"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Nov 18, 2014

अस्कोट से आराकोट के बीच कहीं-5


---1---
एक लम्बी नींद थी और सपने में टिमटिमाता दीया किसी ओट.
अभी ही आँखे खुली, अरसे बाद ऐसी सुबह हुई, ये हवा, ये  सन सन्न सन्नाटा.
यहीं कहीं मेरा जन्म हुआ, मेरी शिराओं, धमनियों में बहता यहीं का लवण, और लोह.
बरसों बाद लौटी हूँ, बोल रही हूँ भूली बिसरायी मातृभाषा, खड़ी हूँ निडर...

---२---
आज रस्तेभर पत्थरों की बारिश होती रही लगातार, कभी भी गिर सकती हैं चट्टानें, धसक सकते हैं पहाड़,
ढहती चट्टानों के ऊपर टिके हैं गाँव के गाँव, गुजरते हैं घोड़े-खच्चर/ औरतें-बच्चें/कुत्ते -बिल्ली/ काकड़-हिरण.   
एक दिन खाली हो जाएंगे ये बचे-खुचे गाँव, रोष में ढह कर गिर जाएंगे पहाड़, उजड़ जाएंगी  सड़कें,  बंद सब रस्ते,
नदियां उन्मत और पागल हो जाएंगी,
कौन रोक सकेगा उन्हें ?

---३---
काली नदी के तीर
छोटी सी दूकान में धामी जी बेचते हैं पेप्सी, बिसलरी, कोक और पांच रूपये के पैकेट में जरा सी नमकीन, ढेर सी हवा.
सड़क पर रोडियां तोड़ती, सर से सर मिलाकर बैठी नौ बच्चियाँ, तीन गाँवों से आयीं,
साथ साथ हंसती, एक सी दिखती हैं, एक से अभाव, एक सी जिद में गुँथी,
एक ही हाईस्कूल में पढ़तीं हैं...

---४---
पहाड़ और नदी के बीच, खनन का अनंत सिलसिला है, खप रहे हैं पहाड़, खप रही है नदी,
खप रहे हैं कई-कई हाथ/पीठ/बच्चे-बच्चियां/किशोर-किशोरियाँ/औरतें और औरतें,
दिन दिन भर ढो रहे हैं रेत/बजरी/कंकड़/पत्थर.
तोड़ रहे हैं रोड़ी, बीस रूपये कट्टा रोड़ी, दिन में १० कट्टा रोड़ी.
खप रही है रोड़ी बांध/सड़क/पुलों में,
सुदूर मेट्रोपॉलिटन शहरों के  मॉल्स/बहुमंज़िला इमारतों/मल्टीप्लेक्स सिनेमा घरों में.
मेरे जहन में गूँजता है मशहूर फिल्म 'शिंडलर्स लिस्ट' का डायलॉग जरा हेर-फ़ेर के साथ 'लोग सड़कों, पुल, मॉल्स और इमारतों में रूपांतरित हुए जाते हैं '
कैलास मानसरोवर मोक्ष मार्ग की ये कैसी शुरुआत हुई, बिना रिसर्च के ही लौट गया खुशहाली का शोधार्थी...

---५ ---

गोरी नदी की घाटी में 
छिपे हैं कस्तूरी मृग,  उग रहा है जंबू और धुआँर.
ढ़ाई दिन बीत गया है अब चलते चलते, ढूंगातोली,  बरम, चामी, लुंगती, मौरी, बंगापानी, छोरीबगड़, मदकोट,
बारिश का कहर और नदी लील गयी है खेत, घर,  सड़क, पुल, स्कूल, अस्पताल.  
सब तरफ भूख है, सिर्फ भूख और बेहाली,  
वनराजी, जनजाति,  हरिजन गाँवों के बच्चे और किशोर— अधिक से अधिक कोई तीसरी पास कोई चौथी फेल,
औरतें—चौदह-पंद्रह में  ब्याह, पच्चीस तक अधेड़,  चालीस में विधवा,
वही, वही, घूमफिर कर फिर वही कथा, वही गोल चक्कर, वही फ़सान...

---६ ---
 जौलजीवी में मिलती हैं काली और गोरी  नदी,
वीरान संगम तट, उजाड़ घाट.
दोनों बहनों की धार तेज़, दोनों उफनती हैं, बहाकर लायी हैं कहाँ कहाँ से अगड़मबगड़म.
इंडो-तिब्बत व्यापार
​का ​ सदियों पुराना केंद्र जौलजीवी, अब लगभग भुतहा क़स्बा.
टूटते-ढ़हते दुमंजिले पर पुराने काष्ठ के खिड़की दरवाजों से झांकते, झूलते बच्चे,
और नीचे गोठ में अब तक भरी है रेत, ठूँठ, और कंकण, पत्थर.  
हाथ में कलेवा लिये, संगम की महिमा बखानता, आशीष बांटने को आतुर, देर तक झक मारता रहा एक पंडित,
उसने चाय पी और आखिर हारकर लौट गया...

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Oct 14, 2014

AAA14: पांगू से यात्रा की विधिवत शुरुआत

25 मई 2014
"मन का घोड़ा, कसकर दौड़ा, मार चला मैदान 
चलता मुसाफिर  ही पायेगा मंजिल और मकाम "

नारायण आश्रम में विधिवत आज अस्कोट -आराकोट यात्रा का शुभारम्भ हुआ. शेखर दा ने श्रीदेव सुमन को याद करते हुए यात्रा का शुभारम्भ किया, कुछ दिशा निर्देश दिये, और बताया कि आगे क्या अपेक्षित है. चंडीप्रसाद भट्ट जी ने प्रार्थना करवायी, और एक गीत भी सबसे गवाया "मन का घोड़ा,  कसकर दौड़ा, मार चला मैदान '.  पहले एक पंक्ति वो गाते, जिसे हम लोग दोहराते.  82 वर्ष के चंडीप्रसाद भट्ट बहुत स्वस्थ और दमखम वाले इंसान है, संकरी, ऊंची-नीची पगडंडियां चढ़ने-उतरने में संकोच नहीं करते, उत्साह से भरे हैं.  उनकी आवाज बुलंद है, उसमें किसी तरह का संकोच नहीं है और उच्चारण साफ़ है.   उनके लिए ऊंची आवाज में गाना,  नारे लगवाना, किस्से सुनाना,  कविता पाठ, और लोगों को सम्बोधित करना, सब सांस लेने जैसा सहज है. हिंदी और गढ़वाली दोनों भाषाओं पर उनकी पूरी पकड़ है, खाने, पहनावे, रहन-सहन में किसी ग्रामीण पहाड़ी किसान की सी सादगी है, लेकिन सामाजिक-राजनैतिक  समझ तीखी है, व्यक्तित्व तेजस्वी है.  अपने जीवन में मेरे लिए ये पहला अनुभव है किसी सर्वोदयी क़िस्म की प्रार्थना में शामिल होने का.   
Photo by Sushma Naithani

राणाजी  और उनकी पत्नी ने हमें चाय और हलवा खिलाकर विदा दी. ये विदा कुछ घर जैसी ही थी, स्नेहसिक्त, वैसी नहीं जैसी किसी होटल को छोड़कर जाते हुए होती है. भट्ट जी जिस जीप से आये थे, अभी दो तीन दिन वो हमारे साथ रहेगी, इसीलिए पीठ का बोझ फिलहाल इस जीप में रख दिया है और  लगभग खाली हाथ या एक छोटे से बैग और पानी की बोतल लिए हुए हम लोग पांगू की  तरफ पैदल निकल पड़े.  जल्द ही चलने की रफ़्तार के आधार पर चार पांच ग्रुप बन गए. सबसे  रफ़्तार वाले शेखर दा, प्रकाश उपाध्याय, गिरजा पांडे, कैलाश तिवारी, कमल जोशी आदि कुछ मिनटों में ही आँख से ओझल हो गए.  कुछ लोग दूर से दिखते रहे, मैं सबसे पीछे चलने वालों में रही, मेरा साथ देने भूपेन, अंजलि और हिमानी थे.

नारायण आश्रम से पांगू तक  सड़क काफी ठीक हालत में है, हम दो तीन गांवों से होकर गुजरे लेकिन किसी से ज्यादा बातचीत के लिए नहीं रुके, चूँकि  ठीक ग्यारह बजे पांगू पहुँचने का तय हुआ था. इस इलाके में पांगू सहित चौदह गाँव हैं जिन्हे चौदास कहते हैं, इन गांवों में रंग भाषा बोली जाती है, और यहाँ के लोग भोटिया या शौका जनजाति के अंतर्गत आते हैं. भोटिया लोग पारम्परिक रूप से भारत, नेपाल, तिब्बत के बीच  घूमंतू ब्यापारी रहे हैं. अच्छे मौसम में ये लोग छह महीने घर रहते और बाक़ी छह महीने घूमंतू व्यापारी की तरह रहते रहे हैं, व्यापार के इन छह महीनों को रंग भाषा में 'कुंचा' (पलायन) कहते हैं.  शौक़ा और भोटिया लोग पहाड़ के सबसे समृद्ध लोगों में से रहे हैं, और रंग भाषा के अलावा हिमालयी क्षेत्र की कई भाषाएँ ये लोग जानते हैं.  भारत-चीन की १९६२ की लड़ाई के बाद सदियों पुराना इंडो-तिब्बत व्यापार बंद हो गया और जीवन यापन के लिए सरकार ने भोटिया लोगों को आरक्षित जनजाति की सूची में शामिल किया, आज विभिन्न सरकारी नौकरियों में और ऊंची नौकरियों में इस समुदाय के लोग हैं.
Photo by Sushma Naithani

 पांगू गाँव लगभग सड़क पर ही हैं.  सड़क पर गाँव की तरफ जानेवाला एक गेट या मुख्यद्वार है , यहाँ स्वतंत्रता संग्रामी परिमल सिंह हयांकि के नाम का बोर्ड लगा है.  अस्कोट आराकोट की १९८४ और १९९४ की यात्रा के समय इस गाँव में पहाड़ की टीम का स्वागत परिमल सिंह जी ने किया था.यहीं  स्युसंग (शिव) का  मंदिर है, और 15X 25  फुट का प्रांगण है.  हमारे इस गाँव में सूत्र कर्णसिंह और जगत सिंह हैं जो स्वर्गीय परमल सिंह हयांकि के पोते हैं.  करीब साठ साल के, नाती पोतों  वाले कर्णसिंह खुशमिजाज और रंगीले व्यक्तित्व के आदमी हैं, उन्होंने कुछ घूँट लगा रखी है, लेकिन उसका इतना ही असर है कि वो निसंकोच हमें रंग भाषा में गीत सुना रहे हैं, नाच भी जा रहे है,  जैसे सोलह सत्रह साल के लौंडे हो, और भावुक हो रहे हैं बात बात पर. किसी तरह की अभद्रता उनके व्यवहार में नहीं है.

जगत सिंह मुझे महिलाओं से मिलवाने ले जाते हैं, कुछ महिलाएं अभी अभी खेत से ही लौटी हैं और अपने हाथ-पैर धो रही हैं, करीब पचपन साल की गीता देवी का शरीर  कसा हुया है, चेहरे पर चमक, सरलता और मातृत्व का मिलाजुला मीठा भाव है. उन्होंने हमें अपने पारम्परिक जेवर दिखाए, कालीन बुनने की हथकरघा मशीन दिखायी, बने हुए करीब बीस खूबसूरत कालीन भी दिखायें. इसमें से  कालीन उनकी बहु प्रेमा ने बुने हैं. प्रेमा दो बच्चों की माँ  है, और उसकी शिक्षा एम. ए. तक हुई है, लेकिन वो खेती, घर के कामों और कालीन डिजायन करने और बुनने में  निपुण है, जो  परिवार की जीविका का मुख्य स्रोत है.

 गीता देवी के घर के आँगन में प्लम का पेड़ है , और एक दुसरे पेड़ को वो टिमाटर का पेड़ बता रहीं हैं, इस तरह का चौड़े पत्तों वाला पेड़ मैंने पहले कभी नहीं देखा, जितना समझ में आता है, उससे यही लगता है, कि टमाटर की जंगली बेल हो सकती है या बड़े छोटे पौधे, लेकिन लगभग प्लम के जैसा पेड़ नहीं हो सकता. शायद टमाटर की तरह दिखने वाला कोई खट्टा फल इस पेड़ पर लगता होगा, जिसका इस्तेमाल ये लोग टमाटर की जगह करते हैं.  बातचीत में जैसे कल पता चला कि कुमायूँनी में हर नदी को गंग (यानि गंगा) कहते हैं, शायद इसी तरह इस पेड़ को टमाटर का पेड़ कहते होंगे.
Photo by Sushma Naithani

गाँव के अधिकतर घर साफ़ सुथरे और ईंट सीमेंट वाले हैं, अधिकतर घरों की बेटियां, बहुएं, लड़के सरकारी नौकरियों में है. गाँव में अच्छी खेती हैं, अच्छा मौसम है, बहुत से लोग सरकारी नौकरी करने के बाद गाँव वापस लौटें हैं, या फिर गाँव और शहरों के बीच आते जाते रहतें हैं. लेकिन गाँव में अस्पताल और स्कूल की दिक्कत अब भी है.  नजदीकी अस्पताल करीब चालीस किलोमीटर दूर धारचूला में ही है. चौदास के इन गाँवों के बीच एक ए. एन. एम. है. औरतें बहुत मेहनती हैं, और आम शहरी महिलाओं  से ज्यादा स्वस्थ और फिट दिखती हैं, ज्यादा निर्भय भी हैं.    

