Copyright © 2007-present by the blog author. All rights reserved. Reproduction including translations, Roman version /modification of any material is not allowed without prior permission. If you are interested in the blog material, please leave a note in the comment box of the blog post of your interest.
कृपया बिना अनुमति के इस ब्लॉग की सामग्री का इस्तेमाल किसी ब्लॉग, वेबसाइट या प्रिंट मे न करे . अनुमति के लिए सम्बंधित पोस्ट के कमेंट बॉक्स में टिप्पणी कर सकते हैं .

Apr 22, 2014

किसी समय पृथ्वी पर: निकोलाई वाविलोव और जेरेड डायमंड के बीच

आज  "पृथ्वी दिवस" यानी अर्थ डे  है,  हमारी इस प्यारी धरती पर  एक बड़ी सौगात है जीवन की विविधता, इतनी कि डार्विन के समय से 150 वर्ष बीत जाने के बाद भी आजतक इसकी पूरी कैटलॉगिंग नहीं हो सकी.

इस दिन एक विशेष कृषि वैज्ञानिक  निकोलाई वाविलोव याद आते हैं. निकोलाई पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने जैव विविधता को मनुष्य मात्र की अमूल्य धरोहर के बतौर पहचाना, विभिन्न फसलों  के उत्पत्ति  केन्द्रों को सूचीबद्ध किया, बहुत से 'वीड और वाईल्ड प्रजातियों के बीजों को भी इकठ्ठा किया.  १०० साल पहले उन्होंने पांच महाद्वीपों में घूम-घूम कर, हज़ारों मीलों की यात्रा करके, दूनिया के विभिन्न हिस्सों से २००,००० किस्म के बीज संग्रहित कर पहला "सीड बैंक" बनाया.

 निकोलाई ने जिस समय बीजों  को एकत्र  करना शुरू किया उस वक़्त तक जेनेटिक्स  जानकारी बहुत सीमित थी, सिर्फ दो दशक  ही बीते थे 30 सालों तक ठंडे बस्ते में पड़े मेंडल के सिद्वांतों की फिर से खोज को, जेनेटिक्स का टर्म बमुश्किल इस्तेमाल में आया आया ही था.  जेनेटिक मटीरियल क्या है इसके इर्दगिर्द बीसवीं सदी के पहले पचास वर्ष निकल गये. निकोलाई की मौत के करीब बीस वर्ष के बाद डीएनए को आखिरकार जेनेटिक मटीरियल माना गया.  अत:  बीजों का संग्रहण किसी काम आएगा, दुनिया की खाद्य सुरक्षा इसके जरिये सुनिश्चित हो सकेगी का सपना, इसकी समझ उनके समकालीन कुछ वैज्ञानिकों के अलावा किसी के पास नहीं थी.  वो समय  रूस की सर्वहारा क्रांति के बाद का और दो  विश्वयुद्धों के बीच उथल-पुथल का ज़माना था. अकाल से घिरे, दुनिया से लगातार कटते जा रहे रूस में स्टालिन विज्ञान से चमत्कार जैसा कुछ चाहता था.  दूरदर्शी, मेहनती और संजीदा  वाविलोव किसी चमत्कार का सपना नहीं दिखा सकते थे.  

एक औसत से निम्न दर्ज़े के वैज्ञानिक Trofim Lysenko, जो स्टालिन के सर्कल में ज्यादा राजनैतिक पैठ रखता था, ने  हवामहल खड़े किए और स्टालिन को जो चमत्कार चाहिए थे, उनका वादा किया, उसका दावा था कि  बीजों को बोने से पहले ठंडे पानी मे भिगाकर इस लायक बनाया जा सकता है कि वो बड़ी संख्या में अंकुरित हो सकें, और सिर्फ़ भोगोलिक बदलाव उपज को बढ़ाने के लिए काफी हैं.  वाविलोव और उनके सहयोगियों ने  विज्ञान के सरलीकरण का विरोध  किया,  और इसके  बदले अकाल के समय रिसर्च पर अतिशय संसाधन बर्बाद करने के इल्ज़ाम में वाविलोव और कई प्रतिभावान वैज्ञानिको को  बंदी बनाकर साईबेरिया भेज दिया गया, जहाँ देशद्रोह के आरोप में उन्हें जेल, प्रताड़ना, और भूख से मौत मिली.  उधर वाविलोव के सहयोगीयों ने अपनी जान दाँव पर लगाकर, भूखे रहकर, अपनी आँखों के आगे अपने परिवार को भूखे मरते देखकर भी उस समय के एकमात्र सीड बैंक की रक्षा की.  मालूम नहीं क्या आशा और किनके लिए आशा उनके मन में रही होगी ?  आज यही संग्रह  बदलते पर्यावरण,  जीवाणु व् दूसरे परजीवियों से फसलों को बचाने का बीमा है, मानव जाति के अस्तित्व में बने रहने का बीमा है. 

