"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Nov 18, 2014

अस्कोट से आराकोट के बीच कहीं-5


---1---
एक लम्बी नींद थी और सपने में टिमटिमाता दीया किसी ओट.
अभी ही आँखे खुली, अरसे बाद ऐसी सुबह हुई, ये हवा, ये  सन सन्न सन्नाटा.
यहीं कहीं मेरा जन्म हुआ, मेरी शिराओं, धमनियों में बहता यहीं का लवण, और लोह.
बरसों बाद लौटी हूँ, बोल रही हूँ भूली बिसरायी मातृभाषा, खड़ी हूँ निडर...

---२---
आज रस्तेभर पत्थरों की बारिश होती रही लगातार, कभी भी गिर सकती हैं चट्टानें, धसक सकते हैं पहाड़,
ढहती चट्टानों के ऊपर टिके हैं गाँव के गाँव, गुजरते हैं घोड़े-खच्चर/ औरतें-बच्चें/कुत्ते -बिल्ली/ काकड़-हिरण.   
एक दिन खाली हो जाएंगे ये बचे-खुचे गाँव, रोष में ढह कर गिर जाएंगे पहाड़, उजड़ जाएंगी  सड़कें,  बंद सब रस्ते,
नदियां उन्मत और पागल हो जाएंगी,
कौन रोक सकेगा उन्हें ?

---३---
काली नदी के तीर
छोटी सी दूकान में धामी जी बेचते हैं पेप्सी, बिसलरी, कोक और पांच रूपये के पैकेट में जरा सी नमकीन, ढेर सी हवा.
सड़क पर रोडियां तोड़ती, सर से सर मिलाकर बैठी नौ बच्चियाँ, तीन गाँवों से आयीं,
साथ साथ हंसती, एक सी दिखती हैं, एक से अभाव, एक सी जिद में गुँथी,
एक ही हाईस्कूल में पढ़तीं हैं...

---४---
पहाड़ और नदी के बीच, खनन का अनंत सिलसिला है, खप रहे हैं पहाड़, खप रही है नदी,
खप रहे हैं कई-कई हाथ/पीठ/बच्चे-बच्चियां/किशोर-किशोरियाँ/औरतें और औरतें,
दिन दिन भर ढो रहे हैं रेत/बजरी/कंकड़/पत्थर.
तोड़ रहे हैं रोड़ी, बीस रूपये कट्टा रोड़ी, दिन में १० कट्टा रोड़ी.
खप रही है रोड़ी बांध/सड़क/पुलों में,
सुदूर मेट्रोपॉलिटन शहरों के  मॉल्स/बहुमंज़िला इमारतों/मल्टीप्लेक्स सिनेमा घरों में.
मेरे जहन में गूँजता है मशहूर फिल्म 'शिंडलर्स लिस्ट' का डायलॉग जरा हेर-फ़ेर के साथ 'लोग सड़कों, पुल, मॉल्स और इमारतों में रूपांतरित हुए जाते हैं '
कैलास मानसरोवर मोक्ष मार्ग की ये कैसी शुरुआत हुई, बिना रिसर्च के ही लौट गया खुशहाली का शोधार्थी...

---५ ---

गोरी नदी की घाटी में 
छिपे हैं कस्तूरी मृग,  उग रहा है जंबू और धुआँर.
ढ़ाई दिन बीत गया है अब चलते चलते, ढूंगातोली,  बरम, चामी, लुंगती, मौरी, बंगापानी, छोरीबगड़, मदकोट,
बारिश का कहर और नदी लील गयी है खेत, घर,  सड़क, पुल, स्कूल, अस्पताल.  
सब तरफ भूख है, सिर्फ भूख और बेहाली,  
वनराजी, जनजाति,  हरिजन गाँवों के बच्चे और किशोर— अधिक से अधिक कोई तीसरी पास कोई चौथी फेल,
औरतें—चौदह-पंद्रह में  ब्याह, पच्चीस तक अधेड़,  चालीस में विधवा,
वही, वही, घूमफिर कर फिर वही कथा, वही गोल चक्कर, वही फ़सान...

---६ ---
 जौलजीवी में मिलती हैं काली और गोरी  नदी,
वीरान संगम तट, उजाड़ घाट.
दोनों बहनों की धार तेज़, दोनों उफनती हैं, बहाकर लायी हैं कहाँ कहाँ से अगड़मबगड़म.
इंडो-तिब्बत व्यापार
​का ​ सदियों पुराना केंद्र जौलजीवी, अब लगभग भुतहा क़स्बा.
टूटते-ढ़हते दुमंजिले पर पुराने काष्ठ के खिड़की दरवाजों से झांकते, झूलते बच्चे,
और नीचे गोठ में अब तक भरी है रेत, ठूँठ, और कंकण, पत्थर.  
हाथ में कलेवा लिये, संगम की महिमा बखानता, आशीष बांटने को आतुर, देर तक झक मारता रहा एक पंडित,
उसने चाय पी और आखिर हारकर लौट गया...

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3 comments:

  1. बहुत ही अच्छी लगीं । जिन्दाबाद

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  2. brings you so close to nature. Amazing poem.

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  3. "We shall not cease from exploration
    And the end of all our exploring
    Will be to arrive where we started
    And know the place for the first time."
    --T. S. Eliot

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