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Aug 30, 2018

कई चाँद थे सरे आसमां

शम्सुर्ररहमान फारुकी का उपन्यास 'कई चाँद थे सरे आसमां' पढ़कर पिछले 3-4 दिन में ख़त्म किया. एक बार जो उठाई तो फिर छूटी नहीं. बहुत मुद्दत बाद हिंदी-उर्दू की की किसी किताब को पढ़कर मन इतना लाज़बाब हुआ...
यूँ 3 सालों से 750 पन्नों की इस किताब को हसरत से देख रही थी और मुनासिब मौक़ा लग नहीं रहा था. अच्छा होता कि कुछ फ़ारसी आती तो मज़ा कुछ और रहता, फ़िलहाल फ़ारसी से लबालब शेरों-शायरी को समझने की क़ाबिलयत का न होना कचोट रहा है.
किताब में १७ वीं-१९वीं सदी के बीच हिन्दुस्तानी इल्म, शायरी, चित्रकारी की दुनिया का तसव्वुर और उस समय की रिवायतों को सघन किस्सागोई में गूँथा हुआ है. मशहूर शायर नबाब मिर्ज़ा खां 'दाग़' की माँ, खूबसूरत वज़ीर खानम इस उपंन्यास की नायिका हैं, जिनका जी शेरो-शायरी में न सिर्फ धंसा रहता था, बल्कि खुद आला दर्ज़े की शायरा थीं. दिल्ली-जयपुर-दिल्ली-रामपुर-दिल्ली में उनकी चार अलग-अलग तरह की घर गृहस्थी और फिर बादशाह जफ़र की बहु तक का सफर बेहद दिलचस्प है. तमाम आफ़तों के बीच भी, बेहद खुद्दार और समय से आगे की इस औरत ने बार-बार बर्बादी के बाद फिर-फिर अपने बूते बुलंदी हासिल की, और उसके जीवन जीने में उसकी मर्ज़ी शामिल रही. औरत का इस तरह का समृद्ध अनुभवों का जीवन किस्से कहानियों में भी अपवाद ही है.
वज़ीर खानम का ऐसा जीवन उनकी व्यक्तिगत खासियत के अलावा इसलिए भी संभव हुआ क्यूंकि मुसलामानों में शादी के लिए औरत की मंजूरी, मेहर का रिवाज़ और क़ानून में औरत के नाम पर जायजाद का होना, और विधवा के लिए फिर-फिर घर बसा लेने का विकल्प समाज में स्वीकृत था.
बरबस ओरहान पामुक की 'माई नेम इज़ रेड' की याद आती है. वहाँ जैसी महीन गुफ़्तगू पेंटिंग्स पर है, उसी दर्जे की बारीक गुफ़्तगू शायरी पर शम्सुर्ररहमान फारुकी ने 'कई चाँद थे सरे आसमां' में बुनी है. और ओरहान की शक़ूर और फारुकी की वज़ीर खानम एक जैसी नहीं तो बहने ज़रूर लगती हैं. दोनों में ख़ुद्दारी, और सेल्फ़ डिटरमिनेशन की जो लौ है लगभग एक जैसी है.
उस जमाने को याद करते हुए, सतही तौर पर 'गोन विद द विंड' की नायिका स्कार्लेट ओ' हारा की बरबस याद आती है, लेकिन स्कार्लेट वज़ीर खानम के २०-३० वर्ष बाद हुई. अपनी खूबसूरती और हिम्मत में भले ही दोनों के किरदार में समानता हो, ज़हनियत में कोई समानता नहीं है. स्कार्लेट जहाँ लिटरल और गहरी गुफ़्तगू में नाक़ाम और सौंदर्यबोध में पैदल दिखतीं हैं वहीँ वज़ीर खानम आला दर्ज़े की नफ़ासतपसंद, और बौद्धिक रूप से बेहद संजीदा व भरपूर हैं. हालाँकि स्कार्लेट जैसी इंटरप्राइज़िंग वज़ीर नहीं थी. शायद इस तुलना का कोई बहुत मतलब नहीं हैं, चूँकि दोनों दो अलग-अलग सभ्यताओं की उपज थीं.
अच्छी किताबें पाठक को एक से निकल कर दूसरी में और फिर तीसरी में और चौथी में धकेलने का सिलसिला चलाए रखती हैं जैसे वो एक ही शहर की गलियों में रास्ता भूला घूमता फिरे. मेरा मन भी अभी जाने कहाँ -कहाँ किन भूली गलियों में मुझे लेकर जाएगा.