चन्द्रादेवी गाँव की चुनी हुई  प्रधान हैं, उनकी उम्र करीब चौसठ वर्ष है, वो इस गाँव की बेटी हैं और रिटायर्ड शिक्षिका हैं. उनके चेहरे पर मास्टरनी वाली सख़्ती की बजाय बहुत ममता और मीठापन है. उनका स्वभाव दोस्ताना और ऐसा है कि उनसे किसी को भी सहज प्रेम हो जाय, फट से अपनापा बन जाय. गाँव की तरफ से उन्होंने हमारा स्वागत किया, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं की गाँव के उनके भाई उन्हें बहुत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. उनसे बातचीत में पता चला कि आठवीं कक्षा के बाद उनकी शादी हो गयी थी, लेकिन कुछ वर्ष बाद पति किसी दूसरी महिला के साथ रहने लगा तो वो अपने मायके लौट आयी और फिर से पढ़ाई शुरू की, बी.टी.सी. की और प्राथमिक विधालय में शिक्षिका हो गयी. कई आस-पास के गाँवों, सोसा, गुंजी, धारपांगू, ज्योतिपांगू आदि के गाँवों में उन्होंने पढ़ाया. क्या संयोग कि  इस तरह की प्यारी औरत को जीवन में प्रेम नहीं मिला.  लेकिन स्वाभिमान और खुद्दारी की गहरी छाप उनके चेहरे पर है. जीवन के प्रति कोई कटुता भी नहीं है.
Photo by Sushma Naithani

भोटिया लोगों में शादी ब्याह के तरीके कुछ अलग हैं और संपत्ति के बंटवारे में कुछ मातृसत्ताक रिवाज़ भी हैं.  मुझे सिर्फ कुछ इस तरह की बात याद है कि  बसंत के महीने या किसी मेले में लड़के और लड़कियां अपने जीवन साथी का चुनाव खुद करते हैं.  यहाँ महिलाओं से इस रिवाज़ के बारे में पूछती हूँ तो जबाब मिलता है कि पुराने रिवाज़ के अनुसार सिर्फ पुरुष को अपने लिए पत्नी चुनने का अधिकार था, जो लड़की किसी पुरुष को पसंद आ गयी, वो उस लड़की पर रंग फेंक देता था और वो स्त्री रिवाज़ के अनुसार उसकी हो जाती. यदि स्त्री नहीं मानती थी तो उसे उठाकर जंगल में ले जाते थे, और जबतक वो अपनी नियति स्वीकार नहीं कर लेती गाँव वापस नहीं लाते थे. आज की लड़कियों को इत्मीनान है कि ये पुरानी प्रथा अब समाप्त हो गयी है, गुंडई करके मर्द अब किसी लड़की को जबरन नहीं ले जा सकते,  लड़की और उसके माता-पिता की सहमति के बिना अब कोई शादी नहीं हो सकती.

मंदिर के प्रांगण में कर्णसिंह, जगत सिंह समेत गाँव के मर्द हमारे लिए इस बीच खाना बना रहे हैं, दाल-भात  और आलू-टमाटर-न्युट्रिला की सब्जी, और हमारे साथी गीत गा  रहे हैं, गिरदा के लिखे गीत, नरेंद्र नेगी के गीत, शेरदा  अनपढ़ के गीत.  कुमायूँनी गीतों की और बीच बीच में रंग भाषा में छौंक लगाते हुए कर्णसिंह के गीत भले लग रहे हैं. फिर फैज़ के 'हम मेहनतकश ' की बारी आयी, जिसे बहुत मीठी आवाज और जोश के साथ गाया गया लेकिन, फैज़ का ये गीत इस जगह मेरे कानों को अटपटा और एलियन लगता है.  फैज़ इतने अजनबी मुझे कभी नहीं लगे.
Photo by Sushma Naithani

खाने के बाद विदा का वक़्त हुआ तो शेखर पाठक ने पांगू और उसके आसपास के गाँवों के लोगों को याद किया, यात्रा के बारे में एक छोटा सा भाषण दिया, और इसी बीच बारिश शुरू हो गयी, भट्ट जी ने भी लोगों को धन्यवाद दिया और पहाड़ की आन्दोलनों की परम्परा और विशेष रूप से चिपको आंदोलन को याद किया, गाँव के लोगों को विदाकर, बरसाती ओढ़कर हम लोग वापस तवाघाट की तरफ निकले.

तवाघाट पहुँचते पहुँचते रात हो गयी और वहीँ एन. एच. पी. सी. के गेस्टहाउस में हमने रात बितायी.    

Oct 4, 2014

अस्कोट-आराकोट २०१४-४: तवाघाट-नारायण आश्रम

२४ मई २०१४ 
तवाघाट 
पिथौरागढ़  से हम करीब सुबह दस बजे नारायण आश्रम के लिए दो गाड़ियों में रवाना हुये.  धारचूला से बाहर निकलते ही सेलफोन पर मैसेज आने लगा 'अब नेपाल की सर्विस लागू होती है',  यानि यहाँ  से भारत के किसी भी क्षेत्र में फ़ोन करना है तो I.S.D. लगेगी.  किसी को यहाँ से अपनी तहसील धारचूला या जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ भी फ़ोन करना हो तो उसके लिए ये नेपाल से फोन करने के बराबर है, सबसे नजदीकी अस्पताल धारचूला फ़ोन कम्पनी के हिसाब से विदेश में है.  इन ग्रामीणों को, जो बहुत गरीब हैं, देश के भीतर फ़ोन करने के लिए अन्य भारतीयों के मुकाबिले ज्यादा दाम चुकाना पड़ता  है.
हम धौली गंगा के किनारे-किनारे, पुराने कैलास मानसरोवर मार्ग पर चल रहे हैं,  ऊपर की चट्टानों से छोटे बड़े पत्थर रह रह कर गिर रहे हैं, कंकड़ों की जैसे झड़ी लगी है, सड़क बस एक आइडिया भर रह गयी है. बजरी और कीचड़ पर हमसे पहले गयी गाड़ियों के टायरों के निशान से ही पता लग रहा था कि  यहाँ से कोई गाड़ी गुजरी है,  सड़क  के बीच में बड़ी बड़ी चट्टानों के टुकड़े हैं.  हमारे ड्राइवर ने तवाघाट के आगे अपनी कार ले चलने के लिए मना कर दिया.  एक दो साथियों ने ड्राइवर से धीरे धीरे बढ़ने के लिए कहा कि हमें नारायण आश्रम तक पहुंचा दे, लेकिन ड्राइवर ने हाथ खड़े कर दिए. ड्राइवर के साथ सिर्फ धारचूला तक आने की ही बात तय हुयी थी.  मालूम नहीं किस कनफ्यूज़न में वो आगे निकल आया है. धारचूला में शायद पहले से जीप कर लेने की बात हुयी थी, लेकिन हमारे ग्रूप में किससे हुयी थी मुझे मालूम नहीं.

हम लोग गाड़ी  से उतरे, सड़क के आस-पास सिर्फ दो दुकानें हैं,  सड़क से जरा ऊपर चढ़कर हम एक छोटी सी दूकान में पहुंचे.  ये दूकान शेरसिंह  धामी जी की है, उन्हें यात्रा के बाबत शेखर पाठक जी की चिठ्ठी मिली हुयी है.  धामी जी ने हमें बिठाया, चाय पिलायी.  हर जगह टूट-फूट है,  धामी जी की दूकान भी पहले सड़क पर थी, ये नई दूकान है, जिसे उन्होंने हाल में ही खड़ा किया है.  यहाँ फ़ोन काम नहीं करता, किसी डॉक्टर की सूरत देखने के लिए १४ किलोमीटर दूर धारचूला जाना पड़ता है. लेकिन रस्ते की इस अकेली दूकान पर जाने कहाँ कहाँ से पहुंची कोक, पेप्सी  और बिसलरी की बोतलें हैं, हल्दीराम  के दालमोट, नमक़ीनों  और कुछ  बिस्कुटों के पैकेट हैं.  यहाँ  से ३ किलोमीटर ऊपर चढ़ने पर खेला गाँव बसा है, एक तरह से जर्जर हुए, हिलते, टूटते पहाड़ों के ऊपर.  मालूम नहीं कब तक बचा रहेगा?  

दूसरी गाड़ी में बैठे साथियों का कोई पता नहीं हैं. अब  तक लगता रहा कि दूसरी गाड़ी हमारे आगे है, लेकिन हमारे आगे वो लोग आये नहीं थे. सेलफ़ोन पर सिगनल नहीं आ रहा है, इसीलिए कुछ दूरी पर स्थित सीमा सुरक्षा बल की चौकी से फोन किया गया,  पता चला की दूसरी टीम पीछे धारचूला में लंच  के लिए हमारा इंतज़ार कर रही है. वापस जाना संभव नहीं है तो ये तय हुआ कि  वो लोग हमारे लिए एक जीप भी लेकर पहुंचे. 

इंतज़ार करना ही है तो रास्ते पर आस-पास की टोह लेने का अवसर है. पास ही में जो सीमेंट का बना,  दो कमरों का एक ढांचा है, उसके चारों पिलर्स टेढ़े हो गए हैं, लगभग गिरने को तैयार.  एक पैतीस साल की विधवा और एक किशोरी वहां रहते हैं.  किसी तरह मज़दूरी करके ये लोग अपना पेट पालते हैं, बारिश की तबाही, और धौली गंगा पर बने हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट के बनने के चलते उनके गाँव का घर, खेत सब ख़त्म हो गए.  कुछ मुआवज़ा  मिला तो ये दो कोठरियों के ऊपर लेंटर डाला गया, जो पिछले साल की बारिश में धसक गया, कभी भी गिर सकता है.
घर में कोई फर्नीचर नहीं, बर्तनों के नाम पर एक कड़ाई, एक पतीला और दो थाली, दो गिलास हैं,  कोने में जो गुदड़ी लपेट कर रखी गयी है, संभवत: बिस्तर है.  माँ और बच्ची सड़क पर रोड़ी तोड़ने का काम करते हैं,  लड़की इसके साथ हाईस्कूल भी पास कर ली है.  माँ सिर्फ कुमायूँनी बोलती है, बेटी हिंदी में जबाब देती है. अपनी सहृदयता में दोनों मुझे चाय और खाने के लिए पूछते हैं, मुझे मालूम है कि उनके पास सचमुच कुछ नहीं है , शायद अपने लिए रात भर का खाना भी नहीं.  दुबली पतली काया  की  ये माँ  पैतीस साल में साठ  साल की बूढ़ी दिखती है,  वैसा ही उसका आचरण और मनोभाव है,  गरीब इंसान का एक बरस जी लेना शायद खाते-पीते लोगों के कई बरस जीने के बराबर होता है,  उसके एक साल में कई सालों की जीवनी शक्ति चुक जाती हैं.

सड़क के किनारे कुछ दूरी पर इन. एच.  पी. सी. पॉवर प्रॉजेक्ट की कॉलोनी है. कॉलोनी का कुछ हिस्सा पिछले साल की बारिश में नेस्तनाबूद हुआ. यहाँ से उस विध्वंस के  निशान दिख रहे हैं. इन. एच. पी. सी. ने  धौली पर बड़े हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट बनाये  है, जिसकी  वजह से भी पूरे इलाके में डायनामाइट का  प्रयोग हुआ हैं, और धसकते हुए पहाड़ और अधिक कमजोर हुए हैं,  कई लोगों के घरों में इन धमाकों और कम्पन्न से दरारें पड़  गयीं,  कुछ घर टूट गए. धामी जी की पुरानी दूकान में भी नुकसान हुया और  आसपास का हिस्सा टूट गया है. चूँकि दूकान नहीं टूटी तो उन्हें मुआवजा नहीं मिला है.  धामी कई बड़े अफसरों को पुलिंदा भर अर्ज़ी लिख चुके हैं , लेकिन किसी के कान पर जूं  नहीं रेंगी, अपनी एप्लीकेशन वो हम लोगों को दिखाते हैं.   मुझे इस बारे में  कुछ नहीं मालूम, सो मैं नैनीताल हाईकोर्ट के वकील कैलास तिवारी से कहती हूँ "आप समझे मामला क्या है और कुछ सलाह बनती हो तो दें". धामी एक एक बाद एक हमारे कई साथियों को अपनी अर्जियां दिखाते हैं, मालूम नहीं कि उनका कुछ भी भला हुआ या नहीं, चार फुट के धामी, साधुओं जैसी दाढ़ी, और मरियल काया  के साथ धीरे धीरे ख़त्म होते, टूटते पहाड़ का ही हिस्सा हैं, अब भी जाने किस उम्मीद की नोंक पर टिके.…

दोपहर के तीन बज गए हैं,  हम सबको भूख लगी है, मेरे पास लड्डू का डिब्बा है, उसे खोला गया और दो -दो लड्डू सबने खाए, पानी पिया, और दूसरी टीम का इंतज़ार करने लगे.  स्टीव डर्न  ने इस बीच वापसी का निर्णय लिया और मुझसे कहा कि वो वापस जा रहा है, और  दूसरी टीम  जैसे  ही यहाँ पहुंचेगी वो अलविदा करके दिल्ली की तरफ लौट जाएगा.  अपनी तरफ से उसने तीन वजहें बतायी, पहली ये कि उसकी हिंदी बहुत बढ़िया नहीं है और वो कुछ कॉन्ट्रिब्यूट  नहीं कर पा रहा है.  दूसरी ये कि वो स्प्रिचुअल  इंसान हैं,  ग्रुप के रिसोर्सेस को कंज्यूम करना और बदले में अपनी तरफ से कोई कंट्रीब्यूशन न करने के कारण वो अपना बना रहना नैतिक नहीं समझता,  तीसरा उसके ड्राइवर पर लोग आगे चलने का दबाब बना रहे थे जो उसको अच्छा नहीं लगा.
इस तरह की यात्रा में आना और जाना, दोनों  निहायत व्यक्तिगत निर्णय  हैं, उनके लौट जाने के निर्णय का सम्मान भी करना ही था.  आगे अनिश्चितता है,  दूर दराज़ के जिन इलाकों में हमें जाना था उनके बारे में  ठीक ठीक जानकारी मुझे भी नहीं है,  इसीलिए मेरे पास स्टीव के लिए  आश्वस्ति के कोई शब्द नहीं हैं.  अमूमन जिस तरह  के रिसर्च टूर होते हैं, ये यात्रा उससे भिन्न है.  यहाँ हर व्यक्ति को स्वतस्फूर्त तरीके से अपने लिए रोज़-ब-रोज रहने और खाने-पीने का जुगाड़ करना है,  अपने साथ के लोगों का ध्यान रखना है,  अपने हिसाब से ही लोगों के साथ बातचीत करते हुए  इस यात्रा का सबब और सबक खुद के लिए ढूंढना है.  कुछ देर में दूसरी गाड़ी पहुंची, और शेखरदा को बताकर स्टीव ने विदाई ली.  मुझे देर तक बुरा लगता रहा कि इतनी दूर अपना समय-संसाधन लगाकर स्टीव आया और नाउम्मीद लौट रहा है. थोड़ा आगे तक चलता तो शायद उसकी रिसर्च के लिए और खुद उसके लिए अच्छा अनुभव बनता. फिर ये ख़याल भी आता रहा कि हम उसे कम्फ़र्टेबल बनाने के लिए क्या कर सकते थे? आज पूरे दिन स्टीव ने सुबह से किसी से बात नहीं की थी, और संभवत: खुद को कुछ अलग थलग पाया होगा.  या शायद  उसने अपनी रिसर्च के मद्देनज़र प्रैग्मैटिक निर्णय लिया होगा.

