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Oct 4, 2014

अस्कोट-आराकोट २०१४-४: तवाघाट-नारायण आश्रम

२४ मई २०१४ 
तवाघाट 
पिथौरागढ़  से हम करीब सुबह दस बजे नारायण आश्रम के लिए दो गाड़ियों में रवाना हुये.  धारचूला से बाहर निकलते ही सेलफोन पर मैसेज आने लगा 'अब नेपाल की सर्विस लागू होती है',  यानि यहाँ  से भारत के किसी भी क्षेत्र में फ़ोन करना है तो I.S.D. लगेगी.  किसी को यहाँ से अपनी तहसील धारचूला या जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ भी फ़ोन करना हो तो उसके लिए ये नेपाल से फोन करने के बराबर है, सबसे नजदीकी अस्पताल धारचूला फ़ोन कम्पनी के हिसाब से विदेश में है.  इन ग्रामीणों को, जो बहुत गरीब हैं, देश के भीतर फ़ोन करने के लिए अन्य भारतीयों के मुकाबिले ज्यादा दाम चुकाना पड़ता  है.
हम धौली गंगा के किनारे-किनारे, पुराने कैलास मानसरोवर मार्ग पर चल रहे हैं,  ऊपर की चट्टानों से छोटे बड़े पत्थर रह रह कर गिर रहे हैं, कंकड़ों की जैसे झड़ी लगी है, सड़क बस एक आइडिया भर रह गयी है. बजरी और कीचड़ पर हमसे पहले गयी गाड़ियों के टायरों के निशान से ही पता लग रहा था कि  यहाँ से कोई गाड़ी गुजरी है,  सड़क  के बीच में बड़ी बड़ी चट्टानों के टुकड़े हैं.  हमारे ड्राइवर ने तवाघाट के आगे अपनी कार ले चलने के लिए मना कर दिया.  एक दो साथियों ने ड्राइवर से धीरे धीरे बढ़ने के लिए कहा कि हमें नारायण आश्रम तक पहुंचा दे, लेकिन ड्राइवर ने हाथ खड़े कर दिए. ड्राइवर के साथ सिर्फ धारचूला तक आने की ही बात तय हुयी थी.  मालूम नहीं किस कनफ्यूज़न में वो आगे निकल आया है. धारचूला में शायद पहले से जीप कर लेने की बात हुयी थी, लेकिन हमारे ग्रूप में किससे हुयी थी मुझे मालूम नहीं.

हम लोग गाड़ी  से उतरे, सड़क के आस-पास सिर्फ दो दुकानें हैं,  सड़क से जरा ऊपर चढ़कर हम एक छोटी सी दूकान में पहुंचे.  ये दूकान शेरसिंह  धामी जी की है, उन्हें यात्रा के बाबत शेखर पाठक जी की चिठ्ठी मिली हुयी है.  धामी जी ने हमें बिठाया, चाय पिलायी.  हर जगह टूट-फूट है,  धामी जी की दूकान भी पहले सड़क पर थी, ये नई दूकान है, जिसे उन्होंने हाल में ही खड़ा किया है.  यहाँ फ़ोन काम नहीं करता, किसी डॉक्टर की सूरत देखने के लिए १४ किलोमीटर दूर धारचूला जाना पड़ता है. लेकिन रस्ते की इस अकेली दूकान पर जाने कहाँ कहाँ से पहुंची कोक, पेप्सी  और बिसलरी की बोतलें हैं, हल्दीराम  के दालमोट, नमक़ीनों  और कुछ  बिस्कुटों के पैकेट हैं.  यहाँ  से ३ किलोमीटर ऊपर चढ़ने पर खेला गाँव बसा है, एक तरह से जर्जर हुए, हिलते, टूटते पहाड़ों के ऊपर.  मालूम नहीं कब तक बचा रहेगा?  