Mar 24, 2018

चीन डायरी-02: वूहान

21 सितम्बर 2015 


रात 2:30 बजे सर में तेज पीड़ा के साथ आँख खुली, घंटे भर कोशिश की लेकिन फिर नींद नहीं आई.  सुबह छह बजे जैसे ही उजाला हुआ यूनिवर्सिटी परिसर में टहलने के लिए निकल गई.  परिसर में सबसे पहले मुझे बड़ी तरतीब लाल ईंटों के खड़ंजे से बने क्वॉर्टर्स सड़क  के दोनों और दिखे जो यहाँ के कर्मचारियों और अध्यापकों के लिए बने थे. इन घरों के दरवाजे चौड़े और खूबसूरत हैं, और उनपर पेण्ट के ऊपर की पोलिश चमक रही है. फुटपाथ के दोनों तरफ करीने से फूल-पौधे और जातां से सहेजी झाड़ियाँ, और फ़्रांस से मॅगवाये हुए चिनार और पॉपलर के पेड़ हैं. यहाँ के नेटिव ओस्मेंथस के खूबसूरत पेड़ों पर इस समय सुगन्धित पीले फूल खिले हैं और वातावरण में उनकी उनकी सुगंध भरी हुई है. तापमान 25-28 डिग्री है, और सुबह हल्की सी धूंध है लेकिन यह शरद का सामान्य कोहरा ही प्रतीत होता है. एक छोटे से तालाब के किनारे एक चबूतरे पर कुछ बुजुर्ग मधुर संगीत के साथ डांस कर रहे हैं, इनमें से अधिकतर रिटायर हो चुके लोग हैं लेकिन सब फिट हैं, चुस्त दुरुस्त हैं. चीन में औरतों को ५५ वर्ष और मर्दों को ६० वर्ष में रिटायर कर दिया जाता है. प्रोफ़ेसर और बौद्धिकों को कई दफा उनकी विशेज्ञता के फिर से भी अगले दस वर्ष तक काम करने का मौका मिलता है. परिसर में ही एक अन्य जगह कुछ लोग सुबह सुबह 'ताई ची'  कर रहे हैं, और एक बड़े मैदान में बड़ी संख्या में विधार्थी मिलटरी की वेशभूषा में अपनी कवायद कर रहे हैं. बाद में मालूम चला कि यूनिवर्सिटी से डिग्री लेने के लिए प्राथमिक सैनिक शिक्षा हर विधार्थी के लिए जरूरी है.      

टहल कर  कमरे में लौटी तो दरवाजे के नीचे एक चिट मिली है कि  कैफे में सुबह ८ बजे से नाश्ता मिलेगा। सुबह नाश्ते में चाय-कॉफी पीने का रिवाज़ नहीं है, बल्कि सीधे पेट भरकर खाना खाने का रिवाज़ है. नाश्ता चीन, फ़ीलीपींस, और अन्य पूर्वी एशियाई देशों  में दिन का सबसे बड़ा भोजन होता है. चीनी लोगों के अनुसार नाश्ता राजा की तरह करना चाहिए, जितना अच्छा और ज्यादा से ज्यादा खा सको उतना खाना चाहिए। लंच रानी की तरह यानि कम लेकिन अच्छा आहार और रात का भोजन भिखारी की तरह बहुत कम मात्रा में करना चाहिए। दूसरी बात यह कि रोज एक ही समय पर भोजन करना चाहिए, उसमें बहुत आगे-पीछे की गुंजायश नहीं छोड़नी चाहिए। सो यहाँ नाश्ते मैं पचासियों तरह के व्यंजन है, बड़े-बड़े भगौनों में कमल ककड़ी का सूप, मछली का सूप, फर्मेन्टेड राइस सूप,  बाजरे का सूप और सोयबीन का दूध है, नमक और सिरके में डला बड़ा सुस्वादु खीरे का अचार है, कई तरह की हरी सब्जियाँ, बीफ, पोर्क, चिकन, बीन्स, तोफू, कई तरह की नूड्ल्स, भात और फ्रायड राइस हैं. कई तरह के भाप में पके 'मोंटो' बन हैं, और फलों में कच्चे खज़ूर, लीची, तरबूज़ और कई तरह के संतरे हैं. आमतौर पर डेजर्ट में कुछ नहीं। चीनी लोग अब भी सुगर  का बहुत कम इस्तेमाल करते हैं. इस सबके बीच कहीं पानी का नामोंनिशाँ नहीं है. लेमोनेड है वो भी गरम और पानी भी गरम. मैं काफी देर तक बैरे से ठंडा पानी मांगती रही, उसे मेरी बात समझ नहीं आई तो फिर एक लड़की को बुलाकर लाया फिर उसे भी समझ में नहीं आया तो एक प्याले में गरम पानी लेकर आ गई. यह सब तमाशा चल ही रहा था कि  तब तक मेरे एक पुराने परिचित डेविड हू  हॉल में दाखिल हुए और मेरी मदद को आये. डेविड ताइवानी हैं तो उनको चीनी भाषा में समझाते हैं कि पानी की एक ठंडी बोतल फ्रिज से निकाल कर लाओ.  