नारायण आश्रम (समुद्र तल से ~ 9,000 फुट/ 2734 मीटर )
दूसरी जीप से  हम लोग शाम को सात बजे करीब नारायण आश्रम पहुंचे. पीठ पर पिठठू  बांधे जैसे ही गेट पर पहुंचे तो आश्रम  मैनेजर पी.  एस. राणा  जी  मिले, और कहने लगे कि हमारे आने की पूर्वसूचना उनके पास नहीं है. उन्हें सिर्फ शेखर पाठक के साथ चार लोगों के आने की ही सूचना है, अट्ठारह  लोगों के आने की नहीं.  उनकी पत्नी और एक आदमी के सिवा आश्रम में कोई नहीं है, इतने लोगों का इंतज़ाम कौन करेगा? आसपास के गाँव के लोग जो आश्रम के काम के लिए मिल जाते हैं, आजकल गाँव में नहीं हैं, सब ऊपर बुग्यालों में यारसा गम्बू के लिए गए हैं.  कौन इतने लोगों के लिए नीचे से पानी भरकर लाएगा?  कौन खाना बनाएगा?   यहाँ से लौटने की कोई सूरत नहीं थी.  हमने राणा जी से कहा की अपनी जरूरत पानी हम खुद भरकर ले आएंगे, उन्हें कष्ट नहीं देंगे.  चन्दन डांगी अपने साथ मैगी के ढेर से पैकेट लाये थे, उन्होंने कहा कि अगर सिर्फ हमें एक पतीले में गरम पानी उबालकर दे देंगें तो हम मैगी  बनाकर खा लेंगें, सोने के लिए हमारे पास अपने स्लीपिंग बैग हैं.  राणा जी फिर नरम पड़  गए और हमें आश्रम के भीतर ले गए,  चाय पिलवाई,  और पत्नी सहित  खाना बनाने में जुट गए,  हमसे कहा कि सिर्फ खिचड़ी बन रही है.  किसी की कोई मदद उन्होंने खाना बनाने में नहीं ली. मेरे पास जो डिब्बे में दो चार लड्डू बचे थे , वो मैंने उनकी पत्नी को दिए, जिसे उन्होंने से ख़ुशी ख़ुशी से ले लिया.  कुछ देर में दूसरी टीम भी पहुँच गयी और एक जीप में चंडीप्रसाद भट्ट जी,  उनके ड्राइवर कंडारी जी, अजय और अमर उजाला के रुद्रप्रयाग के संवादाता अनुसूया प्रसाद  मालासी भी पहुंचे.

आश्रम में बिजली गुल थी, दो कमरों में कुछ सोलर पैनल की वजह से रोशनी थी, बाक़ी भक अँधेरा. हमारे पास टोर्च थीं  तो उसकी सहायता से दो मंजिले  में सोने के कमरों तक पहुंचे, सामान रखा. और फिर प्राथना भवन में इक्कट्ठा हुए.  अमूमन भजन कीर्तन से मैं दूर रहती हूँ, लेकिन वहां जाकर पीछे बैठ गयी,  ये सोच कर कि अपने व्यक्तिगत आग्रह पर बेवजह अड़े रहने का कोई तुक नहीं है,  किसी ग्रुप के साथ आयी हूँ  तो उसके अनुभव में खुले मन से शामिल हो जाऊं, भागीदार की तरह  न सही दर्शक की तरह.  दक्षिण भारतीय पुजारी का कंठ बहुत मीठा है, विठ्ठल स्वामी की आरती के ये भजन अबतक मैंने कहीं सुने नहीं थे, इनकी मौलिकता ने ध्यान खींचा, और अब पूरे दिनभर की उथल -पुथल के बाद कुछ देर एक जगह निश्चिंत होकर बैठ जाना भला लगा. ठेठ भारत के उत्तर के आखिरी छोर पर बसे  इस आश्रम में, दक्षिण भारत  के ये स्वर  जरा भी पराये नहीं लगे और सादगी से पूजा समाप्त हो गयी.  प्रार्थना घर की तिरछी छत लकड़ी की शहतीरों और पैनल्स से बनी है, चुस्त-दुरुस्त पक्का सलीकेदार काम,  दीवारों पर नारायण स्वामी की बहुत सी तसवीरें लगी हैं, उनके ऑटोग्राफ के साथ. नारायण स्वामी के नाम और इन तस्वीरों से मेरा पहली बार परिचय हो रहा है.  अब तक मुझे लगता रहा कि शायद इसका सम्बन्ध स्वामी नारायण सम्प्रदाय से है.   
Photo by Bhupen Singh

पूजा के बाद राणा जी ने नारायण स्वामी का संक्षिप्त परिचय दिया.  नारायण स्वामी कर्नाटक के एक शिक्षित संभ्रांत परिवार में जन्में थे,  और इंजीनियर की तरह उनकी शिक्षा-दीक्षा हुयी थी. वर्ष १९३५ में गढ़वाल कुमायूं के कई हिमालयी क्षेत्रों की  यात्रा करने के बाद वो यहाँ पहुंचे  और उन्होंने इस आश्रम की स्थापना की. पिथौरागढ़ जिले में कई स्कूल भी खोले.  इन स्कूलों के, इस आश्रम के मुख्य शिल्पी और आर्किटेक्ट वो खुद थे.  स्वामी नारायण की जीवनी आश्रम की वर्तमान ट्रस्टी द्रौपदी गर्ब्याल ने लिखी है "परम पूज्य श्री नारायण स्वामी और नारायण आश्रम".   आश्रम में ये किताब मुझे यहाँ नहीं दिखी,  इस किताब पर मेरी नजर मुनस्यारी में किसी के घर पर पड़ी और कुछ पलटने का अवसर मिला.

आश्रम के दो मुख्य भवनों और मेडिटेशन सेंटर के डिटेल प्रभावित करते हैं.   इस आश्रम की पहली इमारत में रसोई, ऑफिस, और यात्रियों के रुकने की व्यवस्था है.  कुछ दूरी पर मेडिटेशन सेंटर है.  दूसरी बड़ी इमारत में नीचे संग्रहालय-लाइब्रेरी है, और उसके ऊपर प्रार्थनाघर.  लायब्रेरी में नारायण स्वामी से सम्बंधित पुस्तकें, उनकी व्यक्तिगत सामग्री और नारायण ट्रस्ट  की चीज़ें हैं.  एक डिबिया में यहीं महात्मा गांधी की राख भी रखी हुई हैं.

आश्रम का रखरखाव बहुत मेहनत से किया गया है, सुरुचिपूर्ण है.  गुलाब, डेफोडिल, नर्गिस, और अज़ेलिया (गुलदस्ता बुरांश ) के फूल खिले थे, खेतों में आलू और दूसरी सब्जियां उग रही हैं, एक कोने में कटी हुयी जौ सूख रही है. आँगन साफ़ सुथरा, क्यारियां करीने से बनी हुई.  ९००० फ़ीट की ऊंचाई पर इस दुर्गम, निर्जन जगह में, कमोड और इटालियन टॉयलेट की सुविधा है,  साफ़ सुथरे टॉयलेट्स हैं,  हालाँकि पानी नहीं है, लेकिन बाहर पानी से भरे ड्रम रखे हुए थे, जो संभवत: बरसात का पानी था.  पानी अपने साथ ले जाना पड़ता है.  पूरे  आश्रम पर स्वालम्बन, सादगी और सेवा भाव की गहरी छाप है.  इसीलिए हैरत नहीं है कि जिम्मेदारी से हर व्यक्ति टॉयलेट को साफ़ दशा में ही छोड़ कर गया है. 

पुराने मिटटी के तेल की चिमनियां के बीच खाना बना और परोसा गया.  राणा जी और उनकी पत्नी ने खिचड़ी, सब्जी, रोटी बनायी थी, और सबको बहुत स्नेह से खाना खिलाया.  पहली दृष्टि  में राणा जी जैसे अनवेलकमिंग दिखे, सचमुच में उसके विपरीत हैं, बहुत नरम दिल और सेवा भाव से भरे हुए. राणा जी चमोली जिले के मूल निवासी है, और सरकारी नौकरी  करते थे, लेकिन जब उन्हें आश्रम में काम का मौका मिला तो नौकरी छोड़ दी. अब करीब पंद्रह वर्षों से इस आश्रम की देखभाल कर रहे हैं. आश्रम के पास कुछ नाली जमीन है,  आश्रम के गुजारे भर की सब्जियां, अनाज, फल आदि इसमें उगाये जातें हैं. दोनों पति-पत्नी लगभग सारा आश्रम सम्भालतें हैं.  राणा जी की पत्नी सरल मन की,  सह्रदय, ग्रामीण गढ़वाली महिला है, बहुत भली और मेहनती. इनवर्ड माइग्रेशन का ये पहला किस्सा मेरे सामने आया. 

Sep 20, 2014

अस्कोट -आराकोट अभियान -03 : पिथौरागढ़

२३-२४ मई २०१४

अल्मोड़ा से पिथौरागढ़ के लम्बे पहाड़ी  रास्ते पर बीच-बीच में छितरी आबादी की झलक मिलती है, रह रह कर, दरक गए पहाड़ दिखते हैं, मालूम नहीं कि ये सिर्फ पिछले साल की बारिश की ही तबाही है, या कुछ सालों में हुयी बारिशों का मिलाजुला असर, किसी भी साल की बारिश क्यों इन पहाड़ों को बख़्श देने वाली है?  वो पेड़ जो अपनी जड़ों में नमी संजोंकर मिट्टी को बांधे रख सकतें हैं बहुत कम है,  जल्दी जल्दी कटान हो सके इसीलिए पहाड़ों में सिर्फ और सिर्फ जल्दी बढ़ने वाले चीड़ का ही प्लांटेशन किया गया है,  देवदार के भरे पूरे पेड़ के लिए सौ साल कौन इंतज़ार करे ?

 चारों ओर हिमालय का अथाह विस्तार है, अच्छी, खुशनुमा धूप, और ठंडी हवा है.   रास्ते में १०-१० रूपये में काफल बेचने वाले लड़के हैं.  हम लोग एक चाय की दुकान पर कुछ देर रुके तो वहीं परपारम्परिक नीली-पीली पौशाक में छलिया नर्तकों की एक टीम मिली, जो किसी बारात में जा रहे हैं.  सभी छलिया नर्तक पुरुष हैं, स्त्रियोचित मेकअप में, काली पेन्सिल की भवें, लिपस्टिक, रूज़, मस्कारा और माथे पर छोटी छोटी लाल सफ़ेद बिंदियाँ.   हमारी रिक्वेस्ट पर एक छोटा सा झोड़ा ये लोग सुनाते हैं,  एक बारगी मुझे चीनी फिल्म 'फेरवेल माई कोनकुबाइन' की याद हो आती है.

छलिया नृत्य मुख्यत: पिथौरागढ़ और नेपाल के कुछ इलाकों में बेहद लोकप्रिय पारम्परिक नृत्य है, कुछ वैसे ही जैसे गढ़वाल में पांडव नृत्य है.  यह युद्ध का स्वाँग है.  छलिया नर्तक पुरुष प्राचीन सैनिकों जैसी वेशभूषा धारण कर तलवार और ढाल लेकर युद्ध-नृत्य करते हैं, ढोलिया एक तरह से पूरे नृत्य का संचालक होता है, और साथ में दमाऊ, रणसिंग, तुरही और मशकबीन भी बजते रहे हैं.  नृत्य नाटिका का मुख्य नैरेटिव युद्धभूमी में छल के महत्त्व पर केंद्रित रहता है, और कई तरह की व्यूह रचनाओं का वर्णन और स्थानीय राजाओं और नायकों की विजयगाथाओं की क़िस्सागोई चलती रहती है. बीच बीच में जब नर्तक विराम लेते हैं, तो गायक चांचरी की तान छेड़ देता है.  छल से ही 'छलिया' या 'छोलिया' नाम पड़ा है.

लगातार तीन चार घंटे से बिना रुके गाड़ी चल रही है, निर्जन लैंडस्केप में शाम ढलते ढलते लगता है कि कौन देश है? इतनी दूर तक जाकर लोग क्यों बस गए, और अब तक क्यों यहाँ बने हुए हैं.  मेरे पिता दस वर्षों तक पिथौरागढ़ के कई छोटे कस्बों में रहे, हम लोग माँ  के साथ नैनीताल जिले में ही अपनी पढ़ाई करते रहे. इतने वर्षों बाद ये देखना कि पिथौरागढ़ की वो तमाम जगहें, लोहाघाट, धारचूला, चल्थी, मुनस्यारी, तवाघाट कैसी हैं, किन रास्तों से होकर पिताजी वहां जाते थे , मेरे लिए एक तरह की व्यक्तिगत भरपायी है.

 एक जगह एक बड़ा ट्रक खड्ड में गिरा हुआ है, शायद जबतक इसके  अवशेष प्रकृति में मिल नहीं जाएंगे तब तक पड़ा रहेगा, इतनी गहरी खाई से निकलने का कोई रास्ता नहीं है.  हमारा ड्राइवर हिमांचली है, पहाड़ से वाकिफ है लेकिन इस रुट पर पहली बार आया है, शाम  ढलने लगी है, और उसके माथे अगले दिन की भी चिंता है कि इस पूरे रास्ते उसे दिल्ली तक अकेला ही लौटना पड़ेगा. इस सबके अलावा वो खुशमिज़ाज नौजवान है, बीच बीच में काँगड़ी में गीत सुनाता है, दिल्ली में उसका कोई उत्तराखंडी दोस्त है जिसने उसे गढ़वाली-कुमायूँनी गाने भी सिखाये हैं.

