"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Oct 14, 2014

AAA14: पांगू से यात्रा की विधिवत शुरुआत

25 मई 2014
"मन का घोड़ा, कसकर दौड़ा, मार चला मैदान 
चलता मुसाफिर  ही पायेगा मंजिल और मकाम "

नारायण आश्रम में विधिवत आज अस्कोट -आराकोट यात्रा का शुभारम्भ हुआ. शेखर दा ने श्रीदेव सुमन को याद करते हुए यात्रा का शुभारम्भ किया, कुछ दिशा निर्देश दिये, और बताया कि आगे क्या अपेक्षित है. चंडीप्रसाद भट्ट जी ने प्रार्थना करवायी, और एक गीत भी सबसे गवाया "मन का घोड़ा,  कसकर दौड़ा, मार चला मैदान '.  पहले एक पंक्ति वो गाते, जिसे हम लोग दोहराते.  82 वर्ष के चंडीप्रसाद भट्ट बहुत स्वस्थ और दमखम वाले इंसान है, संकरी, ऊंची-नीची पगडंडियां चढ़ने-उतरने में संकोच नहीं करते, उत्साह से भरे हैं.  उनकी आवाज बुलंद है, उसमें किसी तरह का संकोच नहीं है और उच्चारण साफ़ है.   उनके लिए ऊंची आवाज में गाना,  नारे लगवाना, किस्से सुनाना,  कविता पाठ, और लोगों को सम्बोधित करना, सब सांस लेने जैसा सहज है. हिंदी और गढ़वाली दोनों भाषाओं पर उनकी पूरी पकड़ है, खाने, पहनावे, रहन-सहन में किसी ग्रामीण पहाड़ी किसान की सी सादगी है, लेकिन सामाजिक-राजनैतिक  समझ तीखी है, व्यक्तित्व तेजस्वी है.  अपने जीवन में मेरे लिए ये पहला अनुभव है किसी सर्वोदयी क़िस्म की प्रार्थना में शामिल होने का.   
Photo by Sushma Naithani

राणाजी  और उनकी पत्नी ने हमें चाय और हलवा खिलाकर विदा दी. ये विदा कुछ घर जैसी ही थी, स्नेहसिक्त, वैसी नहीं जैसी किसी होटल को छोड़कर जाते हुए होती है. भट्ट जी जिस जीप से आये थे, अभी दो तीन दिन वो हमारे साथ रहेगी, इसीलिए पीठ का बोझ फिलहाल इस जीप में रख दिया है और  लगभग खाली हाथ या एक छोटे से बैग और पानी की बोतल लिए हुए हम लोग पांगू की  तरफ पैदल निकल पड़े.  जल्द ही चलने की रफ़्तार के आधार पर चार पांच ग्रुप बन गए. सबसे  रफ़्तार वाले शेखर दा, प्रकाश उपाध्याय, गिरजा पांडे, कैलाश तिवारी, कमल जोशी आदि कुछ मिनटों में ही आँख से ओझल हो गए.  कुछ लोग दूर से दिखते रहे, मैं सबसे पीछे चलने वालों में रही, मेरा साथ देने भूपेन, अंजलि और हिमानी थे.

नारायण आश्रम से पांगू तक  सड़क काफी ठीक हालत में है, हम दो तीन गांवों से होकर गुजरे लेकिन किसी से ज्यादा बातचीत के लिए नहीं रुके, चूँकि  ठीक ग्यारह बजे पांगू पहुँचने का तय हुआ था. इस इलाके में पांगू सहित चौदह गाँव हैं जिन्हे चौदास कहते हैं, इन गांवों में रंग भाषा बोली जाती है, और यहाँ के लोग भोटिया या शौका जनजाति के अंतर्गत आते हैं. भोटिया लोग पारम्परिक रूप से भारत, नेपाल, तिब्बत के बीच  घूमंतू ब्यापारी रहे हैं. अच्छे मौसम में ये लोग छह महीने घर रहते और बाक़ी छह महीने घूमंतू व्यापारी की तरह रहते रहे हैं, व्यापार के इन छह महीनों को रंग भाषा में 'कुंचा' (पलायन) कहते हैं.  शौक़ा और भोटिया लोग पहाड़ के सबसे समृद्ध लोगों में से रहे हैं, और रंग भाषा के अलावा हिमालयी क्षेत्र की कई भाषाएँ ये लोग जानते हैं.  भारत-चीन की १९६२ की लड़ाई के बाद सदियों पुराना इंडो-तिब्बत व्यापार बंद हो गया और जीवन यापन के लिए सरकार ने भोटिया लोगों को आरक्षित जनजाति की सूची में शामिल किया, आज विभिन्न सरकारी नौकरियों में और ऊंची नौकरियों में इस समुदाय के लोग हैं.
Photo by Sushma Naithani

