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Nov 19, 2009

ढाई बरस का एक बच्चा

ढाई बरस के एक बच्चे ने
अभी सीखा है पूरी ताकत के साथ नकार
और अपने चुनाव


ढाई बरस का एक बच्चा खोजता है
सहजता, आदमजात के इतर
किसी दूसरे रूप में, बिम्ब और भूगोल में
कभी गाय के बछड़े में
और चाहता है कि माँ भी गाय बन जाय
कभी हाथी में, और चाहता है
माँ के साथ एक बड़े स्वर मे गर्जन
तो कभी डायनोसोर में और झपट जाता है
माँ के ही ऊपर
और कभी फडफडाता है
अपनी कल्पना के पंख
एक कोने से दूसरे मे उड़ता हुया।

ढाई बरस का बच्चा
रोज़ खोल देता है माँ के बंधे बाल
और ढक देना चाहता है चेहरा
खिलाना चाहता है माँ को कुछ ज़बरदस्ती
और चहकता है जीत पर
गौर से देखता है बालियाँ
और छीन लेता है स्कार्फ
छुपमछुपाई के लिए
या फ़िर बनने को सुपरमेन

जो कभी माँ निकाल सकी
वक़्त एक कल्पनालोक से दूसरे मे उड़ने का
तो कहता है
"मामी यू आर गुड बॉय ".

Nov 17, 2009

आधी शताब्दी यम के इंतज़ार के बाद भी बची रहती है स्त्री

बरसो पहले जब मैं छोटी थी
अक्सर किसी दादी, नानी, ताई,
या फ़िर ऐसी ही किसी अधेड़ पहाड़ी स्त्री
को कहते सुनती थी
दिन भर की कमरतोड़ मेहनत के बाद
'बाबा-बोई * मुझे यम भी भूल गया है"
क्या करू जब तक है जान
तब तक लगी हूँ

अक्सर मन मे सवाल आता था कि
एक भरे-पूरे परिवार मे स्नेह बांटती स्त्री,
एक माँ, पत्नी
और एक कठिन भूगोल मे
बुजुर्गो का एक मात्र संबल
क्यूँ रिक्त हो जाती है अपने भीतर ही भीतर

और बहुत सी ये स्त्रियाँ आधी शताब्दी
ऐसे ही जी गयी
कर गयी बच्चों को अपने पैरो पर खडा
पितरो का तर्पण
बना गयी घर-द्वार
कंठस्थ है इन्हे रामायण
और कबीर और रहीम
और ढेर सी लोकोक्तिया
कभी स्कूल जाने के बाद भी

तीस साल बाद अचानक
एक दिन ऐसे ही
बचपन के मृगछौने जैसे उत्साह से
उलटे रास्ते
कूदते-फांदते सीढ़ीदार खेतों मे
बहुत उपर मुझे मिलती है एक दादी
एक पेड़ के नीचे घाम तापती हुयी
सौ साल की एक बुढ़िया
और कहती है
"बोई बहुत सुख से हूँ,
कितना खुबसूरत है
सामने का पहाड़ और यहाँ की धुप
किसी अस्पताल की बजाय
यही मरना है मुझे"

आधी शताब्दी यम के इंतज़ार मे
जीवन को धकेलती स्त्री के भीतर भी
ज़िंदा रहता है प्रेम
प्रकृति से, मनुष्य से,
और बची रहती है इच्छा..........

Nov 13, 2009

स्त्री का ह्रदय

युं ही किवदंती नही बनी होगी
कि स्त्री का ह्रदय
धरती की तरह होता है
पर्त-दर-पर्त खोदते जाने के बाद
क्या क्या निकलेगा?
किस-किस पर जाने-अनजाने
नेह की बारिश होगी?
या कि ताबड़तोड़ इधर-उधर
जहाँ-कहाँ दीवारे दरकेंगी


अप्रत्याक्षित संभावनाएं लिए
स्त्री का ह्रदय कितना डराता है?
इसीलिये एक सिरे से नकारा जाता है
समाज मे सुविधा बनी रहती है
सरंचनाये बनी रहती है
घर परिवार बने रहते है
और लहुलुहान होती है स्त्री की आत्मा


कितना डरती है स्त्री ख़ुद से भी
और अनभिज्ञ बनी रहती है
और बनी रहती है कभी न हिलने वाली
पददलित नींव
लहुलुहान छाती लिए
डालती रहती है
मलबे के उपर मलबा
ह्रदय मे उठ रहे भूकंप पर

क्यूंकि स्त्री का ह्रदय
जानता है कि
स्त्री होने का जो बिम्ब है
कवि की कल्पना मे,
रोमानी उपन्यासों मे,
दस दिशाओं मे जो विज्ञापन है कि स्त्री कैसी हो?
वों ड्ल्सीनीया* जिसकी चाहत है प्रेमीजन को
वों स्त्री जिसके के लिए जगह है
घर-परिवार मे, समाज मे
और जो एक सुविधा है
वों एक असल की जीती-जागती स्त्री
के ह्रदय पर भारी है ......

* उन सभी के लिए जो किसी " डान किहोते" की ड्ल्सीनीया है।