"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Sep 20, 2014

अस्कोट -आराकोट अभियान -03 : पिथौरागढ़

२३-२४ मई २०१४

अल्मोड़ा से पिथौरागढ़ के लम्बे पहाड़ी  रास्ते पर बीच-बीच में छितरी आबादी की झलक मिलती है, रह रह कर, दरक गए पहाड़ दिखते हैं, मालूम नहीं कि ये सिर्फ पिछले साल की बारिश की ही तबाही है, या कुछ सालों में हुयी बारिशों का मिलाजुला असर, किसी भी साल की बारिश क्यों इन पहाड़ों को बख़्श देने वाली है?  वो पेड़ जो अपनी जड़ों में नमी संजोंकर मिट्टी को बांधे रख सकतें हैं बहुत कम है,  जल्दी जल्दी कटान हो सके इसीलिए पहाड़ों में सिर्फ और सिर्फ जल्दी बढ़ने वाले चीड़ का ही प्लांटेशन किया गया है,  देवदार के भरे पूरे पेड़ के लिए सौ साल कौन इंतज़ार करे ?

 चारों ओर हिमालय का अथाह विस्तार है, अच्छी, खुशनुमा धूप, और ठंडी हवा है.   रास्ते में १०-१० रूपये में काफल बेचने वाले लड़के हैं.  हम लोग एक चाय की दुकान पर कुछ देर रुके तो वहीं परपारम्परिक नीली-पीली पौशाक में छलिया नर्तकों की एक टीम मिली, जो किसी बारात में जा रहे हैं.  सभी छलिया नर्तक पुरुष हैं, स्त्रियोचित मेकअप में, काली पेन्सिल की भवें, लिपस्टिक, रूज़, मस्कारा और माथे पर छोटी छोटी लाल सफ़ेद बिंदियाँ.   हमारी रिक्वेस्ट पर एक छोटा सा झोड़ा ये लोग सुनाते हैं,  एक बारगी मुझे चीनी फिल्म 'फेरवेल माई कोनकुबाइन' की याद हो आती है.

छलिया नृत्य मुख्यत: पिथौरागढ़ और नेपाल के कुछ इलाकों में बेहद लोकप्रिय पारम्परिक नृत्य है, कुछ वैसे ही जैसे गढ़वाल में पांडव नृत्य है.  यह युद्ध का स्वाँग है.  छलिया नर्तक पुरुष प्राचीन सैनिकों जैसी वेशभूषा धारण कर तलवार और ढाल लेकर युद्ध-नृत्य करते हैं, ढोलिया एक तरह से पूरे नृत्य का संचालक होता है, और साथ में दमाऊ, रणसिंग, तुरही और मशकबीन भी बजते रहे हैं.  नृत्य नाटिका का मुख्य नैरेटिव युद्धभूमी में छल के महत्त्व पर केंद्रित रहता है, और कई तरह की व्यूह रचनाओं का वर्णन और स्थानीय राजाओं और नायकों की विजयगाथाओं की क़िस्सागोई चलती रहती है. बीच बीच में जब नर्तक विराम लेते हैं, तो गायक चांचरी की तान छेड़ देता है.  छल से ही 'छलिया' या 'छोलिया' नाम पड़ा है.

लगातार तीन चार घंटे से बिना रुके गाड़ी चल रही है, निर्जन लैंडस्केप में शाम ढलते ढलते लगता है कि कौन देश है? इतनी दूर तक जाकर लोग क्यों बस गए, और अब तक क्यों यहाँ बने हुए हैं.  मेरे पिता दस वर्षों तक पिथौरागढ़ के कई छोटे कस्बों में रहे, हम लोग माँ  के साथ नैनीताल जिले में ही अपनी पढ़ाई करते रहे. इतने वर्षों बाद ये देखना कि पिथौरागढ़ की वो तमाम जगहें, लोहाघाट, धारचूला, चल्थी, मुनस्यारी, तवाघाट कैसी हैं, किन रास्तों से होकर पिताजी वहां जाते थे , मेरे लिए एक तरह की व्यक्तिगत भरपायी है.