दूसरी गाड़ी में बैठे साथियों का कोई पता नहीं हैं. अब  तक लगता रहा कि दूसरी गाड़ी हमारे आगे है, लेकिन हमारे आगे वो लोग आये नहीं थे. सेलफ़ोन पर सिगनल नहीं आ रहा है, इसीलिए कुछ दूरी पर स्थित सीमा सुरक्षा बल की चौकी से फोन किया गया,  पता चला की दूसरी टीम पीछे धारचूला में लंच  के लिए हमारा इंतज़ार कर रही है. वापस जाना संभव नहीं है तो ये तय हुआ कि  वो लोग हमारे लिए एक जीप भी लेकर पहुंचे. 

इंतज़ार करना ही है तो रास्ते पर आस-पास की टोह लेने का अवसर है. पास ही में जो सीमेंट का बना,  दो कमरों का एक ढांचा है, उसके चारों पिलर्स टेढ़े हो गए हैं, लगभग गिरने को तैयार.  एक पैतीस साल की विधवा और एक किशोरी वहां रहते हैं.  किसी तरह मज़दूरी करके ये लोग अपना पेट पालते हैं, बारिश की तबाही, और धौली गंगा पर बने हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट के बनने के चलते उनके गाँव का घर, खेत सब ख़त्म हो गए.  कुछ मुआवज़ा  मिला तो ये दो कोठरियों के ऊपर लेंटर डाला गया, जो पिछले साल की बारिश में धसक गया, कभी भी गिर सकता है.
घर में कोई फर्नीचर नहीं, बर्तनों के नाम पर एक कड़ाई, एक पतीला और दो थाली, दो गिलास हैं,  कोने में जो गुदड़ी लपेट कर रखी गयी है, संभवत: बिस्तर है.  माँ और बच्ची सड़क पर रोड़ी तोड़ने का काम करते हैं,  लड़की इसके साथ हाईस्कूल भी पास कर ली है.  माँ सिर्फ कुमायूँनी बोलती है, बेटी हिंदी में जबाब देती है. अपनी सहृदयता में दोनों मुझे चाय और खाने के लिए पूछते हैं, मुझे मालूम है कि उनके पास सचमुच कुछ नहीं है , शायद अपने लिए रात भर का खाना भी नहीं.  दुबली पतली काया  की  ये माँ  पैतीस साल में साठ  साल की बूढ़ी दिखती है,  वैसा ही उसका आचरण और मनोभाव है,  गरीब इंसान का एक बरस जी लेना शायद खाते-पीते लोगों के कई बरस जीने के बराबर होता है,  उसके एक साल में कई सालों की जीवनी शक्ति चुक जाती हैं.

सड़क के किनारे कुछ दूरी पर इन. एच.  पी. सी. पॉवर प्रॉजेक्ट की कॉलोनी है. कॉलोनी का कुछ हिस्सा पिछले साल की बारिश में नेस्तनाबूद हुआ. यहाँ से उस विध्वंस के  निशान दिख रहे हैं. इन. एच. पी. सी. ने  धौली पर बड़े हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट बनाये  है, जिसकी  वजह से भी पूरे इलाके में डायनामाइट का  प्रयोग हुआ हैं, और धसकते हुए पहाड़ और अधिक कमजोर हुए हैं,  कई लोगों के घरों में इन धमाकों और कम्पन्न से दरारें पड़  गयीं,  कुछ घर टूट गए. धामी जी की पुरानी दूकान में भी नुकसान हुया और  आसपास का हिस्सा टूट गया है. चूँकि दूकान नहीं टूटी तो उन्हें मुआवजा नहीं मिला है.  धामी कई बड़े अफसरों को पुलिंदा भर अर्ज़ी लिख चुके हैं , लेकिन किसी के कान पर जूं  नहीं रेंगी, अपनी एप्लीकेशन वो हम लोगों को दिखाते हैं.   मुझे इस बारे में  कुछ नहीं मालूम, सो मैं नैनीताल हाईकोर्ट के वकील कैलास तिवारी से कहती हूँ "आप समझे मामला क्या है और कुछ सलाह बनती हो तो दें". धामी एक एक बाद एक हमारे कई साथियों को अपनी अर्जियां दिखाते हैं, मालूम नहीं कि उनका कुछ भी भला हुआ या नहीं, चार फुट के धामी, साधुओं जैसी दाढ़ी, और मरियल काया  के साथ धीरे धीरे ख़त्म होते, टूटते पहाड़ का ही हिस्सा हैं, अब भी जाने किस उम्मीद की नोंक पर टिके.…

