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Mar 24, 2018

चीन डायरी-02: वूहान

21 सितम्बर 2015 


रात 2:30 बजे सर में तेज पीड़ा के साथ आँख खुली, घंटे भर कोशिश की लेकिन फिर नींद नहीं आई.  सुबह छह बजे जैसे ही उजाला हुआ यूनिवर्सिटी परिसर में टहलने के लिए निकल गई.  परिसर में सबसे पहले मुझे बड़ी तरतीब लाल ईंटों के खड़ंजे से बने क्वॉर्टर्स सड़क  के दोनों और दिखे जो यहाँ के कर्मचारियों और अध्यापकों के लिए बने थे. इन घरों के दरवाजे चौड़े और खूबसूरत हैं, और उनपर पेण्ट के ऊपर की पोलिश चमक रही है. फुटपाथ के दोनों तरफ करीने से फूल-पौधे और जातां से सहेजी झाड़ियाँ, और फ़्रांस से मॅगवाये हुए चिनार और पॉपलर के पेड़ हैं. यहाँ के नेटिव ओस्मेंथस के खूबसूरत पेड़ों पर इस समय सुगन्धित पीले फूल खिले हैं और वातावरण में उनकी उनकी सुगंध भरी हुई है. तापमान 25-28 डिग्री है, और सुबह हल्की सी धूंध है लेकिन यह शरद का सामान्य कोहरा ही प्रतीत होता है. एक छोटे से तालाब के किनारे एक चबूतरे पर कुछ बुजुर्ग मधुर संगीत के साथ डांस कर रहे हैं, इनमें से अधिकतर रिटायर हो चुके लोग हैं लेकिन सब फिट हैं, चुस्त दुरुस्त हैं. चीन में औरतों को ५५ वर्ष और मर्दों को ६० वर्ष में रिटायर कर दिया जाता है. प्रोफ़ेसर और बौद्धिकों को कई दफा उनकी विशेज्ञता के फिर से भी अगले दस वर्ष तक काम करने का मौका मिलता है. परिसर में ही एक अन्य जगह कुछ लोग सुबह सुबह 'ताई ची'  कर रहे हैं, और एक बड़े मैदान में बड़ी संख्या में विधार्थी मिलटरी की वेशभूषा में अपनी कवायद कर रहे हैं. बाद में मालूम चला कि यूनिवर्सिटी से डिग्री लेने के लिए प्राथमिक सैनिक शिक्षा हर विधार्थी के लिए जरूरी है.      

टहल कर  कमरे में लौटी तो दरवाजे के नीचे एक चिट मिली है कि  कैफे में सुबह ८ बजे से नाश्ता मिलेगा। सुबह नाश्ते में चाय-कॉफी पीने का रिवाज़ नहीं है, बल्कि सीधे पेट भरकर खाना खाने का रिवाज़ है. नाश्ता चीन, फ़ीलीपींस, और अन्य पूर्वी एशियाई देशों  में दिन का सबसे बड़ा भोजन होता है. चीनी लोगों के अनुसार नाश्ता राजा की तरह करना चाहिए, जितना अच्छा और ज्यादा से ज्यादा खा सको उतना खाना चाहिए। लंच रानी की तरह यानि कम लेकिन अच्छा आहार और रात का भोजन भिखारी की तरह बहुत कम मात्रा में करना चाहिए। दूसरी बात यह कि रोज एक ही समय पर भोजन करना चाहिए, उसमें बहुत आगे-पीछे की गुंजायश नहीं छोड़नी चाहिए। सो यहाँ नाश्ते मैं पचासियों तरह के व्यंजन है, बड़े-बड़े भगौनों में कमल ककड़ी का सूप, मछली का सूप, फर्मेन्टेड राइस सूप,  बाजरे का सूप और सोयबीन का दूध है, नमक और सिरके में डला बड़ा सुस्वादु खीरे का अचार है, कई तरह की हरी सब्जियाँ, बीफ, पोर्क, चिकन, बीन्स, तोफू, कई तरह की नूड्ल्स, भात और फ्रायड राइस हैं. कई तरह के भाप में पके 'मोंटो' बन हैं, और फलों में कच्चे खज़ूर, लीची, तरबूज़ और कई तरह के संतरे हैं. आमतौर पर डेजर्ट में कुछ नहीं। चीनी लोग अब भी सुगर  का बहुत कम इस्तेमाल करते हैं. इस सबके बीच कहीं पानी का नामोंनिशाँ नहीं है. लेमोनेड है वो भी गरम और पानी भी गरम. मैं काफी देर तक बैरे से ठंडा पानी मांगती रही, उसे मेरी बात समझ नहीं आई तो फिर एक लड़की को बुलाकर लाया फिर उसे भी समझ में नहीं आया तो एक प्याले में गरम पानी लेकर आ गई. यह सब तमाशा चल ही रहा था कि  तब तक मेरे एक पुराने परिचित डेविड हू  हॉल में दाखिल हुए और मेरी मदद को आये. डेविड ताइवानी हैं तो उनको चीनी भाषा में समझाते हैं कि पानी की एक ठंडी बोतल फ्रिज से निकाल कर लाओ.  