ये  ड्राइवर स्टीव ड्रन के साथ दिल्ली से आया है. स्टीव सिटी यूनिवर्सिटी न्यू यॉर्क में प्रोफ़ेसर हैं.  उनकी रिसर्च का विषय खुशहाली है.  खुशहाली को लेकर और विभिन्न देशों और समाजों की 'हैप्पीनेस इंडेक्स' को लेकर कुछ बातचीत हम लोग करते हैं. स्टीव ने बॉलीवुड की फिल्मों को लेकर कुछ भारतीय संस्कृति और समाज को समझने की कोशिश की है,  कई भारतीय शहरों में घूमकर उन्होंने लोगों से बात की है.  मैंने  स्टीव से कहा कि बॉलीवुड की फिल्में फ्रॉड हैं, उसका भारतीय समाज से कुछ लेना देना नहीं है.  वो महज इंटरटेनमेंट शो है, और जो बातचीत उसने घूमकर बड़े शहरों में सिर्फ मर्दों से की है वो भी सही तस्वीर नहीं बताती. खुशहाली की असली तस्वीर औरतों, बच्चों, ग्रामीण और हाशिये पर खड़े समुदायों की भागीदारी के बिना नहीं बनायी जा सकती है.

लगभग रात के आठ बजे हम पिथौरागढ़ पहुंचे, वहां अधिकतर लोगों के रुकने का इंतज़ाम ललित खत्री जी के मेघना होटल में है. मैं, अंजली और हिमानी, शेखर दा  के साथ उनकी दीदी  के घर पहुँचते है. रास्ते में ललित पंत जी के घर होते हुए, जो पुराने अस्कोट-आराकोट  यात्राओं के भागीदार रहे हैं. लक्ष्मी दीदी के घर पर उनकी दो बहुएं और तीन  छोटे छोटे नाती-नातिन हैं. अभी तक की तो लगता है यात्रा हुयी नहीं, घर के ही आराम के बीच हूँ.

जेटलेग का असर या जो भी, अच्छी ही बात है कि  सुबह उठने में परेशानी नहीं हुई, पांच बजे तक नहाकर तैयार हो  गयी हूँ, हल्का सा धुंधलका है , लेकिन चिड़ियों की बड़ी मीठी मीठी आवाज़ें आ रही हैं....

उजाला हुआ तो सामने दूर दूर तक फैली बसावट नज़र आ रही है, बहुत बड़ी खुली घाटी, लगभग समतल घाटी.  पहाड़ी शहरों में मुकाबिले प्रकृति ने पिथौरागढ़  पर विशेष कृपा की है.  शहर में बहुत घनी बसावट है, अधिकतर मकान सीमेंट के, अपेक्षाकृत हवादार हैं, मोर्डर्न हैं. पारम्परिक घर अब नहीं के बराबर हैं , या फिर वो हैं जिन्हे  लोग छोड़ कर चले गए हैं, या फिर बहुत गरीब लोगों के जिनके पास फिलहाल नए तरह के घर बनाने के लिए संसाधन नहीं है. पुराने घर लगभग उजड़ते हुए घर हैं.

मुझे पहाड़ी शहरों की पुरानी ढलवा छतें याद आती हैं,  अपने गाँव के घर की छत भी याद आती है, ढलवा छत की पठाल पर धीरे धीरे चलते हुये मेरी  दादी  खीरे और दाल की बड़ियाँ चादर पर फैलाती थी, फल और सब्जियों को पर धूप में सुखाती थी, ताकि सर्दी के दो महीनों की गुजर के लिए हमारे पास स्टॉक रहे.  दीवाली के ठीक पहले और होली के बाद यहीं  छतों पर महीने भर गद्दे, रजाईयां , और कालीन सूखते थे.  बच्चों को छत पर चढ़ने की मनाही थी फिर भी मैं  छत पर चुपके से बेडू  तोड़ने जाती ही थी. कभी चमचमाती रही होंगीं लेकिन दो सौ वर्षों पुराने उस घर की छत की पठालें गहरी स्लेटी और काली थी, खूब चटक धूप से दिन भर नहायी रहती थी, किसी तरह के मॉस या लाइकन, कोई नमी उनपर नहीं थी.  छत के अलावा ढैपर (एटिक)  को टटोलने में मुझे विशेष आनंद आता था,  एकदम से रहस्यलोक , घर में कोई नहीं जानता था की ढैपर में ठीक ठीक क्या है?   वहां मुझे अपने पिताजी और चाचा की स्कूल के जमाने की कॉपी किताबें मिली,  सौ-साल पुराने बारहसिंगा के सींग दिखे, घर के पुराने बड़े बर्तन, और बहुत सा अटरम-पटरम. पहाड़ में नए घरों में अब ढैपर नहीं है, ढलवा छत नहीं.…  

आठ बजते बजाते पूरा दल बाहर निकलने को तैयार है, कुछ १०-१५ मिनट मैं छोटे बच्चों के साथ बैठती हूँ, बच्चा पूछता है अमेरिका में क्या क्या है? मैं उसे अपने फ़ोन पर कुछ तस्वीर और वीडियो क्लिप्स दिखाती हूँ, बच्चा कहता है अरे यहीं के जैसा है. माउंट सेंट हेलेंस की और क्रेटर लेक की तस्वीर उसको अच्छी लगती है, ज्वालामुखी के मुँह  से निकलता धुँआ भी रोमांच से भरता है.  मुझे रवि की याद आती है, कैसे लगभग एक उम्र के सारे बच्चे एक से होते हैं, एक जैसे क्यूरियस, एक जैसे निर्दोष और उत्साह से भरे...

हम लोग घर से विदा लेते हैं,  आत्मीय विदा,  और मेघना होटल पहुँचते हैं, वहां ललित खत्री जी ने नाश्ते का इंतज़ाम किया है, एक तरह से खाना ही है , क्यूंकि अब सचमुच अनिश्चितता से भरी यात्रा शुरू होती है.  मेघना बहुत साफ़ सुथरा और अपने डिजायन में मोर्डर्न रेस्टोरेंट और होटल है.  जाते समय मैंने  एक रसगुल्ला खाया और फिर एक किलो लड्डू बंधवा लिए.  इसी बीच चलने की तैयारी हो रही है, और भूपेन के साथ हम दो तीन लोग पिथौरा का किला, जिसमें अब तहसील कार्यालय है, देख आतें हैं, वहां से पूरे शहर का नज़ारा बहुत ही खूबसूरत दिखता है, बाजार की थोड़ी टहल कर आतें हैं, और फिर धारचूला होते हुए नारायण आश्रम की तरफ कूच करते हैं......

Sep 12, 2014

छुट्टी के दो दिन


आज फिर धूल फांकी,
फालतू चीज़ों से घर से खाली किया
इस्तरी की, कपड़े-लत्ते तहाये
मन अटका रहा
दिन निकल गया

​कुछ देर घाम में बैठी
कुछ देर गुमते, घुमते हिसर टूंगे
रस्ते पर एक सांप ​दिखा
दो खरहे, एक कनगोजर
दिन निकल गया

***

Sep 3, 2014

अस्कोट से आराकोट -०२- अल्मोड़ा

23 मई 2014

नैनीताल से अल्मोड़ा जाते समय लगभग घंटे भर तक भवाली में जाम लगा रहा, लेकिन फिर रास्ता खुला तो अल्मोड़ा की तरफ आगे बढ़ने लगे.

जिस कार में बैठी हूँ उसमें मेरे साथ गिरिजा पांडे, स्टीव ड्रन, चन्दन डांगी, भूपेन सिंह,  देव प्रकाश डिमरी और बी. एस. नेगी हैं. कई तरह की बातें हो रहीं हैं प्रधानमंत्री  मोदी के वर्किंग स्टाइल की, लोगों का आपसी परिचय,  पहाड़ से जुड़ाव की बात, और फिर देश दुनिया की भी. कब किस बात का सिरा कहाँ जुड़ जाएगा तय नहीं.  चन्दन की आवाज मीठी है, वो बीच बीच में कई पहाड़ी गीत सुनाते चल रहे हैं,  भूपेन भी संगत करते चलते हैं.  स्टीव समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और खुशहाली पर रिसर्च करने आये हैं, स्वभाव से कम बोलने वाले  हैं,  वे अच्छी हिंदी बोलते हैं , लेकिन जब तक उनसे सीधे कुछ न पूछा जाय, कोई बात नहीं करते.

गिरिजा पांडे पहाड़ के मिथकों, लोककथाओं, लोक देवताओं से लेकर पहाड़ के इतिहास की तमाम बातों को रोचक ढंग से बताते चलते हैं.  गोलू, हरु, सैम आदि देवताओं के जागर के बारे में गिरिजा को सुनते लगता है किसी सपने में वापसी है, जैसे ये सबकुछ पहले सुना था, लेकिन अब कुछ भी याद नहीं सिवाय इसके कि ये नाम कहीं गहरे स्मृति में दबे हैं, ये कथाएं किसी बिसराये खाने में हैं. पहाड़ी जागरों की, जगरियों की, उनकी बजती थाली और  देवी देवता आये लोगों को देखने की बहुत बचपन की याद है, एक भय मिश्रित जुगुप्सा की याद है.  मैंने इन सब चीज़ों को किशोरवय तक आते आते अंधविश्वास के खाते में डाल दिया, फिर कभी पलट कर नहीं देखा. एक सहज जिज्ञासा में कुछ और चीज़ें पता चल सकती थीं, उसका भी रास्ता बंद हो गया.  मैं समझती हूँ कि बचपन की वो कुछ कुछ जादू, रहस्य भरी स्मृति मेरे लिए अमूल्य है.

सड़क के दोनों तरफ छितरे हुए चीड़ के जंगलों की और इस रास्ते के पुराने लैंडस्केप की कुछ याद मेरे मन के भीतर है, २९ वर्ष बाद अल्मोड़ा जा रही हूँ, एक पूरा युग बीत गया  है, बचपन के तीन वर्ष इस शहर में गुजरे हैं, अल्मोड़ा से खट्टी मीठी यादें जुड़ी हैं, इसी शहर में पहले पहल विज्ञान में रूचि हुयी,  साहित्य पढ़ना शुरू किया, कविता लिखना भी १२-१३ साल की उम्र में,  यहीं पढ़ने -लिखने  के संस्कार के बीज पड़े. जितनी तबकी मुझे याद है, अमूमन अधिकतर मकान पठाल की तिरछी छतों वाले थे, सरकारी मकान और कार्यालय लाल और हरे रंग के टिन की तिरछी छत वाले.  अल्मोड़ा के कारीगर जिस सफाई से पत्थर की स्लेटें काटते थे, उसकी प्रसिद्धि पूरे उत्तराखंड में थी. आज सड़क से जितना दिख रहा है, कोई पठाल की तिरछी छत वाला घर ढूंढें नहीं मिल रहा है. सब नए पुराने मकान अब सीमेंट के  लेंटर वाले हैं,  सब जगह सपाट छतें हैं.  संभव है कि मुख्य बाजार के भीतर अब भी कुछ पुराने पठाल की छत बची रह गयीं हों, लकड़ी के खूबसूरत दरवाजे बचे हो. अल्मोड़ा छोड़कर इतने वर्षों बाद भी कभी कभार इस शहर के सपने मुझे आते रहते हैं.  मेरा बहुत मन हो रहा था कि एक बार फिर पल्टन बाजार से लाला बाज़ार तक पैदल घूमकर आ जाऊं,  हनुमान मंदिर और थाना बाज़ार के बीच वो घर देख आ जाऊं जहाँ हम रहते थे, स्कूल तक फिर एक बार पैदल टहल कर आ सकूँ, कपड़े की दुकानों में हर जगह लहराते पिछौड़े और ताँबे के खूबसूरत नक़्क़ाशी वाली गागरें, और दुसरे बर्तन देख कर आ जाऊं,  लेकिन फिर सबके साथ ही निकलना था तो ऐसा हो नहीं सका.

अल्मोड़ा के सेवॉय होटल में  एक सभा हुयी, २०-३० लोग आये.  शमशेर सिंह बिष्ट जी से पहली बार मुलाकात हुयी,  पहली बार ही उन्हें सुनना भी हुआ.   शेखर दा ने यात्रा के बारे में घंटे भर का लेक्चर दिया, पूरे हिमालयी क्षेत्र की एक-एक नदी, नालें, झीलें, चोटियां, घाटियां  और बुग्याल, उनकी भौगोलिक स्थिति और उनसे जुड़ा कई तरह का डेटा उन्हें मुँहज़बानी याद है.  शेखर दा ने सबका परिचय भी कराया,  मेरे  परिचय की भी जाने अनजाने जो टोन बनी वो यही बनी कि अमेरिका से आयी रिसर्चर है.  मैं अपने देखे पहाड़ की लड़की थी, लोगों के देखे अमेरिका से लौटी रिसर्चर. कई तरह की आइडेंटीटीज के बीच जूझते  हुए अब पूरा जीवन निकल गया है तो अब मेरे लिए ये हैरानी का विषय नहीं है,  लेकिन आइडेंटिटी के ये खेल मुझे रोचक लगते हैं. मैंने श्याम मनोहर जोशी जी को याद किया कि जब 'कसप' का ठेठ अल्मोड़िया नायक इस शहर में 'देबिया  टैक्सी ' के नाम से पहचाना गया, तो मेरी क्या बिसात?

दाल भात खाकर हम पिथोरागढ़ की ओर रवाना हुए, अल्मोड़े से जरा बाहर शैलेश मटियानी का गाँव बाड़ेछीना और एन. एस. थापा का गाँव लम्बाटा दिखा.  सड़क के आस-पास भी गाँव दिखे, कुछ लोगों से बातचीत हुयी तो पता चला कि गाँव में पानी की दिक्कत है, इस अच्छे मौसम में पहले जो फलसब्जी इफरात में उग जाते थे अब संभव नहीं है.  पानी के स्रोत अधिकतर सूख गए हैं और जो बचे हैं उनका पानी प्रभावशाली लोगों के रिसॉर्ट में पहुँच जाता है.  टूरिज़्म इंडस्ट्री के मॉडल पर प्रदेश का विकास होगा तो फिर गाँव के हिस्से पानी कहाँ से आएगा?  फ़ायदा  जाने कितने लोगों को हुआ लेकिन फल और सब्जी बेचकर शहर के आस-पास के लोगों की जो आमदनी होती थी वो अब बंद हो गयी है. घर के आँगन में कोई हरियाली नहीं है.

