"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


Copyright © 2007-present:Blog author holds copyright to original articles, photographs, sketches etc. created by her. Reproduction including translations, roman version /modification of any material is not allowed without prior permission. But if interested, leave a note on comment box. कृपया बिना अनुमति के इस ब्लॉग से कुछ उठाकर अपने ब्लॉग/अंतरजाल की किसी साईट या फ़िर प्रिंट मे न छापे.

Dec 31, 2013

नयी-पुरानी उम्मीदें मुबारक

बहुत दिनों से आधी अधूरी, इधर उधर भागी जाती कुछ पंक्तियाँ, आसपास  डोलती रहीं , २०१३ के आखिरी दिन जितना भी बन पड़ा इन्हे एक जगह दर्ज़ कर रहीं हूँ, आधेअधूरी ही, कि कुछ काम एक बार में ख़त्म नहीं होते, सारे हिसाब आज, इसी समय दुरुस्त नहीं हो सकते, २०१३ का उधार  का परचा २०१४ की कील पर टांग रही हूँ, अतीत और भविष्य के बीच एक सिलसिला बचा रहेगा, उम्मीद बची रहेगी .....



ताज महल

लाल बलुआ-पत्थरों के बीच एक फूल खिला है
ताज महल!

मुगलिया के सपने में तीन सदी तक डोलते रहे होंगे
मिश्र के पिरामिड
उलूग बेग के मदरसे,
समरकंद, हिरात, काबुल के हुज़रें
दिल्ली से दक्षिण तक फैले किलों, मकबरों, महलों में
इन सपनों के अक्स है
मुगलिया की आँखों का भरपूर सपना है
ताजमहल

बीसीयों साल पत्थरों से पटा रहा होगा आगरा शहर
हज़ारों हज़ार पीठ हुयी होंगी पत्थर
हज़ारों हज़ार हाथ हुये होंगे पत्थर,
नक्कास, गुम्बजकारों, शिल्पीयों, के जहन में
क़तरा क़तरा उभरी होंगी महराबें, मीनारें,
चित्रकारों, संगतराशों, पच्चीकारों के उँगलियों के पोरों पर बेल बूटे
बीस हज़ार कारीगरों के आंसुओं के तालाब में खिले होंगे फूल पत्तियां
लिपिकारों के होठों पर आयतें
छलनी छलनी झिर्रियों से हुए होंगे मन
एक तसल्लीबख्श आख़िरी क्षण की आह है 
ताजमहल   


अर्जुमन्दबानो बेगम उर्फ मुमताज महल
कायनात की अजीम सौगातों के बीच
कितने प्यार से रखे हुए हैं तुम्हारे अवशेष
दक्खिनी दरवाजे के जरा सा इधर
सहेली बुर्ज एक में दफ़न हैं  बेग़म अकबराबादी^ 
सहेली बुर्ज दो में फतेहपुरीबेगम^  
क्या मालूम कहाँ मरी खपी
शाही हरम की हूरें
या मुमताज की तीन बेटियों समेत दर्ज़नों कुंवारी शहजादियाँ*
सिर्फ एक शहंशाह का ही विलाप है
ताजमहल
______________
^ शाहजहां की दो बेग़में जो ताजमहल परिसर में ही दफ़न  हैं .
* अकबर ने मुग़ल शहजादियों के विवाह पर रोक लगा दी थी, जो मुमताज की बेटियों के लिए भी रही. 



Dec 11, 2013

एक अदृश्य जमात के हक़ में


समलैंगिक आज से नहीं है, हज़ारों वर्षों से सब समाजों में रहे हैं, और ख़त्म होने वाले नहीं है. भारतीय समाज में बाकी सब समाजों की तरह LGBT बहुत कम संख्या में होंगे, हालांकि उस संख्या के बारे में भी आज की परिस्थिति में जानना सम्भव नहीं हो सकता. परिवार से द्वीलिंगी खांचे मे फिट होने का दबाव और समाज में परिहास, घृणा, और शर्मिन्दगी का दबाव उनके अदृश्य होने की शर्त बुनता है.

वो जो समलैंगिक नहीं है, ३७७ के समर्थक हैं, उनके हिस्से भी इस अन्याय के दंश बीस रूपों में आयेंगे, अगर व्यक्ति को समाज और परिवार जगह नहीं देगा, आज़ादी नहीं देगा, तो उसके उलझाव से बाक़ी लोग भी नहीं बचेंगे. पारम्परिक शादियों में कई स्त्री पुरुष समलैंगिकों के साथ बंधते रहेंगे. आज की दुनिया के साथ संगत व्यवहार के लिए हमारे बच्चे मानसिक रूप से अपाहिज़ बने रहेंगे. एक ताज़ा वाकया है, २०१० में एक भारत से आये १८-१९ साल के लड़के की हरकतों की वजह से उसके अमरीकी गे रूममेट ने आत्महत्या की, और वो भारतीय लड़का जेल में हैं.

फिलहाल उदार लोग भी ठीक से LGBT की समस्या को नहीं समझते हैं, और समझ सकें इसके लिए खुलेपन की और संवाद की जगह जनतंत्र में होनी चाहिए. लेकिन धारा ३७७ की वापसी, LGBT को अपराधिक करार दिए जाने की वापसी, इस अल्पसंख्यक और सबसे दबी -कुचली अस्मिता को अँधेरे गड्ढ़े में धकेलती है, सम्मान के साथ जीवन जीने के सब रास्तों को बंद करती है, संवाद के सब दरवाजे बंद करती है .…

Dec 7, 2013

जयपुर -आगरा-2013

जयपुर 
सुबह सुबह दिल्ली से जयपुर के रास्ते में गाँव, खेत, छोटे कस्बों की कुछ झलक दिखती है,  घरों के नाम पर सिर्फ ईंटों का ढेर नज़र आता है, बहुत कम घरों पर पलस्तर है. महानगरों से बहुत पीछे छूटे समय और साधनों की ये कोई दूसरी दुनिया है, कच्चे रास्तों और खेत की मुंडेरों के बीच ऊंट की सवारी की उबड़-खाबड़ दुनिया है.  दूर-दूर तक जुते हुए खेत दिखतें हैं, सुबह के नीम उजाले में टीले-पहाड़ दिखतें हैं, गाँव के किसान मर्द, औरतें, बच्चे दिखतें हैं,  ये दुनिया मुझे दिल्ली से ज्यादा सुकून देती है.  इस बड़े मुल्क का पेट भरने के लिए ऐसी ही जगहों में अनाज उपजता है.

जयपुर में सिर्फ दो मिनट के लिए शताब्दी रुकती है, दस मिनट पहले ही बच्चों के साथ हम दरवाजे पर खड़े हो गये,  हमारे ठीक पीछे ३०-३५ साल  का एक आदमी खड़ा हुआ, अजीब अक्खड़, रूड, शायद दिल्ली-गुड़गाँव में कोई ठीक-ठाक नौकरी करने वाला.  उसकी जल्दबाज़ी देखकर लगा कि हो न हो वो बच्चों को धक्का मारने में गुरेज नहीं करेगा.  मैंने उससे कहा कि तुम ही आगे चले जाओ.  स्टेशन पर टैक्सीवाला बहुत अच्छा और सभ्य इंसान मिला,  उसकी टैक्सी चुनाव प्रचार में लगी हुयी थी, हफ्ते भर बाद राजस्थान में चुनाव हैं, लगता है सभी प्राइवेट टैक्सीयां अमूमन दिन के कुछ घंटे इस काम में लगी हैं. फिलहाल कॉंग्रेस की सरकार है लेकिन मोदी, भाजपा की भी हवा बनी हुयी है.  बाक़ी फैसला देश के लोग करेंगे ही… 

पहली नज़र में जयपुर में जो भी आँखों को भाता है, वो पुराना है,  अरावली पहाड़ी पर सदूर तक फैली चीन की दीवार सरीखी दीवारों से घिरे किलें,  उनकी संगमरमरी, लाल बलुवा पत्थरों की भीत पर बेल बूटे,  फूल पत्तियां,  भवरें, तितलियाँ, झिर्रियां, झरोखे;  हवामहल के दोनों तरफ पुरानी गुलाबी इमारतें, सामने पब्लिक लायब्रेरी, संग्रहालय, जलमहल और झीलें.

हमारे साथ आमेर किले की घुमाई के लिए पंकज के मामा जी व  मामी जी हैं.   मामा जी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के रिटायर्ड इंजिनीयर हैं, राजस्थान के किलों, ताजमहल समेत भारत भर की कई पुरानी इमारतों और कम्बोडिया के शिव मंदिर के रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट्स में उनकी भागीदारी रही है.  वो हमें किले के भीतर पानी के संग्रह की तकनीक, अलग अलग मौसम के अनुकूल बने किले के हिस्से, हवा, पानी रोशनी को ध्यान में रखकर किया गया कंस्ट्रक्शन, आर्किटेक्चर की कुछ बुनियादी बातें बताते रहे. इस पुराने से मोह होता है, इस बात की खुशी भी होती है कि ये सब पांच सदियों के बाद भी बचा है, अच्छी हालत में है .

अतीत के रजवाड़ों की भव्यता को जरा किनारे रखकर आजादी के बाद पनपा, जो आज का जयपुर दिखता है, वो बाक़ी हिंदुस्तान के सब छोटे-बड़े शहरों की तरह ही है,  बेतरतीब, ईंट-गारे-सीमेंट का ढ़ेर,  सब तरफ कूड़ा कचरा, बिखरा हुआ है,  शहर में किसी संगत प्लानिंग के कोई चिन्ह नहीं है.  मालूम नहीं दूर देहात के क्या हाल हैं. चौकी ढाणी की तर्ज़ के सिम्युलेटेड गाँव देखकर सिर्फ विदेशी ही नहीं, हमारे दिल्ली, देहरादून तक के मध्यवर्गीय लोग भी निहाल हुए रहते हैं.  मेरे जैसों को ये मज़ाक ही लगता है, जिनका असली गाँवों के बीच बचपन बीता है,  जिन्होंने गाँवों में लोगों की दरियादिली और बाक़ी दुनिया से अलगथलग छूट जाने की हताशा देखी है. जिनकी स्मृति में रूपकवँर और भंवरी बाई हैं.  जिन्हे ये बात भूलती नहीं है, आधुनिक भारत के विकास के स्केल पर सबसे पिछड़े पांच राज्यों में से एक राजस्थान भी है, 'बीमारू' के बीच का 'र'.  उम्मीद करती हूँ  हमारे इसी जीवन में उत्तर भारत के राज्यों के लिए बीमारू संज्ञा बदल जायेगी, अतीत की छाया से निकल कर आधुनिक हिंदुस्तान की समृद्धि, शिक्षा और लोकतान्त्रिक जीवन पद्धति में इनका क्लेम बढ़ेगा.