इधर सिर्फ सौ वर्ष बीतें हैं और खेती मानव मात्र की धरोहर के बजाय ग्लोबल कॉर्पोरेशन की मुनाफाखोरी का ज़रिया बन गयी है, रोज़-ब-रोज़ जैव विविधता कुछ कम हो जाती है, आधुनिक खेती के तरीके ले-दे कर पूरी प्रकृति के सम्पूर्ण दोहन पर आधारित है, और बड़ी तेज़ी से पूरी दुनिया में एक से होते जा रहे हैं.  तात्कालिक फायदे के लिए  भविष्य दाँव पर लगाने की हिचक किसी भी नीति नियंता और समाज को नहीं है.  बेहिसाब लूट खसौट और संसाधनों की भागीदारी में जिस तरह का असंतुलन आज पृथ्वी पर है , उसके मद्दे नज़र मशहूर एंथ्रोपोलॉजिस्ट जेरेड डायमंड कह रहे हैं कि  अगर समय रहते हम नहीं चेते, तो सिर्फ अगले 100 वर्षों के भीतर मानव सभ्यता एक बार फिर पाषाण युग में चली जायेगी. जेरेड डायमंड की बतकही , उनकी किताबें, उनकी बातें कुछ यहाँ हैं.

Apr 18, 2014

उलटबासियाँ

सिर्फ गुनगुन आवाज़े हैं
कोई बात नहीं है
कोई जगह है हरी भरी
अकेली, लोगों के बीच घिरी
साफ़ कुछ दिखता नहीं
आँख है कि खुलती नहीं
और ढूंढते रहना जाने क्या क्या
अधूरा चाँद,  आधा वृत्त
दिवंगत दादी
दुगड्डे के बस अड्डे में लीची का ठेला
डोईवाला में योयो, बाक़ूगान
डेनवर में चाट की दूकान
यूँ ही किसी बस में चढ़ जाना
नीम अँधेरे किसी सुनसान में उतरना
जाने कौन शहर पहुंचना
इप्सविच, इम्फाल, इथाका
लेरेमी, लॉन्ग आईलैंड, लाटूर 
बाराबंकी, बंबई, बरोड़ा, बाड़मेर
हतप्रभ हूँ, खो गयी सी  
यहाँ किसी को  जानती नहीं
पहचानती नहीं, रस्ता सूझता नहीं
कोई कहता है
'बीस वर्ष बाद,  इन्ही जगहों पर 
फलाँ -फलाँ  रहते होंगे
बस अभी नहीं हैं. "
सपने के भीतर सपना
खेल के बीच खेल
और उलटबासियाँ 
सपनों के समांतर जीवन .....

Apr 14, 2014

आज भी खरे हैं तालाब-अनुपम मिश्र

शनिवार-इतवार को अनुपम मिश्र की 'आज भी खरे हैं तालाब' पढ़ी. सरल भाषा में तकनीकी और परम्परा का, पानी के संचयन का, सदियों पुराना लेख जोखा. सवाल फिर वही है, परम्पराओं की जड़ता कैसे टूटे और उनमें निहित अच्छी बातें, और ज्ञान को आधुनिक शिक्षा और समाज में कैसे इंटीग्रेट किया जाय? 

किताब पर कुछ और जानकारी यहाँ है।  

 किताब की ऑनलाइन पीडीएफ  भी यहीं से मिल सकती है, नहीं तो लिंक ये रहा.
http://www.indiawaterportal.org/sites/indiawaterportal.org/files/aaj_bhi_khare_hain_talaab_anupam_mishra.pdf


 जिन्हे पानी में और किताब में दिलचस्पी हो  उनके लिए अनुपम मिश्र का इंटरव्यू है.