रास्ते में गिरिजा हमें 'लक्खू उडियार' दिखाते हैं, उडियार की भीत पर भित्तिचित्र हैं, अधिकतर चित्रों में बहुत से लोग साथ-साथ हैं, जानवर, फूल, पेड़  और कुछ चिन्ह हैं, बमुश्किल एक जगह एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा है, शायद कबीलाई राजा रानी या इष्ट देव व देवी. गिरिजा बताते हैं कि उत्तराखंड में पुरातात्विक महत्त्व की इस तरह की पांच गुफाएं हैं. अच्छी बात है कि उत्तराखंड में हज़ारों वर्षों से लोग रहते हैं, सब मुसलामानों के अत्याचार से भागकर पहाड़ नहीं आये हैं. 


Aug 3, 2014

अस्कोट-आराकोट २०१४ -०१

 'लस्का कमर बाँधा हिम्मत का साथा'
अस्कोट -आराकोट अभियान के बारे में २००७ में विस्तार से जानने का संयोग हुआ, तब से मन में ये इच्छा बनी रही कि  जैसे भी होगा, कुछ दिन के लिए २०१४  के  अस्कोट-आराकोट अभियान में  जरूर शामिल होना है. सात वर्ष बीत गये, २०१४ आ ही गया, बहुत दिनों तक उधेड़बुन चलती रही कि यात्रा का हासिल क्या होगा, छोटे बच्चों को यूँ महीने भर के लिए छोड़ कर जाना, एक झटके में सालभर की छुट्टी ख़त्म कर लेना, आदि ठीक होगा या नहीं?  बच्चों के मन में भी उत्साह था कि उनकी माँ  इस तरह की किसी यात्रा के बारे में सोच रही है, पंकज के मन में इस बाबत कोई संशय नहीं था, मुझे पहाड़ जाने को कहा.
फिर  मेरा भी मन बन गया कि  खुले मन से पहाड़ पर कुछ समय के लिए जा रही हूँ, बचपन और किशोरावस्था के भूगोल को फिर एक बार वयस्क आखों से देखने जा रही हूँ, सपनों के भीतर जिस लैंडस्केप में बार बार जाती रहती हूँ, उसका इतने वर्ष बीत जाने पर कैसा हाल है उसे देखने जा रही हूँ, बिना किसी अपेक्षा के, बिना पहले से जाने हुए उद्देश्य के, बिना ये जाने भी कि  कितना आगे तक जा सकूंगी, बिना इस डर के कि यात्रा के पहले ही ध्वस्त हो जाऊँगी या नहीं .…
भारत जाने की टिकट बुक हो गयी, यात्रा के लिए सामान जुटाने और पैक करने में बच्चे मेरी मदद करने लगे: स्लीपिंग बैग, तोलिया, ४  जोड़ी कपड़े, एक जैकेट,  एक बरसाती, पानी की बोतल, दवाईयाँ, कैमरा, ट्राइपॉड, वॉइस रिकॉर्डर, बैकअप बैटरीज व डिस्क,  एक नोटबुक और पेन, मच्छरों से बचने के लिए क्रीम, हाइकिंग पोल्स, वाटर फ़िल्टर व टेबलेट्स. 
 
देहरादून पहुँच गयी हूँ, टेलीविजन पर चौबीसों घंटे  महिलाओं से बलात्कार की और उनकी हत्या की खबरे आ रहीं हैं , बदायूँ  में बलात्कार के बाद दो किशोरियों की हत्या के बाद पेड़ पर  लटकाने की खबर चल रही है. शौच को जाते वक्त, स्कूल आते-जाते, बाजार कुछ सामान खरीदने जाते समय, लगता है किसी भी समय किसी भी महिला का अपहरण हो सकता है,  बलात्कार और हत्या उत्तर भारत में आम बात हो गयी है.  ऐसे माहौल में लड़कियां इस देश में जरा सा भी सपना, कोई भी सपना कैसे देख सकती हैं? 
माता-पिता  को  ऊबड़-खाबड़, भूस्खलन वाले रास्ते और  साथ में कौन लोग जा रहे हैं इसकी चिंता है.  मालूम नहीं मेरे अलावा कौन लड़कियां या महिलाएं इस यात्रा में हिस्सेदारी कर रहीं हैं?  अस्कोट-आराकोट की पिछली दो यात्राओं में कुछ महिलाओं की भागीदारी रही है, इसीलिए उम्मीद है कि  अधिक संख्या में न सही कुछ महिलाएं और छात्राएं होंगी.

विदा के समय माँ ने एक गिलास, और कटोरा दिया, हिदायत दी, रोज एक बार फोन करने को कहा, पिताजी ने एक शीशी में जोंकों से बचने के लिए नमक और पिथौरागढ़ और चमोली के दुर्गम भूगोल की जानकारी दी और अगर रास्ता ठीक न हो तो लौट आने को कहा.

हल्द्वानी में जगदीश ददा सुबह सुबह रेलवे स्टेशन लेने आये, उनके घर पर ही मेरी बहन तारा और उसकी बेटी भी आ गयी, बेटी को पहली बार ही देखा, अर्चना भाभी से भी पहली बार ही इतने समय तक बातचीत हुयी.  कुछ समय पुराने दिनों की याद और बातचीत के बीच हमने कुछ समय बिताया,  पुरानी अल्बम में तस्वीरें देखी, फिर नैनीताल जाने के लिए टैक्सी पकड़ी.  

नैनीताल तक का घुमावदार रास्ता मुझे नॉस्टालजिया से भरता है,  १३ साल से १८ साल तक इस रास्ते में बहुत सी यात्रायें की हैं , कुछ पैदल, कुछ बस या जीप  में.  रानीबाग पहुंचते ही पहला धक्का लगता है , एच. एम. टी. फैक्ट्री और पूरी की पूरी कॉलोनी किसी भुतहा खण्डर में बदल गयी है, मालूम था कि फैक्ट्री बंद हो गयी, मन ये कहीं उम्मीद थी कि  शायद इस इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल किसी दुसरे संस्थान के लिए किया जा सकेगा, कम से कम एक स्कूल या कॉलेज यहाँ बन ही सकता था.  लेकिन ये सब इस कदर खंडहर हो गया की बात मालूम नहीं थी,  इस तरह का दुःस्वप्न मन में नहीं था. हम छोटे ही थे, शायद मिडिल स्कूल में, जब ये फैक्ट्री शुरू हुयी थी, और २०-२५ साल में इसका जीवन पूरा हो गया.…
 
बीस साल बाद नैनताल
 मालूम नहीं, क्यों बीस साल बीत गए आखिरी बार नैनीताल आये हुए, हर बार जब भारत जाना हुआ सोचती रही नैनीताल भी जाना है, नहीं जा सकी.  अब इतने सालों बाद लौटी तो दिखता  है शहर के भीतर सब बदल गया है. कॉलेज जाने वाला लाल खड़ंजों वाला का रस्ता अब सीमेंट के बदरंग रास्ते में बदल गया है, पूरे रास्ते में दुकान और छोटी कोठरियां बन गयी हैं,  कंस्ट्रक्शन चल रहा है, रास्ता कहीं दीखता नहीं.  मालरोड़ पर बेतहाशा भीड़ है,  फ्लैट्स में चलने की जगह नहीं है,  ठंडी सड़क पर भी चलने की जगह नहीं ही बची, सड़क चौड़ी हो गयी है.  ठंडी पर दो बदसूरत मंदिर बन गए हैं, सड़क के बीचों बीच किसी सत्संग का कार्यक्रम चल रहा है, उसके लाउडस्पीकर से निकली आवाज़ से पूरा शहर गूँज रहा है, जहाँ सड़क ख़त्म होती है, वहां  ठसाठस बाज़ार है, लगता है किसी अंधेरी सुरंग के भीतर आ गए हैं , एक के बाद एक दुकानों में प्रवेश किये बिना बाहर निकलना संभव नहीं, फिर सिर्फ बाहर निकलने की आशा रहती है , लेकिन अब बाहर जैसा कुछ बचा नहीं, चलने की जगह भी नहीं, अब सब तरफ अब ठेले, दुकाने, रेस्टोरेंट्स हैं, चलने की जगह और खुली हवा में सांस लेने की जगह सचमुच में फ्लैट्स में नहीं बची. पहले कभी शहर में नीचे मालरोड या ठंडी पर कोई शौकिया स्कूटर या मोटरसाइकिल दिखती थी, अब कोई गली नहीं बची, कोई और कैसा भी अटपटा रास्ता नहीं बचा जहाँ मोटरसाइकिल न दिखी हो, और चलने वाला व्यक्ति बेफ़िक्र  होकर चल सके. 
इस  बदलाव को देखकर दिल टूटता है,  लगातार बदसूरती बढ़ती चली जा रही है , जो कुछ अच्छा था, सहेज लेने लायक था, वो ख़त्म होता चला गया, ख़त्म होता जा रहा है. ...  



तल्लीताल से शेखर दा का घर सीधी चढ़ाई है, इतना याद है, पिट्ठू और स्लीपिंग बैग पीठ पर और हाथ में एक पानी की बोतल और हैंड बैग लेकर चढ़ना आसान नहीं रहा, लेकिन फिर पहुँच गयी, बहुत वर्षों के बाद उमा जी से मुलाकात हुयी, रुपीन को आख़िरी बार लखनऊ में देखा था, तब बहुत छोटी बच्ची थी, अब वो पी.एच.डी. कर रही है. भाभी से पहली बार इतनी ढेर सारी बातें हुयी, रुपी से भी, उनके घर की लाइब्रेरी में बहुत सी किताबें दिखी, स्टडी डेस्क के ठीक ऊपर गौरादेवी की बड़ी सी तस्वीर,  इसे देखकर मुझे शेखर दा के बहुत पहले लिखे एक लेख (एक थीं गौरा देवी: एक माँ के बहाने चिपको आन्दोलन की याद) की याद हो आती है, जिसको पढ़ते हुए मैंने जाना था कि गौरादेवी कौन थी, उनकी और उनकी साथिनों की चिपको आंदोलन में क्या भूमिका रही. यहीं पहाड़ के अनाजों के बारे में एक किताब "बारहनाजा" दिखी,  शिवप्रसाद डबराल जी की लिखी पूरी सीरीज दिखी, और बहुत सी किताबें दिखीं, कुछ के नाम लिखे, कुछ को देखकर ख़ुशी हुयी,  आश्वस्ति हुयी कि ये किताबें कहीं मौजूद हैं. पहाड़ के कुछ अंक, और पहाड़ प्रकाशन से ही छपी "गिरदा समग्र", "एशिया की पीठ पर – पंडित नैन सिंह रावत", चंद्रकुँअर बर्त्वाल की "इतने फूल खिले" और इसका अंग्रेज़ी अनुवाद ,' और 'The Boy from Lambata" छांटकर देहरादून के लिए पोस्ट करती हूँ. जैसे जीवन में बहुत सी जगहों पर जाना बचा रह जाएगा, बहुत से अपने समकालीनों से मिलना नहीं हो सकेगा,  वैसे ही ही बहुत सी किताबें पढ़ना भी हमेशा छूटा रहेगा, लेकिनजानने की इच्छा, पढ़ लेने की इच्छा लगातार बनी रहती है.

शेखर दा लगातार फ़ोन पर कई लोगों से बात करते रहे, साथ ले जाने वाले सामान, साहित्य, अतिरिक्त बरसातीयाँ, नक्शा, बैनर आदि का इंतज़ाम करते रहे.  अगले दिन कोटद्वार से कमल जोशी आ गये, हमारा परिचय पहले का था लेकिन ठीक से बातचीत का मौका इसी बार बना.  यात्रा के बारे में मैंने चलने से पहले फेसबुक पर एक स्टेटस डाला था  
 'इस बात को लेकर उत्साह है कि इस महीने के आख़िर में अस्कोट -आराकोट पदयात्रा में पहाड़ को देखने समझने का मौका मिलेगा, शरीर बहुत दुरुस्त नहीं है, भीतर से डर है कि यात्रा शुरू होने के पहले ही निढ़ाल न हो जाऊं, लेकिन फिर जीवन में कभी भी कुछ दुरुस्त कहाँ रहा? अपने मन की ताकत पर भरोसा है, वो मुझे सात समंदर पार इस देश में खींच ले आयी तो फिर पहाड़ मेरा अपना ही घर है "

इसी स्टेटस पर अभिषेक मिश्रा जो मेरे फेसबुक मित्र है, ने प्रतिक्रिया दी थी कि
"अस्कोट आराकोट अभियान बौद्धिक टूरिज़्म है, आम लोगों का  इससे कोई भला नहीं होगा'.  

 मैं खुद बिना गए किसी तरह का क्लेम नहीं करना चाहती थी. मेरे अपने लिए तो मकसद यही था कि कुछ बेलौसपन में पहाड़ का भीतरी इलाका, और ग्रामीण समाज देखकर आया जाय.  इतने बड़े देश में, और यहाँ तक की उत्तराखंड जैसे छोटे प्रदेश में भी आम और ख़ास लोगों की किस्मत मौजूदा इकोनॉमी और राजनीति के गठजोड़ से तय होगी, मेरी इस बड़े खेल में कैसी भी भागेदारी नहीं है, आम आदमी या औरत की क्या स्थिति है, मुझे ये भी नहीं मालूम, चूँकि बीस वर्ष से यहाँ नहीं रहती. मुझे इस बात का भी कोई मुगालता नहीं है कि इस यात्रा में जाने से किसी का भला होगा.  मुझे सिर्फ इतनी उम्मीद है कि मेरा अपना मन कुछ हरा होगा, मेरा सम्बन्ध पहाड़ से कुछ और गहरा होगा.
कमल जोशी ने, जो इस यात्रा में पहले भी शिरकत कर चुके हैं, ने अभिषेक को सम्बोधित करते हुए लिखा था "प्यारे अभिषेक, (संबोधन के लिए क्षमा, मैं ६० साल का हूँ शायद तुम मुझसे उम्र में , अनुभव नहीं कह रहा, छोटे होगे. तुम्हारे उत्साही comment के लिए धन्यवाद. मैं तीन बार अस्कोट आराकोट यात्रा में भाग ले चुका. पुरी यात्रा में. और अब भी हिस्सा लेने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा. बस ये पूछना है तुमसे कि  ये किसने कहा की ये यात्रा कॉमन आदमी के हालात को बदलने की यात्रा है. दरअसल ये यात्रा अपने आप को पहचानने की यात्रा है! हम अपनी ईगो त्याग कर समग्र में, वास्तविकताओ के बीच अपनी insignificance समझ सकें, ये इसकी यात्रा है. हम पहाड़ के बारे में थोड़ा सा ज्यादा इमानदारी से बात कर सकें इस बात की यात्रा है, ये दूसरों को बदलने की यात्रा नहीं, खुद को पहचान कर बदलने की यात्रा है. ...! फिर भी यात्रा के बारे में तुम्हारी ना-इत्तेफाकी हो सकती है, यही तो लोकतंत्र है..!"