 पांगू गाँव लगभग सड़क पर ही हैं.  सड़क पर गाँव की तरफ जानेवाला एक गेट या मुख्यद्वार है , यहाँ स्वतंत्रता संग्रामी परिमल सिंह हयांकि के नाम का बोर्ड लगा है.  अस्कोट आराकोट की १९८४ और १९९४ की यात्रा के समय इस गाँव में पहाड़ की टीम का स्वागत परिमल सिंह जी ने किया था.यहीं  स्युसंग (शिव) का  मंदिर है, और 15X 25  फुट का प्रांगण है.  हमारे इस गाँव में सूत्र कर्णसिंह और जगत सिंह हैं जो स्वर्गीय परमल सिंह हयांकि के पोते हैं.  करीब साठ साल के, नाती पोतों  वाले कर्णसिंह खुशमिजाज और रंगीले व्यक्तित्व के आदमी हैं, उन्होंने कुछ घूँट लगा रखी है, लेकिन उसका इतना ही असर है कि वो निसंकोच हमें रंग भाषा में गीत सुना रहे हैं, नाच भी जा रहे है,  जैसे सोलह सत्रह साल के लौंडे हो, और भावुक हो रहे हैं बात बात पर. किसी तरह की अभद्रता उनके व्यवहार में नहीं है.

जगत सिंह मुझे महिलाओं से मिलवाने ले जाते हैं, कुछ महिलाएं अभी अभी खेत से ही लौटी हैं और अपने हाथ-पैर धो रही हैं, करीब पचपन साल की गीता देवी का शरीर  कसा हुया है, चेहरे पर चमक, सरलता और मातृत्व का मिलाजुला मीठा भाव है. उन्होंने हमें अपने पारम्परिक जेवर दिखाए, कालीन बुनने की हथकरघा मशीन दिखायी, बने हुए करीब बीस खूबसूरत कालीन भी दिखायें. इसमें से  कालीन उनकी बहु प्रेमा ने बुने हैं. प्रेमा दो बच्चों की माँ  है, और उसकी शिक्षा एम. ए. तक हुई है, लेकिन वो खेती, घर के कामों और कालीन डिजायन करने और बुनने में  निपुण है, जो  परिवार की जीविका का मुख्य स्रोत है.

 गीता देवी के घर के आँगन में प्लम का पेड़ है , और एक दुसरे पेड़ को वो टिमाटर का पेड़ बता रहीं हैं, इस तरह का चौड़े पत्तों वाला पेड़ मैंने पहले कभी नहीं देखा, जितना समझ में आता है, उससे यही लगता है, कि टमाटर की जंगली बेल हो सकती है या बड़े छोटे पौधे, लेकिन लगभग प्लम के जैसा पेड़ नहीं हो सकता. शायद टमाटर की तरह दिखने वाला कोई खट्टा फल इस पेड़ पर लगता होगा, जिसका इस्तेमाल ये लोग टमाटर की जगह करते हैं.  बातचीत में जैसे कल पता चला कि कुमायूँनी में हर नदी को गंग (यानि गंगा) कहते हैं, शायद इसी तरह इस पेड़ को टमाटर का पेड़ कहते होंगे.
Photo by Sushma Naithani

गाँव के अधिकतर घर साफ़ सुथरे और ईंट सीमेंट वाले हैं, अधिकतर घरों की बेटियां, बहुएं, लड़के सरकारी नौकरियों में है. गाँव में अच्छी खेती हैं, अच्छा मौसम है, बहुत से लोग सरकारी नौकरी करने के बाद गाँव वापस लौटें हैं, या फिर गाँव और शहरों के बीच आते जाते रहतें हैं. लेकिन गाँव में अस्पताल और स्कूल की दिक्कत अब भी है.  नजदीकी अस्पताल करीब चालीस किलोमीटर दूर धारचूला में ही है. चौदास के इन गाँवों के बीच एक ए. एन. एम. है. औरतें बहुत मेहनती हैं, और आम शहरी महिलाओं  से ज्यादा स्वस्थ और फिट दिखती हैं, ज्यादा निर्भय भी हैं.    

