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Apr 4, 2017

यूजेनिक्स पर दो बातें


1883 में डार्विन की मौत के एक साल बाद उनके फूफेरे भाई फ़्रांसिस गेलटन ने एक विवादास्पद किताब ‘इनक़्वारिज इनटू ह्यूमन फ़ैकल्टी एंड इट्स डेवलपमेंट’ प्रकाशित की जिसमें उन्होंने प्रस्ताव रखा कि जिस तरह से नेचुरल सेलेक्सन में जीवों की छँटाई हो जाती है, यदि उसी तरह समाज के बीच से सिर्फ़ वांछित लक्षणों वाले लोगों को छाँटकर उनकी संतति को आगे बढ़ाया जाय तो मनुष्यजाति का स्टॉक इमप्रूवमेंट भी हो सकता है. इस नई सायंस के लिए गेलटन ने ‘यूजेनिक्स’ शब्द का इस्तेमाल किया. चूँकि समाज में ज़बरन थोपी हुई मेचमेकिंग नहीं हो सकती, इसीलिए विशेषकर जर्मनी और अमरीका में कुछ लोगों ने संस्थागत तरीक़े से दुर्बल, अपाहिज, अल्पबुद्धि लोगों को समाज के बीच से हटाने की और उनके बंध्यकरण (नसबंदी) की सिफ़ारिश की. 1909 में गेलटन ने ‘यूजेनिक्स रिव्यू’ जर्नल शुरू किया जिसका मक़सद सलेक्टिव बंध्यकरण और सेलेक्टिव ब्रीडिंग के अध्ययनों को सपोर्ट करना था. 1910 में अमेरिकी वैज्ञानिक चार्ल्स डेवेनपोर्ट ने ‘यूजेनिक्स रिकोर्ड ऑफ़िस’ की स्थापना की और 1911 के बाद डेवेनपोर्ट की लिखी यूजेनिक्स पर केंद्रित पाठ्यपुष्तक अमेरिकी कोलेजों में पढ़ाई जाने लगी. साथ ही सोसायटी के इमप्रूवमेंट और मानव जीन पूल की शुद्धि के नाम पर अल्पबुद्धि, अवसादग्रस्त, अपराधी, और शारीरिक अक्षमताओं वाले लोगों को शहर के बाहर स्पेशल कैम्प में नसबंदी के लिए भेजा जाने लगा. यूजेनिक्स को लेकर उत्साह के चलते 1920 के बाद से अमेरिका में बेबी शो, कुत्ते, बिल्ली इत्यादि के शो आयोजित होने लगे जिनमें सबसे हस्टपुष्ट बच्चों और जानवरों के शरीर की जाँच और नापजोख करके उनमें से सबसे फ़िट को इनाम दिया जाता है. जर्मनी की नात्सी सरकार ने अमेरिका से दो हाथ आगे बढ़कर यूजेनिक्स के तहत रेस हायजीन का कार्यक्रम चलाया, जिसमें शुरुआत नसबंदी से हुई, फिर तीन साल से कम उम्र के अपाहिज बच्चों का सफ़ाया किया गया, और आख़िर में समाज के बीच से यहूदियों को निकालकर यातनाशिविरों में क़ैद किया गया, अनगिनत जनसंहारों को अंजाम दिया. इन सब कामों को करने के लिए उन्होंने जेनेटिक्स की भाषा और शब्दावली का इस्तेमाल किया. जेनेटिक्स के सिद्धांतों को अमल में लाकर जर्मन सुपररेस बनाने के सपने पालने लगे. इस आपाधापी में, बीसवीं सदी के लगभग पचास वर्ष निकल गए लेकिन नात्सी जर्मनी और उसके बाहर चल रहे यूजेनिक्स के प्रयोगों ने जेनेटिक्स की समझ में कोई इज़ाफ़ा नहीं किया. यातना शिविरों में किए गये हज़ारों अमानवीय प्रयोगों से कोई डिस्कवरी नहीं हुई. चूँकि अधिकांश मानवीय लक्षण जैसे शारीरिक फ़िटनेस, सुंदरता, इंटेलीजेंस, इत्यादि जिन पर यूजेनिक्स का विचार टिका था उन्हें कई जीन निर्धारित करते हैं, और ये सिर्फ़ ज़ींस का मामला नहीं है, बहुत कुछ सबजेक्टिव मामला भी है कि सुंदरता और बुद्धि को कौन कैसे परिभाषित करता है, कौन मानदंड बनाता है. ये सभी लक्षण जींस के अलावा समाजीकरण, समाज के बीच व्यक्ति / परिवार की हैसियत, अवसरों और प्रिवलेज होने न होने से भी तय होते हैं. अत: जेनेटिक क्रॉसिंग मात्र से ये मामले सुलझ नहीं सकते है.