कमल जोशी जी की प्रतिक्रिया से और फिर नैनीताल में उनसे बातचीत से, बीच-बीच में शेखर दा से और फिर दुसरे साथियों से पुरानी यात्राओं के किस्सों से इस यात्रा की कुछ समझ बननी शुरू हुयी, पहाड़ के अस्कोट आराकोट यात्रा अंक को पढ़ते हुए भी कुछ बाते, कुछ रेफेरेंस समझ में आने लगे.  लेकिन फिलहाल मैंने कोई फार्मूला न गढ़ने, अपने लिए भी किसी उद्देश्य को अपरिभाषित रखने का मन बनाया, मतलब कि जैसा होगा देखा जाएगा, बारिश आयेगी तो बरसाती ओढ़  ली जायेगी, लेकिन पहले तो धूप  और हवा का अानन्द लिया जाएगा. 

नैनीताल में धूप और ताप दोनों किसी लिहाज से देहरादून से कम नहीं है, इतनी गरमी की अपेक्षा मेरी नहीं थी.  लेकिन जिस तरह से सीधी धूप लगातार पड़ती रही  मेरे चेहरे पर दो दिन में ही सनबर्न से कुछ फफोले जैसे हो गए. पहले कभी इस तरह की याद नहीं है कि ऐसा हुआ हो. नार्थ अमेरिका की तीखी धूप में हमेशा सनस्क्रीन लगाने की याद रहती है क्यूंकि यहाँ अल्ट्रावॉयलेट विकिरण बहुत ज्यादा है.  भारत में अमूमन मैं  कभी सनक्रीम नहीं लगाती, लेकिन लगता है कि लगानी पड़ेगी ही, संभव है कि अब चालीस पार मेरी त्वचा की बनावट में अंतर आ रहा हो.  

नैनीताल में गिरदा की पत्नी  हीरा जी (हेमलता तिवारी) से मेरी पहली मुलाक़ात हुयी. अत्यंत सौम्य और बहुत भली महिला, गिरदा की ही तरह भावुक और पारदर्शी व्यक्तित्व, बहुत देर तक हम गिरदा के बारे में बात करते रहे फिर थोड़ी देर तक मालरोड़ पर टहलते रहे. हीराजी गिरदा के नाम से एक छोटा सा संग्रहालय बनाना चाहती हैं, काश ऐसा हो सके. आने वाली पीढ़ी गिरदा के बारे में जान सके. हीरा जी से मेरी पहले जब गिरदा जीवित थे, तब एक दो बार फ़ोन पर बात हुयी थी. उनसे मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा, माँ  के जैसा उनका स्नेह हमेशा याद रहेगा.

फिर  मनु दी और उनके दोनों बच्चों से मुलाकात हुयी, उनके  बेटे बहुत छोटे थे जब बीस साल पहले देखा था, और दोनों जवान बच्चे हैं , दुनिया भर की बातों के बारें में सोचते विचारते, अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद में. ज़हूर दा और मुन्नी जी से भी छोटी मुलाकात हुयी, दीपा से मिलना नहीं हुआ, आखिर तक असमंजस रही,  शिरीष से भी मिलना नहीं हुआ, उम्मीद करती हूँ फिर कभी मिलना होगा. रिश्तेदारों, मित्र, परिचितों का स्नेह, बीस वर्ष में कुछ  नहीं बदला सिवाय इसके कि तब के जवान लोग धीरे-धीरे बूढ़े होते जा रहे हैं, और ५-१० साल के तब के देखे बच्चे अब जवान हो गए है, उनसे एक तरह अब पहली बार ही रूबरू होना हुआ.

२३ तारीख को नैनताल के सेवॉय होटल से अस्कोट-आराकोट टीम की विदाई हुयी, अपने पुराने अध्यापकों में डा. मलकानी और डा सुधीर चन्द्रा जी से फिर से मिलना सुखद रहा.  डा. वल्दिया ने विदाई भाषण  दिया और जोर देकर कहा कि  खासकर दूर दराज़ के इलाकों में जा कर स्कूलों की स्थिति देखकर हम लोग आयें, अब तक मुझे नहीं मालूम था कि डा. वल्दिया नैनीताल में हैं, नहीं तो संभवत: उनसे मिलने की कोशिश करती, कुछ बातचीत करती, लेकिन अब मौका नहीं है.  थोड़ी देर की बातचीत राजीव लोचन साह जी से, कर्नल मेहता से हुयी, फिर कई विदा करने आये लोगों से.
दिल्ली से प्रकाश उपाध्याय, भूपेन सिंह, चन्दन डांगी, हिमानी, स्टीव डर्न, कर्नल देवप्रकाश  डिमरी और बी एस  नेगी जी भी नैनीताल पहुँच गए हैं.

सेवॉय  के ठीक सामने पिछाड़ी बाज़ार का वो घर है जहाँ करीब चालीस सालों तक मेरे ताऊजी का परिवार रहा, अब ताऊजी  नहीं हैं, ताई जी भी नहीं, भाई-बहन सब दूसरी जगहों में अपनी नौकरी और परिवारों के साथ हैं.  उस  छोटे से तीन कमरे के मकान के साथ जो हमेशा घर होने का अहसास जुड़ा था, आज वो नहीं है.  समय के साथ देखते-देखते सारे जुड़ाव फिर से परिभाषित करने पड़ते हैं , कुछ स्थायी नहीं रहता.

 दो गाड़ियों में सवार होकर करीब १६ लोग, जिनमें मेरे सिवाय अंजलि और हिमानी भी हैं, नैनीताल से निकले. इमोशनल लेवल पर लगता है, जैसे यहाँ से कहीं गयी ही नहीं, या बस कल गयी, आज लौट आयी. दूसरे किसी धरातल पर फिर पहाड़ी शहरों का इकहरापन घेरने लगता है, और उनके लगातार बढ़ते सैलानी मिज़ाज़ से नफरत होने लगती है, मन कहता है बुरा क्या हुआ जो चले गए, ये शहर पीछे छूट गया, जो था पहले यहाँ, अब वो भी नहीं बचा. लेकिन फिर भी कुछ छूट गये की उदास धारा भीतर बहती रहती है… 

Apr 22, 2014

किसी समय पृथ्वी पर: निकोलाई वाविलोव और जेरेड डायमंड के बीच

आज  "पृथ्वी दिवस" यानी अर्थ डे  है,  हमारी इस प्यारी धरती पर  एक बड़ी सौगात है जीवन की विविधता, इतनी कि डार्विन के समय से 150 वर्ष बीत जाने के बाद भी आजतक इसकी पूरी कैटलॉगिंग नहीं हो सकी.

इस दिन एक विशेष कृषि वैज्ञानिक  निकोलाई वाविलोव याद आते हैं. निकोलाई पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने जैव विविधता को मनुष्य मात्र की अमूल्य धरोहर के बतौर पहचाना, विभिन्न फसलों  के उत्पत्ति  केन्द्रों को सूचीबद्ध किया, बहुत से 'वीड और वाईल्ड प्रजातियों के बीजों को भी इकठ्ठा किया.  १०० साल पहले उन्होंने पांच महाद्वीपों में घूम-घूम कर, हज़ारों मीलों की यात्रा करके, दूनिया के विभिन्न हिस्सों से २००,००० किस्म के बीज संग्रहित कर पहला "सीड बैंक" बनाया.

 निकोलाई ने जिस समय बीजों  को एकत्र  करना शुरू किया उस वक़्त तक जेनेटिक्स  जानकारी बहुत सीमित थी, सिर्फ दो दशक  ही बीते थे 30 सालों तक ठंडे बस्ते में पड़े मेंडल के सिद्वांतों की फिर से खोज को, जेनेटिक्स का टर्म बमुश्किल इस्तेमाल में आया आया ही था.  जेनेटिक मटीरियल क्या है इसके इर्दगिर्द बीसवीं सदी के पहले पचास वर्ष निकल गये. निकोलाई की मौत के करीब बीस वर्ष के बाद डीएनए को आखिरकार जेनेटिक मटीरियल माना गया.  अत:  बीजों का संग्रहण किसी काम आएगा, दुनिया की खाद्य सुरक्षा इसके जरिये सुनिश्चित हो सकेगी का सपना, इसकी समझ उनके समकालीन कुछ वैज्ञानिकों के अलावा किसी के पास नहीं थी.  वो समय  रूस की सर्वहारा क्रांति के बाद का और दो  विश्वयुद्धों के बीच उथल-पुथल का ज़माना था. अकाल से घिरे, दुनिया से लगातार कटते जा रहे रूस में स्टालिन विज्ञान से चमत्कार जैसा कुछ चाहता था.  दूरदर्शी, मेहनती और संजीदा  वाविलोव किसी चमत्कार का सपना नहीं दिखा सकते थे.  

एक औसत से निम्न दर्ज़े के वैज्ञानिक Trofim Lysenko, जो स्टालिन के सर्कल में ज्यादा राजनैतिक पैठ रखता था, ने  हवामहल खड़े किए और स्टालिन को जो चमत्कार चाहिए थे, उनका वादा किया, उसका दावा था कि  बीजों को बोने से पहले ठंडे पानी मे भिगाकर इस लायक बनाया जा सकता है कि वो बड़ी संख्या में अंकुरित हो सकें, और सिर्फ़ भोगोलिक बदलाव उपज को बढ़ाने के लिए काफी हैं.  वाविलोव और उनके सहयोगियों ने  विज्ञान के सरलीकरण का विरोध  किया,  और इसके  बदले अकाल के समय रिसर्च पर अतिशय संसाधन बर्बाद करने के इल्ज़ाम में वाविलोव और कई प्रतिभावान वैज्ञानिको को  बंदी बनाकर साईबेरिया भेज दिया गया, जहाँ देशद्रोह के आरोप में उन्हें जेल, प्रताड़ना, और भूख से मौत मिली.  उधर वाविलोव के सहयोगीयों ने अपनी जान दाँव पर लगाकर, भूखे रहकर, अपनी आँखों के आगे अपने परिवार को भूखे मरते देखकर भी उस समय के एकमात्र सीड बैंक की रक्षा की.  मालूम नहीं क्या आशा और किनके लिए आशा उनके मन में रही होगी ?  आज यही संग्रह  बदलते पर्यावरण,  जीवाणु व् दूसरे परजीवियों से फसलों को बचाने का बीमा है, मानव जाति के अस्तित्व में बने रहने का बीमा है. 

इधर सिर्फ सौ वर्ष बीतें हैं और खेती मानव मात्र की धरोहर के बजाय ग्लोबल कॉर्पोरेशन की मुनाफाखोरी का ज़रिया बन गयी है, रोज़-ब-रोज़ जैव विविधता कुछ कम हो जाती है, आधुनिक खेती के तरीके ले-दे कर पूरी प्रकृति के सम्पूर्ण दोहन पर आधारित है, और बड़ी तेज़ी से पूरी दुनिया में एक से होते जा रहे हैं.  तात्कालिक फायदे के लिए  भविष्य दाँव पर लगाने की हिचक किसी भी नीति नियंता और समाज को नहीं है.  बेहिसाब लूट खसौट और संसाधनों की भागीदारी में जिस तरह का असंतुलन आज पृथ्वी पर है , उसके मद्दे नज़र मशहूर एंथ्रोपोलॉजिस्ट जेरेड डायमंड कह रहे हैं कि  अगर समय रहते हम नहीं चेते, तो सिर्फ अगले 100 वर्षों के भीतर मानव सभ्यता एक बार फिर पाषाण युग में चली जायेगी. जेरेड डायमंड की बतकही , उनकी किताबें, उनकी बातें कुछ यहाँ हैं.

Apr 18, 2014

उलटबासियाँ

सिर्फ गुनगुन आवाज़े हैं
कोई बात नहीं है
कोई जगह है हरी भरी
अकेली, लोगों के बीच घिरी
साफ़ कुछ दिखता नहीं
आँख है कि खुलती नहीं
और ढूंढते रहना जाने क्या क्या
अधूरा चाँद,  आधा वृत्त
दिवंगत दादी
दुगड्डे के बस अड्डे में लीची का ठेला
डोईवाला में योयो, बाक़ूगान
डेनवर में चाट की दूकान
यूँ ही किसी बस में चढ़ जाना
नीम अँधेरे किसी सुनसान में उतरना
जाने कौन शहर पहुंचना
इप्सविच, इम्फाल, इथाका
लेरेमी, लॉन्ग आईलैंड, लाटूर 
बाराबंकी, बंबई, बरोड़ा, बाड़मेर
हतप्रभ हूँ, खो गयी सी  
यहाँ किसी को  जानती नहीं
पहचानती नहीं, रस्ता सूझता नहीं
कोई कहता है
'बीस वर्ष बाद,  इन्ही जगहों पर 
फलाँ -फलाँ  रहते होंगे
बस अभी नहीं हैं. "
सपने के भीतर सपना
खेल के बीच खेल
और उलटबासियाँ 
सपनों के समांतर जीवन .....

Apr 14, 2014

आज भी खरे हैं तालाब-अनुपम मिश्र

शनिवार-इतवार को अनुपम मिश्र की 'आज भी खरे हैं तालाब' पढ़ी. सरल भाषा में तकनीकी और परम्परा का, पानी के संचयन का, सदियों पुराना लेख जोखा. सवाल फिर वही है, परम्पराओं की जड़ता कैसे टूटे और उनमें निहित अच्छी बातें, और ज्ञान को आधुनिक शिक्षा और समाज में कैसे इंटीग्रेट किया जाय? 

किताब पर कुछ और जानकारी यहाँ है।  

 किताब की ऑनलाइन पीडीएफ  भी यहीं से मिल सकती है, नहीं तो लिंक ये रहा.
http://www.indiawaterportal.org/sites/indiawaterportal.org/files/aaj_bhi_khare_hain_talaab_anupam_mishra.pdf


 जिन्हे पानी में और किताब में दिलचस्पी हो  उनके लिए अनुपम मिश्र का इंटरव्यू है. 