नाश्ते की टेबल पर ही मुझे अंग्रेजी और भाषा विज्ञान की प्रोफ़ेसर एंजेला मिली, उनका असली नाम जेमयई स्या हैं. एंजेला सुन-यात-सेन यूनिवर्सिटी से रिटायर होकर अब हुआजहोंग एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में पढ़ाने आई हैं. एंजेला की उम्र 65 के आसपास है, वह बहुत फिट, खुशमिजाज़ और उसके स्वभाव में एक तरह की फकीरी है. चूँकि कॉन्फ्रेंस शाम से शुरू होनी है तो मेरे पास अभी पूरा दिन है और आज इतवार है तो एंजेला की छुट्टी है. हमारी बातचीत जल्द ही पुरानी सहेलियों की सी बातचीत में बदल जाती है और एंजेला मुझे दिनभर घुमाने का दायत्व अपने सर ले लेती है. सबसे पहले हम लोकल सब्जीमंडी जाते हैं, वहां तम्बू के भीतर ताज़ी सब्जियां बड़े साफ़-सुथरे ढंग से ठेलियों पर लगी हैं. ग्वार की फलियाँ, बोक चोय, गोल व् लम्बी मूली, शलजम, करेला, लौकी, गोभी और कई तरह की समुद्री शैवाल हैं और एक ठेली में करीब बीस तरह के अंडे और कई तरह की सूखी मछलियां हैं. किनारे किनारे कुछ लोग जमीन पर चटाई  में बैठे कमल ककड़ी और कमल के दानों भरे हरे पॉड्स बेच रहे हैं और अन्य कमल कच्चे बीज निकालकर ढेरियां बना रहे हैं.  चीनी लोगों के अलावा इस बाज़ार में में अकेली परदेशी हूँ लेकिन लोगों का व्यवहार मित्रतापूर्ण है. वे मुझे कच्चे कमल के बीज खाने को देते हैं, जो वाकई स्वादिष्ट हैं, मैंने पहले कभी नहीं खाये थे. कई तरह के मून केक भी चखने को मिले, मैं उन्हें 'शी  शी' (शुक्रिया) कहती हूँ.  बाकी फिर बातचीत एंजेला की मध्यस्तता से या इशारों में होती है. एक तरह से लगता है कि भारत की ही किसी सब्जी मंडी में हूँ , शायद पिछले जमाने के निशातगंज में जब लखनऊ में फ्लाईओवर नहीं बने थे, या देहरादून के सब्जी मंडी-आढ़त बाज़ार में.                                                    
****
 एंजेला अपनी एक दोस्त को फोन करती है कि वो उसके घर लंच पर एक इंडियन प्रोफ़ेसर को लेकर आ रही है. यूं मुझे यह बड़ा अटपटा लगता है कि एंजेला मेरे लिए बिना पूछे फैसला ले रही है. मैं उससे कहती हूँ कि वो अपनी दोस्त के यहाँ चली जाय और में वापस होटल में लंच करुँगी। लेकिन मेरी उसके आगे बहुत चलती नहीं है. इस तरह के उत्साह और भलमनसी पर मुझे कोई संदेह नहीं होता। कई दफे खुद मैंने अपने दुसरे दोस्तों के साथ इसी तरह अधिकार से फैसला लिया है. एक दफ़े हज़रतगंज में जर्मन प्रोफ़ेसर वेस्टहॉफ को पान खिलवाया है, जो उन्हें बहुत नहीं रुचिकर नहीं लगा, सुजाता फर्नाडीज जब मेरे साथ कुछ महीने लखनऊ में रहती थी तब भी क्या खाना पकेगा उसको लेकर अपनी सीमीत समझ और संसाधन पर फैसले लिए. जब मैं पहली दफ़े प्रेगनेंट थी तो हमारे घर में कई महीनों तक रोज कपली ही बनती थी, मेरे पति के पास कई दफे  दूसरा कोई चुनाव नहीं होता था सिवा कपली-भात खाने के. मेरे लिए भी एंजेला के सामने क्या चॉइस बची थी? 

लंच के लिए हम प्रोफ़ेसर जैस्मिन हू के घर पहुंचे। उनका चार कमरों का फ्लैट  वहीँ परिसर में एक बहुमंजिला इमारत के भीतर था. वहां शहर में इस तरह के फ्लैट की कीमत दस करोड़ के करीब होगी, लेकिन यूनिवर्सिटी ने अपने परिसर में इस तरह के फ्लैट शिक्षकों को सब्सिडी पर उपलब्ध करवाए हैं ताकि अच्छे से अच्छे अध्यापक यहाँ आ सकें और बहुत कम पैसे में यहाँ अपना स्थाई निवास बना सकें। खाना जैस्मिन के पति श्री सुन ने बनाया था. बल्कि जब हम वहां पहुंचे तो सुन रसोई में खाना बना ही रहे थे. उन्होंने हमारे लिए तिल की सीजनिंग में पका खरगोश का माँस, मछली, हरा साग और चिकन बनाया था. ब्रेड या चावल नहीं था, लेकिन यह सब थोड़ा-थोड़ा खाकर पेट भर गया. मुझे कुछ आश्चर्य हुआ कि खाने में चावल नहीं था, जबकि चावल चीन का सबसे प्रमुख खाद्यान्न है. मुझे यह बात कुछ दिनों बाद पता चली कि मेहमानों को चावल सबसे अंत में मांगने पर दिया जाता है या फिर नहीं दिया जाता है. चीन में मेहमान नवाज़ी के समय सबसे सस्ते और सुलभ चावल को सर्व नहीं किया जाता। बड़े रेस्टोरेंटों में भी यदि आपको चावल चाहिए तो विशेषरूप से कहना पड़ता है कि चावल पहले लाओ.          

