"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Aug 3, 2014

अस्कोट-आराकोट २०१४ -०१

 'लस्का कमर बाँधा हिम्मत का साथा'
अस्कोट -आराकोट अभियान के बारे में २००७ में विस्तार से जानने का संयोग हुआ, तब से मन में ये इच्छा बनी रही कि  जैसे भी होगा, कुछ दिन के लिए २०१४  के  अस्कोट-आराकोट अभियान में  जरूर शामिल होना है. सात वर्ष बीत गये, २०१४ आ ही गया, बहुत दिनों तक उधेड़बुन चलती रही कि यात्रा का हासिल क्या होगा, छोटे बच्चों को यूँ महीने भर के लिए छोड़ कर जाना, एक झटके में सालभर की छुट्टी ख़त्म कर लेना, आदि ठीक होगा या नहीं?  बच्चों के मन में भी उत्साह था कि उनकी माँ  इस तरह की किसी यात्रा के बारे में सोच रही है, पंकज के मन में इस बाबत कोई संशय नहीं था, मुझे पहाड़ जाने को कहा.
फिर  मेरा भी मन बन गया कि  खुले मन से पहाड़ पर कुछ समय के लिए जा रही हूँ, बचपन और किशोरावस्था के भूगोल को फिर एक बार वयस्क आखों से देखने जा रही हूँ, सपनों के भीतर जिस लैंडस्केप में बार बार जाती रहती हूँ, उसका इतने वर्ष बीत जाने पर कैसा हाल है उसे देखने जा रही हूँ, बिना किसी अपेक्षा के, बिना पहले से जाने हुए उद्देश्य के, बिना ये जाने भी कि  कितना आगे तक जा सकूंगी, बिना इस डर के कि यात्रा के पहले ही ध्वस्त हो जाऊँगी या नहीं .…
भारत जाने की टिकट बुक हो गयी, यात्रा के लिए सामान जुटाने और पैक करने में बच्चे मेरी मदद करने लगे: स्लीपिंग बैग, तोलिया, ४  जोड़ी कपड़े, एक जैकेट,  एक बरसाती, पानी की बोतल, दवाईयाँ, कैमरा, ट्राइपॉड, वॉइस रिकॉर्डर, बैकअप बैटरीज व डिस्क,  एक नोटबुक और पेन, मच्छरों से बचने के लिए क्रीम, हाइकिंग पोल्स, वाटर फ़िल्टर व टेबलेट्स. 
 
देहरादून पहुँच गयी हूँ, टेलीविजन पर चौबीसों घंटे  महिलाओं से बलात्कार की और उनकी हत्या की खबरे आ रहीं हैं , बदायूँ  में बलात्कार के बाद दो किशोरियों की हत्या के बाद पेड़ पर  लटकाने की खबर चल रही है. शौच को जाते वक्त, स्कूल आते-जाते, बाजार कुछ सामान खरीदने जाते समय, लगता है किसी भी समय किसी भी महिला का अपहरण हो सकता है,  बलात्कार और हत्या उत्तर भारत में आम बात हो गयी है.  ऐसे माहौल में लड़कियां इस देश में जरा सा भी सपना, कोई भी सपना कैसे देख सकती हैं? 
माता-पिता  को  ऊबड़-खाबड़, भूस्खलन वाले रास्ते और  साथ में कौन लोग जा रहे हैं इसकी चिंता है.  मालूम नहीं मेरे अलावा कौन लड़कियां या महिलाएं इस यात्रा में हिस्सेदारी कर रहीं हैं?  अस्कोट-आराकोट की पिछली दो यात्राओं में कुछ महिलाओं की भागीदारी रही है, इसीलिए उम्मीद है कि  अधिक संख्या में न सही कुछ महिलाएं और छात्राएं होंगी.

विदा के समय माँ ने एक गिलास, और कटोरा दिया, हिदायत दी, रोज एक बार फोन करने को कहा, पिताजी ने एक शीशी में जोंकों से बचने के लिए नमक और पिथौरागढ़ और चमोली के दुर्गम भूगोल की जानकारी दी और अगर रास्ता ठीक न हो तो लौट आने को कहा.