नाश्ते की टेबल पर ही मुझे अंग्रेजी और भाषा विज्ञान की प्रोफ़ेसर एंजेला मिली, उनका असली नाम जेमयई स्या हैं. एंजेला सुन-यात-सेन यूनिवर्सिटी से रिटायर होकर अब हुआजहोंग एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में पढ़ाने आई हैं. एंजेला की उम्र 65 के आसपास है, वह बहुत फिट, खुशमिजाज़ और उसके स्वभाव में एक तरह की फकीरी है. चूँकि कॉन्फ्रेंस शाम से शुरू होनी है तो मेरे पास अभी पूरा दिन है और आज इतवार है तो एंजेला की छुट्टी है. हमारी बातचीत जल्द ही पुरानी सहेलियों की सी बातचीत में बदल जाती है और एंजेला मुझे दिनभर घुमाने का दायत्व अपने सर ले लेती है. सबसे पहले हम लोकल सब्जीमंडी जाते हैं, वहां तम्बू के भीतर ताज़ी सब्जियां बड़े साफ़-सुथरे ढंग से ठेलियों पर लगी हैं. ग्वार की फलियाँ, बोक चोय, गोल व् लम्बी मूली, शलजम, करेला, लौकी, गोभी और कई तरह की समुद्री शैवाल हैं और एक ठेली में करीब बीस तरह के अंडे और कई तरह की सूखी मछलियां हैं. किनारे किनारे कुछ लोग जमीन पर चटाई  में बैठे कमल ककड़ी और कमल के दानों भरे हरे पॉड्स बेच रहे हैं और अन्य कमल कच्चे बीज निकालकर ढेरियां बना रहे हैं.  चीनी लोगों के अलावा इस बाज़ार में में अकेली परदेशी हूँ लेकिन लोगों का व्यवहार मित्रतापूर्ण है. वे मुझे कच्चे कमल के बीज खाने को देते हैं, जो वाकई स्वादिष्ट हैं, मैंने पहले कभी नहीं खाये थे. कई तरह के मून केक भी चखने को मिले, मैं उन्हें 'शी  शी' (शुक्रिया) कहती हूँ.  बाकी फिर बातचीत एंजेला की मध्यस्तता से या इशारों में होती है. एक तरह से लगता है कि भारत की ही किसी सब्जी मंडी में हूँ , शायद पिछले जमाने के निशातगंज में जब लखनऊ में फ्लाईओवर नहीं बने थे, या देहरादून के सब्जी मंडी-आढ़त बाज़ार में.                                                    
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 एंजेला अपनी एक दोस्त को फोन करती है कि वो उसके घर लंच पर एक इंडियन प्रोफ़ेसर को लेकर आ रही है. यूं मुझे यह बड़ा अटपटा लगता है कि एंजेला मेरे लिए बिना पूछे फैसला ले रही है. मैं उससे कहती हूँ कि वो अपनी दोस्त के यहाँ चली जाय और में वापस होटल में लंच करुँगी। लेकिन मेरी उसके आगे बहुत चलती नहीं है. इस तरह के उत्साह और भलमनसी पर मुझे कोई संदेह नहीं होता। कई दफे खुद मैंने अपने दुसरे दोस्तों के साथ इसी तरह अधिकार से फैसला लिया है. एक दफ़े हज़रतगंज में जर्मन प्रोफ़ेसर वेस्टहॉफ को पान खिलवाया है, जो उन्हें बहुत नहीं रुचिकर नहीं लगा, सुजाता फर्नाडीज जब मेरे साथ कुछ महीने लखनऊ में रहती थी तब भी क्या खाना पकेगा उसको लेकर अपनी सीमीत समझ और संसाधन पर फैसले लिए. जब मैं पहली दफ़े प्रेगनेंट थी तो हमारे घर में कई महीनों तक रोज कपली ही बनती थी, मेरे पति के पास कई दफे  दूसरा कोई चुनाव नहीं होता था सिवा कपली-भात खाने के. मेरे लिए भी एंजेला के सामने क्या चॉइस बची थी? 

