माँ अपनी धुन में एक चेहरा बुनती
नाकनक्श चुनती
जैसे हो उसका अधिकार
फिर उस भीतर बसे अजाने की
कल्पना में हंसती
लिली की पहली पंखुड़ी खुलती
एक साथ पलटते कई सूरजमुखी
दूर तक बहुरंगी एक तितली उड़ती
अपना पहचाना शरीर झरना बन बहता
जाने कौन दिशा कौन डगर पहुंचता
मन को सुधी नयी नज़र मिलती
एक मीठेपन में मनुष्यता घुलती
आत्मा के अतल में साझापन गहराता
निश्चित दायरों, दरीचों के बाहर खड़ी
प्रवासी, एक सांवली औरत
अपने समय के चौतरफा युद्ध, नफ़रत,
और बंदज़हनी से बचती
सन २००३ में न्यूयॉर्क के किसी कौने
पक्ष प्रतिपक्ष की रैलियों के बीच गुज़रती
सुनती फ़ॉक्स, बी.बी.सी., सी.एन.एन.
फ्री स्पीच, डेमोक्रेसी नाऊ, एन.पी.आर.
और हॉवर्ड जिन्न, अज़ीज़, अरुंधती
रोज किसी माँ की आह के बीच ठिठकती
धीमें बुदबुदाती एक प्रार्थना
“किसी भी माँ की कोख से जाये के लिए
जीवन सुन्दर हो, संभव हो ”
पिता सपने बुनता
भीतर फूटता अनजाना कोई सोता
लिए प्रेम, सचेतनता, कोमलता
जिसमे लिपटकर माँ अपने दिन गिनती