दोपहर के तीन बज गए हैं,  हम सबको भूख लगी है, मेरे पास लड्डू का डिब्बा है, उसे खोला गया और दो -दो लड्डू सबने खाए, पानी पिया, और दूसरी टीम का इंतज़ार करने लगे.  स्टीव डर्न  ने इस बीच वापसी का निर्णय लिया और मुझसे कहा कि वो वापस जा रहा है, और  दूसरी टीम  जैसे  ही यहाँ पहुंचेगी वो अलविदा करके दिल्ली की तरफ लौट जाएगा.  अपनी तरफ से उसने तीन वजहें बतायी, पहली ये कि उसकी हिंदी बहुत बढ़िया नहीं है और वो कुछ कॉन्ट्रिब्यूट  नहीं कर पा रहा है.  दूसरी ये कि वो स्प्रिचुअल  इंसान हैं,  ग्रुप के रिसोर्सेस को कंज्यूम करना और बदले में अपनी तरफ से कोई कंट्रीब्यूशन न करने के कारण वो अपना बना रहना नैतिक नहीं समझता,  तीसरा उसके ड्राइवर पर लोग आगे चलने का दबाब बना रहे थे जो उसको अच्छा नहीं लगा.
इस तरह की यात्रा में आना और जाना, दोनों  निहायत व्यक्तिगत निर्णय  हैं, उनके लौट जाने के निर्णय का सम्मान भी करना ही था.  आगे अनिश्चितता है,  दूर दराज़ के जिन इलाकों में हमें जाना था उनके बारे में  ठीक ठीक जानकारी मुझे भी नहीं है,  इसीलिए मेरे पास स्टीव के लिए  आश्वस्ति के कोई शब्द नहीं हैं.  अमूमन जिस तरह  के रिसर्च टूर होते हैं, ये यात्रा उससे भिन्न है.  यहाँ हर व्यक्ति को स्वतस्फूर्त तरीके से अपने लिए रोज़-ब-रोज रहने और खाने-पीने का जुगाड़ करना है,  अपने साथ के लोगों का ध्यान रखना है,  अपने हिसाब से ही लोगों के साथ बातचीत करते हुए  इस यात्रा का सबब और सबक खुद के लिए ढूंढना है.  कुछ देर में दूसरी गाड़ी पहुंची, और शेखरदा को बताकर स्टीव ने विदाई ली.  मुझे देर तक बुरा लगता रहा कि इतनी दूर अपना समय-संसाधन लगाकर स्टीव आया और नाउम्मीद लौट रहा है. थोड़ा आगे तक चलता तो शायद उसकी रिसर्च के लिए और खुद उसके लिए अच्छा अनुभव बनता. फिर ये ख़याल भी आता रहा कि हम उसे कम्फ़र्टेबल बनाने के लिए क्या कर सकते थे? आज पूरे दिन स्टीव ने सुबह से किसी से बात नहीं की थी, और संभवत: खुद को कुछ अलग थलग पाया होगा.  या शायद  उसने अपनी रिसर्च के मद्देनज़र प्रैग्मैटिक निर्णय लिया होगा.