 एक जगह एक बड़ा ट्रक खड्ड में गिरा हुआ है, शायद जबतक इसके  अवशेष प्रकृति में मिल नहीं जाएंगे तब तक पड़ा रहेगा, इतनी गहरी खाई से निकलने का कोई रास्ता नहीं है.  हमारा ड्राइवर हिमांचली है, पहाड़ से वाकिफ है लेकिन इस रुट पर पहली बार आया है, शाम  ढलने लगी है, और उसके माथे अगले दिन की भी चिंता है कि इस पूरे रास्ते उसे दिल्ली तक अकेला ही लौटना पड़ेगा. इस सबके अलावा वो खुशमिज़ाज नौजवान है, बीच बीच में काँगड़ी में गीत सुनाता है, दिल्ली में उसका कोई उत्तराखंडी दोस्त है जिसने उसे गढ़वाली-कुमायूँनी गाने भी सिखाये हैं.

ये  ड्राइवर स्टीव ड्रन के साथ दिल्ली से आया है. स्टीव सिटी यूनिवर्सिटी न्यू यॉर्क में प्रोफ़ेसर हैं.  उनकी रिसर्च का विषय खुशहाली है.  खुशहाली को लेकर और विभिन्न देशों और समाजों की 'हैप्पीनेस इंडेक्स' को लेकर कुछ बातचीत हम लोग करते हैं. स्टीव ने बॉलीवुड की फिल्मों को लेकर कुछ भारतीय संस्कृति और समाज को समझने की कोशिश की है,  कई भारतीय शहरों में घूमकर उन्होंने लोगों से बात की है.  मैंने  स्टीव से कहा कि बॉलीवुड की फिल्में फ्रॉड हैं, उसका भारतीय समाज से कुछ लेना देना नहीं है.  वो महज इंटरटेनमेंट शो है, और जो बातचीत उसने घूमकर बड़े शहरों में सिर्फ मर्दों से की है वो भी सही तस्वीर नहीं बताती. खुशहाली की असली तस्वीर औरतों, बच्चों, ग्रामीण और हाशिये पर खड़े समुदायों की भागीदारी के बिना नहीं बनायी जा सकती है.

लगभग रात के आठ बजे हम पिथौरागढ़ पहुंचे, वहां अधिकतर लोगों के रुकने का इंतज़ाम ललित खत्री जी के मेघना होटल में है. मैं, अंजली और हिमानी, शेखर दा  के साथ उनकी दीदी  के घर पहुँचते है. रास्ते में ललित पंत जी के घर होते हुए, जो पुराने अस्कोट-आराकोट  यात्राओं के भागीदार रहे हैं. लक्ष्मी दीदी के घर पर उनकी दो बहुएं और तीन  छोटे छोटे नाती-नातिन हैं. अभी तक की तो लगता है यात्रा हुयी नहीं, घर के ही आराम के बीच हूँ.

जेटलेग का असर या जो भी, अच्छी ही बात है कि  सुबह उठने में परेशानी नहीं हुई, पांच बजे तक नहाकर तैयार हो  गयी हूँ, हल्का सा धुंधलका है , लेकिन चिड़ियों की बड़ी मीठी मीठी आवाज़ें आ रही हैं....

उजाला हुआ तो सामने दूर दूर तक फैली बसावट नज़र आ रही है, बहुत बड़ी खुली घाटी, लगभग समतल घाटी.  पहाड़ी शहरों में मुकाबिले प्रकृति ने पिथौरागढ़  पर विशेष कृपा की है.  शहर में बहुत घनी बसावट है, अधिकतर मकान सीमेंट के, अपेक्षाकृत हवादार हैं, मोर्डर्न हैं. पारम्परिक घर अब नहीं के बराबर हैं , या फिर वो हैं जिन्हे  लोग छोड़ कर चले गए हैं, या फिर बहुत गरीब लोगों के जिनके पास फिलहाल नए तरह के घर बनाने के लिए संसाधन नहीं है. पुराने घर लगभग उजड़ते हुए घर हैं.

