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Oct 23, 2008

वेलकम टू सज्जनपुर :फ़िल्म


श्याम बेनेगल की कोमेडी फ़िल्म "वेलकम टू सज्जनपुर" मेरी राय मे पिछले कुछ सालो मे बनी हंसोड़ फिल्मो मे बेजोड़ है। बड़ी बखूबी से बुने ताने-बाने एक बड़ा रंगमच तैयार करते है, और व्यवस्था पर कटाक्ष  भी बड़ी आसान से हो जाता है। फिलहाल काफी मज़े की है और देखने वाला कई बार हंसते-हँसते कुर्सी से गिर सकता है। इसीलिये सावधानी बरते!!
पूरी फ़िल्म का सूत्रधार एक गाँव का पढा-लिखा बेरोजगार युवक है जो गाँव लौटकर लोगों  के लिए चिठ्ठी लिखने का धंधा करता है, और उसी के ज़रिये कई लोगों के जीवन मे झांकने का अवसर दर्शको को मिलता है। एक दृश्य यहाँ से लिया गया है। परम्परा , राजनैतिक गुंडागर्दी , के बीच दो-तीन प्रेम कहानीया है, और मोबाइल फ़ोन और किडनी के व्यापार का नया तकनीकी पहलू भी है, जो इस जमीन से जुड़ गया है।

Oct 8, 2008

युमा सुमेक : एक गला अनेक आवाजे

युमा सुमेक पेरू की एक बहुत ही अदुत गायिका थी, जिन्हें उतनी प्रसिद्धी अपने जीवन मे नही मिल पायी। युमा के स्वर मे एक बहुत बड़ी रेंज है, जिसमे कभी ये आवाज़ मानवीय है, सुरीली है, और वही बड़ी आसानी से मानवीय आवाज़ के इतर भी आवाजाही करती है, जंगली पक्षियों, जानवरों, और प्रकृति की विभिन्न धव्नियो को भी उनके गले से सुनना अपने आप मे एक अनुभव है, और मानव के स्वर सामर्थ्य की सीमा तक पहुँचना भी है।




Oct 5, 2008

यात्रा-१

एक पूरी दूनिया समेटकर
बसेरा छोड़ते हुए लगता है,
सब यही है,
कभी भी वापस आना हो जायेगा
हमारे जाने के बाद भी रहेंगी
शहर मे हमारी मौजूदगी
सब वैसे ही रहेगा
मन कहता है
"बस कुछ ही दिन की बात है
आ जायेंगे फ़िर यही "

गाँव छोड़कर शहर
और शहर दर शहर
रास्ते है कि और लंबे हो जाते है
और उम्र चूक जाती है।
सड़के है कि
घूम-फ़िर कर वापस जाने का नाम ही नही लेती.


और अक्सर एक लंबे युग तक
घर लौटना हो भी जाता था,
कुछ दिन बाद ,
महीनो बाद,
कई बार सालों बाद
बचपन और जवानी के उन दिनों मे
घर लौटकर आती थी एक निश्चिंत नींद,
इतनी कि जैसे जनम-जनम से अनिद्रा पूरी करनी हो.
ऐसे ही आती थी खुशी और भूख भी

फ़िर घर छोड़ते वक़्त ले लाये
कुछ घर अपने भीतर
जब घर लौटना उस तरह सम्भव नही है.
और कई शहर जिनमे हम बसते थे कभी
अब बसे है हमारी स्मृति मे।

स्मृति के शहर रूक जाते है
वही पर जहा हम उन्हें छोड़ आए थे,
और सचमुच के शहर बदल जाते है,