नारायण आश्रम (समुद्र तल से ~ 9,000 फुट/ 2734 मीटर )
दूसरी जीप से  हम लोग शाम को सात बजे करीब नारायण आश्रम पहुंचे. पीठ पर पिठठू  बांधे जैसे ही गेट पर पहुंचे तो आश्रम  मैनेजर पी.  एस. राणा  जी  मिले, और कहने लगे कि हमारे आने की पूर्वसूचना उनके पास नहीं है. उन्हें सिर्फ शेखर पाठक के साथ चार लोगों के आने की ही सूचना है, अट्ठारह  लोगों के आने की नहीं.  उनकी पत्नी और एक आदमी के सिवा आश्रम में कोई नहीं है, इतने लोगों का इंतज़ाम कौन करेगा? आसपास के गाँव के लोग जो आश्रम के काम के लिए मिल जाते हैं, आजकल गाँव में नहीं हैं, सब ऊपर बुग्यालों में यारसा गम्बू के लिए गए हैं.  कौन इतने लोगों के लिए नीचे से पानी भरकर लाएगा?  कौन खाना बनाएगा?   यहाँ से लौटने की कोई सूरत नहीं थी.  हमने राणा जी से कहा की अपनी जरूरत पानी हम खुद भरकर ले आएंगे, उन्हें कष्ट नहीं देंगे.  चन्दन डांगी अपने साथ मैगी के ढेर से पैकेट लाये थे, उन्होंने कहा कि अगर सिर्फ हमें एक पतीले में गरम पानी उबालकर दे देंगें तो हम मैगी  बनाकर खा लेंगें, सोने के लिए हमारे पास अपने स्लीपिंग बैग हैं.  राणा जी फिर नरम पड़  गए और हमें आश्रम के भीतर ले गए,  चाय पिलवाई,  और पत्नी सहित  खाना बनाने में जुट गए,  हमसे कहा कि सिर्फ खिचड़ी बन रही है.  किसी की कोई मदद उन्होंने खाना बनाने में नहीं ली. मेरे पास जो डिब्बे में दो चार लड्डू बचे थे , वो मैंने उनकी पत्नी को दिए, जिसे उन्होंने से ख़ुशी ख़ुशी से ले लिया.  कुछ देर में दूसरी टीम भी पहुँच गयी और एक जीप में चंडीप्रसाद भट्ट जी,  उनके ड्राइवर कंडारी जी, अजय और अमर उजाला के रुद्रप्रयाग के संवादाता अनुसूया प्रसाद  मालासी भी पहुंचे.

आश्रम में बिजली गुल थी, दो कमरों में कुछ सोलर पैनल की वजह से रोशनी थी, बाक़ी भक अँधेरा. हमारे पास टोर्च थीं  तो उसकी सहायता से दो मंजिले  में सोने के कमरों तक पहुंचे, सामान रखा. और फिर प्राथना भवन में इक्कट्ठा हुए.  अमूमन भजन कीर्तन से मैं दूर रहती हूँ, लेकिन वहां जाकर पीछे बैठ गयी,  ये सोच कर कि अपने व्यक्तिगत आग्रह पर बेवजह अड़े रहने का कोई तुक नहीं है,  किसी ग्रुप के साथ आयी हूँ  तो उसके अनुभव में खुले मन से शामिल हो जाऊं, भागीदार की तरह  न सही दर्शक की तरह.  दक्षिण भारतीय पुजारी का कंठ बहुत मीठा है, विठ्ठल स्वामी की आरती के ये भजन अबतक मैंने कहीं सुने नहीं थे, इनकी मौलिकता ने ध्यान खींचा, और अब पूरे दिनभर की उथल -पुथल के बाद कुछ देर एक जगह निश्चिंत होकर बैठ जाना भला लगा. ठेठ भारत के उत्तर के आखिरी छोर पर बसे  इस आश्रम में, दक्षिण भारत  के ये स्वर  जरा भी पराये नहीं लगे और सादगी से पूजा समाप्त हो गयी.  प्रार्थना घर की तिरछी छत लकड़ी की शहतीरों और पैनल्स से बनी है, चुस्त-दुरुस्त पक्का सलीकेदार काम,  दीवारों पर नारायण स्वामी की बहुत सी तसवीरें लगी हैं, उनके ऑटोग्राफ के साथ. नारायण स्वामी के नाम और इन तस्वीरों से मेरा पहली बार परिचय हो रहा है.  अब तक मुझे लगता रहा कि शायद इसका सम्बन्ध स्वामी नारायण सम्प्रदाय से है.   
Photo by Bhupen Singh