मुझे पहाड़ी शहरों की पुरानी ढलवा छतें याद आती हैं,  अपने गाँव के घर की छत भी याद आती है, ढलवा छत की पठाल पर धीरे धीरे चलते हुये मेरी  दादी  खीरे और दाल की बड़ियाँ चादर पर फैलाती थी, फल और सब्जियों को पर धूप में सुखाती थी, ताकि सर्दी के दो महीनों की गुजर के लिए हमारे पास स्टॉक रहे.  दीवाली के ठीक पहले और होली के बाद यहीं  छतों पर महीने भर गद्दे, रजाईयां , और कालीन सूखते थे.  बच्चों को छत पर चढ़ने की मनाही थी फिर भी मैं  छत पर चुपके से बेडू  तोड़ने जाती ही थी. कभी चमचमाती रही होंगीं लेकिन दो सौ वर्षों पुराने उस घर की छत की पठालें गहरी स्लेटी और काली थी, खूब चटक धूप से दिन भर नहायी रहती थी, किसी तरह के मॉस या लाइकन, कोई नमी उनपर नहीं थी.  छत के अलावा ढैपर (एटिक)  को टटोलने में मुझे विशेष आनंद आता था,  एकदम से रहस्यलोक , घर में कोई नहीं जानता था की ढैपर में ठीक ठीक क्या है?   वहां मुझे अपने पिताजी और चाचा की स्कूल के जमाने की कॉपी किताबें मिली,  सौ-साल पुराने बारहसिंगा के सींग दिखे, घर के पुराने बड़े बर्तन, और बहुत सा अटरम-पटरम. पहाड़ में नए घरों में अब ढैपर नहीं है, ढलवा छत नहीं.…  

आठ बजते बजाते पूरा दल बाहर निकलने को तैयार है, कुछ १०-१५ मिनट मैं छोटे बच्चों के साथ बैठती हूँ, बच्चा पूछता है अमेरिका में क्या क्या है? मैं उसे अपने फ़ोन पर कुछ तस्वीर और वीडियो क्लिप्स दिखाती हूँ, बच्चा कहता है अरे यहीं के जैसा है. माउंट सेंट हेलेंस की और क्रेटर लेक की तस्वीर उसको अच्छी लगती है, ज्वालामुखी के मुँह  से निकलता धुँआ भी रोमांच से भरता है.  मुझे रवि की याद आती है, कैसे लगभग एक उम्र के सारे बच्चे एक से होते हैं, एक जैसे क्यूरियस, एक जैसे निर्दोष और उत्साह से भरे...

हम लोग घर से विदा लेते हैं,  आत्मीय विदा,  और मेघना होटल पहुँचते हैं, वहां ललित खत्री जी ने नाश्ते का इंतज़ाम किया है, एक तरह से खाना ही है , क्यूंकि अब सचमुच अनिश्चितता से भरी यात्रा शुरू होती है.  मेघना बहुत साफ़ सुथरा और अपने डिजायन में मोर्डर्न रेस्टोरेंट और होटल है.  जाते समय मैंने  एक रसगुल्ला खाया और फिर एक किलो लड्डू बंधवा लिए.  इसी बीच चलने की तैयारी हो रही है, और भूपेन के साथ हम दो तीन लोग पिथौरा का किला, जिसमें अब तहसील कार्यालय है, देख आतें हैं, वहां से पूरे शहर का नज़ारा बहुत ही खूबसूरत दिखता है, बाजार की थोड़ी टहल कर आतें हैं, और फिर धारचूला होते हुए नारायण आश्रम की तरफ कूच करते हैं......

Sep 12, 2014

छुट्टी के दो दिन


आज फिर धूल फांकी,
फालतू चीज़ों से घर से खाली किया
इस्तरी की, कपड़े-लत्ते तहाये
मन अटका रहा
दिन निकल गया

​कुछ देर घाम में बैठी
कुछ देर गुमते, घुमते हिसर टूंगे
रस्ते पर एक सांप ​दिखा
दो खरहे, एक कनगोजर
दिन निकल गया

***

Sep 3, 2014

अस्कोट से आराकोट -०२- अल्मोड़ा

23 मई 2014

नैनीताल से अल्मोड़ा जाते समय लगभग घंटे भर तक भवाली में जाम लगा रहा, लेकिन फिर रास्ता खुला तो अल्मोड़ा की तरफ आगे बढ़ने लगे.