Mar 5, 2014

मालूम नहीं चिड़िया

हमेशा से कुछ चौड़े, सधे, नपे, जाने पहचाने, रास्ते थे, जिनपर चल कर कहीं कहीं पहुंचा जा सकता था. उन रास्तों और उन मंजिलों में  सुरक्षा थी, खो जाने की सम्भावना कम थी, इसीलिए जो मिल सकता था उसी में संतोष करना था, उसी में गिनती की ख़ुशी, गिनती के सुख.  चौड़े, आजमाए रास्तों के दोनों तरफ, जब तब छोटी छोटी पगडंडियाँ थी जिन पर बीच बीच में मनचले निकलते कुछ दूर तक, फिर वापस आते. कुछ  सचमुच में खो जाते, रास्ता भटक जाते, जीवन भर वापस लौटने का रास्ता खोजते रहते.


कोई एक आध मन की पगडंडी के रास्ते ठेठ जंगल में निकल जाता, वो सचमुच ही खो जाना चाहता, उसे इस नपीतुली दुनिया से, रहस्यहीन  और रसहीन जीवन से नफ़रत होती,  वो हमेशा कहीं और, कहीं और, कहीं और निकल जाना चाहता. मन के किसी अँधेरे कोने में दुबककर बैठी रहती हज़ार पंखों वाली सतरंगी चिड़िया,  जो  जब तब डैने  फैलाकर उड़ जाती, जीवन उसके पीछे-पीछे  हरी घास पर दौड़ता, कंटीली  झाड़ में उलझता, खरोंचों से तार तार होता, लहूलुहान होता, किसी गहरी अंधेरी खाई में बेलगाम लुढ़कता, और और लुढ़कता चला जाता.  किसी दिन दौड़ते दौड़ते चिड़िया पकड़ में आती, पैराशूट बन कर समतल जमीन पर उतार देती, और तब जीवन कहता तौबा, अब और नहीं, चिड़िया अब कहीं और जाओ!

चिड़िया फिर कुछ देर अपने पंख समेटकर मन के अँधेरे कोने में दुबक जाती, जानती होती कि अगली उड़ान लम्बी और ज्यादा बेलगाम होगी, नहीं जानती चिड़िया कि  किस दिशा में होगी,  चिड़िया पैराशूट बन सकेगी या नहीं?

चुपचाप एक प्रार्थना  बुदबुदाती चिड़िया: 'मन गहरा रहे, उस गहरे में अँधेरे की याद रहे, ह्रदय की तगारी में पानी, पानी में झिलमिल रोशनी रहे . माफ़ी मांग लेने, और माफ़ कर सकने का हौसला रहे, जज़्ब करने कर लेने का धैर्य, सुन लेने का धीरज, चीन्ह लेने वाली आँख रहे. खड़े होते रहने, होने का हौसला रहे, मुझे अपने होने की खुशी रहे....




Mar 1, 2014

फिलीपींस-हॉंगकांग-2013

नवम्बर 2013 में, धान की फसल पर केंद्रित इंटरनेशल कॉन्फ्रेंस के बहाने में पहली बार फिलीपींस जाना हुआ.  मित्रतापूर्ण रवैये में फिलीपींस का दूसरा जोड़ीदार नहीं है.  पूरब की मिठास और विनम्रता कायम रखते हुए उन्होंने पश्चिम के मर्डेर्नाइजेशन और अंग्रेजी भाषा का समावेश अपनी संस्कृति में कर लिया है.  पिछले पंद्रह-सोलह साल के प्रवास में जिन कुछ लोगों से मेरी बढ़िया दोस्ती हुयी, उनमे फिलीपीनी लोग भी शामिल रहे हैं. कॉर्नेल में पहले साल, जब तक मुझे कार चलाने का लायसेंस नहीं मिल गया था,  एंजेलीना क्योली, जो फिलीपीनी रिसर्चर थी, मेरी बहुत सी चीज़ों में मदद करती थी.  शनिवार को ग्रोसरीज की खरीदारी,  शहर और शहर के बाहर की घुमाई,  वीकेंड में स्कीइंग,  हाइकिंग करना,  मिलकर खाना पकाना,  कोई फ़िल्म देखना,  अकसर होता रहता था.  लगभग एक ही साल हम लोगों ने शादी  की, कुछ अंतराल पर बच्चे हुए. मेरा पहला बेटा हुआ, तब तीन महीने तक एंजेल अपनी बेटी के साथ मेरे बेटे को भी देखती थी. 

Manila

 फिलीपींस से कई रिसर्चर्स  कॉर्नेल आते रहते थे,  हमारा अपार्टमेंट एयरपोर्ट के पास था तो अक्सर लोगों को वहाँ से रीसीव करना और छोड़ने का मौका रहा, बहुत से लोगों से बातें हुयीं. फिलीपींस से इस बार जब मुझे निमंत्रण मिला तो वहाँ जाने का उत्साह कुछ वैसे ही था जैसे किसी  परिचित जगह जाना हो. हमेशा से जानती थी कि फिलीपींस के लोग बहुत मीठे और मित्रवत होते हैं, अनौपचारिक और सह्रदय भी,  लेकिन उनके सरकारी काम और ब्यूरोक्रेसी भी इससे अछूती नहीं है,  ये बात मुझे फिलीपींस के वीसा लेते समय महसूस हुयी. फिलीपीनी सरकार ऍक्सपैट्रियेटस को दुसरे देशों के नागरिक बन जाने के बाद भी अपने यहाँ पूर्ण नागरिक अधिकार देती  हैं, और उनके साथ अपने दूतावास के जरिये जीवंत सम्बंध  बनाये रखती है.  पास के ही शहर में रहने वाले एक एक्सपेट्रियट फिलिपिनो डॉक्टर फिलीपींस एम्बेसी के लिए डोक्युमेन्ट्स की जाँच करते है.  मैंने उन्हें फोन किया तो उन्होंने मुझे तीन दिन इंतज़ार करने की बजाय शनिवार को घर पर ही बुला लिया. मैं फ़ाइल लेकर उनके घर पहुंची, डाइनिंग टेबल पर बैठकर अप्लिकेशन को नोटराइज़ किया और तीस डालर की फीस के साथ फिलीपींस की एम्बेसी भेज दिया.  जब उन्हें पता चला कि मेरे पति और बच्चे बाहर कार में बैठे हैं, तो उन्हें बुला लाये, और फिर बहुत देर तक दोनों पति,पत्नी पुराने परिचितों की तरह बात करते रहे, आस-पास के शहरो के बीसीयों एशियन ओर्गनज़ाइजेशनस में अपनी शिरकतों के बारे में बताते रहे.

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rice cakes

मनीला 
मेरा मनीला पहुंचना देर दोपहर में हुआ,  मैंने एयरपोर्ट पर कुछ पेसो खरीदे,  और बाहर  निकलते ही दो स्टूडेंट्स मिले जो मुझे लेने के लिए आये थे.  एयरपोर्ट से मेट्रो मनीला करीब घंटे भर का सफ़र था.  शहर में खूब अच्छी धूप थी, हवा में ट्रॉपिक की खुशबू भरी थी.  शहर का बाहरी हिस्सा छोटे छोटे घरों वाला कुछ हद तक भारत के किसी छोटे शहर के मानिंद  कच्चे पक्के मकानों से ठसाठस था, कहीं पलस्तर था, कहीं नहीं भी, मध्यवर्गीय, गरीब तबके की रिहायश की ये मिलीजुली झांकी.  इस सबके बीच फिर  विनम्रता, सज्जनता की लोगों पर छाप दिखती रही.  एक तरह से ये भारत का ही कोई शहर हो सकता है,  गरीबी ने उनको अग्रेसिव नहीं बनाया, अपनी मनुष्यता को और सज्जनता को लोगों ने और शायद इस पूरी संस्कृति ने बचा कर रखा है जो एक मायने में ठेठ एशियन है. वो पश्चिमी परिष्कार नहीं है.  भारत के पहाड़ों को जितना पहचानती हूँ,   गरीबी के बीच के इस परिष्कार को, इस सजन्नता को नजदीक से पहचानती हूँ.  यदा-कदा मेरा इससे लखनऊ में, गुजरात में भी सामना हुआ है और साऊथ इण्डिया में भी.

लेकिन मनीला का दिल्ली से कोई साम्य नहीं है.   दिल्ली बहुत उज्जड़ शहर है,  दिल्ली में (उसी तर्ज़ पर बाकी दुसरे उत्तर भारतीय शहरों में) टैक्सी वाले, सामान उठाने वाले, सड़क पर सामान  बेचनेवाले जिस तरह से  टूरिस्टों, यात्रियों और लोकल लोगों को  तंग करते हैं, वैसा शायद दुनियाभर में कहीं नहीं है, उस रेचेडनेस का ऑरिजिन गरीबी के अलावा जरूर कुछ दूसरी चीज़ है,  डेसपरेटनेस की परमानेंट छाप दिल्ली पर पड़ गयी है.

मेट्रो मनीला, जहाँ कोन्फेरेंस थी, एक दूसरी दुनिया थी, जैसे दूसरा मैनहैटन या शिकागो डाउनटाउन, या फिर दुनिया का कोई भी धड़कता हुआ अमीर कोना, बहुमंजिली इमारतों और रोशनी का अनवरत सिलसिला. पूरी दुनिया का बाज़ार, महंगे होटलों, बिजनेस, और रेस्ट्रोरेन्स और मॉल की दुनिया. भारत समेत कई दुसरे देशों से वैज्ञानिक बड़ी संख्या में मनीला आये थे, बहुत बड़ी संख्या में एशियाई चहरे थे, इस लिहाज़ से भी ये मेरे लिए ये अलग अनुभव बना. बहुत से लोगों के काम के बारे में जाना, दुनिया भर में उगाई जाने वाली धान की प्रजातियों, उनकी खासियत, और समस्याओं के बारे में भी.

यहीं मुझे जे एन यु के भूतपूर्व प्रोफेसर प्रसन्ना मोहंती की मृत्यु  के बारे में पता चला.  मन में एक उदासी भर गयी .  भारत में जिन वैज्ञानिकों के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान रहा है, उनमें स्व. प्रसन्ना मोहंती का नाम सबसे पहले आता है.  एम. एस. सी.  प्रथम वर्ष में उनसे हुयी एक दो मुलाकातों का ही असर था कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच मेरा  पी. एच. डी. करने का इरादा बना, और बहुत बाद तक वो प्रेरणा सोत्र रहे.  वो जितने अच्छे वैज्ञानिक थे, उससे लाख गुना अच्छे इंसान भी थे.  कुछ दिनों पहले  उन्हें जानने  वाले दुसरे दोस्तों से मैंने बात की तो एक ने कहा वो एक 'मेल एंजेल' थे.  बहुत बड़ी छाया थी उनके स्नेह की, सब पर सामान. हालिया कुछ वर्षों में उनसे मिलने के बारे में सोचती रही, लेकिन फिर भुवनेश्वर जाना नहीं हुआ.  शायद भारत में रहती तो उनसे कुछ और मुलाकातें मेरी होती,  बहुत से दुसरे मित्र सम्बन्धियों से भी होती रहती.  अब सब्र कर जाती हूँ. जलावतनी की कुछ कड़ी कीमत होती है.

 कॉन्फ्रेंस में लगभग सौ से ज्यादा खाने के आइटम रहते थे. जो बात थोडा मुझे चकित करती रही,  कि सुबह के नाश्ते के समय, दाल-भात, रोटी, और कई तरह की वेजिटेरियन करी, मछली और मीटकरी भी रहती थी. अमूमन  ऑफिस  निकलने के पहले लोग पूरा खाना खाते हैं. लंच  कुछ नास्ते की तरह करते हैं और फिर रात का खाना.  एक भूला हुआ स्वाद भी मिला, बड़ा नीबू  जिसे गढ़वाल में में चकोतरा और कुमायूं में गलगल कहते हैं, कुछ मसालों के साथ सना हुआ मिला, भांग और भंगजीरे की जगह यहाँ मूंगफली थी.  मैंने हर दिन नास्ते में ये सना नीबू खाया.  डिनर  का इंतज़ाम खुद करना होता था, तो लगभग हर शाम कुछ पुरानी और कुछ नयी जान पहचान के लोगों के साथ मेट्रों मनीला के रेस्ट्रोरेन्स में जाना हुआ.  बहुत स्वादिस्ट  खाना, प्लेट की जगह केले के पत्ते पर परोसा हुआ,  बहुत सफ़ाई  और सुरुची के साथ  मिला, और बहुत महंगा नहीं, अलग अलग आर्डर के बजाय हम लोगों ने बहुत सी चीज़े मंगायी,  मिलबाँट कर खायी,  हालाँकि मुझे जूठे  से हमेशा परहेज रहा है, और जब मेरे एक पुराने अमेरिकी दोस्त ने मेरा नारियल का पानी चखने के लिए माँगा, तो मुझे उसे अपना जूठा न खाने का कॉन्सेप्ट बताना पड़ा, खूब मेरी टांग खिंचायी हुयी, लेकिन फिर आप जो है, वो होते ही हैं, उसके साथ जब तक इमेरजेंसी न हो क्यूँ कम्प्रोमाइज़ करना. पहले भी पुराने दोस्त कहते थे "चल तू पहले पी ले, फिर हमें दे देना'. उसने भी वही कहा. 

कॉन्फ्रेंस के बाद, शुक्रवार की सुबह, ०५  नवम्बर को  लगूना का टूर था,  सुबह साढ़े पांच बजे बस को रवाना होना था.  देर रात तक कुछ काम करती रही, फिर  नींद नहीं आयी.  सुबह पांच बजे तैयार होकर होटल की लॉउंज में पहुंची तो टूर कैंसिल हो गया था. घंटे भर दो तीन लोगों के साथ वहीँ बैठ कर कुछ बात  करती रही, मौसम का हालचाल और 'आई ऑफ ह्ययान' को फिलीपींस की तरफ मूव होते देखती रही.  फिर कुछ होश आया तो लगा कि कुछ देर सो जाऊं, कौन जाने शाम तक क्या हो?  कमरे में वापस गयी और दो घंटे के लिए सो गयी. उठी तो पंकज का ईमेल था, और भी कुछ दोस्तों का जिन्हे मेरे मनीला में होने कि जानकारी थी कि जल्दी से वहाँ से बाहर निकलो. वापस होटल के रेसेप्शन पर पहुंची और उन्हें पूछा कि अगर तीन दिन के बाद तूफ़ान की वजह से यहाँ से निकलना सम्भव न हुआ तो मेरी बुकिंग बढ़ा दें, या इसका प्रोविजन रखे. होटल अगले दिन से किसी दूसरी कॉन्फ्रेंस के लिए बुक था. होटेल के लोगों के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. पूरी शांति थी. वो इस इलाके में सेफ थे. 