लंच के लिए हम प्रोफ़ेसर जैस्मिन हू के घर पहुंचे। उनका चार कमरों का फ्लैट  वहीँ परिसर में एक बहुमंजिला इमारत के भीतर था. वहां शहर में इस तरह के फ्लैट की कीमत दस करोड़ के करीब होगी, लेकिन यूनिवर्सिटी ने अपने परिसर में इस तरह के फ्लैट शिक्षकों को सब्सिडी पर उपलब्ध करवाए हैं ताकि अच्छे से अच्छे अध्यापक यहाँ आ सकें और बहुत कम पैसे में यहाँ अपना स्थाई निवास बना सकें। खाना जैस्मिन के पति श्री सुन ने बनाया था. बल्कि जब हम वहां पहुंचे तो सुन रसोई में खाना बना ही रहे थे. उन्होंने हमारे लिए तिल की सीजनिंग में पका खरगोश का माँस, मछली, हरा साग और चिकन बनाया था. ब्रेड या चावल नहीं था, लेकिन यह सब थोड़ा-थोड़ा खाकर पेट भर गया. मुझे कुछ आश्चर्य हुआ कि खाने में चावल नहीं था, जबकि चावल चीन का सबसे प्रमुख खाद्यान्न है. मुझे यह बात कुछ दिनों बाद पता चली कि मेहमानों को चावल सबसे अंत में मांगने पर दिया जाता है या फिर नहीं दिया जाता है. चीन में मेहमान नवाज़ी के समय सबसे सस्ते और सुलभ चावल को सर्व नहीं किया जाता। बड़े रेस्टोरेंटों में भी यदि आपको चावल चाहिए तो विशेषरूप से कहना पड़ता है कि चावल पहले लाओ.          

किचन और घर के अन्य सभी कामों का जिम्मा सुन का था. जैस्मिन की तरह कई नौकरीपेशा स्त्रियां घर में काम नहीं करती और बहुत दफा घर के काम उनके मियां बिना किसी हिचक के संभाल  लेते हैं. सुन घर बैठे किसी कंपनी के लिए ज्यूलरी डिजायन का काम करते हैं और एक अन्य ट्रांसपोर्ट कंपनी में भी उनकी कुछ हिस्सेदारी है जिसके लिए वे महीने में चार-पांच दिन वूहान से बाहर जाते हैं. जैस्मिन यहाँ यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफ़ेसर हैं और विज्ञान के छात्रों को अंग्रेजी में शोधपत्र कैसे लिखे जाये इस बात की ट्रेनिंग देती है. वो साहित्य नहीं पढ़ती बल्कि छात्रों को GRE / Toffel की तयारी करवाती हैं. उनका पाठ्यक्रम विशेष रूप से कृषि वैज्ञानिकों को अंग्रेजी भाषा सिखाने का है और कई तरह के शोधपत्र ही पाठ्यपुष्तक की जगह पढ़ाये जाते हैं और शोध छात्रों और वैज्ञानिकों को शोधपत्र लिखने में मदद करती हैं.   इसी तरह एंजेला भी छात्रों को क्रॉस-कल्चरल संवाद के बारे में पढ़ाती हैं और छात्रों को दुनिया के अलग-अलग देशों में या अलग अलग लोगों के साथ काम करने के लिए तैयार करती है.  उन्हें कल्चरल साइकोलॉजी पढ़ती हैं. सो यहाँ का अंग्रेजी विभाग विशेष रूप से कृषि वैज्ञानिकों और कृषि के बिजनेस को सपोर्ट करने का काम करता है. 