किचन और घर के अन्य सभी कामों का जिम्मा सुन का था. जैस्मिन की तरह कई नौकरीपेशा स्त्रियां घर में काम नहीं करती और बहुत दफा घर के काम उनके मियां बिना किसी हिचक के संभाल  लेते हैं. सुन घर बैठे किसी कंपनी के लिए ज्यूलरी डिजायन का काम करते हैं और एक अन्य ट्रांसपोर्ट कंपनी में भी उनकी कुछ हिस्सेदारी है जिसके लिए वे महीने में चार-पांच दिन वूहान से बाहर जाते हैं. जैस्मिन यहाँ यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफ़ेसर हैं और विज्ञान के छात्रों को अंग्रेजी में शोधपत्र कैसे लिखे जाये इस बात की ट्रेनिंग देती है. वो साहित्य नहीं पढ़ती बल्कि छात्रों को GRE / Toffel की तयारी करवाती हैं. उनका पाठ्यक्रम विशेष रूप से कृषि वैज्ञानिकों को अंग्रेजी भाषा सिखाने का है और कई तरह के शोधपत्र ही पाठ्यपुष्तक की जगह पढ़ाये जाते हैं और शोध छात्रों और वैज्ञानिकों को शोधपत्र लिखने में मदद करती हैं.   इसी तरह एंजेला भी छात्रों को क्रॉस-कल्चरल संवाद के बारे में पढ़ाती हैं और छात्रों को दुनिया के अलग-अलग देशों में या अलग अलग लोगों के साथ काम करने के लिए तैयार करती है.  उन्हें कल्चरल साइकोलॉजी पढ़ती हैं. सो यहाँ का अंग्रेजी विभाग विशेष रूप से कृषि वैज्ञानिकों और कृषि के बिजनेस को सपोर्ट करने का काम करता है. 

एंजेला के बाद जैस्मिन हू मेरी दूसरी लोकल मित्र बनी. मित्रता जीवन में ऐसे ही आती है, अचानक से, उसको हासिल करने के लिए आपको कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती, सिवाय इसके की आप किसी अजनबी पर इंसानियत के नाते भरोसा करे, सतर्क रहे लेकिन डर और शक को ड्राइविंग सीट पर कभी न बिठाये।       

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  शाम को हम एक प्राचीन बौद्ध मंदिर गए. मंदिर के गेट पर हमें अगरबत्ती दी गई जिसे जलाकर एक राख से भरे आयाताकार तसले में रोप  देना था. मंदिर का स्थापत्य बहुत पुराना है, इसके बीचोबीच में एक तालाब है और चारो तरफ बगीचा।मंदिर में बुद्ध की ५०० सुनहरी प्रतिमाएँ हैं, और मंदिर की पूरी सजधज बरकरार है. बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियाँ  हर कमरे के कौनों में बैठे आने-जाने वालों पर निगाह रख रहे हैं और अपना दोपहर का भोजन भी कर रहे हैं. जहाँ भी जाती हूँ वो इंडिया-इंडिया करके मेरा स्वागत करते हैं और कई दफे खड़े होकर अपने स्टूल पर बैठने का आग्रह बड़ी आत्मीयता से करते हैं.  मैं बदलें में उनकी फोटो खींचकर उनको स्क्रीन पर दिखाती हूँ, हाथ मिलाती हूँ और आगे बढ़ जाती हूँ. साधारण लोगों के साथ ऐसी आत्मीयता मुझे अब तक एशिया के अलावा कहीं नहीं दिखी। इस तरह की सहज आत्मीयता की आप यूरोप और अमेरिका में कल्पना भी नहीं कर सकते। चीन में होते हुए भी मुझे लगता है जैसे अपनी ही धरती पर अपने ही लोगों के बीच हूँ. इस टूर में एंजेला लगातार एक गाइड के पीछे-पीछे चलती है और सुनती रहती है कि वो क्या बोल रहा है. मुझे चीनी समझ नहीं आती तो में स्वतंत्र रूप से चीज़ों को देख रही हूँ, कहीं कुछ अंग्रेजी में लिखा है तो उसको पढ़ती हूँ. हमने तय किया है कि यदि बिछड़ गए तो पांच बजे हम गेट पर मिलेंगे।   

मंदिर के विशिष्ट कक्षों में यानि प्रार्थनागृहों में बुद्ध की मूर्तियों के सामने पीली रेशम की गद्दियां राखी हुई हैं, श्रदालु इनपर घुटने टेककर बार बार नमन करते हैं, कुछ को देवता जैसा भी आ जा रहा है, वो कुछ बेसुध से झूम रहे हैं.  यह सब कुछ हद तक हास्यास्पद लगता है लेकिन मंदिर और बौद्ध परंपरा का मैं सम्मान करती हूँ।  घुटने टेकने की बजाय अपनी तरफ से हाथ जोड़कर मैं आगे बढ़ जाती हूँ.