फिलीपींस घूमना नहीं हुआ, बल्कि घूम सकने की कोई सूरत बनती उससे पहले ही समुद्री तूफ़ान हयान ने फीलीपींस को तहस नहस करने की ठान ली. ट्रेवल एजेंट ढूँढा, किसी तरह हॉंगकांग की  फ्लाइट बुक करायी.  तूफ़ान के मनीला पहुँचने के दो तीन घंटे पहले  हॉंगकांग की फ्लाइट मिली. मेट्रो मनीला से एयरपोर्ट जाते हुए टैक्सी से फिर मनीला देखा, टैक्सी ड्राईवर लोकल है , वो फिलीपींस के कई इलाकों  के नाम लेता है जहाँ तहस नहस ज्यादा होगी, लेकिन बहुत अधीरता और बैचैनी मुझे उसमें नज़र नहीं आती. उसे उम्मीद है कि एयरपोर्ट के आसपास के इलाके में पानी भर जाएगा, कुछ दिन के लिए शायद रास्ता बंद हो , लेकिन बड़ा नुकसान मनीला में नहीं होगा, एयरपोर्ट पहुँचते-पहुँचते बारिश और तेज़ अंधड़ शुरू हो गया. एयरपोर्ट पर बड़ी भीड़ थी, मेरे आगे तीन बच्चे अपनी नानी के साथ, लगभग एक ही तरह के कपडे पहने, खड़े थे.  नानी को उम्मीद थी कि भीड़ में बच्चों को इस तरह पहचानने में उसे सुविधा होगी,  इन बच्चों की माँ सिंगापुर में काम करती है  और हर हफ्ते मनीला परिवार से मिलने आती है.  आज नानी इन बच्चों के साथ सिंगापुर  जा रही है, और भी बहुत से बूढ़े लोग है जो लाइन में हैं, इनके बच्चे हांगकांग, सिंगापुर में काम करते हैं.

बाहर हो रही बारिश और घिर रहे तूफ़ान से निसंग,  एयरपोर्ट के भीतर सब शांत था,  फिलीपींस के हैंडीक्राफ्ट, लकड़ी का सामान, खस की बुनी हुयी टोकरियाँ और मैट्स ,  सूखे आम, कटहल और केले की चिप्स थे, मूंगे और सीपी की ज्वैलरी की दुकानें  थी. 
Rice cake and rice balls

अखबार से पता चला कि वर्ष २०१३ में १५ से ज्यादा तूफ़ान फिलीपींस में आ चुके थे, ये शायद अठारहवाँ तूफ़ान था. समुद्री तूफानों से सामना करना और फिर फिर लोगों का बस जाना वहाँ लगातार चलने वाली प्रक्रिया है.  अखबार पूरे साल में अब तक आये तूफानों से हुए नुकसान और रिहेबलिटेशन के ब्योरों से भरा पड़ा था. फिर किसी फैशन शो की खबर थी, किसी महिला राजनैतिज्ञ पर करप्शन का आरोप था, आरोप और प्रति आरोपों का सिलसिला था. 

हॉंगकांग 

हॉंगकांग  रात नौ बजे पहुंची, करीब दो घंटे टर्मिनल एक से टर्मिनल दो के बीच घूमती रही, कि वहाँ से घर जाने की सूरत निकले, या रात में किसी होटल में रुकने की व्यवस्था हो सके.  फ्रीपोर्ट पर बिना वीसा के शहर में चले जाने के ख्याल से कुछ बैचैनी हुयी, एयरपोर्ट से चीन के लिए सीधे ट्रैन खडी थी कुछ वैसे ही जैसे दिल्ली से देहरादून जाना हो, गलती से सिटी ट्रेन में बैठने की बजाय चीन वाली ट्रैन में बैठने की सम्भावना एक बार दिल में आयी.  इस तरह की गलतियां जीवन में कुछ बार हो चुकीं हैं, एक दफे दिल्ली से बरोड़ा जाने वाली जम्मूतवी एक्सप्रेस में बैठने की बजाय प्लेटफॉर्म के दूसरी तरफ लगी जम्मू जाने वाली जम्मूतवी एक्सप्रेस में बैठ ही गयी थी, गाड़ी चले के २ मिनट के भीतर ये अंदाज हुआ कि गलती हुयी, ऑलमोस्ट धीमे चलती गाड़ी  से अपने दो अटैचियों के साथ छलांग लगायी ही थी. अब बीस वर्ष बाद किसी अनजान देश में इस तरह की हरकत की सोचते भी दिल दहल  जाता है.

हॉंगकांग एयरपोर्ट का जेट एयरवेज काउंटर  सिर्फ शाम चार बजे से सात बजे तक खुलता है,  दिल्ली की फ्लाइट को प्रीपोन्ड करवा सकूँ इसके लिए हॉंगकांग  में कम से कम एक रात और एक दिन तो रुकना ही था, मुमकिन था ज्यादा, इसीलिए फिर रहने की जगह ढुंढाई शुरू हुयी, एयरपोर्ट पर एक रेस्टिंग लाउंज थी, जहाँ किसी सोफे पर बैठे, लेटे रात बितायी जा सकती थी.  एयरपोर्ट से लगे रीगल होटल में  निढाल पहुंची,  कमरा मिला लेकिन एक रात के लिए ५०० डॉलर देने का कोई सेन्स नहीं दिखा, फिर कुछ मैप देखकर बिलकुल  उलट  दिशा में चलकर होटल रिजर्वेशन का बूथ ढूँढा, और मन बनाया कि शहर के बीच कहीं जा कर रहा जाय.  रिजर्वेशन बूथ पर आधी कीमत में लगभग वैसा ही रूम रीगल में ही मिल गया.
Hong Kong

सुबह दसवीं मंजिल की खिड़की से पहली मंजिल के बॉलरूम के टेरेस पर बना गार्डन दिखा, कुछ अजीब तरह से एक मंगोलियन चहरे का आदमी, पारम्परिक चीनी परिधान में खड़ा दिखा, बहुत देर तक करीब आधे घंटे वैसे ही, मुझसे लगा कोई मूर्ति  है, लेकिन बाद में पता चला कि नहीं आदमी है ,मेडिटेशन कर रहा था.  गार्डन के एक तल्ले नीचे खुला हुआ स्वीमिंग पुल था, वहाँ कोई माँ-बेटी बहुत देर तक मछलियों की तरह तैर रहे थे.  मुझे अपने बच्चे याद आये,  गर्मियों ज़िद करके उन्होंने मुझे पानी में हाथ पैर चलाने सिखा दिए, और फिर धीरे धीरे अब तैरना आ गया.  घुमाई फिराई, सेमिनार, कॉन्फ्रेंस, पढ़ाई, लिख़ायी, सामाजिक सम्बन्ध, कुछ हद तक बाक़ी सब डिस्पेंसेबल हैं, बच्चे हैं जिनके पास मैं पहुंचना चाहती थी, माँ और पिताजी हैं जिनकी गोद में फिर बच्चे की तरह सुरक्षा ढूंढना चाहती थी.  बच्चों के बारे कुछ हद तक निश्चिंत रही, कि पंकज के पास हैं, सम्भवत:  उन्हें कुछ शील्ड किया होगा,  लेकिन माता-पिता तो बहुत बैचैन होंगे, हमेशा रहे हैं. अकेले और बूढ़े माता-पिता के पास देश से बहुत दूर चले गए बच्चों के लिए, अजाने भूगोल में भटकते बच्चों के लिए, बैचैन रहने के सिवा अब और क्या बचा.

दो तीन घंटे की जद्दोजहद के बाद शाम की दिल्ली जाने की टिकट मिली, अब लगभग ६-७ घंटे मेरे पास खाली है. सो दोपहर में कमरा छोड़ दिया और बैकपैक उठाकर हांगकांग शहर की तरफ चली गयी. एक बड़ा सा बंदरगाह है, समंदर है और किनारे किनारे कुछ उदास करने वाली, भूरी-नीली, पहाड़ियां, बहुत छोटा सा शहर, सिर्फ बहुमंजिला इमारतें.   सिटी सेंटर भी एक बहुमंजिला ईमारत के भीतर ही था. लगभग किसी अमेरिकन बड़े शहर की मॉल की तरह, वही वही ब्रांड नेम्स की दुकाने, हालांकि अमेरिका के मुकाबिले अमूमन हर चीज़ के डेढ़ गुना दाम. इस बहुमंजिली मॉल की आखिरी मंजिल की छत पर गार्डन, खुली हवा में आ बैठने की जगह है, यहाँ से पूरा शहर दिखता है, बहुत दूर तक समंदर भी. पूरे लैंडस्केप में स्काईस्क्रेपर हैं, उनके भीतर माचिस की डिबिया की तरह फ्लैट्स हैं, कोई एक मंजिला, दो मंजिला, छोटा घर / ऑफिस नहीं, लेकिन  बीच बीच में बहुत सी खाली जगह है,  हरियाली है,  तरतीब से पूरे शहर में फूल उगे हैं.  एक एरिया में खाने की छोटी छोटी दुकाने हैं, एक एक करके उन्हें टटोलती, कुछ खाने को ढूंढती हूँ,  कुछ पोटस्टिक्स खरीदती हूँ, स्वाद अच्छा है. लेकिन फिर  कुछ और यहाँ से नहीं खरीदना चाहती, सफ़ाई को लेकर एटीट्यूड बहुत दुरुस्त नहीं है. कुछ देर बाद किसी फॉर्मल रेस्ट्रारेन्ट में बैठकर तसल्ली से खाना खाया.
Hong Kong

हांगकांग कुछ लिहाज से अब भी ब्रिटिश मॉडल का ही बन्दरगाह है. कुछ देर भर ठहरने भर की तसल्ली, कहीं और चले जाने की बैचैनी का अहसास लगता है शहर की हवा में घुला है, रूटेटडनेस नहीं दिखती.   मेरी अपनी इस तरह की फ़सान की स्थिति के बीच यहाँ आना और घूमना हो रहा है, तो अपने मानस को पूरे शहर पर आरोपित कर रही हूँ, ये भी सम्भव है . किसी दुसरे समय आ सकूंगी तो कुछ और दिखायी देगा …

 आमतौर पर यहाँ के लोग ज्यादा अमीर, फैशन के प्रति अति  जागरूक  और पश्चिम से भी ज्यादा पश्चिमी मिजाज़ के हैं. चीन और ताइवान के लोगों में अभी भी जो एशियन  मिज़ाज़ मिल जाता है, हॉंगकॉंग वासियों में वो मुझे लुप्तप्राय दिखा.  दुसरे एशियाई लोगों में से अमूमन जापानी लोग अपने पहनावे के प्रति अधिक  जागरूक है, औरतें बिना मेकअप के किसी के सामने नहीं पड़ती, बिना मेकअप के किसी के सामने जाने को वहाँ अभद्रता माना जाता है.  जापानी वैज्ञानिकों को  मैंने  हर मौसम में अच्छी सिलायी के बहुत महंगे और सलीकेदार फॉर्मल सूट में ही देखा है.  लेकिन जापानी मेनेरिज़म मिजाज फिर बहुत अलग है.

मॉल के ग्राउंड फ्लोर पर मीलों लम्बा ग्रोसरी स्टोर है, कई तरह की  ताज़ी-सूखी  समुद्री मछलियाँ, केकड़े, प्रॉन्स, सीपी, ओक्टोपस एक कतार में रखे हैं.  बहुत तरह के फल,  पैशन फ्रूट, ड्रैगन फ्रूट, लीची, सब बहुत ताज़े,  कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हे पहली बार देख रही हूँ, अच्छी बेकरी है, कई तरह की चाय हैं, 'प्यू रे' व् अन्य दूसरी भी जो चीन से बाहर बिकती नहीं है, कुछ  मेडिसनल कामों में लायी जाती हैं.  एक तरफ बहुत बड़ा एरिया बार का है, जिसमें वाइन टेस्टिंग चल रही है, ये कुछ देखने वाला सीन है, अमूमन बड़ी अमेरिकी दुकानों में भी  २-३ इस तरह के बूथ होते है.  यहाँ लगभग बीस टेबल रखी है, हर एक के आगे लम्बी क्यू है. शायद वाइन के लिए यहाँ हालिया वर्षों में नई तरह का क्रेज़ डवेलप हुआ है.  ग्रासरी स्टोर बहुत ही साफ़ सुथरा है, कुछ कुछ मायनों में ईस्ट कोस्ट के बड़े वेगमैन्स स्टोर की याद दिलाता है, लेकिन वैगमेन इसके आगे बहुत छोटा हुआ.

 चेकइन किया तो ये पता नहीं था कि तीन मंजिल नीचे उतरकर, ट्रेन पकड़कर फिर कहीं दूसरी जगह से डिपार्चर होगा, अपने हिसाब से दो घंटे पहले पहुंची लेकिन फिर भी लगा कि बहुत देर से पहुंचीं, नीचे ट्रेन लेते वक़्त उस प्लेटफॉर्म पर खड़े खड़े जाने कैसी अजनबीयत मेरी तबीयत में भर गयी, सब कुछ मेटेलिक, ठंडा, अँधेरा, नम, निष्प्राण. लेकिन फिर ये  क्षण बीत गये, जीवन का जादू यही है,  हमेशा कुछ भी नहीं रहता, न उद्विग्न मन ही ....        

Feb 13, 2014

Two poems with two facets of love.



Happy Valentine's Day!

1. प्रेम
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ज़रा सी जगह
ज़रा सी रौशनी में
बहुत बहुत नम किसी कोने
क़िरमिज़ी किरणों का रंग लिए
खिलते हैं कनेर के फूल
हवा में घुलता
मिट्टी तक फैलता जाता
लाल रंग...

1. Love
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In a little, moist corner,
under scant sunshine,
the scarlet Keli flowers bloom.

Hue of crimson,
diffuses in the air,
spreads on the earth....

2. प्रतीक्षा
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गुल-ए-सुर्खी सी तेरी याद थी
ओठों पर उग आयी काँटों की चुभन
दिल अम्ल का रिसता झरना
गलती रही इच्छाएं...

2. Lull
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His reminiscence is like a crimson rose,
whose pricks unceasingly emerge on my lips.
My heart a rivulet of acid,
where my desires dissolve one by one...