हल्द्वानी में जगदीश ददा सुबह सुबह रेलवे स्टेशन लेने आये, उनके घर पर ही मेरी बहन तारा और उसकी बेटी भी आ गयी, बेटी को पहली बार ही देखा, अर्चना भाभी से भी पहली बार ही इतने समय तक बातचीत हुयी.  कुछ समय पुराने दिनों की याद और बातचीत के बीच हमने कुछ समय बिताया,  पुरानी अल्बम में तस्वीरें देखी, फिर नैनीताल जाने के लिए टैक्सी पकड़ी.  

नैनीताल तक का घुमावदार रास्ता मुझे नॉस्टालजिया से भरता है,  १३ साल से १८ साल तक इस रास्ते में बहुत सी यात्रायें की हैं , कुछ पैदल, कुछ बस या जीप  में.  रानीबाग पहुंचते ही पहला धक्का लगता है , एच. एम. टी. फैक्ट्री और पूरी की पूरी कॉलोनी किसी भुतहा खण्डर में बदल गयी है, मालूम था कि फैक्ट्री बंद हो गयी, मन ये कहीं उम्मीद थी कि  शायद इस इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल किसी दुसरे संस्थान के लिए किया जा सकेगा, कम से कम एक स्कूल या कॉलेज यहाँ बन ही सकता था.  लेकिन ये सब इस कदर खंडहर हो गया की बात मालूम नहीं थी,  इस तरह का दुःस्वप्न मन में नहीं था. हम छोटे ही थे, शायद मिडिल स्कूल में, जब ये फैक्ट्री शुरू हुयी थी, और २०-२५ साल में इसका जीवन पूरा हो गया.…
 
बीस साल बाद नैनताल
 मालूम नहीं, क्यों बीस साल बीत गए आखिरी बार नैनीताल आये हुए, हर बार जब भारत जाना हुआ सोचती रही नैनीताल भी जाना है, नहीं जा सकी.  अब इतने सालों बाद लौटी तो दिखता  है शहर के भीतर सब बदल गया है. कॉलेज जाने वाला लाल खड़ंजों वाला का रस्ता अब सीमेंट के बदरंग रास्ते में बदल गया है, पूरे रास्ते में दुकान और छोटी कोठरियां बन गयी हैं,  कंस्ट्रक्शन चल रहा है, रास्ता कहीं दीखता नहीं.  मालरोड़ पर बेतहाशा भीड़ है,  फ्लैट्स में चलने की जगह नहीं है,  ठंडी सड़क पर भी चलने की जगह नहीं ही बची, सड़क चौड़ी हो गयी है.  ठंडी पर दो बदसूरत मंदिर बन गए हैं, सड़क के बीचों बीच किसी सत्संग का कार्यक्रम चल रहा है, उसके लाउडस्पीकर से निकली आवाज़ से पूरा शहर गूँज रहा है, जहाँ सड़क ख़त्म होती है, वहां  ठसाठस बाज़ार है, लगता है किसी अंधेरी सुरंग के भीतर आ गए हैं , एक के बाद एक दुकानों में प्रवेश किये बिना बाहर निकलना संभव नहीं, फिर सिर्फ बाहर निकलने की आशा रहती है , लेकिन अब बाहर जैसा कुछ बचा नहीं, चलने की जगह भी नहीं, अब सब तरफ अब ठेले, दुकाने, रेस्टोरेंट्स हैं, चलने की जगह और खुली हवा में सांस लेने की जगह सचमुच में फ्लैट्स में नहीं बची. पहले कभी शहर में नीचे मालरोड या ठंडी पर कोई शौकिया स्कूटर या मोटरसाइकिल दिखती थी, अब कोई गली नहीं बची, कोई और कैसा भी अटपटा रास्ता नहीं बचा जहाँ मोटरसाइकिल न दिखी हो, और चलने वाला व्यक्ति बेफ़िक्र  होकर चल सके. 
इस  बदलाव को देखकर दिल टूटता है,  लगातार बदसूरती बढ़ती चली जा रही है , जो कुछ अच्छा था, सहेज लेने लायक था, वो ख़त्म होता चला गया, ख़त्म होता जा रहा है. ...  