आगरा 
दिल्ली आगरा हाइवे से साढ़े चार घंटे में आगरा पहुंचे, टैक्सी का ड्राइवर उत्साह से भरा हुआ नौजवान है, और अनौपचारिक रूप से हमारे गाइड की भूमिका भी निभा रहा है.  रास्ते में चीतल, हिरन और तीन नील गाय दिखीं,  अमूमन नील गाय बहुत शर्मीला जानवर है, बहुत देर तक सामने नहीं रहती, इतने पास से पहली बार मेरा भी नीलगाय को देखना हुआ.  आगरा शहर में शायद यमुना पर नया ब्रिज़ बना है , पुराने  को तोड़ कर जो लोहे के खांचे, सरिया, मलबा निकला है वो सड़कों पर बिखरा पड़ा है.   जितना शहर दिखता है, लगता है यहाँ खुदायी अभियान चल रहा है, कोई भूकम्प के बाद का मंजर है.  ताज के पार्किंग लॉट में भी अव्यवस्था है, कार पार्क करने की ठीक से जगह नहीं बनी है,  पार्किंग लॉट जरूरत के हिसाब से बहुत छोटा है और उसके बावजूद, ऊँट की बग्गियां, टाँगे, रिक्शे लगातार उस जगह को और तंग बनाते हैं.  वहाँ से ताजमहल एक मील भी नहीं है , लेकिन फिर भी ये गाड़ी वाले पीछे पड़े रहते हैं,  इस गेट से ताजमहल के मुख्य दक्षिणी दरवाजे की दूरी तक जहाँ तक ये बग्गियां जाती है, सब जगह गंदगी भरी पड़ी है।  सड़क के दोनों तरफ पैदल चलने के लिए ठीक ठाक पेवमेंट बना हुआ है, पेवमेंट और सड़क के बीच पानी की निकासी के लिए नालियां हैं लेकिन उनमें कीचड़ भरा है,  पेवमेंट पर चलते हुए उबकायी आती है, सड़क पर एक के बाद एक ऊँट और घोड़े लीद  गिराते जाते हैं, बावजूद इसके की ऊंटों ने डाइपर पहने हुए हैं.  भारत की सबसे अज़ीम इमारत ताजमहल तक पहुँचने के एक मील से कम रास्ते को भी साफ़ सुथरा रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. आप सुकून से आधे घंटे चल सके ये हो नहीं पाता.

खैर जैसे-तैसे टिकट मिला और फिर मुख्य दरवाजे पर लम्बी लाइन.  ड्राइवर हमें किन्ही पतली गलियों के बीच से लाकर पश्चिमी दरवाजे तक लाता है , लाइन वहाँ भी लम्बी है , औरतों की लाईन यहाँ दुगनी है, लेकिन आखिरकर जब एक बार भीतर जा सकी तो फिर ताज के परिसर की भव्यता नज़र आयी, लाल बलुवा पत्थरों से बनी चारदीवारी, दक्षिणी और पश्चिमी द्वार,  पश्चिम में खूबसूरत मस्जिद, पूरब में मेहमान खाना, फिर ठीक यमुना के किनारे ताज महल, नीले आसमान के बीच सफ़ेद मोती की तरह,   धूप भरी दोपहर है, ताजमहल को छोड़कर बाकी सब कुछ बुझा बुझा सा है, लेकिन ताजमहल की परावर्तित रोशनी में चौंध नहीं है, कुछ बहुत मुलायम सी बात है.  पूरा परिसर साफ़ सुथरा है, जितना सम्भव हो सकता है उसकी मेंटेनेंस ठीक है. आज इतवार के दिन बहुत भीड़ है, कुछ फेवरेट स्पॉट पर दो मिनट  खड़े होकर फ़ोटो खिंचवाने की होड़ लोगों के बीच लगी है, लेकिन सब शांतिप्रिय ढंग से हो रहा है, कोई धक्कामुक्की या अभद्रता नहीं है.

ताजमहल के भीतर जाने के लिए लम्बी लाइन लगी है.  लाइन में लगने के पहले जूते उतरने की व्यवस्था है,  जूते रखने की जगह बहुत साफ़ है, ऑर्गनाइज्ड है, वहाँ काम करने वाला इंसान सज्जन है, एफिसिएंट भी. हालिया जूते उतार कर नंगे  पैर जाने का एक और विकल्प पैरों में शू कवर पहन कर जाने का हो गया है, जगह जगह इन शू कवर के चीथड़े बिखरें, उड़ रहे है. अमूमन विदेशी लोग और गाँव देहात के लोग नंगे पाँव जा रहे हैं,  मिडिल क्लास भारतीय, जींस पैंट वाले शू कवर पहन कर जा रहे है, और उन्हें होश नहीं है कि इस्तेमाल करने के बाद इन्हे कूड़ेदान में फेंकना या साथ ले जाना इनकी जिम्मेदारी है. ये पढ़ाई लिखायी और ऊंची कमायी किसी तरह का सिविक सेन्स क्यूँ नहीं लोगों के भीतर पैदा करता है, ये मेरी समझ से बाहर है.  सरकारी साफ सफाई जितनी हो सकती है, उतनी है, और ऐसे  गैर-जिम्मेदार रवैये के चलते लगता है बहुत अधिक है. क्या सोचकर इन शू कवर्स की इज़ाज़त इस परिसर में दी गयी है? हालाँकि  ये भी वैसा ही सवाल कि ऊँट की बग्गियां क्यूँ पार्किंग लॉट में हैं.  कोई कह सकता है कि इस बड़े देश में रोजगार के ये मौके हैं.  लेकिन शायद इससे बेहतर मौके खोजने की जरूरत है,  ये प्योर न्यूसेंस हैं.  

ताजमहल के भीतर जाने के लिए घूमी हुयी लम्बी कतार है, इस कतार को धकेलते हुए बन्दूक और मशीनगन लिए हुए आर्मी-पुलिस के सिपाही और अफसर है,  जो लोगों को जरा भी चैन से खड़े नहीं होने देते, अपनी गति से आगे खिसकने नहीं देते कि सांस लेने कि  जगह बची रहे, चिल्लाते हैं,  खदेड़ते हैं और ताजमहल के दरवाजे तक आते आते लगभग स्टम्पीड का माहौल बना देतें है, उनका चीखना बढ़ जाता है, लोग एक  दुसरे के ऊपर चढ़ रहे है, किसी बच्चे का पैर दब गया, आदि ये सब होता है,  ताजमहल देखने आये सारे उत्साह पर पानी फिर जाता है।  सुरक्षा के लिए पुलिस और आर्मी ठीक है, लेकिन आम लोगों को लाइन से अंदर ले जाने के लिए दुसरे प्रशिक्षित लोग होते तो अच्छा था.  पुलिस के लोगों को सिर्फ भीड़ को काबू रखने की ट्रेनिंग है,  लेकिन ये लाइन में लगे लोग है, हसरत से ताजमहल देखने आये है, उपद्रव मचाने की इनकी मंशा नहीं है. इनके साथ बर्ताव अलग होना चाहिए.  इस दरवाजे से मुश्किल से दो फीट की दूरी पर मुमताज़ महल और शाहजहां की कब्र है. वैसे कहतें हैं कि असल कब्र जमींदोज है, नीचे तहखाने में हैं, ये जो दर्शकों को सुलभ है, असल वाली की रेप्लिका है.  उम्मीद करती हूँ कि मुमताज और शहंशाह अपनी तन्हाई में सुकून से होंगे,  ये शोर, ये गाली गलौज़, बच्चों की रोने की आवाज़ें उनके आराम में खलल नहीं डालते होंगे.

पिछले १५ सालों में भारत के बाहर भी बहुत से स्मारक, म्यूजिम, नेशनल पार्क , वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी देख चुकी हूँ.  वहाँ भी भीड़ ताजमहल से किसी मायने में कम नहीं होती.  लेकिन वहाँ ठीक से जगह- जगह पीने के पानी की व्यवस्था, शौचालय की व्यवस्था होती है, परिसर का नक्शा होता है,  छोटे छोटे क्यूरेटेड डिस्क्रिप्शन होते हैं. ताज महल का परिसर बहुत बड़ा है, ताज महल के भीतर देखने के आलावा दूसरी चीज़ें भी हैं.  ताजमहल बनाने के दौरान नक्शों में हुयी हेर-फेर के दस्तावेज हैं,  कुछ आम जनता और उत्सुक लोगों के लिए इस सूचना का डिसप्ले लगाया जा सकता है,    ठीक से प्रशिक्षित गाइड हो सकते है,  जो कुछ लोगों को ठीक से सूचना दे सकतें, परिसर की मेंटेंनेस में भागीदारी कर सके, स्कूली बच्चों के टूर में मदद कर सकें. रोजगार के ये तमाम रस्ते खुल सकतें हैं.  लेकिन उसके लिए राजनैतिक और प्रशासनिक कुशलता और कंसर्न की जरूरत है. अपनी विरासत से सचमुच प्यार करने और उसपर गर्व करने की जरूरत है.

ताजमहल परिसर, दरवाजों को,  मस्जिद और मेहमान खाने को जितना सम्भव हुआ अपनी तरह से हमने देखा, और यहाँ आना, इसे देखना घाटे का सौदा नहीं रहा, इसे देखकर खुशी, हैरत हुयी और सुकून भी मिला.  लेकिन जरा सी अच्छी व्यवस्था होती तो दूर दराज़ गाँवों, शहरों, देश विदेश के कोनों कोनों से जो लोग यहाँ आते हैं उनके अनुभव में खुशी का इज़ाफ़ा होता, बेवजह की खीज़ नहीं होती. 