चन्द्रादेवी गाँव की चुनी हुई  प्रधान हैं, उनकी उम्र करीब चौसठ वर्ष है, वो इस गाँव की बेटी हैं और रिटायर्ड शिक्षिका हैं. उनके चेहरे पर मास्टरनी वाली सख़्ती की बजाय बहुत ममता और मीठापन है. उनका स्वभाव दोस्ताना और ऐसा है कि उनसे किसी को भी सहज प्रेम हो जाय, फट से अपनापा बन जाय. गाँव की तरफ से उन्होंने हमारा स्वागत किया, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं की गाँव के उनके भाई उन्हें बहुत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. उनसे बातचीत में पता चला कि आठवीं कक्षा के बाद उनकी शादी हो गयी थी, लेकिन कुछ वर्ष बाद पति किसी दूसरी महिला के साथ रहने लगा तो वो अपने मायके लौट आयी और फिर से पढ़ाई शुरू की, बी.टी.सी. की और प्राथमिक विधालय में शिक्षिका हो गयी. कई आस-पास के गाँवों, सोसा, गुंजी, धारपांगू, ज्योतिपांगू आदि के गाँवों में उन्होंने पढ़ाया. क्या संयोग कि  इस तरह की प्यारी औरत को जीवन में प्रेम नहीं मिला.  लेकिन स्वाभिमान और खुद्दारी की गहरी छाप उनके चेहरे पर है. जीवन के प्रति कोई कटुता भी नहीं है.
Photo by Sushma Naithani

भोटिया लोगों में शादी ब्याह के तरीके कुछ अलग हैं और संपत्ति के बंटवारे में कुछ मातृसत्ताक रिवाज़ भी हैं.  मुझे सिर्फ कुछ इस तरह की बात याद है कि  बसंत के महीने या किसी मेले में लड़के और लड़कियां अपने जीवन साथी का चुनाव खुद करते हैं.  यहाँ महिलाओं से इस रिवाज़ के बारे में पूछती हूँ तो जबाब मिलता है कि पुराने रिवाज़ के अनुसार सिर्फ पुरुष को अपने लिए पत्नी चुनने का अधिकार था, जो लड़की किसी पुरुष को पसंद आ गयी, वो उस लड़की पर रंग फेंक देता था और वो स्त्री रिवाज़ के अनुसार उसकी हो जाती. यदि स्त्री नहीं मानती थी तो उसे उठाकर जंगल में ले जाते थे, और जबतक वो अपनी नियति स्वीकार नहीं कर लेती गाँव वापस नहीं लाते थे. आज की लड़कियों को इत्मीनान है कि ये पुरानी प्रथा अब समाप्त हो गयी है, गुंडई करके मर्द अब किसी लड़की को जबरन नहीं ले जा सकते,  लड़की और उसके माता-पिता की सहमति के बिना अब कोई शादी नहीं हो सकती.

मंदिर के प्रांगण में कर्णसिंह, जगत सिंह समेत गाँव के मर्द हमारे लिए इस बीच खाना बना रहे हैं, दाल-भात  और आलू-टमाटर-न्युट्रिला की सब्जी, और हमारे साथी गीत गा  रहे हैं, गिरदा के लिखे गीत, नरेंद्र नेगी के गीत, शेरदा  अनपढ़ के गीत.  कुमायूँनी गीतों की और बीच बीच में रंग भाषा में छौंक लगाते हुए कर्णसिंह के गीत भले लग रहे हैं. फिर फैज़ के 'हम मेहनतकश ' की बारी आयी, जिसे बहुत मीठी आवाज और जोश के साथ गाया गया लेकिन, फैज़ का ये गीत इस जगह मेरे कानों को अटपटा और एलियन लगता है.  फैज़ इतने अजनबी मुझे कभी नहीं लगे.
Photo by Sushma Naithani

खाने के बाद विदा का वक़्त हुआ तो शेखर पाठक ने पांगू और उसके आसपास के गाँवों के लोगों को याद किया, यात्रा के बारे में एक छोटा सा भाषण दिया, और इसी बीच बारिश शुरू हो गयी, भट्ट जी ने भी लोगों को धन्यवाद दिया और पहाड़ की आन्दोलनों की परम्परा और विशेष रूप से चिपको आंदोलन को याद किया, गाँव के लोगों को विदाकर, बरसाती ओढ़कर हम लोग वापस तवाघाट की तरफ निकले.