तल्लीताल से शेखर दा का घर सीधी चढ़ाई है, इतना याद है, पिट्ठू और स्लीपिंग बैग पीठ पर और हाथ में एक पानी की बोतल और हैंड बैग लेकर चढ़ना आसान नहीं रहा, लेकिन फिर पहुँच गयी, बहुत वर्षों के बाद उमा जी से मुलाकात हुयी, रुपीन को आख़िरी बार लखनऊ में देखा था, तब बहुत छोटी बच्ची थी, अब वो पी.एच.डी. कर रही है. भाभी से पहली बार इतनी ढेर सारी बातें हुयी, रुपी से भी, उनके घर की लाइब्रेरी में बहुत सी किताबें दिखी, स्टडी डेस्क के ठीक ऊपर गौरादेवी की बड़ी सी तस्वीर,  इसे देखकर मुझे शेखर दा के बहुत पहले लिखे एक लेख (एक थीं गौरा देवी: एक माँ के बहाने चिपको आन्दोलन की याद) की याद हो आती है, जिसको पढ़ते हुए मैंने जाना था कि गौरादेवी कौन थी, उनकी और उनकी साथिनों की चिपको आंदोलन में क्या भूमिका रही. यहीं पहाड़ के अनाजों के बारे में एक किताब "बारहनाजा" दिखी,  शिवप्रसाद डबराल जी की लिखी पूरी सीरीज दिखी, और बहुत सी किताबें दिखीं, कुछ के नाम लिखे, कुछ को देखकर ख़ुशी हुयी,  आश्वस्ति हुयी कि ये किताबें कहीं मौजूद हैं. पहाड़ के कुछ अंक, और पहाड़ प्रकाशन से ही छपी "गिरदा समग्र", "एशिया की पीठ पर – पंडित नैन सिंह रावत", चंद्रकुँअर बर्त्वाल की "इतने फूल खिले" और इसका अंग्रेज़ी अनुवाद ,' और 'The Boy from Lambata" छांटकर देहरादून के लिए पोस्ट करती हूँ. जैसे जीवन में बहुत सी जगहों पर जाना बचा रह जाएगा, बहुत से अपने समकालीनों से मिलना नहीं हो सकेगा,  वैसे ही ही बहुत सी किताबें पढ़ना भी हमेशा छूटा रहेगा, लेकिनजानने की इच्छा, पढ़ लेने की इच्छा लगातार बनी रहती है.

शेखर दा लगातार फ़ोन पर कई लोगों से बात करते रहे, साथ ले जाने वाले सामान, साहित्य, अतिरिक्त बरसातीयाँ, नक्शा, बैनर आदि का इंतज़ाम करते रहे.  अगले दिन कोटद्वार से कमल जोशी आ गये, हमारा परिचय पहले का था लेकिन ठीक से बातचीत का मौका इसी बार बना.  यात्रा के बारे में मैंने चलने से पहले फेसबुक पर एक स्टेटस डाला था  
 'इस बात को लेकर उत्साह है कि इस महीने के आख़िर में अस्कोट -आराकोट पदयात्रा में पहाड़ को देखने समझने का मौका मिलेगा, शरीर बहुत दुरुस्त नहीं है, भीतर से डर है कि यात्रा शुरू होने के पहले ही निढ़ाल न हो जाऊं, लेकिन फिर जीवन में कभी भी कुछ दुरुस्त कहाँ रहा? अपने मन की ताकत पर भरोसा है, वो मुझे सात समंदर पार इस देश में खींच ले आयी तो फिर पहाड़ मेरा अपना ही घर है "

इसी स्टेटस पर अभिषेक मिश्रा जो मेरे फेसबुक मित्र है, ने प्रतिक्रिया दी थी कि
"अस्कोट आराकोट अभियान बौद्धिक टूरिज़्म है, आम लोगों का  इससे कोई भला नहीं होगा'.  