कुछ देर बाद मुझे एक कक्ष में एंजेला बाकायदा घुटने टेके और बार बार नमन करती दिखती है. मैं उससे पूछती हूँ कि उसने यह नमन करना कहाँ से सीखा? वो कहती है "बस अभी-अभी, मैं इस मंदिर में जीवन में पहली बार आई हूँ"  

Mar 17, 2018

2015 चीन डायरी -01: पहला दिन

15  सितम्बर 2015
मुझे 5 अगस्त को 'इंटनेशनल राइस फंक्शनल जीनोमिक्स सिम्पोजियम' में  वू हान, चीन आने का निमंत्रण मिला लेकिन मेरे पासपोर्ट की मियाद कुछ महीनों में ख़त्म हुई जा रही थी. लिहाज़ा चीनी वीज़ा लेने से पहले नया पासपोर्ट बनवाने और फिर उसपर वीज़ा लगवाने में की भगदौड़ चली. जाने के 5  दिन पहले अब जब सब काम हो गया है तो तय हुआ कि अब जाना ही है.  चीन पहले कभी गई नहीं हूँ, वहां जाने की उत्सुकता हमेशा से रही है. कई मित्रो से सुनती आई हूँ कि भाषा न जानने के कारण उन्हें छोटी-छोटी चीज़ों की परेशानी होती है. सो मैं अपनी चीनी मित्र सिंडी के घर दो घंटे बैठी ये जानने को कि वू हान और बीजींग में क्या क्या देखा जा सकता है? खाने का ऑर्डर  कैसे दिया जाएगा,  रास्ता भूल जाने पर/ इमरजेंसी की हालत में अस्पताल पहुँचने के लिए क्या कहना चाहिए आदि. इस तरह कुछ पचास वाक्य चीनी, चिंग्लिश और अंग्रेजी में एक डायरी में लिखे.

पहले गिनती
1.   yi (यी)            6. lyu (ल्यू)                10. shi (श्रर)
2.  er (अर्र)            7. chi   (चि)               20. ershi (अशर)
3.  San (सन)         8. baa    (बा)             50. wu shi (वूअ: सः)
4. Si (स:)             9. jyo     (ज्यो)          100. yi bai (यि  बाई)
5. wu (वूअ:)

फिर कुछ वाक्य

१. टैक्सी कहाँ मिलेगी?  (chu zhu che di si?)
2. मेरा नाम सुषमा नैथानी है (wo de ming zhi jiao SN)
3. मैं रास्ता भटक गई हूँ, क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं ? (wo mi lu le. Ni neng go shu wo.
4. इसकी क्या कीमत है? (duo shao Qian?)
5. chicken (Ji Zou ke yi)
6. No beef (Bu Yao niu Zou)
7. Fish (yu ke yi)
8. pork (Bu Yao zhu Zou)
9. where can I get Breakfast? (Zhai na li ke yi zhao duo chan jing?)
10. I am sick/ not feeling well (wo Gan Jice sheng Bing Le)
11. I need to see a doctor (wo xu yao Dao yi yuan kan Bing).

कुछ इसी तरह जितना समझ में आया, सिंडी से २०-२५ बातें चीनी में लिखवायी. मेरे बैंक का क्रेडिट कार्ड चीन में काम नहीं करता इसीलिए कुछ करेंसी और चेकबुक रखी, 'ट्रिपल ए '  के ऑफिस से एक पुरुषों वाली, कई जेबों वाली ट्रेवेल जैकेट खरीदी, एक बैग में तीन जोड़ी कपडे रखे और चीन यात्रा की तैयारी पूरी हो गई.
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19 सितम्बर 2015
किसी समय रात को पोर्टलैंड के लिए बस पकड़ी, फिर वहां से सेन फ्रांसिस्को की फ़्लाइट सुबह छह बजे.  सेन फ्रांसिस्को एयरपोर्ट पर नाश्ता किया, वू  हान पहुँचने की इत्तिला कॉन्फ्रेंस संयोजको को इमेल की,  और आउटलुक में एक नया इमेल एड्रेस खोला, चूँकि चीन में जी-मेल और फेसबुक नहीं खुलते. सेन फ्रांसिस्को  से बीजिंग की  तेरह घंटे की फ़्लाइट थी,  सिद्वार्थ देब की 'द ब्यूटीफुल एंड द डैम्ड: ए पोट्रेट ऑफ़ द न्यू इंडिया' पढ़ती रही.  दिल्ली में फ़ाइव स्टार होटलों में वेट्रेस की नौकरी करती नार्थईस्ट की एस्थर,  दक्षिण की स्टील की फैक्ट्री में काम करते पूरबिया मज़दूर,  आत्महत्या और कर्ज़ के बीच झूलते किसानों के साथ-साथ सट्टेबाज़ों, ठेकेदारों, प्राइवेट एजुकेशन इंस्टिट्यूट के माफियाओं, और यूरोप-अमेरिका से वापस लौटे तथाकथित सफल लोगों के इंटरव्यू के ज़रिये ग्लोबलीज़ेशन के बाद के भारत का  दिलतोड़ कोलाज़ उभरता है, जिसमें तथाकथित विकास के चिथड़े किसी बंज़र में बगुलों से उड़ते हैं.  बीच बीच में आँख लगती,  फिर-फिर लौटती रही उसी किताब के भीतर,  स्वप्न और दुःस्वप्न के बीच. 