तवाघाट पहुँचते पहुँचते रात हो गयी और वहीँ एन. एच. पी. सी. के गेस्टहाउस में हमने रात बितायी.    

Oct 4, 2014

अस्कोट-आराकोट २०१४-४: तवाघाट-नारायण आश्रम

२४ मई २०१४ 
तवाघाट 
पिथौरागढ़  से हम करीब सुबह दस बजे नारायण आश्रम के लिए दो गाड़ियों में रवाना हुये.  धारचूला से बाहर निकलते ही सेलफोन पर मैसेज आने लगा 'अब नेपाल की सर्विस लागू होती है',  यानि यहाँ  से भारत के किसी भी क्षेत्र में फ़ोन करना है तो I.S.D. लगेगी.  किसी को यहाँ से अपनी तहसील धारचूला या जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ भी फ़ोन करना हो तो उसके लिए ये नेपाल से फोन करने के बराबर है, सबसे नजदीकी अस्पताल धारचूला फ़ोन कम्पनी के हिसाब से विदेश में है.  इन ग्रामीणों को, जो बहुत गरीब हैं, देश के भीतर फ़ोन करने के लिए अन्य भारतीयों के मुकाबिले ज्यादा दाम चुकाना पड़ता  है.
हम धौली गंगा के किनारे-किनारे, पुराने कैलास मानसरोवर मार्ग पर चल रहे हैं,  ऊपर की चट्टानों से छोटे बड़े पत्थर रह रह कर गिर रहे हैं, कंकड़ों की जैसे झड़ी लगी है, सड़क बस एक आइडिया भर रह गयी है. बजरी और कीचड़ पर हमसे पहले गयी गाड़ियों के टायरों के निशान से ही पता लग रहा था कि  यहाँ से कोई गाड़ी गुजरी है,  सड़क  के बीच में बड़ी बड़ी चट्टानों के टुकड़े हैं.  हमारे ड्राइवर ने तवाघाट के आगे अपनी कार ले चलने के लिए मना कर दिया.  एक दो साथियों ने ड्राइवर से धीरे धीरे बढ़ने के लिए कहा कि हमें नारायण आश्रम तक पहुंचा दे, लेकिन ड्राइवर ने हाथ खड़े कर दिए. ड्राइवर के साथ सिर्फ धारचूला तक आने की ही बात तय हुयी थी.  मालूम नहीं किस कनफ्यूज़न में वो आगे निकल आया है. धारचूला में शायद पहले से जीप कर लेने की बात हुयी थी, लेकिन हमारे ग्रूप में किससे हुयी थी मुझे मालूम नहीं.

हम लोग गाड़ी  से उतरे, सड़क के आस-पास सिर्फ दो दुकानें हैं,  सड़क से जरा ऊपर चढ़कर हम एक छोटी सी दूकान में पहुंचे.  ये दूकान शेरसिंह  धामी जी की है, उन्हें यात्रा के बाबत शेखर पाठक जी की चिठ्ठी मिली हुयी है.  धामी जी ने हमें बिठाया, चाय पिलायी.  हर जगह टूट-फूट है,  धामी जी की दूकान भी पहले सड़क पर थी, ये नई दूकान है, जिसे उन्होंने हाल में ही खड़ा किया है.  यहाँ फ़ोन काम नहीं करता, किसी डॉक्टर की सूरत देखने के लिए १४ किलोमीटर दूर धारचूला जाना पड़ता है. लेकिन रस्ते की इस अकेली दूकान पर जाने कहाँ कहाँ से पहुंची कोक, पेप्सी  और बिसलरी की बोतलें हैं, हल्दीराम  के दालमोट, नमक़ीनों  और कुछ  बिस्कुटों के पैकेट हैं.  यहाँ  से ३ किलोमीटर ऊपर चढ़ने पर खेला गाँव बसा है, एक तरह से जर्जर हुए, हिलते, टूटते पहाड़ों के ऊपर.  मालूम नहीं कब तक बचा रहेगा?  