एक तरह से देखें तो सुंदरता, बुद्धि, जेनेटिक फ़िटनेस कोई एबसोल्यूट चीज़ नहीं है, सुंदरता, और बुद्धि पर कई बहसें पब्लिक डोमेन में हैं, इसीलिए उन्हें यहाँ दोहराने की ज़रूरत नहीं है. जेनेटिक फ़िटनेस को अक्सर एबसोल्यूट मान लिया जाता है, लेकिन अगर इवोल्यूश्नरी बॉयोलोज़ी से कोई सबक़ मिलता है तो यही कि जेनेटिक फ़िटनेस भी तुलनात्मक और परिस्थितिजन्य मामला है. एक स्थिति में जो लक्षण फ़िट होता है, दूसरी में मिसफ़िट हो सकता है. डार्विन की फ़िंच का मामला सर्व विदित है, एक द्वीप में लम्बी चोंच चिड़िया के काम की होती है तो दूसरी जगह छोटी और मज़बूत. जैसे कि पहले भी ज़िक्र किया गया है कि सिकल सेल और थेलेसीमिया से ग्रसित लोगों की मलेरिया से बचने की क्षमता स्वस्थ लोगों की अपेक्षा ज़्यादा होती हैं (जब दवा न हो). तो एक स्थिति में जो शाप है, दूसरी स्थिति में वरदान है. अफ़्रीका की धूप में काला रंग जो मेलेनिन पिग्मेंट की अधिकता के कारण बनता है, लोगों के लिए नेचुरल सनस्क्रीन है, वहीं ठंडे देशों में जहाँ सूरज नहीं निकलता वहाँ काली त्वचा में विटामिन ‘डी’ कम बनता है. गोरी त्वचा अफ़्रीका का तापमान और रोशनी नहीं झेल सकती, लेकिन ठंडे प्रदेशों में ज़रा सी सूरज की रोशनी के साथ अडेप्ट कर लेती है. इसीलिए इवोल्यूशन की प्रक्रिया अंधी है, उसका कोई मक़सद नहीं है, उसे किसी भी नियत मंज़िल तक नहीं पहुँचना है. आज जिस तरह का लक्षण सेलेक्ट हो रहा है बहुत सम्भव है कि हज़ार या लाख साल बाद की परिस्थिति में ठीक इसका उल्टा हो. एक समय हज़ारों लाखों वर्षों तक डायनोसोर, वूली मैमथ, सेबर-टूथ टाइगर सब धरती पर विचरते थे, आज सब विलुप्त हो गये हैं. इस बड़े इवोल्यूश्नरी स्केल में मानव का अस्तित्व सिर्फ़ कुछ सेकंड का है, इसीलिए उसे प्रकृति की सर्वोत्तम रचना समझना भूल है. आज की समझ से छाँटकर मानव समाज का स्टॉक इमप्रूवमेंट कर लिया जाय या स्पीशीज के जीन पूल की शुद्धि कर ली जाय तो वो आज की परिस्थिति के अनुसार होगा. भविष्य में कौन जानता है कि कौन सा लक्षण इस स्पीसीज़ के सरवाइवल में मददगार होगा. किसी भी जीव का इस धरती में होना बहुत से संयोगों और एक्सीडेंट्स का परिणाम है. महज़ इत्तेफ़ाक है. आमलोग आज भी इवोल्यूशन के नाम पर लैमार्कवाद की समझ रखते हैं और समझते हैं कि एक सीधी दिशा में बेहतरी की तरफ विकास होता है. इवोल्यूशन की दिशाहीनता को पचा नहीं सकते. अगर ये बात ठीक से लोग समझ जाते हैं तो फिर रेस, जातिवाद, यूजेनिक्स इत्यादि की हवा निकल जाती है, जेनेटिक्स की सही समझ इन सब की ख़ुद ब ख़ुद बखिया उधेड़ देती है.   
