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अमराई के झुरमुट में स्कूल की छुट्टी के दिनों, स्कूल से आने के बाद, गर्मियों के लम्बे दिनों में, धुंधलके तक बच्चे खेलते. बसंत में आम की बौर आती और उसकी खुशबू में पूरा गाँव नहाया रहता, कोयल, पपीहा, और करेंत ... जाने किन किन चिड़ियों के बोल से अमराई के साथ पूरा गाँव गूंजता .. ,
कच्चे आम और सचमुच के खट्टे दांत, गुड़ की कट्की काटने में भी तकलीफ होती .. ..होती खुशी भी ..., क्या सेंसेशन था वो ? महीने भर तक कच्चे आम की चटनी बनती, अचार बनता. भूनी हुयी कच्ची अमिया का पना, कच्चे आमों के टुकड़ों की धूप में सूखती मालाएं, आम का छिलका और बीज सुखाकर चूर्ण बनता ...
पत् ....पत् ...पत् आम गिरते, लपक लपक कर अपनी फ्रॉक और कुर्तों, कमीजों में अगोरकर बच्चे घर लाते. ठंडे पानी की बाल्टी में डुबोते, आम चूसते, आम की सख्त गुठली चूसते, फिर आम की इस हड्डी पर कोयले से आँख मुंह बनाते, कभी एक छेद बना कर डंडी फंसा कर खड़ा करते, माँ की किसी फट गयी साड़ी के टुकड़े से लपेटते और बनाते गुड्डे, गुड़िया, चोर, सिपाही, नट, नटनी ...
गाँव-गाँव घूमकर आम की खरीदारी का सौदा पटाते कुंजड़े, बगीचे के आम खच्चरों पर लादकर ले जाते कुंजड़े, कोन लोग थे, कहाँ के थे . ...
बरसात के बाद आम से बिघ्लाण पड़ जाती, स्वाद ख़त्म हो जाता, फिर इतने झड़ते आम, झड़ते रहते बेख्याली में, उन पर मक्खियाँ भिनभिनाती, आम सड़ते, बगीचे में केंचुएं रेंगते, किसी कोने अजगर पसरा दिखता या सरसराता हुआ सांप.
महीने भर बाद आम की सिर्फ गुठलियाँ नज़र आती, हर तरफ, फिर एक दिन इसी हड्डी के बीच में एक सुराख से एक नन्हा हरा पोधा झांकता, तब पता चलता की हड्डी नहीं थी आम की गुठली! , सीपी का खोल की दो परते थी, उसमें भीतर भी एक नन्हा जीव था !
समय की किस बोतल में बंद ये कौन देश के बिम्ब ........