दूसरी गाड़ी में बैठे साथियों का कोई पता नहीं हैं. अब  तक लगता रहा कि दूसरी गाड़ी हमारे आगे है, लेकिन हमारे आगे वो लोग आये नहीं थे. सेलफ़ोन पर सिगनल नहीं आ रहा है, इसीलिए कुछ दूरी पर स्थित सीमा सुरक्षा बल की चौकी से फोन किया गया,  पता चला की दूसरी टीम पीछे धारचूला में लंच  के लिए हमारा इंतज़ार कर रही है. वापस जाना संभव नहीं है तो ये तय हुआ कि  वो लोग हमारे लिए एक जीप भी लेकर पहुंचे. 

इंतज़ार करना ही है तो रास्ते पर आस-पास की टोह लेने का अवसर है. पास ही में जो सीमेंट का बना,  दो कमरों का एक ढांचा है, उसके चारों पिलर्स टेढ़े हो गए हैं, लगभग गिरने को तैयार.  एक पैतीस साल की विधवा और एक किशोरी वहां रहते हैं.  किसी तरह मज़दूरी करके ये लोग अपना पेट पालते हैं, बारिश की तबाही, और धौली गंगा पर बने हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट के बनने के चलते उनके गाँव का घर, खेत सब ख़त्म हो गए.  कुछ मुआवज़ा  मिला तो ये दो कोठरियों के ऊपर लेंटर डाला गया, जो पिछले साल की बारिश में धसक गया, कभी भी गिर सकता है.
घर में कोई फर्नीचर नहीं, बर्तनों के नाम पर एक कड़ाई, एक पतीला और दो थाली, दो गिलास हैं,  कोने में जो गुदड़ी लपेट कर रखी गयी है, संभवत: बिस्तर है.  माँ और बच्ची सड़क पर रोड़ी तोड़ने का काम करते हैं,  लड़की इसके साथ हाईस्कूल भी पास कर ली है.  माँ सिर्फ कुमायूँनी बोलती है, बेटी हिंदी में जबाब देती है. अपनी सहृदयता में दोनों मुझे चाय और खाने के लिए पूछते हैं, मुझे मालूम है कि उनके पास सचमुच कुछ नहीं है , शायद अपने लिए रात भर का खाना भी नहीं.  दुबली पतली काया  की  ये माँ  पैतीस साल में साठ  साल की बूढ़ी दिखती है,  वैसा ही उसका आचरण और मनोभाव है,  गरीब इंसान का एक बरस जी लेना शायद खाते-पीते लोगों के कई बरस जीने के बराबर होता है,  उसके एक साल में कई सालों की जीवनी शक्ति चुक जाती हैं.

सड़क के किनारे कुछ दूरी पर इन. एच.  पी. सी. पॉवर प्रॉजेक्ट की कॉलोनी है. कॉलोनी का कुछ हिस्सा पिछले साल की बारिश में नेस्तनाबूद हुआ. यहाँ से उस विध्वंस के  निशान दिख रहे हैं. इन. एच. पी. सी. ने  धौली पर बड़े हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट बनाये  है, जिसकी  वजह से भी पूरे इलाके में डायनामाइट का  प्रयोग हुआ हैं, और धसकते हुए पहाड़ और अधिक कमजोर हुए हैं,  कई लोगों के घरों में इन धमाकों और कम्पन्न से दरारें पड़  गयीं,  कुछ घर टूट गए. धामी जी की पुरानी दूकान में भी नुकसान हुया और  आसपास का हिस्सा टूट गया है. चूँकि दूकान नहीं टूटी तो उन्हें मुआवजा नहीं मिला है.  धामी कई बड़े अफसरों को पुलिंदा भर अर्ज़ी लिख चुके हैं , लेकिन किसी के कान पर जूं  नहीं रेंगी, अपनी एप्लीकेशन वो हम लोगों को दिखाते हैं.   मुझे इस बारे में  कुछ नहीं मालूम, सो मैं नैनीताल हाईकोर्ट के वकील कैलास तिवारी से कहती हूँ "आप समझे मामला क्या है और कुछ सलाह बनती हो तो दें". धामी एक एक बाद एक हमारे कई साथियों को अपनी अर्जियां दिखाते हैं, मालूम नहीं कि उनका कुछ भी भला हुआ या नहीं, चार फुट के धामी, साधुओं जैसी दाढ़ी, और मरियल काया  के साथ धीरे धीरे ख़त्म होते, टूटते पहाड़ का ही हिस्सा हैं, अब भी जाने किस उम्मीद की नोंक पर टिके.…