जिस कार में बैठी हूँ उसमें मेरे साथ गिरिजा पांडे, स्टीव ड्रन, चन्दन डांगी, भूपेन सिंह,  देव प्रकाश डिमरी और बी. एस. नेगी हैं. कई तरह की बातें हो रहीं हैं प्रधानमंत्री  मोदी के वर्किंग स्टाइल की, लोगों का आपसी परिचय,  पहाड़ से जुड़ाव की बात, और फिर देश दुनिया की भी. कब किस बात का सिरा कहाँ जुड़ जाएगा तय नहीं.  चन्दन की आवाज मीठी है, वो बीच बीच में कई पहाड़ी गीत सुनाते चल रहे हैं,  भूपेन भी संगत करते चलते हैं.  स्टीव समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और खुशहाली पर रिसर्च करने आये हैं, स्वभाव से कम बोलने वाले  हैं,  वे अच्छी हिंदी बोलते हैं , लेकिन जब तक उनसे सीधे कुछ न पूछा जाय, कोई बात नहीं करते.

गिरिजा पांडे पहाड़ के मिथकों, लोककथाओं, लोक देवताओं से लेकर पहाड़ के इतिहास की तमाम बातों को रोचक ढंग से बताते चलते हैं.  गोलू, हरु, सैम आदि देवताओं के जागर के बारे में गिरिजा को सुनते लगता है किसी सपने में वापसी है, जैसे ये सबकुछ पहले सुना था, लेकिन अब कुछ भी याद नहीं सिवाय इसके कि ये नाम कहीं गहरे स्मृति में दबे हैं, ये कथाएं किसी बिसराये खाने में हैं. पहाड़ी जागरों की, जगरियों की, उनकी बजती थाली और  देवी देवता आये लोगों को देखने की बहुत बचपन की याद है, एक भय मिश्रित जुगुप्सा की याद है.  मैंने इन सब चीज़ों को किशोरवय तक आते आते अंधविश्वास के खाते में डाल दिया, फिर कभी पलट कर नहीं देखा. एक सहज जिज्ञासा में कुछ और चीज़ें पता चल सकती थीं, उसका भी रास्ता बंद हो गया.  मैं समझती हूँ कि बचपन की वो कुछ कुछ जादू, रहस्य भरी स्मृति मेरे लिए अमूल्य है.

सड़क के दोनों तरफ छितरे हुए चीड़ के जंगलों की और इस रास्ते के पुराने लैंडस्केप की कुछ याद मेरे मन के भीतर है, २९ वर्ष बाद अल्मोड़ा जा रही हूँ, एक पूरा युग बीत गया  है, बचपन के तीन वर्ष इस शहर में गुजरे हैं, अल्मोड़ा से खट्टी मीठी यादें जुड़ी हैं, इसी शहर में पहले पहल विज्ञान में रूचि हुयी,  साहित्य पढ़ना शुरू किया, कविता लिखना भी १२-१३ साल की उम्र में,  यहीं पढ़ने -लिखने  के संस्कार के बीज पड़े. जितनी तबकी मुझे याद है, अमूमन अधिकतर मकान पठाल की तिरछी छतों वाले थे, सरकारी मकान और कार्यालय लाल और हरे रंग के टिन की तिरछी छत वाले.  अल्मोड़ा के कारीगर जिस सफाई से पत्थर की स्लेटें काटते थे, उसकी प्रसिद्धि पूरे उत्तराखंड में थी. आज सड़क से जितना दिख रहा है, कोई पठाल की तिरछी छत वाला घर ढूंढें नहीं मिल रहा है. सब नए पुराने मकान अब सीमेंट के  लेंटर वाले हैं,  सब जगह सपाट छतें हैं.  संभव है कि मुख्य बाजार के भीतर अब भी कुछ पुराने पठाल की छत बची रह गयीं हों, लकड़ी के खूबसूरत दरवाजे बचे हो. अल्मोड़ा छोड़कर इतने वर्षों बाद भी कभी कभार इस शहर के सपने मुझे आते रहते हैं.  मेरा बहुत मन हो रहा था कि एक बार फिर पल्टन बाजार से लाला बाज़ार तक पैदल घूमकर आ जाऊं,  हनुमान मंदिर और थाना बाज़ार के बीच वो घर देख आ जाऊं जहाँ हम रहते थे, स्कूल तक फिर एक बार पैदल टहल कर आ सकूँ, कपड़े की दुकानों में हर जगह लहराते पिछौड़े और ताँबे के खूबसूरत नक़्क़ाशी वाली गागरें, और दुसरे बर्तन देख कर आ जाऊं,  लेकिन फिर सबके साथ ही निकलना था तो ऐसा हो नहीं सका.