Sep 27, 2013

गिरदा की छवियाँ

 "पहाड़'-19:  'गिरदा विशेषांक' (नवंबर 2015) में प्रकाशित


“हमन उज्याड़ि फिरि के करला
पछिल तुमरो मन पछताल
आपुंणो भलो जो अघिली कैं चांछा
पालो-सैतों करो समाल”
                      -----------वृक्षन को विलाप, गौर्दा    



झुसिया दमाई और गिरदा से मुलाक़ात


९८ के जनवरी या फरवरी की बात है, मैं उन दिनों लखनऊ में थी, पी.एच.डी. थीसीस जमा कर दी थी, एक साथ देश के भीतर नौकरी और देश के बाहर पोस्टडॉक्टरल रिसर्च फेलोशिप के लिए आवेदन कर रही थी, इन्ही दिनों शेखर दा का फ़ोन आया ‘यहाँ रवीन्द्रालय  में  झुसिया दमाई जी का कार्यक्रम हो रहा है, हो सके तो जल्दी आ जाओ’.  


अस्सी वर्ष से ज्यादा के झुसिया दमाई पारंपरिक ढोली की वेश में, उसपर घुँघरू बंधी गाय की पूँछ की करधनी, हाथ में हुड़का, और डमरू लिए, नाचते, अभिनय करते हुए एक के बाद एक वीरगाथाएं गाते, बिजली की चमक से पलटते, भाव और भंगिमाओं का कोई कोलाज गडमड होता, अदृश्य घोड़े, तीर, तलवार, घायल रणबाकुंरे, सब एक साथ मानों झुसिया जी की देह में ही रह रहकर अवतरित होते रहे.  नेपाल और कुमाऊं मे लोकगाथा गायन की तमाम बारीकियों को समझने परखने वाले अस्सी बर्षीय श्री झुसिया दमाई के बारे में लोगों को खास जानकारी नहीं थी, मैंने भी पहली बार उनका नाम सुना था, पहली बार ही उन्हें देखा था. हुन्गरे लगाने (संगत) के लिए उनकी दोनों पत्नियाँ साथ थी.



झुसिया दमाई बैतुड़, नेपाल के मूल निवासी थे, जो कई वर्षों से उत्तराखंड पिथोरागढ़ जिले के ढुंगातोली गाँव में रहते थे, उत्तराखंड व नेपाल के मौखिक इतिहास के विरल, संभवत: आखिरी भडौं गायक (वीरगाथा गायक) थे. २० साल की उम्र से अपने पिताजी के साथ झुसिया दमाई ने गायन शुरु कर दिया था. नेपाल (बैतुड़ के त्रिपुरासुंदरी के मंदिर में चैत्र, आश्विन और कर्तिक में भगवती, जगन्नाथ, पांडवगाथा, का विधिवत स्तुति गान उनकी वंश परम्परा थी, जिसे सात दशक तक उन्होंने निभाया. दीवाली की अमावस के दिन हर साल रणसैनी के मेले में शुरुआत झुसिया जी के गायन से होती.  झुसिया दमाई पर गिरदा ने शोध तैयार किया था और दमाई जी  जैसे कलाकार से बड़े समाज का परिचय गिरदा और पहाड़ की कोशिशों से ही संभव हुआ था. अस्सी वर्ष के बाद ही दमाई जी पर लोगों की नज़र गयी.


हुड़के के साथ गिरदा को पहली दफे वहीं स्टेज, रवीन्द्रालय में  झुसिया दमाई जी का कार्यक्रम  में देखा, सुना.  एक कथा से दूसरी कथा में जाते झुसिया जी बीच बीच में विराम लेते, और गिरदा अपनी गूंजती आवाज में कभी भावार्थ कहते, कभी संगत के लिए हिन्दी का तर्जुमा गाते, नेपाली और कुमाऊंनी न समझने वाले दर्शकों के लिए एंकर का रोल निभाते.  झुसिया दमाई को देखना-सुनना अद्भुत अनुभव था, गिरदा की उस आवाज की कोई छाया अब तक कहीं मन के भीतरी हिस्से में है. कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद, जैसा अपेक्षित था, भीड़ ने गिरदा और दमाई जी को घेर लिया, परिचय का मौका गिरदा से उस दिन नहीं बना, शेखर दा से भारत छोड़ने के पहले वो पांच मिनट की बातचीत मेरी आखिरी बातचीत थी.


नौ वर्ष बाद २००७ में सूचना मिली कि  प्रवासी उत्तराखंडियों की संस्था ‘उना’ ने शेखर दा, गिरदा  और नरेन्द्र सिंह नेगी जी को अपने सालाना कार्यक्रम में न्यूजर्सी बुलाया है.  इन दिनों मैं और पंकज अपने दो छोटे बच्चों, के साथ इथाका में रह रहे थे. हमारे लिए जाना संभव नहीं हुआ, बाद में यूट्यूब पर उस प्रोग्राम  की झलक मिली और न्यूजर्सी में रहने वाले कई दोस्तों की बात सुनने को मिली.  सुजाता फर्नेंडिस, जो अपने विधार्थी दिनों में शेखर दा से परिचित रही है, और एक वर्ष के करीब उत्तराखंड में रही है, अब कई वर्षों से न्युयोर्क में है.  सुजाता ने ब्रेख्त फोरम में भी एक कार्यक्रम करवाया.   ब्रेख्त फोरम में आये अधिकतर लोगों को हिंदी नहीं ही आती थी, लेकिन गिरदा के सहज आत्मीय व्यक्तित्व, उनकी आवाज और अदायगी से लगभग हर कोई उनके प्रेम में बंध गया. अलग-अलग तरह से मुझे न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी के दोस्तों से प्रतिक्रियाएं मिली, उनमें से एक रोचक प्रतिक्रिया ये भी थी कि गिरदा के दांतों की ठीक से रिपेयरिंग हुयी होती तो वो आवाज ज्यादा अच्छी होती.  मेरा कभी ध्यान नहीं गया, पंकज से पूछा तो उसको भी इसकी कोई याद नहीं है.  जिस गिरदा को हमने जाना-सुना उसी से हमें प्यार हो गया, गिरदा के व्यक्तित्व की मिठास का स्रोत उनका जिया हुआ जीवन था, वंचित जन के लिए उनकी बेपनाह संवेदना थी, उनकी मिठास बहुत भीतर की चीज़ थी, गिरदा के दांतों, तमाम बाहरी चीज़ों से उसका लेना देना नहीं था. जाने पहचाने अर्थों में गिरदा वैसे परफोर्मर भी नहीं थे, और अच्छा है कि परफोर्मर नहीं थे, विपन्नता के बीच गर्वीला जीवन जीने वाले कलाकार थे.  


कभी-कभी अच्छा भाग्य होता है, मुलाक़ात असंभव परिस्थिति में भी हो जाती है, शेखर दा, गिरदा, और नरेन्द्र नेगी जी ने इथाका आने का समय निकाला, और तीन-चार  दिन उनके साथ रहने का मौका बना. गिरदा और नेगी जी से ये मेरी पहली मुलाक़ात थी. ९८ में दमाई जी के कार्यक्रम में जिस चेहरे और आवाज से परिचय हुआ था, अब उस समूचे गिरदा से आमने सामने मिलना हुआ.  तीन-चार दिन इथाका में हमें गिरदा की सोहबत का मौका मिला.


घर में गिरदा और देश दुनिया के क़िस्से  


गिरदा  यूँ तो मेरे पिताजी  से आयु में दस बरस बड़े थे,  अपने से छोटो के साथ  बराबरी के जिस  भाव और अपनेपन से वो मिलते, बरताव करते थे, वो ताऊ, या मामा नहीं हो सकते थे, वो गिरदा ही थे—पांच बरस के बच्चे से लेकर सौ बरस के बूढो तक सबके ‘गिरदा’—इन सारी पीढ़ीयों में एक साथ.  गिरदा बात करते हुये फट से रसोई में बरतन धोने चले जाते, चूल्हे में झांक अाते,  किसी भी नयी चीज को बालपन की भौंचक नज़र से देखते, फिर उतनी ही संजीदगी से िकसी बात पर कोई राय पूछते, कोई क़िस्सा सुनाते. गिरदा को बहुत खांसी हो रही थी, और उनकी सिगरेट उसमें इजाफा कर रही थी.  शेखर दा की रजामंदी  से मैंने गिरदा की सिगरेट छिपा दी, बीच बीच में गिरदा अपनी सिगरेट के लिए मनुहार करते. फिर किसी बात में उलझ जाते.



बातचीत के बीच कुछ बात मेरे कामकाज और रिसर्च पर भी आयी. कुछ बात जी.एम.ओ. फसलों और दुनिया भर में इस तकनीकी के विरोध में उठी आवाजों के बारे में भी हुयी. मैंने उनसे कहा कि जी.एम.ओ. फसलों के पक्ष-विपक्ष को निरपेक्ष तरह से देखती रही हूँ. तकनीकी चाहे परमाणु ऊर्जा की हो या जैव तकनीकी, उसका अच्छा या बुरा होना इस बात से तय होता है कि अंतत: उसका समाज में किस तरह से उपयोग होता है, उसे क्रियान्वित करने वाली राजनैतिक और आर्थिक ताकतें किस नीयत से उसे प्रमोट करती हैं, रेगुलेट करती हैं, सरकारे व्यापक जन समूह की भलाई के हित में नयी तकनीकी के कारोबार को निगोशिएट करती हैं या नहीं.  हमेशा नयी तकनीकी की समझ और इन पर कंट्रोल बड़ी ताकतों का रहता है. जन अन्दोलान्कारीयों के पास हमेशा इस समझ की कमी रहती है कि नयी संभावनाओं को कैसे आवाम के हक में निगोशिएट किया जाय, इसीलिए उनके पास सिर्फ विरोध का ही विकल्प बचता है. जी.एम.ओ. फसलों से लम्बे समय में होने वाले एक नुक्सान से मुझे ज़रूर चिंता होती है कि भारत जैसे देश में जो जैव-विविधता का एक बड़ा केंद्र है, मुनाफे के लिए सिर्फ एक तरह की फसल को उपजाना भविष्य में बड़े संकट खड़े करेगा, और इस जैव विविधता को नुकसान पहुंचाएगा. जैव विविधता के बाबत फिर फसलों की उत्पत्ति पर बात हुयी, फिर गिरदा ने एक पुरानी कहानी सुनाई.