दोपहर के तीन बज गए हैं,  हम सबको भूख लगी है, मेरे पास लड्डू का डिब्बा है, उसे खोला गया और दो -दो लड्डू सबने खाए, पानी पिया, और दूसरी टीम का इंतज़ार करने लगे.  स्टीव डर्न  ने इस बीच वापसी का निर्णय लिया और मुझसे कहा कि वो वापस जा रहा है, और  दूसरी टीम  जैसे  ही यहाँ पहुंचेगी वो अलविदा करके दिल्ली की तरफ लौट जाएगा.  अपनी तरफ से उसने तीन वजहें बतायी, पहली ये कि उसकी हिंदी बहुत बढ़िया नहीं है और वो कुछ कॉन्ट्रिब्यूट  नहीं कर पा रहा है.  दूसरी ये कि वो स्प्रिचुअल  इंसान हैं,  ग्रुप के रिसोर्सेस को कंज्यूम करना और बदले में अपनी तरफ से कोई कंट्रीब्यूशन न करने के कारण वो अपना बना रहना नैतिक नहीं समझता,  तीसरा उसके ड्राइवर पर लोग आगे चलने का दबाब बना रहे थे जो उसको अच्छा नहीं लगा.
इस तरह की यात्रा में आना और जाना, दोनों  निहायत व्यक्तिगत निर्णय  हैं, उनके लौट जाने के निर्णय का सम्मान भी करना ही था.  आगे अनिश्चितता है,  दूर दराज़ के जिन इलाकों में हमें जाना था उनके बारे में  ठीक ठीक जानकारी मुझे भी नहीं है,  इसीलिए मेरे पास स्टीव के लिए  आश्वस्ति के कोई शब्द नहीं हैं.  अमूमन जिस तरह  के रिसर्च टूर होते हैं, ये यात्रा उससे भिन्न है.  यहाँ हर व्यक्ति को स्वतस्फूर्त तरीके से अपने लिए रोज़-ब-रोज रहने और खाने-पीने का जुगाड़ करना है,  अपने साथ के लोगों का ध्यान रखना है,  अपने हिसाब से ही लोगों के साथ बातचीत करते हुए  इस यात्रा का सबब और सबक खुद के लिए ढूंढना है.  कुछ देर में दूसरी गाड़ी पहुंची, और शेखरदा को बताकर स्टीव ने विदाई ली.  मुझे देर तक बुरा लगता रहा कि इतनी दूर अपना समय-संसाधन लगाकर स्टीव आया और नाउम्मीद लौट रहा है. थोड़ा आगे तक चलता तो शायद उसकी रिसर्च के लिए और खुद उसके लिए अच्छा अनुभव बनता. फिर ये ख़याल भी आता रहा कि हम उसे कम्फ़र्टेबल बनाने के लिए क्या कर सकते थे? आज पूरे दिन स्टीव ने सुबह से किसी से बात नहीं की थी, और संभवत: खुद को कुछ अलग थलग पाया होगा.  या शायद  उसने अपनी रिसर्च के मद्देनज़र प्रैग्मैटिक निर्णय लिया होगा.