पूजा के बाद राणा जी ने नारायण स्वामी का संक्षिप्त परिचय दिया.  नारायण स्वामी कर्नाटक के एक शिक्षित संभ्रांत परिवार में जन्में थे,  और इंजीनियर की तरह उनकी शिक्षा-दीक्षा हुयी थी. वर्ष १९३५ में गढ़वाल कुमायूं के कई हिमालयी क्षेत्रों की  यात्रा करने के बाद वो यहाँ पहुंचे  और उन्होंने इस आश्रम की स्थापना की. पिथौरागढ़ जिले में कई स्कूल भी खोले.  इन स्कूलों के, इस आश्रम के मुख्य शिल्पी और आर्किटेक्ट वो खुद थे.  स्वामी नारायण की जीवनी आश्रम की वर्तमान ट्रस्टी द्रौपदी गर्ब्याल ने लिखी है "परम पूज्य श्री नारायण स्वामी और नारायण आश्रम".   आश्रम में ये किताब मुझे यहाँ नहीं दिखी,  इस किताब पर मेरी नजर मुनस्यारी में किसी के घर पर पड़ी और कुछ पलटने का अवसर मिला.

आश्रम के दो मुख्य भवनों और मेडिटेशन सेंटर के डिटेल प्रभावित करते हैं.   इस आश्रम की पहली इमारत में रसोई, ऑफिस, और यात्रियों के रुकने की व्यवस्था है.  कुछ दूरी पर मेडिटेशन सेंटर है.  दूसरी बड़ी इमारत में नीचे संग्रहालय-लाइब्रेरी है, और उसके ऊपर प्रार्थनाघर.  लायब्रेरी में नारायण स्वामी से सम्बंधित पुस्तकें, उनकी व्यक्तिगत सामग्री और नारायण ट्रस्ट  की चीज़ें हैं.  एक डिबिया में यहीं महात्मा गांधी की राख भी रखी हुई हैं.

आश्रम का रखरखाव बहुत मेहनत से किया गया है, सुरुचिपूर्ण है.  गुलाब, डेफोडिल, नर्गिस, और अज़ेलिया (गुलदस्ता बुरांश ) के फूल खिले थे, खेतों में आलू और दूसरी सब्जियां उग रही हैं, एक कोने में कटी हुयी जौ सूख रही है. आँगन साफ़ सुथरा, क्यारियां करीने से बनी हुई.  ९००० फ़ीट की ऊंचाई पर इस दुर्गम, निर्जन जगह में, कमोड और इटालियन टॉयलेट की सुविधा है,  साफ़ सुथरे टॉयलेट्स हैं,  हालाँकि पानी नहीं है, लेकिन बाहर पानी से भरे ड्रम रखे हुए थे, जो संभवत: बरसात का पानी था.  पानी अपने साथ ले जाना पड़ता है.  पूरे  आश्रम पर स्वालम्बन, सादगी और सेवा भाव की गहरी छाप है.  इसीलिए हैरत नहीं है कि जिम्मेदारी से हर व्यक्ति टॉयलेट को साफ़ दशा में ही छोड़ कर गया है. 

पुराने मिटटी के तेल की चिमनियां के बीच खाना बना और परोसा गया.  राणा जी और उनकी पत्नी ने खिचड़ी, सब्जी, रोटी बनायी थी, और सबको बहुत स्नेह से खाना खिलाया.  पहली दृष्टि  में राणा जी जैसे अनवेलकमिंग दिखे, सचमुच में उसके विपरीत हैं, बहुत नरम दिल और सेवा भाव से भरे हुए. राणा जी चमोली जिले के मूल निवासी है, और सरकारी नौकरी  करते थे, लेकिन जब उन्हें आश्रम में काम का मौका मिला तो नौकरी छोड़ दी. अब करीब पंद्रह वर्षों से इस आश्रम की देखभाल कर रहे हैं. आश्रम के पास कुछ नाली जमीन है,  आश्रम के गुजारे भर की सब्जियां, अनाज, फल आदि इसमें उगाये जातें हैं. दोनों पति-पत्नी लगभग सारा आश्रम सम्भालतें हैं.  राणा जी की पत्नी सरल मन की,  सह्रदय, ग्रामीण गढ़वाली महिला है, बहुत भली और मेहनती. इनवर्ड माइग्रेशन का ये पहला किस्सा मेरे सामने आया. 

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