“एक परिवार अपने भोजन के लिये सिर्फ चावल का एक दाना हांडी मे पकाता था, और हांडी भर जाती थी, जो सब के लिये पर्याप्त होती थी. एकदिन अचानक कुछ मेहमान आये और एक की बज़ाय दो दाने मिलाकर गृहणी ने पकाये और नतीजतन  हांडी के आधे चावल कच्चे और आधे पके, सभी को भूखा रहना पड़ा”.


इस लोककथा में  संभवत: धान की जैव-विविधता और उत्पत्ति की कहानी का विम्ब ही छिपा है. शायद ये उन दिनों की कहानी हो जब  धान की विविध प्रजातियाँ यहाँ जंगल में उगती हो जिनके दानों को लोग बटोर लेतें हो, विधिवत खेती की शुरुआत न हुई  हो.  गिरदा के पास लोक स्मृति के जाने कितने खजाने थे.गिरदा और नेगी जी से बहुत से गीत सुने, गिरदा फैज़ को, फिर फैज़ की रचनाओं का कुमाऊँनी में अनुवाद सुनाते रहे, बीच बीच में हुड़का ठीक करते गिरदा,  उन्होंने अपना हुड़का खुद बनाया था, इस तरह का पारंपरिक पहाड़ी ड्रम बाजार में नहीं मिलता, कैसे हुड़का बना, किन सामग्रीयों से हुड़के के अलग-अलग हिस्से बने बताते रहे, नरेन्द्र नेगी ने भी अपने किस्से बताये कि घर में किस तरह अपना हुड़का बनाने को लेकर उनका विरोध हुआ. पारंपरिक रूप से सवर्ण का हुड़का बनाना बजाना पहाड़ में नहीं था. हुड़का मुख्य रूप से नाचने-गाने से जीविका चलाने वाले ‘बादी’ (नट) का ही था. लोक कला को जात-पांत की परंपरा की जकड़न से बाहर समूचे में क्लेम करने का हुनर गिरदा में बहुत पहले से था, उत्तराखंड के कई लोक कलाकारों गिरदा ने ही खोजा, जिनमें गोपाल बाबु गोस्वामी, सूरदास हरदा, झुसिया दमाई शामिल है. गिरदा को बिजेंद्र लाल साह जी ने ढूँढा था और गिरदा कई मायनों में लोककवि गौर्दा,  बिजेंद्र लाल साह और मोहन उप्रेती की परम्परा के वाहक थे.      



शेखर दा ने बातचीत में कहा कि अपने सब्जेक्ट के बारे में, देश दुनिया से उसके सम्बन्ध के बारे में मुझे लिखते रहना चाहिए. मैंने उनसे कहा कि पहले तो लिखना किसके लिए होगा, और दूसरा तकनीकी शब्दावली को पठनीय हिन्दी में लिखना मेरे बस से बाहर की बात है, फिर लिखने में समय लगाऊं भी तो इतने समय मेरी जीविका कैसे चलेगी? किसी तरह कुछ लिख भी लिया जाय तो उसे छापेगा कौन? फिर अपने लिखे को छपने के लिए अलग से कसरत, मुझसे नहीं होगा. गिरदा धीरे से हँसे, कहा कि ‘जीवन में सब काम सिर्फ जीविका की शर्तों पर नहीं होते.  कुछ काम अपने मन की खुशी और सपनों के लिए भी होते हैं’.  गिरदा ने और शेखर दा ने कुछ साल पहले ही स्वेच्छाअवकाश ले लिया था और अपने मन के काम कर रहे थे, गिरदा मीठी आवाज में गाये ‘दिल की खाने में वक़्त लगता है, दिल लगाने में वक्त लगता है’.


इस बातचीत के बाद संयोगवश ब्लोगर पर हिन्दी लिखने की सुविधा का पता चला, हिन्दी भाषा के साथ बरसों पहले टूटा मेरा लिखने का सम्बन्ध फिर से जुड़ गया, जो भी मन में आया लिखा, गलत वर्तनी के साथ, गडमड विचारों के साथ, कभी भावुकता के आवेग में ही. इससे पहले कई सालों से सिर्फ कवितायें लिखती थी, वो भी छुपाकर.  अब इस उम्र में भी छिपाकर लिखने की वैसी जरूरत नहीं रही, तो कई दफे सिर्फ कवितायें ही लिखी. समय की मारामारी के बीच भी अब कई चीजे लिखने का मन करता है, शायद किसी दिन लिखते-लिखते सचमुच कुछ लिखना होगा….


कोर्नेल यूनिवर्सिटी और नियाग्रा में गिरदा
कोर्नेल यूनिवर्सिटी का  साउथ एशिया विभाग समय-समय पर नेपाल व हिमालय पर कार्यक्रम करता रहता है, हालाँकि जुलाई से सितम्बर के बीच आमतौर पर  सेमिनार नहीं होते, लेकिन विभाग के मैनेजर वलियम फ़ेलन से जब मैंने हिमालयी क्षेत्र में शेखर दा के काम का ज़िक्र किया तो विलियम ने बहुत उत्साह से एक विशेष लेक्चर अपने विभाग में आयोजित किया.  उत्तराखंड हिमालय पर शेखर दा ने लेक्चर दिया, जिसकी समाप्ति गिरदा, नेगी जी और शेखर दा के सामूहिक गान से हुयी. हिमालय को उसके भूगोल, इतिहास और हिमालयीजन के जीवन पर विस्तार से जानने का ये मेरे लिए भी मौका था.  कुछ मित्र परिचितों के साथ बातचीत करते  हुए पॉटलक भोज के बीच हमारी शाम गुजरी. अगले दिन फिर शेखर दा विलियम के साथ कई दुसरे लोगों से मिलते रहे.  तीसरे दिन पंकज के साथ तीनों लोग इथाका से नियाग्रा के लिए निकले. पंकज अब भी नियाग्रा जाते समय रास्ते भर गाने गाते हुए पहुंचने के अच्छे दिन को याद करते हैं. रात करीब दस बजे ये सब लोग इथाका लौटे, किसी तरह मुझसे दोनों बच्चों को सँभालते हुए सिर्फ खिचड़ी बनी, वही सबने प्रेम से खायी, फिर बात होती रही देर रात तक,  अगले दिन फिर सुबह से देर दोपहर तक.  


 गिरदा के पास किस्सों का खज़ाना था, लोककथाओं से लेकर अपने जीवन के अनुभवों का, और विराट  स्नेह  संसार में बंधे अनिगनत मित्र-परिचितों के क़िस्से भी जैसे उनके अपने ही क़िस्सों का विस्तार था. जिन लोगों से हम कभी मिले  नहीं, जिनका  पहले नाम भी नहीं सुना,गिरदा के मार्फ़त उनसे एक आत्मीय परिचय बना, लोगों को जोड़ने, उस तरल आत्मीय संसार के विस्तार की, उसे लबालब भरते रहने का उनका स्वभाव बेमिसाल था.  गिरदा के ये क़िस्से भी उनकी मन की अमीरी, मन की मरोड़  और जीवन के दिल तोड़ अनुभवों के बीच की आवाजाही का ही वृत्तांत थे.  गिरदा बात बात में कह गए ‘यात्रा भी सबसे बडी अपने भीतर ही होती है, मंथन भी’.
फिर विदा हुयी, मन हम सबका भीगा ही था, गिरदा की आँखे भी भीगी और फिर जाते जाते उन्होंने अपनी रुलाई भी नहीं रोकी.  तीन-चार दिन का सम्बन्ध नहीं था, लगता रहा की वे हमेशा से हमारे आत्मीय थे, घर परिवार के थे.      


लोक के कवि गिरदा


गिरदा अपने समूचेपन में उत्तराखंड की कई पीढीयों के बीच लोकचेतना के वाहक, संस्कृतिकर्मी थे. परम्पराओं की समझ रखने वाले, अपने समय के लोगों की पीड़ा से विचलित, और ताउम्र अपने लोगों के लिए सपने देखने वाले आन्दोलनकारी. गिरदा बखूबी समझते थे कि  पहाड़ के दूर दराज के गांव से  निकलकर देश के कोने-कोने   में पहुंचे पहाड़ के गरीब लोगों की भटकन, पीछे छूट गये परिवार की विपदा, पहाड़ के जल जंगल और संसाधनो का दोहन, खनन, हिमालय का लगातार टूटना, सबके सिरे  आपस  में उलझे हैं. पहाड़ के जन और प्रकृति को  केंद्र में रखे बिना  िवकास की कोई योजना कभी कारगर नहीं हो सकती. ये बात बहुत सादा तरीके से गिरदा बताते रहे, सत्तर के दशक में चिपको आन्दोलन के समय गिरदा कहते रहे  …

“ढुंग बेचा, माट बेचो, बेची खै  बज्याणी
लिस खोपी -खोपी मेरी उधेड़ी दी खाल”


बीसवीं सदी के आखिरी दशक में जब अलग उत्तराखंड राज्य का आन्दोलन परवान चढ़ा, तब उस राज्य के सपने में, सबसे मजबूर और हाशिये पर खड़े जन की बेहतरी के सपने को गिरदा अभिव्यक्त करते रहे, उस सपने को सींचते रहे...

“बैणीं फांसी नी खाली जाँ रौ नि पड़ल भाई
मेरी बाली उमर नि माजौ तलिउना  कढ़ाई
रम, रैफल, ल्य्फ्ट -रैट  कसि हुंछों बतुलों    
हम लड़ते रैया भुली ! हम लड़ते रूलो !”


उत्तराखंड राज्य बन जाने के दस साल बाद तक, अपने आख़िरी  दिनों  तक, गिरदा इस सपने को  पीठ पर लादे, धरनों पर बैठे, मचंपर, सड़क पर, जुलुस में, जहाँ भी मौका मिला पहाड़ के विकास के विनाशकारी मॉडल के विरोध में अपना मत दर्ज करते रहे.