 मैं खुद बिना गए किसी तरह का क्लेम नहीं करना चाहती थी. मेरे अपने लिए तो मकसद यही था कि कुछ बेलौसपन में पहाड़ का भीतरी इलाका, और ग्रामीण समाज देखकर आया जाय.  इतने बड़े देश में, और यहाँ तक की उत्तराखंड जैसे छोटे प्रदेश में भी आम और ख़ास लोगों की किस्मत मौजूदा इकोनॉमी और राजनीति के गठजोड़ से तय होगी, मेरी इस बड़े खेल में कैसी भी भागेदारी नहीं है, आम आदमी या औरत की क्या स्थिति है, मुझे ये भी नहीं मालूम, चूँकि बीस वर्ष से यहाँ नहीं रहती. मुझे इस बात का भी कोई मुगालता नहीं है कि इस यात्रा में जाने से किसी का भला होगा.  मुझे सिर्फ इतनी उम्मीद है कि मेरा अपना मन कुछ हरा होगा, मेरा सम्बन्ध पहाड़ से कुछ और गहरा होगा.
कमल जोशी ने, जो इस यात्रा में पहले भी शिरकत कर चुके हैं, ने अभिषेक को सम्बोधित करते हुए लिखा था "प्यारे अभिषेक, (संबोधन के लिए क्षमा, मैं ६० साल का हूँ शायद तुम मुझसे उम्र में , अनुभव नहीं कह रहा, छोटे होगे. तुम्हारे उत्साही comment के लिए धन्यवाद. मैं तीन बार अस्कोट आराकोट यात्रा में भाग ले चुका. पुरी यात्रा में. और अब भी हिस्सा लेने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा. बस ये पूछना है तुमसे कि  ये किसने कहा की ये यात्रा कॉमन आदमी के हालात को बदलने की यात्रा है. दरअसल ये यात्रा अपने आप को पहचानने की यात्रा है! हम अपनी ईगो त्याग कर समग्र में, वास्तविकताओ के बीच अपनी insignificance समझ सकें, ये इसकी यात्रा है. हम पहाड़ के बारे में थोड़ा सा ज्यादा इमानदारी से बात कर सकें इस बात की यात्रा है, ये दूसरों को बदलने की यात्रा नहीं, खुद को पहचान कर बदलने की यात्रा है. ...! फिर भी यात्रा के बारे में तुम्हारी ना-इत्तेफाकी हो सकती है, यही तो लोकतंत्र है..!"

कमल जोशी जी की प्रतिक्रिया से और फिर नैनीताल में उनसे बातचीत से, बीच-बीच में शेखर दा से और फिर दुसरे साथियों से पुरानी यात्राओं के किस्सों से इस यात्रा की कुछ समझ बननी शुरू हुयी, पहाड़ के अस्कोट आराकोट यात्रा अंक को पढ़ते हुए भी कुछ बाते, कुछ रेफेरेंस समझ में आने लगे.  लेकिन फिलहाल मैंने कोई फार्मूला न गढ़ने, अपने लिए भी किसी उद्देश्य को अपरिभाषित रखने का मन बनाया, मतलब कि जैसा होगा देखा जाएगा, बारिश आयेगी तो बरसाती ओढ़  ली जायेगी, लेकिन पहले तो धूप  और हवा का अानन्द लिया जाएगा. 

नैनीताल में धूप और ताप दोनों किसी लिहाज से देहरादून से कम नहीं है, इतनी गरमी की अपेक्षा मेरी नहीं थी.  लेकिन जिस तरह से सीधी धूप लगातार पड़ती रही  मेरे चेहरे पर दो दिन में ही सनबर्न से कुछ फफोले जैसे हो गए. पहले कभी इस तरह की याद नहीं है कि ऐसा हुआ हो. नार्थ अमेरिका की तीखी धूप में हमेशा सनस्क्रीन लगाने की याद रहती है क्यूंकि यहाँ अल्ट्रावॉयलेट विकिरण बहुत ज्यादा है.  भारत में अमूमन मैं  कभी सनक्रीम नहीं लगाती, लेकिन लगता है कि लगानी पड़ेगी ही, संभव है कि अब चालीस पार मेरी त्वचा की बनावट में अंतर आ रहा हो.  

