"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Feb 18, 2015

विनम्र श्रदांजलि : भगवती प्रसाद देवरानी


वर्ष २००० में जब देहरादून गयी तो जिन दो तीन लोगों का ध्यान आया कि उनसे मिलना है, उनमें से दाढ़ी वाले ताऊजी यानि श्री भगवती प्रसाद देवरानी भी थे. बचपन की छवि थी मेरे मानस में एक स्नेही, मीठे व्यक्ति की. पिताजी से पूछा कि  "ताऊजी कहाँ रहतें हैं ?" उनसे मिलकर आना है,   पिताजी मुझे उनके घर ले गए, करीब पंद्रह साल बाद मिलने पर भी ताऊजी का स्नेह ज्यूँ का त्यूँ था, वो कुछ भावुक हो गए कि बचपन की किसी याद के बूते मैं उन्हें ढूढ़ने गयी थी. ताऊजी ने पूछा की कहाँ रहती है, क्या करती है, और शादी हुई कि नहीं? शादी के बारे में भी बताया तो  जो जात-पांत पर टिप्पणी की बजाय उन्होंने पूछा  "तुम्हारी मुलाकात कहाँ हुई?"  

पिछले पंद्रह वर्षों से लगभग रोज़ ताऊजी सुबह शाम टहलते हुए मेरे माता-पिता के घर आ जाते, कुछ देर बैठते, फिर चले जाते, कभी घर में ही रुक जाते, घर में जो भी आता उससे बात करते, दोस्ती गाँठ लेते, बच्चों से, बच्चों के मित्रों से, माँ की सहेलियों से, बाक़ी पिता तो उनकी स्नेह की छाया में बचपन से बड़े हुए थे. 

चार फ़रवरी को भी ऐसे ही टहलते हुए हमारे घर आये थे, और सुबह खबर आयी कि अब नहीं रहे, रात किसी समय हार्टअटैक पड़ा और अस्पताल तक पहुँचते पहुँचते ख़त्म हो गये. इस बीच अपनी कुछ उलझनों में फंसी रही, घर फ़ोन नहीं किया, आज ग्यारह दिन बाद १६ फरवरी को उनके जाने की खबर मुझ तक पहुंची है.

दिसंबर में भाई की शादी के लिए महीने भर देहरादून में थी, तो जितने बुजुर्गों से मुलाक़ात हुयी उनके बीच वो सबसे स्वस्थ थे, दिन दिन भर इधर-उधर घूमते थे, यादाश्त, शरीर सब चुस्त-दुरुस्त, हँसी-ठिठोली भी अपनी जगह. यूं ताउजी से हमारा बहुत सीधा रिश्ता नहीं था. ताऊजी मेरे पिता के मामा के बेटे थे. ये बहुत बाद में जाना कि मेरी सगी दादी के भतीजे न होकर, मेरे दादा जी की पहली पत्नी के भतीजे थे. जब दादाजी की पहली पत्नी मर गयी और मेरी दादी से उनकी दूसरी शादी हुयी तो अपनी बेटी की जगह आयी लड़की को भी ताऊजी के घर के लोगों ने अपना लिया,  दादी ने भी उसी को अपने मायके की तरह अपना लिया.  अब इस बात को बीते भी लगभग सौ वर्ष हो गए, चार पीढ़ीयों का फासला आ गया है, लेकिन दोनों परिवारों के बीच मेलजोल है, आत्मीयता बनी हुई  है, सुख-दुःख में साथ खड़े रहने की दोस्ती भी है, मन के बहुत से रिश्ते गुंथे हैं.

इन सौ वर्षों में दोनों परिवार के पैतृक गाँव नौशिन और बिस्ताना लगभग खाली हो गए हैं, हमारे दादा की पीढ़ी पूरी ख़त्म हो गयी है, और मेरे पिता की पीढ़ी के सिर्फ उँगलियों में गिने जाने लायक लोग बचे हैं. ताऊजी के पास मेरे पिता से भी पहले के बीस वर्षों की स्मृति थी, नौशिन की, बिस्ताने की, हमारे पूरे परिवार की.

अपनी रोजी-रोटी ताऊजी ने C. I. D में नौकरी करके कमाई थी, नौकरी के और पहाड़ से अलग इतने वर्षों में बदले भारत के, और अलग-अलग शहरों के बहुत से किस्से भी उनके पास थे. उनकी पत्नी की बहुत पहले मौत हो गयी थी, तब वो सिर्फ ३० वर्ष के थे, तब से अपने दो बच्चों को उन्होंने माँ-बाप दोनों बनकर पाला था. उनका व्यक्तित्व बहुत कुछ माँ जैसा स्नेहिल था, बहुत सा धीरज, सह्रदयता, और लचीलापन था, बहुत सी लाचारी भी, जो कठिन जीवन चुनने वाले संवेदनशील लोगों के हिस्से आती ही है.  उनके व्यवहार में प्रेम प्रमुख था, किसी को जरा भी तकलीफ पहुंचाना उनका स्वभाव  नहीं था.

उस दुबली-पतली काया और स्नेहिल मन के भीतर ८५ साल की कैसी-कैसी यादें थी, एक भरा-पूरा संसार उनके साथ साथ चलता था, उनकी बातों के बीच, चुपके से, सौ वर्ष पुराने अतीत में झाँक लेने की एक खिड़की कुछ देर को मेरे लिए खुलती थी. उनके आस-पास रहने से बहुत आश्वस्ति रहती थी, अब तक लगता था सब कुछ है आस-पास.  अब जब वो नहीं हैं, अचानक से सब शून्य हो गया है, मेरे पैरों के नीचे की बहुत सारी जमीन दरक गयी है.

श्री भगवती प्रसाद देवरानी, M.A., L.L.B, बेहद कठिन, बहुत सादा, बेपनाह मुहब्बत से भरपूर जीवन.

मेरे कुछ मित्र उन्हें देवानंद कहते थे.
हमारे इस पर्सनल देवानंद को,  सदाबहार व्यक्तित्व को,
ताऊजी और दोस्त को विनम्र श्रद्वांजलि!

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