एंजेला के बाद जैस्मिन हू मेरी दूसरी लोकल मित्र बनी. मित्रता जीवन में ऐसे ही आती है, अचानक से, उसको हासिल करने के लिए आपको कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती, सिवाय इसके की आप किसी अजनबी पर इंसानियत के नाते भरोसा करे, सतर्क रहे लेकिन डर और शक को ड्राइविंग सीट पर कभी न बिठाये।       

***   
  शाम को हम एक प्राचीन बौद्ध मंदिर गए. मंदिर के गेट पर हमें अगरबत्ती दी गई जिसे जलाकर एक राख से भरे आयाताकार तसले में रोप  देना था. मंदिर का स्थापत्य बहुत पुराना है, इसके बीचोबीच में एक तालाब है और चारो तरफ बगीचा।मंदिर में बुद्ध की ५०० सुनहरी प्रतिमाएँ हैं, और मंदिर की पूरी सजधज बरकरार है. बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियाँ  हर कमरे के कौनों में बैठे आने-जाने वालों पर निगाह रख रहे हैं और अपना दोपहर का भोजन भी कर रहे हैं. जहाँ भी जाती हूँ वो इंडिया-इंडिया करके मेरा स्वागत करते हैं और कई दफे खड़े होकर अपने स्टूल पर बैठने का आग्रह बड़ी आत्मीयता से करते हैं.  मैं बदलें में उनकी फोटो खींचकर उनको स्क्रीन पर दिखाती हूँ, हाथ मिलाती हूँ और आगे बढ़ जाती हूँ. साधारण लोगों के साथ ऐसी आत्मीयता मुझे अब तक एशिया के अलावा कहीं नहीं दिखी। इस तरह की सहज आत्मीयता की आप यूरोप और अमेरिका में कल्पना भी नहीं कर सकते। चीन में होते हुए भी मुझे लगता है जैसे अपनी ही धरती पर अपने ही लोगों के बीच हूँ. इस टूर में एंजेला लगातार एक गाइड के पीछे-पीछे चलती है और सुनती रहती है कि वो क्या बोल रहा है. मुझे चीनी समझ नहीं आती तो में स्वतंत्र रूप से चीज़ों को देख रही हूँ, कहीं कुछ अंग्रेजी में लिखा है तो उसको पढ़ती हूँ. हमने तय किया है कि यदि बिछड़ गए तो पांच बजे हम गेट पर मिलेंगे।   

मंदिर के विशिष्ट कक्षों में यानि प्रार्थनागृहों में बुद्ध की मूर्तियों के सामने पीली रेशम की गद्दियां राखी हुई हैं, श्रदालु इनपर घुटने टेककर बार बार नमन करते हैं, कुछ को देवता जैसा भी आ जा रहा है, वो कुछ बेसुध से झूम रहे हैं.  यह सब कुछ हद तक हास्यास्पद लगता है लेकिन मंदिर और बौद्ध परंपरा का मैं सम्मान करती हूँ।  घुटने टेकने की बजाय अपनी तरफ से हाथ जोड़कर मैं आगे बढ़ जाती हूँ.

कुछ देर बाद मुझे एक कक्ष में एंजेला बाकायदा घुटने टेके और बार बार नमन करती दिखती है. मैं उससे पूछती हूँ कि उसने यह नमन करना कहाँ से सीखा? वो कहती है "बस अभी-अभी, मैं इस मंदिर में जीवन में पहली बार आई हूँ"  

Mar 17, 2018

2015 चीन डायरी -01: पहला दिन

15  सितम्बर 2015
मुझे 5 अगस्त को 'इंटनेशनल राइस फंक्शनल जीनोमिक्स सिम्पोजियम' में  वू हान, चीन आने का निमंत्रण मिला लेकिन मेरे पासपोर्ट की मियाद कुछ महीनों में ख़त्म हुई जा रही थी. लिहाज़ा चीनी वीज़ा लेने से पहले नया पासपोर्ट बनवाने और फिर उसपर वीज़ा लगवाने में की भगदौड़ चली. जाने के 5  दिन पहले अब जब सब काम हो गया है तो तय हुआ कि अब जाना ही है.  चीन पहले कभी गई नहीं हूँ, वहां जाने की उत्सुकता हमेशा से रही है. कई मित्रो से सुनती आई हूँ कि भाषा न जानने के कारण उन्हें छोटी-छोटी चीज़ों की परेशानी होती है. सो मैं अपनी चीनी मित्र सिंडी के घर दो घंटे बैठी ये जानने को कि वू हान और बीजींग में क्या क्या देखा जा सकता है? खाने का ऑर्डर  कैसे दिया जाएगा,  रास्ता भूल जाने पर/ इमरजेंसी की हालत में अस्पताल पहुँचने के लिए क्या कहना चाहिए आदि. इस तरह कुछ पचास वाक्य चीनी, चिंग्लिश और अंग्रेजी में एक डायरी में लिखे.