मेरे बगल की सीट खाली है और उसके बाद एक हमउम्र चीनी पुरुष बैठा है. पूरी यात्रा में हमारे बीच बस छोटी छोटी औपचारिक बात होती है. उसके लगभग सारे दांत पीले-भूरे और सड़े हुए हैं. हालांकि लगता है कि वह अमेरिका में किसी अच्छी नौकरी पर है. 12 घंटे की फ्लाइट में जितने समय भी यह बंदा जगा रहा लगातार फोन पर कोई वीडियो ही देखता रहा. उसे बीजिंग से आगे ग्यांग  सू  जाना है. 

चलते चलते सिंडी ने मुझे ईमेल पर एक डॉक्यूमेंट भेजा है जिसमें उन सब जगहों की सूची है जहाँ मुझे  वू  हान और बेजिंग में देखना है. चूँकि चीन में जीमेल नहीं खुलता तो फ़ोन से वो सब फिर डायरी में हाथ से कॉपी किया.  पहली बार चीनी लिखने की कोशिश की. लिखने के बाद मैंने बगल वाले को दिखाया  कि नक़ल ठीक हुई कि नहीं, उसने सहमति में सर हिलाया और फिर उसे पढ़कर शब्दों का सही उच्चारण बताया। मैंने वो उच्चारण हिंदी में लिखा। अभी तक सिर्फ एक चीनी शब्द को पहचान पा रही हूँ —तियन (天).   

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20 सितम्बर 2015
 शायद  मंगोलिया की सरहद से लगे पूरबी इलाके से मेरा हवाई जहाज़ चीन में दाखिल हुआ, बहुत देर तक धूसर, समतल, बंज़र, रेगिस्तानी इलाके के ऊपर उड़ता रहा. यह इलाका लगभग निर्जन है लेकिन बीच बीच में कोई सड़क दिखती है, लगभग बंजर और कुछ रेगिस्तानी इलाके में छोटे छोटे तालाब भी दिखे, लेकिन कुल मिलाकर कोई बस्ती या शहर नहीं दिखा. मेरे मन में हज़ारों साल पहले घोड़े दौड़ाते, ख़ानाबदोश, बर्बर, जाँबाज़ मंगोलों की छवि उभरती है.  इसके बाद फिर बहुत दूर तक खेती और बौनी पहाड़ियों का इलाका बीजिंग की सीमा तक दीखता रहा. मज़े की बात यह है कि यहाँ किसी भी पहाड़ी के ऊपर कोई ईमारत या बसावट नहीं है , लेकिन पहाड़ी के तल में यदि जरा भी कोई जगह है तो वहां बस्ती या कोई इमारत या गाँव जैसा दिखता है,  पहाड़ियों में सिर्फ जंगल ही हैं या फिर पानी को हार्वेस्ट करने के सयंत्र।फिर इसके बाद बीजिंग के बाहरी इलाके में समतल जमीन और तरतीब से बने खेतों और बागों का सिलसिला है, जिनमें मोनोक्रॉप न होकर मिश्रित खेती का सिलसिला है. फिर नदी, तालाब  के बाद घनी आबादी वाले बीजिंग शहर में हवाई जहाज दाखिल हुआ. जितना हो सकता है इस शहर को इस ऊंचाई से देखकर उसके बारे में कुछ स्थूल समझ बनाने की मुझे जल्दबाज़ी है.  बहुमंजिली इमारते, पुअर क्वार्टर्स सब ठसाठस भरे हुए हैं, लेकिन उनमें बेतरतीबी नहीं है, महानगर का यह लैंडस्केप प्लान्ड है, बहुत सी खेती की जगह, और हरी-भरी जगहें हैं. अलबत्ता अपार्टमेंट बिल्डिंग्स इस कदर सटी हैं कि देखकर दम घुटता है. कम से कम  हवाई जहाज़ से बच्चों के पार्क नहीं दीखते। फिलहाल सुबह से हवाई जहाज़ से जितना चीन दिखा उसे देखकर लगता है कि चीन असीम है, इसका एक नाख़ून बराबर भी मेरी पकड़ में आएगा मालूम नहीं !   

फ्लाइट में चीनी में जो एनाउंसमेंट  हो रहा है वो एक स्त्री स्वर में है, बात समझ में नहीं आती लेकिन उस लहजे में बहुत धैर्य और संगीत है, किसी तरह की जल्दबाज़ी  और बेचैनी नहीं है, और अंग्रेजी के उच्चारण का भी उसपर प्रभाव नहीं है. अंग्रेजी का एनाउंसमेंट  पुरुष स्वर में है, यह परफेक्ट अमेरिकन उच्चारण है पर रफ़्तार धीमी है, चीनी धैर्य उस स्वर में भी है.         