नारायण आश्रम (समुद्र तल से ~ 9,000 फुट/ 2734 मीटर )
दूसरी जीप से  हम लोग शाम को सात बजे करीब नारायण आश्रम पहुंचे. पीठ पर पिठठू  बांधे जैसे ही गेट पर पहुंचे तो आश्रम  मैनेजर पी.  एस. राणा  जी  मिले, और कहने लगे कि हमारे आने की पूर्वसूचना उनके पास नहीं है. उन्हें सिर्फ शेखर पाठक के साथ चार लोगों के आने की ही सूचना है, अट्ठारह  लोगों के आने की नहीं.  उनकी पत्नी और एक आदमी के सिवा आश्रम में कोई नहीं है, इतने लोगों का इंतज़ाम कौन करेगा? आसपास के गाँव के लोग जो आश्रम के काम के लिए मिल जाते हैं, आजकल गाँव में नहीं हैं, सब ऊपर बुग्यालों में यारसा गम्बू के लिए गए हैं.  कौन इतने लोगों के लिए नीचे से पानी भरकर लाएगा?  कौन खाना बनाएगा?   यहाँ से लौटने की कोई सूरत नहीं थी.  हमने राणा जी से कहा की अपनी जरूरत पानी हम खुद भरकर ले आएंगे, उन्हें कष्ट नहीं देंगे.  चन्दन डांगी अपने साथ मैगी के ढेर से पैकेट लाये थे, उन्होंने कहा कि अगर सिर्फ हमें एक पतीले में गरम पानी उबालकर दे देंगें तो हम मैगी  बनाकर खा लेंगें, सोने के लिए हमारे पास अपने स्लीपिंग बैग हैं.  राणा जी फिर नरम पड़  गए और हमें आश्रम के भीतर ले गए,  चाय पिलवाई,  और पत्नी सहित  खाना बनाने में जुट गए,  हमसे कहा कि सिर्फ खिचड़ी बन रही है.  किसी की कोई मदद उन्होंने खाना बनाने में नहीं ली. मेरे पास जो डिब्बे में दो चार लड्डू बचे थे , वो मैंने उनकी पत्नी को दिए, जिसे उन्होंने से ख़ुशी ख़ुशी से ले लिया.  कुछ देर में दूसरी टीम भी पहुँच गयी और एक जीप में चंडीप्रसाद भट्ट जी,  उनके ड्राइवर कंडारी जी, अजय और अमर उजाला के रुद्रप्रयाग के संवादाता अनुसूया प्रसाद  मालासी भी पहुंचे.

आश्रम में बिजली गुल थी, दो कमरों में कुछ सोलर पैनल की वजह से रोशनी थी, बाक़ी भक अँधेरा. हमारे पास टोर्च थीं  तो उसकी सहायता से दो मंजिले  में सोने के कमरों तक पहुंचे, सामान रखा. और फिर प्राथना भवन में इक्कट्ठा हुए.  अमूमन भजन कीर्तन से मैं दूर रहती हूँ, लेकिन वहां जाकर पीछे बैठ गयी,  ये सोच कर कि अपने व्यक्तिगत आग्रह पर बेवजह अड़े रहने का कोई तुक नहीं है,  किसी ग्रुप के साथ आयी हूँ  तो उसके अनुभव में खुले मन से शामिल हो जाऊं, भागीदार की तरह  न सही दर्शक की तरह.  दक्षिण भारतीय पुजारी का कंठ बहुत मीठा है, विठ्ठल स्वामी की आरती के ये भजन अबतक मैंने कहीं सुने नहीं थे, इनकी मौलिकता ने ध्यान खींचा, और अब पूरे दिनभर की उथल -पुथल के बाद कुछ देर एक जगह निश्चिंत होकर बैठ जाना भला लगा. ठेठ भारत के उत्तर के आखिरी छोर पर बसे  इस आश्रम में, दक्षिण भारत  के ये स्वर  जरा भी पराये नहीं लगे और सादगी से पूजा समाप्त हो गयी.  प्रार्थना घर की तिरछी छत लकड़ी की शहतीरों और पैनल्स से बनी है, चुस्त-दुरुस्त पक्का सलीकेदार काम,  दीवारों पर नारायण स्वामी की बहुत सी तसवीरें लगी हैं, उनके ऑटोग्राफ के साथ. नारायण स्वामी के नाम और इन तस्वीरों से मेरा पहली बार परिचय हो रहा है.  अब तक मुझे लगता रहा कि शायद इसका सम्बन्ध स्वामी नारायण सम्प्रदाय से है.   
Photo by Bhupen Singh