पहले गिनती
1.   yi (यी)            6. lyu (ल्यू)                10. shi (श्रर)
2.  er (अर्र)            7. chi   (चि)               20. ershi (अशर)
3.  San (सन)         8. baa    (बा)             50. wu shi (वूअ: सः)
4. Si (स:)             9. jyo     (ज्यो)          100. yi bai (यि  बाई)
5. wu (वूअ:)

फिर कुछ वाक्य

१. टैक्सी कहाँ मिलेगी?  (chu zhu che di si?)
2. मेरा नाम सुषमा नैथानी है (wo de ming zhi jiao SN)
3. मैं रास्ता भटक गई हूँ, क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं ? (wo mi lu le. Ni neng go shu wo.
4. इसकी क्या कीमत है? (duo shao Qian?)
5. chicken (Ji Zou ke yi)
6. No beef (Bu Yao niu Zou)
7. Fish (yu ke yi)
8. pork (Bu Yao zhu Zou)
9. where can I get Breakfast? (Zhai na li ke yi zhao duo chan jing?)
10. I am sick/ not feeling well (wo Gan Jice sheng Bing Le)
11. I need to see a doctor (wo xu yao Dao yi yuan kan Bing).

कुछ इसी तरह जितना समझ में आया, सिंडी से २०-२५ बातें चीनी में लिखवायी. मेरे बैंक का क्रेडिट कार्ड चीन में काम नहीं करता इसीलिए कुछ करेंसी और चेकबुक रखी, 'ट्रिपल ए '  के ऑफिस से एक पुरुषों वाली, कई जेबों वाली ट्रेवेल जैकेट खरीदी, एक बैग में तीन जोड़ी कपडे रखे और चीन यात्रा की तैयारी पूरी हो गई.
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19 सितम्बर 2015
किसी समय रात को पोर्टलैंड के लिए बस पकड़ी, फिर वहां से सेन फ्रांसिस्को की फ़्लाइट सुबह छह बजे.  सेन फ्रांसिस्को एयरपोर्ट पर नाश्ता किया, वू  हान पहुँचने की इत्तिला कॉन्फ्रेंस संयोजको को इमेल की,  और आउटलुक में एक नया इमेल एड्रेस खोला, चूँकि चीन में जी-मेल और फेसबुक नहीं खुलते. सेन फ्रांसिस्को  से बीजिंग की  तेरह घंटे की फ़्लाइट थी,  सिद्वार्थ देब की 'द ब्यूटीफुल एंड द डैम्ड: ए पोट्रेट ऑफ़ द न्यू इंडिया' पढ़ती रही.  दिल्ली में फ़ाइव स्टार होटलों में वेट्रेस की नौकरी करती नार्थईस्ट की एस्थर,  दक्षिण की स्टील की फैक्ट्री में काम करते पूरबिया मज़दूर,  आत्महत्या और कर्ज़ के बीच झूलते किसानों के साथ-साथ सट्टेबाज़ों, ठेकेदारों, प्राइवेट एजुकेशन इंस्टिट्यूट के माफियाओं, और यूरोप-अमेरिका से वापस लौटे तथाकथित सफल लोगों के इंटरव्यू के ज़रिये ग्लोबलीज़ेशन के बाद के भारत का  दिलतोड़ कोलाज़ उभरता है, जिसमें तथाकथित विकास के चिथड़े किसी बंज़र में बगुलों से उड़ते हैं.  बीच बीच में आँख लगती,  फिर-फिर लौटती रही उसी किताब के भीतर,  स्वप्न और दुःस्वप्न के बीच. 

मेरे बगल की सीट खाली है और उसके बाद एक हमउम्र चीनी पुरुष बैठा है. पूरी यात्रा में हमारे बीच बस छोटी छोटी औपचारिक बात होती है. उसके लगभग सारे दांत पीले-भूरे और सड़े हुए हैं. हालांकि लगता है कि वह अमेरिका में किसी अच्छी नौकरी पर है. 12 घंटे की फ्लाइट में जितने समय भी यह बंदा जगा रहा लगातार फोन पर कोई वीडियो ही देखता रहा. उसे बीजिंग से आगे ग्यांग  सू  जाना है. 