बीजिंग एयरपोर्ट के टॉयलेट में एक सूचनापट्ट है जिसमें लिखा है कि 'कमोड में चढ़कर न बैठे' . साथ ही बगल में इंडियन/इटालियन स्टाइल का टॉयलेट भी है, लेकिन दोनों जगह हाथ पोंछने के लिए पेपर गायब है.   एक चीनी महिला रेस्टरूम में खड़ी कोई पुरानी अंग्रेजी फिल्म देख रही है , वो एक कैबिनेट खोलकर दो-तीन नैपकिंस मेरे को पकड़ाती है. यह हूँ-ब-हू  हरकत कई दफे दिल्ली एयरपोर्ट पर भी देखी है. मालूम नहीं कि यह किफायत का आदेश ऊपर से है या फिर निचले दर्ज़े के कर्मचारियों का अपना कोई सबवर्सिव एक्ट भारत और चीन दोनों में समान है, और वो पेपर टॉवल का इस्तेमाल गैरज़रूरी समझते हैं. वैसे CNN की वेबसाइट पर चीन जाते समय अपने साथ टॉयलेट पेपर साथ रखने का सुझाव था.

मैं लाइन में कस्टम चेक के लिए प्रतीक्षा कर रही हूँ.  मुझे दो घंटे बाद 'वू हान'  की फ्लाइट पकड़नी है. बेजिंग एयरपोर्ट पर लगातार अंग्रेजी में एनाउंस हो रहा है कि यदि किसी विदेशी यात्री के पास पहले से ठहरने की सुविधा नहीं है तो वह इस सम्बन्ध में किसी बूथ पर जाकर मदद ले सकता है.
***

वू हान पहुँचते हुए अब शाम हो गई है और मुझे घर से निकले २४ घंटे, अब लगता है किसी तरह ठिकाने पर पहुँच जाऊं और कुछ देर को नींद मिले। एयरपोर्ट के बाहर, जैसा तय था, मुझे लेने के लिए एक पीएचडी स्टूडेंट आया है,वो अपना अंग्रेजी नाम माइकल बताता है. मैं इस बात से खूब वाकिफ हूँ कि पिछली दो पीढ़ीयों से अधिकतर चीनी अंग्रेजी और एक चीनी नाम रखते हैं। कार एक खुशमिज़ाज महिला ड्राइवर चला रही है, वो बड़ी ख़ुशी से हाथ मिलाती है और "नी  हाउ " कहती है, उसके आगे हमारी बात माइकल की मध्यस्थता से ही होती है। रात में लगभग २ घंटे की ड्राइव के बाद हम 'इंटरनेशल एकेडेमिक एक्सचेंज सेंटर' पहुंचे जो  Huazhong Agriculture University के भीतर है.  वहां पहले से ३ अन्य विधार्थी मेरा इंतज़ार कर रहे थे और मेरे तरफ से होटल की रेसेप्सनिष्ट से बात कर रहे थे.  इस ओवर व्हेल्मिंग अस्सिस्टेंस से मुझे खीझ होती है, लेकिन फिर चारा भी क्या था ? होटल में एडवांस जमा करने के लिए मेरा क्रेडिट कार्ड काम नहीं किया इसीलिए जो जेबखर्च के पैसे थे उन्ही को जमा कर दिया।  इसके बाद अब मेरी जेब में सिर्फ 100 डॉलर के बराबर पैसे बचे हैं.  अब मुझे सुबह सबसे पहले बैंक खोजना होगा।  पांच लोग मेरे सर न चढ़े होते तो शायद में आखिरी दिन पेमेंट का ऑप्शन रखती। अब मुझे समझ में आया कि बीजिंग एयरपोर्ट पर होटल बुक करने के लिए मदद का काउंटर क्यों था. बहुत से होटलों में किसी भी कर्मचारी को अंग्रेजी नहीं आती और बातचीत मुश्किल हो जाती है.   

वैसे अपने तई सभी छात्र अच्छे और मिलनसार थे।  अपने नाम और फोन नंबर किसी जरूरत के लिए दे गए.  कमरे में पहुँच कर इत्मीनान की सांस ली  और मेहदी हसन की आवाज छन रही है कंप्यूटर से  
"अभी तो सुबह के माथे का रंग काला है 
अभी फरेब न खाओ बहुत अँधेरा है 
चरागे तूर  जलाओ बड़ा अँधेरा है "       