गिरदा के भीतर का जो कवि था, कलाकार था, नाटककार और निर्देशक था वो अपनी इसी राजनैितक चेतना को सीधे सरल तरीके से लोगों के बीच ले जाने का काम करता था. उसके सब खेल, सारी धुन, सारी रंगत, सारा जीवन भी इसीलिए था कि  कैसे भी हो ये सूरत बदलें. गिरदा ने अपनी कवितायें आमतौर पर जलूस के बीच, नुक्कड़ नाटक या उत्तराखंड में हुए विभिन्न आन्दोलनों  की तत्कालिक जरूरत, और क्षोभ के बीच लिखी, बहुत सी कवितायें अपनी दूधबोली कुमाँऊनी में लिखी, फैज़ को भी कुमाँऊनी में अनुवाद किया, सब तुरंत-फुरंत, लोगों के ठीक बीचोबीच.  कविता से उनका सरोकार शायद इतना ही रहा हो कि लोगों के मन तक अपनी बात सरल भाषा और लय के साथ पहुंचा सकें, उनके मन में कोई बात सीधी तरह से बिंध जाय, याद रह जाय या फिर गिरदा ही लोगों की पीड़ा को सरल तरह से, उनकी अपनी बोली-भाषा में कह सकें.


अपनी समझ का इस्तेमाल गिरदा ने कविता को चमकाने के लिए  नहीं िकया, क्राफ्ट के साथ कोई विशेष प्रयोग नहीं किये, हालाँकि कहन के लिए कुछ पॉपुलर जुमलों, पहाड़ के लोगों के मन में धंसे पॉपुलर बिम्बों का उन्होंने प्रयोग किया, कुछ पंक्तियाँ बार-बार कई कविताओं में आयी है. शायद कभी सचेत तरह से किसी कविता में कोई संशोधन भी नहीं किया गया. हिंदी कविता के संस्कार से गिरदा की कविता और उनके गीत अलग हैं, आधुनिक हिंदी कविता के जाने संसार से अलहदा.  समाज के कविता से विमुख होने की बात गिरदा नहीं किये, जिस समाज के बीच वह  थे, वहां लोगों ने खूब उनकी कविता और गीतों को गया, बहुत प्रेम से गाया, आगे भी गाते रहेंगे, क्यूंकि गिरदा और उनकी कविता ठीक जन के बीच जन्म लेती रही, उन्ही के लिए  लिखी गयी, उन्होंने ही उसे गाया भी. गिरदा की कविता से मेरा एक मात्र सीधा परिचय ‘उत्तराखंड काव्य’ और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री तक सीमीत है, और इसी के देखे ये चंद बातें हैं.  गिरदा लिखी-पढ़ी जो पीछे छोड़ गए हैं, जब प्रकाशित होगी, तो  गिरदा को जानना कुछ और बढेगा.


विदा, गिरदा
 
गिरदा के हिन्दुस्तान लौटने के बाद मेरी तीन बार उनसे फ़ोन पर बात हुयी, लम्बी बात हुयी, फिर से मिलने की बात भी हुयी.  २०१० में मेरा महीने भर के लिए भारत जाना हुआ, उम्मीद थी कि इस बीच अपने घर परिवार से अलग कुछ उत्तराखंड को देखकर, गिरदा और पुराने नैनीताल के मित्रों से मिलकर आ सकूँ. इस बीच एक अच्छा काम विद्यासागर नौटियाल जी से मिलना हुआ, उनकी कुछ बातचीत रिकॉर्ड की. मेरा नैनीताल जाने का प्रोग्राम था, १७ अगस्त को मैंने गिरदा के घर फोन किया तो पता चला कि वो अस्पताल में हैं, फिर उन्हें हल्द्वानी ले जाया गया.


विद्यासागर नौटियाल जी से गिरदा की तबीयत का ज़िक्र किया, अपनी तरह से गिरदा को उन्होंने प्रेम से याद किया और ये भी कहा कि  ‘गिरदा कुछ कम अराजक होते, कुछ अनुशासित तरह से लिखते होते तो उनके अनुभवों का खजाना बहुत बड़ा है’.  २२ अगस्त को गिरदा ने विदा ली. उसके बाद नैनीताल जाने की मेरी हिम्मत टूट गयी, बिना गए ही मैं लौट आयी. बहुत बार गिरदा के बारे में लिखने की बात मन में आयी, दो चार लाइन से ज्यादा नहीं लिख सकी.वापस लौटकर नौटियाल जी का इमेल मिला


“ उस दिन मैंने गिरदा की जीवन शैली की बात शुरू की थी, आपने बताया था कि आपने उनकी पत्नी से बातें की है, लेकिन गिरदा उसके दो तीन दिन बाद ही हमें छोड़ कर विदा हो गये. मैं हतप्रभ हूँ, पहाड़ क्या इस देश के अन्दर अब कोई ऐसी शक्सियत कभी जन्म नहीं लेगी, वे जिस युग के अनुभवों को साथ लिए चलते थे, वे दिन ही कभी वापस नहीं आने वाले  हैं “.

गिरदा से अब फिर कभी मिलना नहीं होगा. दुबारा तो नौटियाल जी से मिलना भी नहीं हुआ, मनमौजी, भावनाओं के आवेग में जीने वाले गिरदा और बेहद अनुशासित, सचेत, प्रतिबद्ध जीवन जीने वाले नौटियाल जी, दोनों से अब मिलना नहीं होगा, शायद दोनों जैसा अब कोई कभी नहीं होगा…, मुझे कुछ अक्ल होती तो सिलसिलेवार तरीके से गिरदा से इथाका में कुछ बातचीत करती, कुछ सचेत तरह से उनके अनुभव जानने को मिलते. उनसे बात करते हुये ये यही लगा कि इतनी ही सहजता से गिरदा फिर मिल जायेंगे. उनके जाने के बाद, उन्हें  याद करते हुये, दुसरे तमाम लोग जो गिरदा से मिले उनके मार्फ़त अब गिरदा को कुछ और जान सकूंगी. उन्हें चाहने वाले मेरी नज़र के देखे गिरदा को कुछ जान सकेंगे, इसी उम्मीद में लिख रही हूँ.

Sep 17, 2013

गिरीश तिवारी "गिर्दा"

गिर्दा उत्तराखंड के लोककवि हैगिर्दा की कविता और उनका जीवन सामाजिक सरोकार से सरोबार हैगिर्दा की कविता राजनैतिक और क्रांतिकारी कवियों से कई मायने मे बहुत अलग है. उनकी बुद्धिमता आपको चकाचौंध नहीं करती, ना ही निराशा भरती है, ही अंगार बरसाती है. गिर्दा की लोक की समझ, भावों की तीव्रता, सीधे सादे तरीके से मनुष्य के मन से संवाद बनाती हैआशा भरती है, पर निठल्लेपन की आशा नही, बल्कि सामाजिक जीवन के रंगमच पर बुलावा देती हैजो भी है उसे बाँटने का, बिल्कुल पहाड़ी तरीके से, जिसमे औपचारिकता की कोई गुंजाईश  नही है. गिर्दा की कविताओ को उनकी आवाज़ मे सुनना अपने आप एक सुखद अनुभव है. गिर्दा के प्रसंशकों ने कुछ वीडियो youtube पर डाले है. उनके लिए लिंक है.......



गिर्दा की एक कुमायूँनी कविता का हिन्दी अनुवाद आप सब के लिए.................



जैंता एक दिन तो आयेगा


इतनी उदास मत हो

सर घुटने मे मत टेक जैंता

आयेगा, वो दिन अवश्य आयेगा एक दिन


जब यह काली रात ढलेगी

पो फटेगी, चिडिया चहकेगी

वो दिन आयेगा, जरूर आयेगा


जब चौर नहीं फलेंगे
नहीं चलेगा जबरन किसी का ज़ोर
वो दिन आयेगा, जरूर आयेगा


जब छोटा-बड़ा नहीं रहेगा

तेरा-मेरा नहीं रहेगा

वो दिन आयेगा


चाहे हम ला सके 

चाहे तुम ला सको

मगर लायेगा, कोई कोई तो लायेगा

वो दिन आयेगा


उस दिन हम होंगे तो नहीं

पर हम होंगे ही उसी दिन

जैंता ! वो जो दिन आयेगा एक दिन इस दुनिया मे,

जरूर आयेगा,



-उत्तराखंड काव्य से साभार














Sep 15, 2013

ऑक्सफ़ोर्ड-पहला दिन

 हवाई जहाज़ की खिड़की  से लन्दन शहर दिखता है, शहर अपने अधिकतम सचुरेशन में बसा हुआ, एक दुसरे से सटी बहुमंजिला इमारते, आई ऑफ़ लन्दन, लन्दन ब्रिज, बीच में हाईड पार्क की बड़ी खुली जगह,  इस ठसाठस को देखकर फगोश होती है,  यूं ही नहीं हुआ कि ये लोग नयी जमीनों, नयी दुनिया की तलाश में इतनी आक्रमकता के साथ निकले…

हीथ्रू से ऑक्सफ़ोर्ड की राउंड ट्रिप बस टिकट ली.  बिना ग्रीटिंग और बिना मुस्कान के बस ड्राइवर ने कामकाजी तरीके से मेरी अटैची रखी, टिकिट दिया.  अमरीकी ड्राइवर अधिकतर खुशमिजाजी से मिलते हैं,  बातचीत के बीच हालचाल पूछते हुए अपना काम करते है.

बादल घिरे हैं, धूप  नहीं है लेकिन धुंध भी नहीं है, ठण्ड के साथ कुछ कम रोशनी वाला दिन है,  हीथ्रू से ऑक्सफ़ोर्ड जाते हुए, बस से एरियल व्यू का विलोम दिखता है; सड़क के दोनों ओर हरियाली, एक फार्म, घोड़ों का एक तबेला, एक जगह बंधी गायें, कुछ खुले घास के मैदान, मेरा क्लोस्टरोफोबिया कम हुआ.  पेड़ बहुत एकसार है, अमेरिकी वेस्ट कोस्ट के घने रेडवुड और डगलस फर और बूढ़े चीड़ -चिनारों के मुकाबिले बहुत बोने, झाड़ीनुमा नज़र आते हैं.   