चलते चलते सिंडी ने मुझे ईमेल पर एक डॉक्यूमेंट भेजा है जिसमें उन सब जगहों की सूची है जहाँ मुझे  वू  हान और बेजिंग में देखना है. चूँकि चीन में जीमेल नहीं खुलता तो फ़ोन से वो सब फिर डायरी में हाथ से कॉपी किया.  पहली बार चीनी लिखने की कोशिश की. लिखने के बाद मैंने बगल वाले को दिखाया  कि नक़ल ठीक हुई कि नहीं, उसने सहमति में सर हिलाया और फिर उसे पढ़कर शब्दों का सही उच्चारण बताया। मैंने वो उच्चारण हिंदी में लिखा। अभी तक सिर्फ एक चीनी शब्द को पहचान पा रही हूँ —तियन (天). 

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20 सितम्बर 2015
 शायद  मंगोलिया की सरहद से लगे पूरबी इलाके से मेरा हवाई जहाज़ चीन में दाखिल हुआ, बहुत देर तक धूसर, समतल, बंज़र, रेगिस्तानी इलाके के ऊपर उड़ता रहा. यह इलाका लगभग निर्जन है लेकिन बीच बीच में कोई सड़क दिखती है, लगभग बंजर और कुछ रेगिस्तानी इलाके में छोटे छोटे तालाब भी दिखे, लेकिन कुल मिलाकर कोई बस्ती या शहर नहीं दिखा. मेरे मन में हज़ारों साल पहले घोड़े दौड़ाते, ख़ानाबदोश, बर्बर, जाँबाज़ मंगोलों की छवि उभरती है.  इसके बाद फिर बहुत दूर तक खेती और बौनी पहाड़ियों का इलाका बीजिंग की सीमा तक दीखता रहा. मज़े की बात यह है कि यहाँ किसी भी पहाड़ी के ऊपर कोई ईमारत या बसावट नहीं है , लेकिन पहाड़ी के तल में यदि जरा भी कोई जगह है तो वहां बस्ती या कोई इमारत या गाँव जैसा दिखता है,  पहाड़ियों में सिर्फ जंगल ही हैं या फिर पानी को हार्वेस्ट करने के सयंत्र।फिर इसके बाद बीजिंग के बाहरी इलाके में समतल जमीन और तरतीब से बने खेतों और बागों का सिलसिला है, जिनमें मोनोक्रॉप न होकर मिश्रित खेती का सिलसिला है. फिर नदी, तालाब  के बाद घनी आबादी वाले बीजिंग शहर में हवाई जहाज दाखिल हुआ. जितना हो सकता है इस शहर को इस ऊंचाई से देखकर उसके बारे में कुछ स्थूल समझ बनाने की मुझे जल्दबाज़ी है.  बहुमंजिली इमारते, पुअर क्वार्टर्स सब ठसाठस भरे हुए हैं, लेकिन उनमें बेतरतीबी नहीं है, महानगर का यह लैंडस्केप प्लान्ड है, बहुत सी खेती की जगह, और हरी-भरी जगहें हैं. अलबत्ता अपार्टमेंट बिल्डिंग्स इस कदर सटी हैं कि देखकर दम घुटता है. कम से कम  हवाई जहाज़ से बच्चों के पार्क नहीं दीखते। फिलहाल सुबह से हवाई जहाज़ से जितना चीन दिखा उसे देखकर लगता है कि चीन असीम है, इसका एक नाख़ून बराबर भी मेरी पकड़ में आएगा मालूम नहीं !   

फ्लाइट में चीनी में जो एनाउंसमेंट  हो रहा है वो एक स्त्री स्वर में है, बात समझ में नहीं आती लेकिन उस लहजे में बहुत धैर्य और संगीत है, किसी तरह की जल्दबाज़ी  और बेचैनी नहीं है, और अंग्रेजी के उच्चारण का भी उसपर प्रभाव नहीं है. अंग्रेजी का एनाउंसमेंट  पुरुष स्वर में है, यह परफेक्ट अमेरिकन उच्चारण है पर रफ़्तार धीमी है, चीनी धैर्य उस स्वर में भी है.         