Apr 4, 2017

यूजेनिक्स पर दो बातें


1883 में डार्विन की मौत के एक साल बाद उनके फूफेरे भाई फ़्रांसिस गेलटन ने एक विवादास्पद किताब ‘इनक़्वारिज इनटू ह्यूमन फ़ैकल्टी एंड इट्स डेवलपमेंट’ प्रकाशित की जिसमें उन्होंने प्रस्ताव रखा कि जिस तरह से नेचुरल सेलेक्सन में जीवों की छँटाई हो जाती है, यदि उसी तरह समाज के बीच से सिर्फ़ वांछित लक्षणों वाले लोगों को छाँटकर उनकी संतति को आगे बढ़ाया जाय तो मनुष्यजाति का स्टॉक इमप्रूवमेंट भी हो सकता है. इस नई सायंस के लिए गेलटन ने ‘यूजेनिक्स’ शब्द का इस्तेमाल किया. चूँकि समाज में ज़बरन थोपी हुई मेचमेकिंग नहीं हो सकती, इसीलिए विशेषकर जर्मनी और अमरीका में कुछ लोगों ने संस्थागत तरीक़े से दुर्बल, अपाहिज, अल्पबुद्धि लोगों को समाज के बीच से हटाने की और उनके बंध्यकरण (नसबंदी) की सिफ़ारिश की. 1909 में गेलटन ने ‘यूजेनिक्स रिव्यू’ जर्नल शुरू किया जिसका मक़सद सलेक्टिव बंध्यकरण और सेलेक्टिव ब्रीडिंग के अध्ययनों को सपोर्ट करना था. 1910 में अमेरिकी वैज्ञानिक चार्ल्स डेवेनपोर्ट ने ‘यूजेनिक्स रिकोर्ड ऑफ़िस’ की स्थापना की और 1911 के बाद डेवेनपोर्ट की लिखी यूजेनिक्स पर केंद्रित पाठ्यपुष्तक अमेरिकी कोलेजों में पढ़ाई जाने लगी. साथ ही सोसायटी के इमप्रूवमेंट और मानव जीन पूल की शुद्धि के नाम पर अल्पबुद्धि, अवसादग्रस्त, अपराधी, और शारीरिक अक्षमताओं वाले लोगों को शहर के बाहर स्पेशल कैम्प में नसबंदी के लिए भेजा जाने लगा. यूजेनिक्स को लेकर उत्साह के चलते 1920 के बाद से अमेरिका में बेबी शो, कुत्ते, बिल्ली इत्यादि के शो आयोजित होने लगे जिनमें सबसे हस्टपुष्ट बच्चों और जानवरों के शरीर की जाँच और नापजोख करके उनमें से सबसे फ़िट को इनाम दिया जाता है. जर्मनी की नात्सी सरकार ने अमेरिका से दो हाथ आगे बढ़कर यूजेनिक्स के तहत रेस हायजीन का कार्यक्रम चलाया, जिसमें शुरुआत नसबंदी से हुई, फिर तीन साल से कम उम्र के अपाहिज बच्चों का सफ़ाया किया गया, और आख़िर में समाज के बीच से यहूदियों को निकालकर यातनाशिविरों में क़ैद किया गया, अनगिनत जनसंहारों को अंजाम दिया. इन सब कामों को करने के लिए उन्होंने जेनेटिक्स की भाषा और शब्दावली का इस्तेमाल किया. जेनेटिक्स के सिद्धांतों को अमल में लाकर जर्मन सुपररेस बनाने के सपने पालने लगे. इस आपाधापी में, बीसवीं सदी के लगभग पचास वर्ष निकल गए लेकिन नात्सी जर्मनी और उसके बाहर चल रहे यूजेनिक्स के प्रयोगों ने जेनेटिक्स की समझ में कोई इज़ाफ़ा नहीं किया. यातना शिविरों में किए गये हज़ारों अमानवीय प्रयोगों से कोई डिस्कवरी नहीं हुई. चूँकि अधिकांश मानवीय लक्षण जैसे शारीरिक फ़िटनेस, सुंदरता, इंटेलीजेंस, इत्यादि जिन पर यूजेनिक्स का विचार टिका था उन्हें कई जीन निर्धारित करते हैं, और ये सिर्फ़ ज़ींस का मामला नहीं है, बहुत कुछ सबजेक्टिव मामला भी है कि सुंदरता और बुद्धि को कौन कैसे परिभाषित करता है, कौन मानदंड बनाता है. ये सभी लक्षण जींस के अलावा समाजीकरण, समाज के बीच व्यक्ति / परिवार की हैसियत, अवसरों और प्रिवलेज होने न होने से भी तय होते हैं. अत: जेनेटिक क्रॉसिंग मात्र से ये मामले सुलझ नहीं सकते है.