ऑक्सफ़ोर्ड हज़ार साल से ज्यादा पुराना शहर,  लाल ईंट और खपरैल की छत वाली, आइवी की लतर से ढकीं इमारतें, इमारतों का खाका लखनऊ की रेजीडेंसी के खंडहरों की याद दिलाता है , जिन दिनों वो साबुत रही होंगी, शायद कुछ इसी तरह का दिखतीं होंगी.  बीच बीच में बहुत पुरानी पत्थर और मिट्टी की चिनाई वाले कुछ भवन और पुरानी दीवार भी दिखती है जो दसवीं-ग्यारवीं सदी की हैं.  इनके मुकाबिले ईंट-खपरैल के मकान नए और ज्यादा पहचाने हुए लगतें हैं .

हाई स्ट्रीट,क्वीन्स लेन बस स्टॉप, पर उतरकर मैप में  कोर्पस क्रिस्टी कॉलेज तक जाने का रास्ता ढूंढती, रोड़ी बिछी, संकरी  मेग्पई लेन से होते हुए अपेक्षाकृत चौड़ी, लाल कॉबलस्टोन की मरलॉट स्ट्रीट तक अटैची को घसीटना तकलीफ दे रहा है, अच्छा होता अगर बैकपैक लायी होती.

मेग्पई लेन, एक संकरी गली, असमतल सड़क पर अटैची को घसीटना तकलीफ दे रहा है, अच्छा होता अगर बैकपैक लायी होती.  मरलॉट भी लाल कॉबलस्टोन की बनी पुरानी संकरी सड़क है जिसके वाकवे पर पत्थर की स्लेट बिछी हैं, मरलॉट स्ट्रीट के दोनों किनारे  सटी हुयी,  एक के बाद एक इमारतें, और बीचों बीच पुराना भव्य चर्च है.  चर्च और इमारतों के मुख्य द्वार लकड़ी के बने मध्यकालीन किले के दरवाजों की तरह बड़े है, जिनके बीच एक आदमकद छोटा दरवाजा खुला है,  ये दरवाजे किसी कॉलेज या संस्थान के खुले दरवाजे नहीं लगते, इनके भीतर जाते हुए हिचक होती है, किसी अपरिचित घर में घुसने का अनमनापन होता है. इन इमारतों के नाम कहीं साफ़ साफ़ बड़े बोर्ड पर नज़र नहीं आतें, बल्कि एक तरह से इन नामों को खोजना पड़ता है.  ऑक्सफ़ोर्ड एक सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी न होकर लगभग ३९ स्वायत कॉलेजों का समुच्चय है, और इन कॉलेजों की भी अपनी अलग से परिधि नहीं है, इतना कह सकतें हैं कि एक मोहल्ले के भीतर अमुक इमारतें इस कॉलेज की हैं,  बाकी दो किसी दूसरे कॉलेज की टाईप, मेरे अब तक जाने पहचाने यूनिवर्सिटी के डिजायन से अलहदा अनुभव… 

मरलॉट स्ट्रीट  के आखिरी सिरे पर कोर्पस क्रिस्टी कोलेज की इमारत है, आज रविवार हैं, लगभग सन्नाटा है,  बड़े किलेनुमा द्वार के भीतर एक संकरे गेट से निकलकर पोर्टर मुझे गेट से सटे एक छोटे कोठरीनुमा ऑफिस में बुलाता है, दो चाबियाँ और एक पर्चे पर NB32 लिखकर देता है, एक मैप पर फिर मरलॉट स्ट्रीट के बीच निशान बनाकर छोड़ देता है.  पोर्टर   के चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं, सपाट चेहरा, नपे तुले शब्द, कोई उत्साह नहीं,  अमूमन अमेरिकी लोग उत्साह से मिलते हैं, हालचाल पूछते हैं और किसी तरह कैम्पस में हुयी दिक्कत के बारे में पूछते हैं.  यहाँ लगता है कि किसी कोड के साथ किसी आले में चाबी टंकी होती और मुझे उसके इंस्ट्रक्शन होते तो वो भी इतना ही इम्पर्सनल अनुभव होता.  ऑफिस की एक कोने की मेज पर एक बच्चा कम्पुटर पर खेल रहा है, इस पूरे सीन के बीच यही बात जानी पहचानी लगती है.  मैप और न्यू बिल्डिंग के नाम के आधार पर मैं एक होटल की बिल्डिंग में पहुंचती हूँ, दरबान अंदाज से दूसरी इमारत का इशारा करता है ,  मकानों के बीच कोर्पस क्रिस्टी की न्यू बिल्डिंग है, लोहे के दरवाजे की एक चाबी से गेट खोलकर अंदाजे से पत्थर के अहाते को पारकर एक छोटी चौमंजिले मकान के तीसरे फ्लोर के कमरे तक जाती हूँ, फिर कमरा मिलता है,  भारत में कोंफ्रेंस होती तो कोई स्टूडेंट ही  इस भूलभुलैया में किसी विजिटर को छोड़ आता,  अमेरिका में भी शायद अमूमन कोई हेल्प होती, नहीं तो ज्यादा साफ़ इंस्ट्रक्शन होते.   डोरमेट्री के छह कमरों के बीच एक टायलट और एक शावर है, दोनों में मुश्किल से एक आदमी के खड़े होने की जगह है, हिलने-डुलने की तो बिलकुल नहीं.   टॉयलेट में सीट कवर नहीं, वाश बेसिन में ठंडे और गर्म पानी का अलग अलग नल,  हाथ पोछ्नें के लिए एक पुराना टॉवल है, एयर ड्रायर या पेपर टॉवल नहीं है.   अमेरिकी यूनिवर्सिटी के डोरमेट्री के टॉयलेट्स इसके मुकाबिले शायद आठ से दस गुना बड़े, ज्यादा रोशन, होते हैं,  अमूमन भारत के भी जिन होस्टलों में मेरा रहना हुआ है, इन जगहों से वो भी तीन गुना ज्यादा बड़ी हैं.

लेकिन अमेरिकी यूनिवर्सिटीयों की कहानी महज २०० से १५० साल की है, भारतीय यूनिवर्सिटीयों की भी अधिक से अधिक सौ साल पुरानी.   ये हज़ार साल पुराने इतिहास के साथ तालमेल बनाते हुये, बिना ज्यादा छेड़छाड़ के एक लिमिट के भीतर नए खांचों को फिट करने की कोशिश का नतीजा है.
 पुरानी परम्परा, पुराने आर्किटेक्चर और पुराने संस्कारों के साथ ताल मिलाते हुए नए को जितना ज़रूरी है सिर्फ उतना जोड़ने की बात है, यहाँ पुराना अमूल्य है, प्राथमिकता उसके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ न करने की है,  नये का जुड़ना इस परिवेश में अदृश्य होने, पुराने में समा जाने की की शर्त पर है….  

चर्च और मोनेस्ट्री की परम्परा की छाप अब तक ऑक्सफ़ोर्ड पर बनी हुयी है,  उसी परम्परा में पढाई-लिखायी, रिसर्च और तमाम तरह के बौद्धिक सिलसिले आगे बढे हैं,  पुराने और धार्मिक बौद्धिक परम्परा के सिलसिले  से निकले आज के ज्यादा सेक्युलर संस्थान हैं,  धार्मिक बौद्धिक परंपरा की स्वीकृति यहाँ की नींव है, आधुनिक शिक्षा उसके नकार पर नहीं खड़ी  है.

भारतीय आधुनिक शिक्षा भारत के पारम्परिक दर्शन, ज्ञान, परम्परा के नकार पर खड़ी  है, बाहर से थोपी गयी है.  इसीलिए ये शिक्षा संस्कार नहीं बदलती, पुराने के साथ जूझ सकने की कुव्वत, वहां की अच्छी चीजों के साथ आगे बढ़ने के दिशा में हमारी मदद नहीं करती.  शायद भारत में  संस्कृत की सघन बौद्धिक परम्परा,  हिन्दू-बौद्ध-जैन  तर्क-वितर्क की पुरानी परम्परा के सिलसिले, सूफीयों के दर्शन के सिलसिले में अगर हमारे शैक्षिक संस्थान होते,  तब  आधुनिक संस्कारों के लिए भी एक सहज सिलसिला होता,  एक संगत रास्ता  बनता.  अभी जो जनमानस की भाव और धार्मिक संस्कार की दुनिया है वो किसी तरह शिक्षा और बौद्धिक डिस्कोर्स के बीच जगह नहीं पाती, उसका विस्तार, उसका संस्कार नहीं बनता, उसके भीतर सवालों की जगह नहीं बनती, वो बंद की बंद दुनिया है, बंद दुनियाओं  के बीच ही लम्बे समय तक अज्ञान, अंधविश्वास, और विकृतियाँ छिपी रहती है.   ताश के पत्तों की तरह हमारी सेक्युलर स्टेट शायद इसीलिए भरभरा कर गिर जाती है …    

Jul 28, 2013

ज्वालामुखी के आँगन में —माउन्ट सेंट हेलेंस

दुनिया के लगभग तीन चौथाई ज्वालामुखी 'पेसिफिक रिंग ऑफ़ फायर' के भीतर आते हैं, जिनमें से कुछ ब्रिटिश कोलंबिया, वाशिंगटन, ऑरेगन, और कैलिफ़ोर्निया राज्यों में पसरी  कैस्केड पर्वत श्रृंखला के भीतर हैं.  पेसिफिक नार्थवेस्ट के लैंडस्केप को रचने में इन ज्वालामुखीयों की अहम् भूमिका रही है.  पिछले वर्ष माउंट मेज़मा पर हुए विस्फोट से बनी 'क्रेटर लेक' देखने का मौका मिला था, जिसके तल में अब सुप्त ज्वालामुखी है. 

इस इलाके में बहुत से एक्टिव ज्वालामुखी भी हैं. पोर्टलैंड या सियाटल से हरीभरी कैस्केड पर्वत श्रृंखला के बीच वनस्पति विहीन स्लेटी, बर्फ से ढके माउंट हुड, माउंट रेनियर और माउन्ट सेंट हेलेंस दूर से दिखतें हैं.  हवाई जहाज जैसे ही इन तीन पर्वतों के ऊपर से गुजरतें हैं, पायलट यात्रियों को याद दिलातें हैं कि वे इन पर्वतों के एरियल व्यू का मज़ा लेना न भूलें. सन दो हज़ार में सियाटल आयी थी, तब पहली बार आते-जाते हवाई जहाज से माउन्ट रेनियर और माउंट सेंट हेलेंस को देखा था. फट ये ख्याल आया कि शायद हिमालय की किसी चोटी का एरियल व्यू ऐसा ही होगा,  हालांकि  हिमालय का विस्तार वृहद् है, ये तुलना ही बेमानी थी, फिर भी घर की याद होगी, जिसने अजाने देश में समरूपता ढूंढ लेने का दबाव बनाया. 