नैनीताल में गिरदा की पत्नी  हीरा जी (हेमलता तिवारी) से मेरी पहली मुलाक़ात हुयी. अत्यंत सौम्य और बहुत भली महिला, गिरदा की ही तरह भावुक और पारदर्शी व्यक्तित्व, बहुत देर तक हम गिरदा के बारे में बात करते रहे फिर थोड़ी देर तक मालरोड़ पर टहलते रहे. हीराजी गिरदा के नाम से एक छोटा सा संग्रहालय बनाना चाहती हैं, काश ऐसा हो सके. आने वाली पीढ़ी गिरदा के बारे में जान सके. हीरा जी से मेरी पहले जब गिरदा जीवित थे, तब एक दो बार फ़ोन पर बात हुयी थी. उनसे मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा, माँ  के जैसा उनका स्नेह हमेशा याद रहेगा.

फिर  मनु दी और उनके दोनों बच्चों से मुलाकात हुयी, उनके  बेटे बहुत छोटे थे जब बीस साल पहले देखा था, और दोनों जवान बच्चे हैं , दुनिया भर की बातों के बारें में सोचते विचारते, अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद में. ज़हूर दा और मुन्नी जी से भी छोटी मुलाकात हुयी, दीपा से मिलना नहीं हुआ, आखिर तक असमंजस रही,  शिरीष से भी मिलना नहीं हुआ, उम्मीद करती हूँ फिर कभी मिलना होगा. रिश्तेदारों, मित्र, परिचितों का स्नेह, बीस वर्ष में कुछ  नहीं बदला सिवाय इसके कि तब के जवान लोग धीरे-धीरे बूढ़े होते जा रहे हैं, और ५-१० साल के तब के देखे बच्चे अब जवान हो गए है, उनसे एक तरह अब पहली बार ही रूबरू होना हुआ.

२३ तारीख को नैनताल के सेवॉय होटल से अस्कोट-आराकोट टीम की विदाई हुयी, अपने पुराने अध्यापकों में डा. मलकानी और डा सुधीर चन्द्रा जी से फिर से मिलना सुखद रहा.  डा. वल्दिया ने विदाई भाषण  दिया और जोर देकर कहा कि  खासकर दूर दराज़ के इलाकों में जा कर स्कूलों की स्थिति देखकर हम लोग आयें, अब तक मुझे नहीं मालूम था कि डा. वल्दिया नैनीताल में हैं, नहीं तो संभवत: उनसे मिलने की कोशिश करती, कुछ बातचीत करती, लेकिन अब मौका नहीं है.  थोड़ी देर की बातचीत राजीव लोचन साह जी से, कर्नल मेहता से हुयी, फिर कई विदा करने आये लोगों से.
दिल्ली से प्रकाश उपाध्याय, भूपेन सिंह, चन्दन डांगी, हिमानी, स्टीव डर्न, कर्नल देवप्रकाश  डिमरी और बी एस  नेगी जी भी नैनीताल पहुँच गए हैं.

सेवॉय  के ठीक सामने पिछाड़ी बाज़ार का वो घर है जहाँ करीब चालीस सालों तक मेरे ताऊजी का परिवार रहा, अब ताऊजी  नहीं हैं, ताई जी भी नहीं, भाई-बहन सब दूसरी जगहों में अपनी नौकरी और परिवारों के साथ हैं.  उस  छोटे से तीन कमरे के मकान के साथ जो हमेशा घर होने का अहसास जुड़ा था, आज वो नहीं है.  समय के साथ देखते-देखते सारे जुड़ाव फिर से परिभाषित करने पड़ते हैं , कुछ स्थायी नहीं रहता.

 दो गाड़ियों में सवार होकर करीब १६ लोग, जिनमें मेरे सिवाय अंजलि और हिमानी भी हैं, नैनीताल से निकले. इमोशनल लेवल पर लगता है, जैसे यहाँ से कहीं गयी ही नहीं, या बस कल गयी, आज लौट आयी. दूसरे किसी धरातल पर फिर पहाड़ी शहरों का इकहरापन घेरने लगता है, और उनके लगातार बढ़ते सैलानी मिज़ाज़ से नफरत होने लगती है, मन कहता है बुरा क्या हुआ जो चले गए, ये शहर पीछे छूट गया, जो था पहले यहाँ, अब वो भी नहीं बचा. लेकिन फिर भी कुछ छूट गये की उदास धारा भीतर बहती रहती है…