पूजा के बाद राणा जी ने नारायण स्वामी का संक्षिप्त परिचय दिया.  नारायण स्वामी कर्नाटक के एक शिक्षित संभ्रांत परिवार में जन्में थे,  और इंजीनियर की तरह उनकी शिक्षा-दीक्षा हुयी थी. वर्ष १९३५ में गढ़वाल कुमायूं के कई हिमालयी क्षेत्रों की  यात्रा करने के बाद वो यहाँ पहुंचे  और उन्होंने इस आश्रम की स्थापना की. पिथौरागढ़ जिले में कई स्कूल भी खोले.  इन स्कूलों के, इस आश्रम के मुख्य शिल्पी और आर्किटेक्ट वो खुद थे.  स्वामी नारायण की जीवनी आश्रम की वर्तमान ट्रस्टी द्रौपदी गर्ब्याल ने लिखी है "परम पूज्य श्री नारायण स्वामी और नारायण आश्रम".   आश्रम में ये किताब मुझे यहाँ नहीं दिखी,  इस किताब पर मेरी नजर मुनस्यारी में किसी के घर पर पड़ी और कुछ पलटने का अवसर मिला.

आश्रम के दो मुख्य भवनों और मेडिटेशन सेंटर के डिटेल प्रभावित करते हैं.   इस आश्रम की पहली इमारत में रसोई, ऑफिस, और यात्रियों के रुकने की व्यवस्था है.  कुछ दूरी पर मेडिटेशन सेंटर है.  दूसरी बड़ी इमारत में नीचे संग्रहालय-लाइब्रेरी है, और उसके ऊपर प्रार्थनाघर.  लायब्रेरी में नारायण स्वामी से सम्बंधित पुस्तकें, उनकी व्यक्तिगत सामग्री और नारायण ट्रस्ट  की चीज़ें हैं.  एक डिबिया में यहीं महात्मा गांधी की राख भी रखी हुई हैं.

आश्रम का रखरखाव बहुत मेहनत से किया गया है, सुरुचिपूर्ण है.  गुलाब, डेफोडिल, नर्गिस, और अज़ेलिया (गुलदस्ता बुरांश ) के फूल खिले थे, खेतों में आलू और दूसरी सब्जियां उग रही हैं, एक कोने में कटी हुयी जौ सूख रही है. आँगन साफ़ सुथरा, क्यारियां करीने से बनी हुई.  ९००० फ़ीट की ऊंचाई पर इस दुर्गम, निर्जन जगह में, कमोड और इटालियन टॉयलेट की सुविधा है,  साफ़ सुथरे टॉयलेट्स हैं,  हालाँकि पानी नहीं है, लेकिन बाहर पानी से भरे ड्रम रखे हुए थे, जो संभवत: बरसात का पानी था.  पानी अपने साथ ले जाना पड़ता है.  पूरे  आश्रम पर स्वालम्बन, सादगी और सेवा भाव की गहरी छाप है.  इसीलिए हैरत नहीं है कि जिम्मेदारी से हर व्यक्ति टॉयलेट को साफ़ दशा में ही छोड़ कर गया है. 

पुराने मिटटी के तेल की चिमनियां के बीच खाना बना और परोसा गया.  राणा जी और उनकी पत्नी ने खिचड़ी, सब्जी, रोटी बनायी थी, और सबको बहुत स्नेह से खाना खिलाया.  पहली दृष्टि  में राणा जी जैसे अनवेलकमिंग दिखे, सचमुच में उसके विपरीत हैं, बहुत नरम दिल और सेवा भाव से भरे हुए. राणा जी चमोली जिले के मूल निवासी है, और सरकारी नौकरी  करते थे, लेकिन जब उन्हें आश्रम में काम का मौका मिला तो नौकरी छोड़ दी. अब करीब पंद्रह वर्षों से इस आश्रम की देखभाल कर रहे हैं. आश्रम के पास कुछ नाली जमीन है,  आश्रम के गुजारे भर की सब्जियां, अनाज, फल आदि इसमें उगाये जातें हैं. दोनों पति-पत्नी लगभग सारा आश्रम सम्भालतें हैं.  राणा जी की पत्नी सरल मन की,  सह्रदय, ग्रामीण गढ़वाली महिला है, बहुत भली और मेहनती. इनवर्ड माइग्रेशन का ये पहला किस्सा मेरे सामने आया.