 हवाई जहाज़ से, कई कई दफे इन पर्वतों को समीप से देख लेने का भ्रम हुआ है, लेकिन फिर एरियल व्यू, डिसटोर्टेड व्यू हुआ,  हर चीज़ बौनी, पिचकी हुयी नज़र आती है, पहाड़ देखने के लिए वैसे भी एरियल व्यू सबसे नाकाफी है, वैसे पहाड़ देखने के लिए कोई भी एक व्यू कभी पर्याप्त नहीं होता, पहाड़ की बहुत दूर से, ठीक तलहटी से,  360 डिग्री की परिधि में खड़े पडौसी पहाड़ों से और पहाड़ चढ़ते चले जाने के बीच कई-कई देखी, कई कई मौसमों के बीच दिखी और बहुत सी छिपी रह गयी झलकों से मिलकर पहाड़ का जादू सर चढ़ता है, विस्मित करता है, बार बार लौटेते रहने का आग्रह करता है. 

 पिछले हफ्ते,  माउंट सेंट हेलेंस तक जाने और इसे करीब से देखने का मौका लगा.   हालाँकि चार वर्ष पहले २००८ में यहाँ आखिरी मर्तबा एक छोटा विस्फोट हुआ था, लेकिन ये जो सामने लैंडस्केप है,  वो सन अस्सी के विध्वंस की सृष्टी है.  ढाई सौ मील के इलाके में ज्वालामुखी की राख, पमिस, लावा रॉक्स, हज़ारों  की संख्या में पेट्रीफाइड पेड़ ही पेड़, औंधे गिरे हुए,  खड़े के खड़े रह गए, अपनी जड़ों तक नग्न,  बिखरे हुए हैं.  ज्वालामुखी का सीधा प्रहार जिन पर्वतों पर हुआ, वहां  पूरी तरह मिट्टी की परतें पहाड़ों से उधड़  गयी, उनकी नुकीली देह पता नहीं कितने वर्ष बाद हरियाली ढक सकेगी, कब फिर से वन्यजीव, और पक्षी बसेंगें...

 बिना ऑक्सीजन के ज्वालामुखी के ताप में जल जाने, उस राख में एकमेक हो पत्थर हो गए पेड़ को छूती हूँ, सन अस्सी की ठीक-ठाक याद है मुझे, मन में ये ख़्याल आता है कि मैं सन अस्सी की मई अठारह को, किसी वजह से, यहाँ होती तो इन्ही पेड़ों की तरह एक पत्थर होती. दो हज़ार साल पहले  ज्वालामुखी में दब गए रोमन साम्राज्य के पुराने शहर पॉमपेई का सहसा स्मरण हो आता है. लगता है कि पॉमपेई के बीचों-बीच कहीं पहुंची हूँ.  पॉमपेई के विपरीत यहाँ मानवहानि बहुत कम हुयी. ये इलाका बहुत कम आबादी वाला, घने वनों से घिरा है, रिहायिश यहाँ से काफी दूरी पर है, और इतवार की सुबह जब विस्फोट हुआ तो यहाँ काम करनेवाले लोग दूर अपने घर पर थे, फिर भी ५७  लोगों की जान गयी, जिनमें कुछ कैम्पिंग करते हुए लोग, यहाँ काम कर रहे पत्रकार और कुछ वैज्ञानिक थे.  विस्फोट के कुछ ही दिनों बाद वैज्ञानिक यहाँ लौटे,  यहाँ पर हुयी रिसर्च से मिली जानकारियों से अब ये संभव हुआ है कि भविष्य में इस तरह के हादसों का पूर्वानुमान कुछ हफ़्तों पहले लग जाएगा, इन प्राकृतिक आपदाओं का मनेजमेंट संभव हो सकेगा.  मन में अभी भी, 16 जून 2013  में केदारनाथ में हुए विध्वंस की कथा समेत पहाड़ों की कई कई कथायें समान्तर चल रहीं हैं.

अस्सी के विस्फोट के बाद बहुत मात्रा में जो पेड़ अगल-बगल के पहाड़ों में गिरे थे, लेकिन जले नहीं थे, उनकी ढुलाई कई महीनों तक चलती रही.  अगले दो वर्षों तक यहाँ ६८,००० एकड़ में फिर पेड़ रोपें गयें, अब इन पेड़ों की उम्र भी तीस वर्ष हो गयी है, बहुत बड़े हिस्से में हरियाली लौट आयी है.  डगलस फर के ये पेड़ काले, सलेटी लावा, राख, चट्टानों से ढके पहाड़ों के बीच हरी पन्नी में लिपटी टूथपिक की कतारबद्ध, बौनी, सेनायें जैसी लगती हैं.  विनाश के बीच, जीवन की लड़ाई के योद्धा ही तो हैं ये हरे पेड़. इस हरेभरे के बीच ही अब निर्जन सेंट हेलेंस पर्वत दिखता है. 

सिर्फ तीस साल पहले ट्युटल नदी यहाँ से होकर बहती थी, ठीक माउन्ट सेंट हेलेंस के नीचे से,  और यहीं 'स्पिरिट लेक' भी है.  पुरानी तस्वीरों में साफ़ पानी की नीली नदी दिखती है, स्वच्छ , नीली 'स्पिरिट लेक' भी.  अब बहुत बड़े निर्जन का सलेटी विस्तार है, ट्युटल का बड़ा हिस्सा मलबे के नीचे भूमिगत है.  स्पिरिट लेक में राख घुला, गन्दला पानी है, नदी और झील दोनों का कुछ हिस्सा दलदल में बदला हुआ है. वर्षों बाद या कल ही कौन जानता है की यहाँ क्या होगा?

माउंट सेंट हेलेंस के ठीक सामने के पहाड़ पर, ट्युटल नाम की जगह में,   ब्लास्ट जोन के भीतर जॉनस्टन रिज़ ओब्जर्वेटरी एवं नेशनल वोल्केनिक मोन्यूमेंट है, जहाँ कई रियल लाइफ़ एक्जिबिट से लेकर ज्वालामुखी के मॉडल है, यहाँ  थियेटर में, 'The Eruption of Mount St. Helens' देखी.  ज्वालामुखी के विस्फोट और धुंएँ, गर्द की बारिश और विनाश की इमेजेज  हिरोशिमा के परमाणु बम विस्फोट की छवि उकेरती हैं.  लगता है पॉमपेई, हिरोशिमा और सन अस्सी के माउंट हेलेंस के विस्फोट सब की देखी, सुनी बातें एक साथ गूँथ रही हैं.    धीरे-धीरे स्क्रीन फोल्ड हो रही है, और अब परदे पर फिल्म की जगह, एक बड़ी खिड़की है, जिसके पीछे से माउंट सेंट हेलेंस नमूदार हुआ है.  एक उम्रदराज़ जोड़ा जो ठीक मेरे पीछे बैठा है, हमारी पारिवारिक फोटो लेने की पेशकश करता है, और बदले में यही प्रस्ताव उन्हें देती हूँ. इन लोगों का यहाँ दूसरी बार आना हुआ है, पांच वर्ष पहले जब यहाँ आये थे, उसक समय की धुंध  में उनके लिए बहुत कुछ देखना संभव नहीं हुआ था, आज के देखे की उनको खुशी है.  हम अपने धूप में नहाए दिन के शुक्रगुजार हैं  …

जॉनस्टन रिज़ ओब्जर्वेटरी जिस पहाड़ पर है, वहां मील पांच मील पैदल टहलते  ब्लास्ट जोन का बहुत बड़ा हिस्सा दिखता है, इस पूरे पहाड़ पर भी अब मिट्टी  नहीं है, पमिस, लावा, रेत की तरह भुरभुरी राख है, कई पेट्रीफाईड, बड़े, बड़े,  कोनीफर पेड़ आड़े तिरछे गिरे हुए हैं, फिर उनके ही बीच से जगह-जगह लूपिन के बैंजनी-नीले फूल, सफ़ेद एस्टर, अजाने नारंगी, पीले फूल, कुछ घास, खरपतवार, जंगली ओट उगीं हैं, धीरे-धीरे हरियाली के लिए जमीन रच देंगे यही.   हरे की आहटें हैं ये,  फिर किसी दिन, जब मैं नहीं रहूंगी, उग ही आएगा सब्जरंग…

यहाँ से माउंट सेंट हेलेन्स का विस्तार दीखता है,  पर्वत की मुख्य चोटी की जगह बड़ा गड्ढ़ा है,  अच्छे, उजले, धूप के इस दिन,  बर्फ से ढके, दो मुहानों से छूटते भाप के बगूले रह रह कर दिखतें हैं. बीच बीच में तेज़ हवा इन्हें बहाकर ले जाती है.  ये एक्टिव ज्वालामुखी है, पर इस वक़्त कितना शांत, किसी तरह का भय सृजित नहीं करता. इस वक़्त लगता है कि ये इस नए लैंडस्केप का सृजक ही है. विध्वंस और सृजन एक ही सिक्के के दो पहलू है, दोनों लगातार साथ साथ चलने वाली प्रक्रियाएं  …  




अस्सी के विस्फोट का एक वीडीयो है , पहले और बाद के लैंडस्केप का अंतर और विभीषिका का दस्तावेज  ….

Jun 30, 2013

कोलंबिया रिवर गोर्ज के बीच उत्तराखंड की याद


पेसिफिक नॉर्थवेस्ट में रहते हुए अब पांच वर्ष हुए, इस बीच करीब पांच हज़ार मील ड्राइव करते हुए इस क्षेत्र को देखने का मौका मिला है, इस क्षेत्र में कई झीलें, नदियाँ, प्रशांत महासागर का तट , ऊँचे पहाड़, गहरे दर्रे, सोये हुए ज्वालामुखी और अतीत में ज्वालामुखी विस्फोटों से बनी विशद घाटियाँ, झील और तालाब हैं. कोस-कोस पर झरने और दर्रों के बीच बहती नदियाँ.  बुराँस, बाँज, फर, चीड़, हेमलक, बर्च, चिनार, और देवदार के घने जंगलों में,
तेज़ हवा और पानी की मिलीजुली आवाज़, हड्डियों को चीरती ठण्ड के बीच हिमालय में कहीं होने का अहसास होता हैये साम्य, अजीब खेल करता है, कुछ ही देर को सही, मैं घर से बहुत दूर घर जैसी किसी जगह में पहुँच जाती हूँ. 
 