अल्मोड़ा के सेवॉय होटल में  एक सभा हुयी, २०-३० लोग आये.  शमशेर सिंह बिष्ट जी से पहली बार मुलाकात हुयी,  पहली बार ही उन्हें सुनना भी हुआ.   शेखर दा ने यात्रा के बारे में घंटे भर का लेक्चर दिया, पूरे हिमालयी क्षेत्र की एक-एक नदी, नालें, झीलें, चोटियां, घाटियां  और बुग्याल, उनकी भौगोलिक स्थिति और उनसे जुड़ा कई तरह का डेटा उन्हें मुँहज़बानी याद है.  शेखर दा ने सबका परिचय भी कराया,  मेरे  परिचय की भी जाने अनजाने जो टोन बनी वो यही बनी कि अमेरिका से आयी रिसर्चर है.  मैं अपने देखे पहाड़ की लड़की थी, लोगों के देखे अमेरिका से लौटी रिसर्चर. कई तरह की आइडेंटीटीज के बीच जूझते  हुए अब पूरा जीवन निकल गया है तो अब मेरे लिए ये हैरानी का विषय नहीं है,  लेकिन आइडेंटिटी के ये खेल मुझे रोचक लगते हैं. मैंने श्याम मनोहर जोशी जी को याद किया कि जब 'कसप' का ठेठ अल्मोड़िया नायक इस शहर में 'देबिया  टैक्सी ' के नाम से पहचाना गया, तो मेरी क्या बिसात?

दाल भात खाकर हम पिथोरागढ़ की ओर रवाना हुए, अल्मोड़े से जरा बाहर शैलेश मटियानी का गाँव बाड़ेछीना और एन. एस. थापा का गाँव लम्बाटा दिखा.  सड़क के आस-पास भी गाँव दिखे, कुछ लोगों से बातचीत हुयी तो पता चला कि गाँव में पानी की दिक्कत है, इस अच्छे मौसम में पहले जो फलसब्जी इफरात में उग जाते थे अब संभव नहीं है.  पानी के स्रोत अधिकतर सूख गए हैं और जो बचे हैं उनका पानी प्रभावशाली लोगों के रिसॉर्ट में पहुँच जाता है.  टूरिज़्म इंडस्ट्री के मॉडल पर प्रदेश का विकास होगा तो फिर गाँव के हिस्से पानी कहाँ से आएगा?  फ़ायदा  जाने कितने लोगों को हुआ लेकिन फल और सब्जी बेचकर शहर के आस-पास के लोगों की जो आमदनी होती थी वो अब बंद हो गयी है. घर के आँगन में कोई हरियाली नहीं है.

रास्ते में गिरिजा हमें 'लक्खू उडियार' दिखाते हैं, उडियार की भीत पर भित्तिचित्र हैं, अधिकतर चित्रों में बहुत से लोग साथ-साथ हैं, जानवर, फूल, पेड़  और कुछ चिन्ह हैं, बमुश्किल एक जगह एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा है, शायद कबीलाई राजा रानी या इष्ट देव व देवी. गिरिजा बताते हैं कि उत्तराखंड में पुरातात्विक महत्त्व की इस तरह की पांच गुफाएं हैं. अच्छी बात है कि उत्तराखंड में हज़ारों वर्षों से लोग रहते हैं, सब मुसलामानों के अत्याचार से भागकर पहाड़ नहीं आये हैं.