बीजिंग एयरपोर्ट के टॉयलेट में एक सूचनापट्ट है जिसमें लिखा है कि 'कमोड में चढ़कर न बैठे' . साथ ही बगल में इंडियन/इटालियन स्टाइल का टॉयलेट भी है, लेकिन दोनों जगह हाथ पोंछने के लिए पेपर गायब है.   एक चीनी महिला रेस्टरूम में खड़ी कोई पुरानी अंग्रेजी फिल्म देख रही है , वो एक कैबिनेट खोलकर दो-तीन नैपकिंस मेरे को पकड़ाती है. यह हूँ-ब-हू  हरकत कई दफे दिल्ली एयरपोर्ट पर भी देखी है. मालूम नहीं कि यह किफायत का आदेश ऊपर से है या फिर निचले दर्ज़े के कर्मचारियों का अपना कोई सबवर्सिव एक्ट भारत और चीन दोनों में समान है, और वो पेपर टॉवल का इस्तेमाल गैरज़रूरी समझते हैं. वैसे CNN की वेबसाइट पर चीन जाते समय अपने साथ टॉयलेट पेपर साथ रखने का सुझाव था.

मैं लाइन में कस्टम चेक के लिए प्रतीक्षा कर रही हूँ.  मुझे दो घंटे बाद 'वू हान'  की फ्लाइट पकड़नी है. बेजिंग एयरपोर्ट पर लगातार अंग्रेजी में एनाउंस हो रहा है कि यदि किसी विदेशी यात्री के पास पहले से ठहरने की सुविधा नहीं है तो वह इस सम्बन्ध में किसी बूथ पर जाकर मदद ले सकता है.
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वू हान पहुँचते हुए अब शाम हो गई है और मुझे घर से निकले २४ घंटे, अब लगता है किसी तरह ठिकाने पर पहुँच जाऊं और कुछ देर को नींद मिले। एयरपोर्ट के बाहर, जैसा तय था, मुझे लेने के लिए एक पीएचडी स्टूडेंट आया है,वो अपना अंग्रेजी नाम माइकल बताता है. मैं इस बात से खूब वाकिफ हूँ कि पिछली दो पीढ़ीयों से अधिकतर चीनी अंग्रेजी और एक चीनी नाम रखते हैं। कार एक खुशमिज़ाज महिला ड्राइवर चला रही है, वो बड़ी ख़ुशी से हाथ मिलाती है और "नी  हाउ " कहती है, उसके आगे हमारी बात माइकल की मध्यस्थता से ही होती है। रात में लगभग २ घंटे की ड्राइव के बाद हम 'इंटरनेशल एकेडेमिक एक्सचेंज सेंटर' पहुंचे जो  Huazhong Agriculture University के भीतर है.  वहां पहले से ३ अन्य विधार्थी मेरा इंतज़ार कर रहे थे और मेरे तरफ से होटल की रेसेप्सनिष्ट से बात कर रहे थे.  इस ओवर व्हेल्मिंग अस्सिस्टेंस से मुझे खीझ होती है, लेकिन फिर चारा भी क्या था ? होटल में एडवांस जमा करने के लिए मेरा क्रेडिट कार्ड काम नहीं किया इसीलिए जो जेबखर्च के पैसे थे उन्ही को जमा कर दिया।  इसके बाद अब मेरी जेब में सिर्फ 100 डॉलर के बराबर पैसे बचे हैं.  अब मुझे सुबह सबसे पहले बैंक खोजना होगा।  पांच लोग मेरे सर न चढ़े होते तो शायद में आखिरी दिन पेमेंट का ऑप्शन रखती। अब मुझे समझ में आया कि बीजिंग एयरपोर्ट पर होटल बुक करने के लिए मदद का काउंटर क्यों था. बहुत से होटलों में किसी भी कर्मचारी को अंग्रेजी नहीं आती और बातचीत मुश्किल हो जाती है.   

वैसे अपने तई सभी छात्र अच्छे और मिलनसार थे।  अपने नाम और फोन नंबर किसी जरूरत के लिए दे गए.  कमरे में पहुँच कर इत्मीनान की सांस ली  और मेहदी हसन की आवाज छन रही है कंप्यूटर से  
"अभी तो सुबह के माथे का रंग काला है 
अभी फरेब न खाओ बहुत अँधेरा है 
चरागे तूर  जलाओ बड़ा अँधेरा है "