ये इलाका आइसऐज़ के ख़त्म होने के बाद महाजलप्रलय के असर में बना है. आईसएज  के अंत में तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर्स के कारण नदियों और झरनों में आयी बाढ़ के पानी से कटकर ज़मीन का बड़ा हिस्सा दर्रों में बदल गया.  जो हिस्सा या तो सीधे पानी से बचा रहा या अपनी ख़ास संरचना के कारण पानी के दबाव को झेल सका वों क्लिफ्फ़ बन गया. जो बह/कट  गया, जो परते पानी में घुल गयी, उनकी जगह खड्ड व दर्रे बनते रहे. ये प्रक्रिया कई बार हुयी है.  इसके अलावा, चट्टानों के बीच रिसते पानी का बर्फ़ बनना, फिर पिघलना, फिर जमना की अनवरत प्रक्रिया भी चट्टानओं को तोड़ती रही है.  पानी, हवा, से हुये भूक्षरण, ज्वालामुखी और भूकंप से हुये विध्वंस सबने लाखों-करोड़ों वर्षों में इस विहंगम लैंडस्केप को गढ़ा है.

नोर्थवेस्ट में रहते हुये उत्तराखंड में बिताये हुए अपने जीवन के पहले बीस वर्षों की याद आती है,  यहाँ के भोगोलिक साम्य के बरक्स इस इलाके को किस तरह विकसित किया गया है,  इसकी देखरेख किस तरह से हुयी है, इस पर भी अक्सर नज़र जाती है, और कुछ अच्छी बातें देखकर एक सपना बुनती रहीं हूँ कि ये चीज़े काश हिमालयी क्षेत्र में भी संभव हो सके. अपनी जीवन पद्दती, गैजेट्स, और विकास और बाज़ार की अवधारणा तो  अमेरिका की नक़ल में ज्यादा विद्रूप के साथ हिन्दुस्तान अपनाता ही है, काश की अच्छी बातों और नीतीयों का भी कभी अनुकरण हो सकता. 
 
मेरे घर से दो घंटे की ड्राइव पर , पोर्टलैंड शहर के बाहर, कोलंबिया रिवर गोर्ज सीनिक एरिया है जो कोलंबिया नदी के दोनों तटों पर पसरा हुआ है. चूँकि कोलंबिया नदी ऑरेगन और वाशिंगटन राज्यों के बीच की विभाजन रेखा है, अत: ये क्षेत्र इन दो राज्यों के बीच पड़ता है, जिसमे ६ जनपद(काउंटी), १३ शहर-कस्बे, और चार नेटिव अमेरिकन रिजर्व आते है. कोलंबिया नदी जो पहाड़ों के बीच से बहती दिखती है , दरअसल ये समुद्र तल से भी नीचे बहती है, और जो पहाड़ हैं, वो पहाड़ न होकर जमीन का वो बचा हुआ हिस्सा है जो पानी की धार से कटा नहीं, घाटी महज एक बड़ा दर्रा है. पहाड़ और दर्रे बिलकुल एक सा वितान, एक सरीखे. ये इलाका देखकर और आइसएज़ के बाद बने तमाम क्षेत्रों को देखकर समझ आता है  कि पहाड़ हमेशा जमीन के ऊपर उठने से ही नहीं बनते, जमीन के भीतर कटाव से भी बनते हैं. जमीन दरकती है, दर्रे बनते है, और बचा रह गया प्लेट्यू पहाड़.  विपरीत चीज़ों के बीच साम्य का भ्रम, पृथ्वी ऐसी ही है.  

उन्नीसवीं सदी के मध्य में , हिमालय की तरह यहाँ भी नेटिव पेड़ों का भारी मात्रा में कटान हुआ और इस इलाके में लकड़ी के टालों  और आरा मशीनों के अलावा कोई दूसरा उधोग नहीं था.  नेटिव वृक्ष  जब कट गए तो सिर्फ व्यवसायिक नज़रिए से ही यहाँ तेज़ी से बढ़ने वाले वृक्ष लगाए गये. 
 पहले विश्वयुद्द के बाद, लगभग सौ साल पहले इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल की तरह विकसित किया गया, यहाँ अमेरिका का पहला सीनिक हाइवे, कोलंबिया रिवर हाइवे, १९१३-१९२२ के बीच बना. पहली बार किसी हाइवे के निर्माण के लिए भारी मात्र में मेटल–बेस्ड संरचना का निर्माण किया गया, जो इस हाईवे को लंबे समय से टिकाये हुये है. जब ये हाइवे बन रहा था तो इस बात का बड़ी बारीकी से विशेष ध्यान रखा गया कि गोर्ज के साथ कम से कम छेड़-छाड़ हो, इस सोच के इर्द-गिर्द इस हाईवे का निर्माण हुआ, जिसका श्रेय  वकील सैम्युअल हिल और इंजीनियर सैम्युअल लेंकास्टर को जाता है . 
१९३० तक आते आते बहुत बड़ी संख्या में पर्यटक गोर्ज को देखने आये और गोर्ज में अंधाधुंध कंस्ट्रक्शन न् हो इसकी चिंता बनी. १९३७ में पेसिफिक नॉर्थवेस्ट के क्षेत्रीय कमीशन ने गोर्ज को राष्ट्रीय महत्तव का क्षेत्र घोषित किया और इसे संरक्षित पार्क बनाने की पेशकश की. कई सालों तक प्रकृति प्रेमियों ने इस एरिया के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध होकर तथाकथित विकास को दूर ठेले रखा. अंत में १९८० में पोर्टलैंड की एक गृहणी नेन्सी रसल ने जागरूक नागरिक मोर्चा बनाया और इस एरिया के संरक्षण की फेडरल गवर्नमेंट से मांग की. आन्दोलन करीब ६ साल चला, और नेन्सी रसल इस आंदोलन का चेहरा बनी, उन्हें बहुत सी व्यक्तिगत धमकियां मिली, कार का एक बम्पर स्टिकर भी पोपुलर हुआ Save the Gorge from Nancy Russel”.  १९८६ में तत्कालीन रास्ट्रपति  रीगन ने इस पर दस्तखत किये, और अब गोर्ज हमेशा के लिए विकास की आंधी से बच गया है. 

अब ये क्षेत्र २९२,५०० एकड़ का कोलंबिया नदी के दोनों तरफ फैला है.  अब इस एरिया के विकास और प्राकृतिक सौंदर्य को बरकरार रखने के लिए एक स्वायत्त कमीशन है जिसके १३ सदस्य है, ३ सदस्य ओरेगन का गवर्नर और ३ वाशिंगटन का गवर्नर मनोनीत करता है. और ६ सदस्य  अपने जनपद से आते है. एक सदस्य फोरेस्ट डिपार्टमेंट से आता है. 

हालांकि विकास और रोजगार को दरकिनार करके प्रकति को संरक्षित किया जाय तो लोग हाशिए  पर आ जायेंगे, इसीलिए बहुत सचेत तरह से विकास की ज़रूरत होती है. इस इलाके में पर्यटन सीमीत है, लगभग हर साल २० लाख पर्यटक गोर्ज में आते हैं. रहने के लिए कोई बड़ा होटल नहीं है, सिर्फ कुछ पुराने घरों में बेड एंड ब्रेकफास्ट की व्यवस्था है, बाक़ी लोग दिनभर यहाँ घुमते हैं, और वापस पोर्टलैंड चले जाते हैं.  सिर्फ कुछ पार्किंग लॉट हैं, बहुत से हाइकिंग ट्रेल्स है, वाटर सर्फिंग और विंड सर्फिंग के ऑउटडोर स्पोर्ट्स है.

आज इस गोर्ज में बहुत से हाईटेक, कंपनियां है, सौ साल पहले जहाँ जगह-जगह आरामशीनें थी, लम्बर कंपनियां थी, अब  बहुत सी इंजीनियरिंग की कंपनियां है. जैसे डालास वाटरफ्रंट पर जहाँ अलुमिनियम की भट्टी होती थी, अब गूगल का डाटा सेंटर है.  अब इस एरिया में बहुत से विनयर्ड्स भी है.. २००४ में इस एरिया को अमेरिकन विटीकल्चर एरिया की आधिकारिक स्वीकृति मिल गयी है. गोर्ज गाइड के अनुसार यहाँ पचास से ज्यादा विनयर्ड्स में अंगूर की लगभग तीस किस्में उगाई जातीं हैं. अंगूर के अलावा इस इलाके में बड़ी मात्र में हिमालयन ब्लेक बेरी , हिसालू, सेब, पल्म, नाशपाती, आडू, खुबानी भी उगायी जाती है.
 
गोर्ज को देखकर तसल्ली होती है कि आने वाली पीढीयों के लिए ये जगह बची रहेगी. 


केदारनाथ और उत्तराखंड के दुसरे इलाकों में हुयी भयानक तबाही के बाद भी क्या उत्तराखंड के नीतिनिर्माता कोई सबक लेंगें . पर्यटन और हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्लांट्स के इतर प्रकृति से मेल जोल रखने वाली होर्टीकल्चर  इंडस्ट्री और सॉफ्टवेर और हार्डवेयर की इंडस्ट्री का विकल्प सोचेंगे? उत्तराखंड के मानव संसाधन को शिक्षित और कुशल बनाने के लिए क्या राज्य कभी इन्वेस्ट करेगा या पिछड़ी खेती को ही नए वैज्ञानिक आयाम देने की कभी पहल होगी ? या सिर्फ पर्यटन का ही ढोल बजाएगा जहाँ लोग सिर्फ होटलों के सर्विस सेक्टर और खच्चर पर सामान ढोनें वाले मजदूर ही बने रहेंगे.


**********