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Jan 6, 2014

कैलाइडोस्कोप

एक दुनिया बाहर, सौ भीतर
एक फेनिल समंदर यहीं
सतह पर बुलबुले, तल में भार
यहीं मणि, माणिक, मूंगे, सीपी, मोती
यहीं  गहिर अँधेरा, आलोकित संसार
यहीं अंतरदीप्ती
यहीं विस्थापन का आयाम
और डूबने की स्मृति
यहीं हैं संशय के बीस गड्ढे
चाह की सत्तरह पगडंडियां
यहीं हैं याद रह गयी तकलीफ़
भूल जाने की शर्म
भुलाये जाने की टीस
और सांत्वना की फुलझड़ियाँ
यहीं है नमी, बरसात यहीं
यहीं है बरसों बरस ऊँचे हिमखंड 
बालपन की हरियर घाटी यहीं
साथ-साथ चलते पहाड़ यहीं
बहुत बहुत चुप के बीच
'मठु-मठु, छैल-छैल'* की बात यहीं
यहीं है सूरज का एक टुकड़ा 
यहीं हैं प्रगाढ़ स्मृति के बहुरंग
यहीं पतझर
फिर फिर बसंत यहीं...


06jan2014
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'मठु-मठु, छैल-छैल'*: भरी दोपहरी धीमें धीमें, छाया-छाया  में पहाड़ चढ़ लेने की एक गढ़वाली सीख.