एक तरह से देखें तो सुंदरता, बुद्धि, जेनेटिक फ़िटनेस कोई एबसोल्यूट चीज़ नहीं है, सुंदरता, और बुद्धि पर कई बहसें पब्लिक डोमेन में हैं, इसीलिए उन्हें यहाँ दोहराने की ज़रूरत नहीं है. जेनेटिक फ़िटनेस को अक्सर एबसोल्यूट मान लिया जाता है, लेकिन अगर इवोल्यूश्नरी बॉयोलोज़ी से कोई सबक़ मिलता है तो यही कि जेनेटिक फ़िटनेस भी तुलनात्मक और परिस्थितिजन्य मामला है. एक स्थिति में जो लक्षण फ़िट होता है, दूसरी में मिसफ़िट हो सकता है. डार्विन की फ़िंच का मामला सर्व विदित है, एक द्वीप में लम्बी चोंच चिड़िया के काम की होती है तो दूसरी जगह छोटी और मज़बूत. जैसे कि पहले भी ज़िक्र किया गया है कि सिकल सेल और थेलेसीमिया से ग्रसित लोगों की मलेरिया से बचने की क्षमता स्वस्थ लोगों की अपेक्षा ज़्यादा होती हैं (जब दवा न हो). तो एक स्थिति में जो शाप है, दूसरी स्थिति में वरदान है. अफ़्रीका की धूप में काला रंग जो मेलेनिन पिग्मेंट की अधिकता के कारण बनता है, लोगों के लिए नेचुरल सनस्क्रीन है, वहीं ठंडे देशों में जहाँ सूरज नहीं निकलता वहाँ काली त्वचा में विटामिन ‘डी’ कम बनता है. गोरी त्वचा अफ़्रीका का तापमान और रोशनी नहीं झेल सकती, लेकिन ठंडे प्रदेशों में ज़रा सी सूरज की रोशनी के साथ अडेप्ट कर लेती है. इसीलिए इवोल्यूशन की प्रक्रिया अंधी है, उसका कोई मक़सद नहीं है, उसे किसी भी नियत मंज़िल तक नहीं पहुँचना है. आज जिस तरह का लक्षण सेलेक्ट हो रहा है बहुत सम्भव है कि हज़ार या लाख साल बाद की परिस्थिति में ठीक इसका उल्टा हो. एक समय हज़ारों लाखों वर्षों तक डायनोसोर, वूली मैमथ, सेबर-टूथ टाइगर सब धरती पर विचरते थे, आज सब विलुप्त हो गये हैं. इस बड़े इवोल्यूश्नरी स्केल में मानव का अस्तित्व सिर्फ़ कुछ सेकंड का है, इसीलिए उसे प्रकृति की सर्वोत्तम रचना समझना भूल है. आज की समझ से छाँटकर मानव समाज का स्टॉक इमप्रूवमेंट कर लिया जाय या स्पीशीज के जीन पूल की शुद्धि कर ली जाय तो वो आज की परिस्थिति के अनुसार होगा. भविष्य में कौन जानता है कि कौन सा लक्षण इस स्पीसीज़ के सरवाइवल में मददगार होगा. किसी भी जीव का इस धरती में होना बहुत से संयोगों और एक्सीडेंट्स का परिणाम है. महज़ इत्तेफ़ाक है. आमलोग आज भी इवोल्यूशन के नाम पर लैमार्कवाद की समझ रखते हैं और समझते हैं कि एक सीधी दिशा में बेहतरी की तरफ विकास होता है. इवोल्यूशन की दिशाहीनता को पचा नहीं सकते. अगर ये बात ठीक से लोग समझ जाते हैं तो फिर रेस, जातिवाद, यूजेनिक्स इत्यादि की हवा निकल जाती है, जेनेटिक्स की सही समझ इन सब की ख़ुद ब ख़ुद बखिया उधेड़ देती है.   
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अधिनायकवादी फ़ासिस्ट विचार कभी ज्ञान-विज्ञान का भला नहीं करते, भले ही वो विज्ञान का मुकुट लगायें, सड़ी विचारधारा के तहत जो सायंस होती है, वो भी सड़ जाती है, निष्फल होती है.
राजनीतिज्ञ और विचारधारायें जब जब विज्ञान को डायरेक्ट करते हैं और वैज्ञानिकों के लिए स्वतंत्र तरीक़े से ज्ञान के संधान का स्पेस नहीं छोड़ते तो मानवता और समाज दोनों का लम्बे समय के लिए नुक़सान होता है. इस दख़ल के चलते वाविलोव जैसा जीव विज्ञानी और उसके अनगिनत सीनियर साथी मार दिए जाते हैं, और हेबर जैसा प्रखर वैज्ञानिक ऑल्मोस्ट राक्षस का दर्जा पा जाता है.     सायन्स अगर ज्ञान के संधान और प्रकृति के रहस्यों की खोज है तो वे वैज्ञानिक ही दुनिया को नए विचार और ज्ञान दे पाते हैं जो सिंसियर प्रयास करते हैं और सिर्फ अपने ऑब्जर्वेशन्स और निष्कर्षों को तर्क की कसौटी पर कसते हैं. डार्विन अगर ऐसा नहीं करते तो उस समय की धार्मिक विचारधारा में फंस जाते. विज्ञान विचारधारा से नहीं चलता बल्कि नए अन्वेक्षण और नयी टेक्नोलॉजी से गति पाता है और सार्वभौम सत्य को उद्घाटित करता है. गुरुत्वाकर्षण के कारण अगर सेब को टूटकर जमीन पर गिरना है तो गिरना ही है, दक्षिणपंथी और वामपंथी और धार्मिक पूर्वाग्रह उसे बदल नहीं सकते. वैज्ञानिक का ईमान इसी में हैं कि सावधानी पूर्वक अपना काम करे और बिना पूर्वाग्रह के डाटा का विश्लेषण करे और परिणामों पर यकीन करे. सायंस के मूलभूत सिद्धांत समय और काल के लम्बे टेस्ट पर या तो खरे उतरेंगे, उनमें कुछ घटेगा, कुछ जुड़ेगा और ख़ारिज होंगे, लेकिन ये सब नए ज्ञान के आलोक में ही होगा. ये ऑल्मोस्ट पोयटिक जस्टिस जैसा मामला है कि पचासियों लोग जो यूजेनिक्स पर काम करते रहे, आज उनका कोई नामलेवा नहीं है, फ़्रांसिस गेलटन को कोई नहीं जानता, जबकि डार्विन से असहमति रखने वाले भी उसके भूत से पीछा नहीं छुड़ा पा रहे हैं.   

ये ज़रूर है कि राजनीति और सत्ताएँ और समाज का प्रभुवर्ग रिसर्च की दिशा को मोड़ता रहेगा और सायंस को टूल की तरह इस्तेमाल करता रहेगा, उसके फ़ायदे बराबर सब लोगों के बीच नहीं पहुँचेगे। परंतु ये सब सायंस पालिसी के मामले हैं, किसी भी सायंस के सैद्धांतिक मामले नहीं है जिनके समाधान सायंटिफ़िक न होकर अंत में सामाजिक और राजनैतिक होंगे.