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अधिनायकवादी फ़ासिस्ट विचार कभी ज्ञान-विज्ञान का भला नहीं करते, भले ही वो विज्ञान का मुकुट लगायें, सड़ी विचारधारा के तहत जो सायंस होती है, वो भी सड़ जाती है, निष्फल होती है.
राजनीतिज्ञ और विचारधारायें जब जब विज्ञान को डायरेक्ट करते हैं और वैज्ञानिकों के लिए स्वतंत्र तरीक़े से ज्ञान के संधान का स्पेस नहीं छोड़ते तो मानवता और समाज दोनों का लम्बे समय के लिए नुक़सान होता है. इस दख़ल के चलते वाविलोव जैसा जीव विज्ञानी और उसके अनगिनत सीनियर साथी मार दिए जाते हैं, और हेबर जैसा प्रखर वैज्ञानिक ऑल्मोस्ट राक्षस का दर्जा पा जाता है.     सायन्स अगर ज्ञान के संधान और प्रकृति के रहस्यों की खोज है तो वे वैज्ञानिक ही दुनिया को नए विचार और ज्ञान दे पाते हैं जो सिंसियर प्रयास करते हैं और सिर्फ अपने ऑब्जर्वेशन्स और निष्कर्षों को तर्क की कसौटी पर कसते हैं. डार्विन अगर ऐसा नहीं करते तो उस समय की धार्मिक विचारधारा में फंस जाते. विज्ञान विचारधारा से नहीं चलता बल्कि नए अन्वेक्षण और नयी टेक्नोलॉजी से गति पाता है और सार्वभौम सत्य को उद्घाटित करता है. गुरुत्वाकर्षण के कारण अगर सेब को टूटकर जमीन पर गिरना है तो गिरना ही है, दक्षिणपंथी और वामपंथी और धार्मिक पूर्वाग्रह उसे बदल नहीं सकते. वैज्ञानिक का ईमान इसी में हैं कि सावधानी पूर्वक अपना काम करे और बिना पूर्वाग्रह के डाटा का विश्लेषण करे और परिणामों पर यकीन करे. सायंस के मूलभूत सिद्धांत समय और काल के लम्बे टेस्ट पर या तो खरे उतरेंगे, उनमें कुछ घटेगा, कुछ जुड़ेगा और ख़ारिज होंगे, लेकिन ये सब नए ज्ञान के आलोक में ही होगा. ये ऑल्मोस्ट पोयटिक जस्टिस जैसा मामला है कि पचासियों लोग जो यूजेनिक्स पर काम करते रहे, आज उनका कोई नामलेवा नहीं है, फ़्रांसिस गेलटन को कोई नहीं जानता, जबकि डार्विन से असहमति रखने वाले भी उसके भूत से पीछा नहीं छुड़ा पा रहे हैं.   

ये ज़रूर है कि राजनीति और सत्ताएँ और समाज का प्रभुवर्ग रिसर्च की दिशा को मोड़ता रहेगा और सायंस को टूल की तरह इस्तेमाल करता रहेगा, उसके फ़ायदे बराबर सब लोगों के बीच नहीं पहुँचेगे। परंतु ये सब सायंस पालिसी के मामले हैं, किसी भी सायंस के सैद्धांतिक मामले नहीं है जिनके समाधान सायंटिफ़िक न होकर अंत में सामाजिक और राजनैतिक होंगे.