"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Feb 25, 2008

कापीराईट एक्ट कुछ फलसफे -कुछ उलझन

कापीराईट एक्ट को लेकर बहुत दिनों से दुविधा थी की इसे अपने ब्लॉग मित्रो के सामने रखा जाय या नही। आज दिनेश जी की पोस्ट ने ये रास्ता भी खोल दिया और शायद इस ब्लॉग जगत को वही एक सही राय भी दे सकते है।

मैं यहाँ पर IPR के फलसफे और इतिहास को लेकर कुछ कहना चाहती हूँ।

IPR (intelectual property rights) आपेक्षाकृत नया और लगातार बदलती हुयी धारना है। जैसे की बहुतायत मे हमारे मित्र इसे गंभीरता से नही लेते, ये उनका अपना निजी मत नही है, ये आता है काफी कुछ हमारी ज्ञान को लेकर जो सांस्कृतिक और एतिहासिक धारना हमारे देश मे रही है। ज्ञान को या फ़िर कला को आर्थिक मानदंडो से भारत मे कभी तोला नही गया। बहुत से कलाकारों को आर्थिक सुरक्षा एक लंबे अरसे तक राजघराने देते रहे। लोक्गयाको को हमारा समाज। अब उनके ये सहारे टूट चुके है, और इस नयी दूनिया मे अगर कलाकार की मेहनत को और कलाकार को भी बचाना है तो कम से कम उसके आर्थिक स्वार्थ के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति अनैतिक है, ये मेहनत की चोरी ही है।

हमारे समाज मे भले ही कलाकार या विद्वजन आर्थिक फायदे नही लेते थे, पर एक सामाजिक सम्मान हमेशा उन्हें मिलता था। और अपने ज्ञान को वों कभी भी सार्वजनिक नही करते थे, जब तक कोई लायक चेला न मिले। और कई बार तो इस ज्ञान को देने की कई गुना कीमत गुरुओ ने ली है। एकलव्य का उदाहरण हमारे सामने है। स्त्री, एक बड़े हिस्से के लोग, दलित और कई सवर्ण जातिया भी शिक्षा से दूर राखी गयी। सो एक तरह से भले ही हमारे ज्ञान के मथाधीशो ने आर्थिक कीमत नही ली। हमारे देश ने इसकी एक बड़ी सामाजिक कीमत चुकाई है।

दूसरा पहलू ये भी रहा की इसी कशमकश मे लोगो ने अपना ज्ञान नही बँटा और ये खंड-खंड का ज्ञान आखिरकार सिर्फ़ कुछ अंध-विश्वासों तक सिमट कर रह गया। अगर इस तरह की एक सामाजिक प्रक्रिया होती की हर एक किसी को उसकी मेहनत से आर्थिक सुरक्षा मिलाती, और एक पहचान भी तो ज्ञान को यू मंत्रों के बीच छुपाने की ज़रूरत नही पड़ती, और अलग-अलग /अधूरे अक्षर बनाने की बजाय हमारे पास पूरे वाक्य होते, पोथे होते, प्रोटोकोल होते। सूर, तुलसी , मीरा के भजन की आख़िरी लाइन मे उनका नाम होना, कबीर का भी बार बार ये कहना के "कबीर कहे" कही न कही ये दर्शाता है, की अपनी मेहनत, रचना के लिए और उससे जुडी पानी पहचान के लिए, क्रेडिट के लिए ये लोग भी सचेत थे। अगर आर्थिक मूल्य के लिए नही तो कम से कम अपनी पहचान के लिए।

कट और पेस्ट के इस युग मे किसी के विचार जो सालो तक अपने भीतर चल रही उथलपुथल, अपने जीवन के प्रयोगों, या मेहनत से सीखे-पढे गए विचारों से मिलकर बनते है, अभिव्यक्त कराने मे भी कुछ समय लेते है, एक मूल रचनाकार के लिए। और चोर को सिर्फ़ कट या पेस्ट करना पड़ता है।

भले ही क़ानून ऐसा करने से आपके हाथ रोके या न रोके, आप जीवन भर ये करते रहे और पकडे भी न जाय। बहुत वाहवाही भी लुटे । पर यक्ष prashan yahee है की आप का eemaan kyaa kahataa है ? अगर आप IPR मे अपने व्यक्तिगत नज़रिये से इतेफाक नही रखते, तो भी आप अपनी रचना के लिए कापीराईट का प्रावधान न रखे, और सबके साथ बांटे। दूसरो की रचना के लिए ये हक़ आपके पास नही है।

ब्लॉग को लेकर एक और दुविधा भी है की क्या हिन्दी के ब्लॉग भारत के क़ानून के भीतर आयेंगे या फ़िर अंतर्रास्त्रीय क़ानून के। एक मित्र से ये ईमेल मिली है....

Another point to note v9y is citing the legal aspects of the Indianjurisdiction, whereas no blogger from hindi world has said that anymatter of conflicts infringements on rights will fall under the Indianjurisdiction। Which means by default your work falls in thejursidiction of the owner/host of the webserver which I am sure is USA.
This aspect should be discussed as well.

कुछ जानकारी और विचार

–"If nature has made any one thing less susceptible than all others of exclusive property, it is the action of the thinking power called an idea, which an individual may exclusively possess as long as he keeps it to himself; but the moment it is divulged, it forces itself into the possession of every one, and the receiver cannot dispossess himself of it."
Thomas Jefferson, Letter to Isaac McPherson, Monticello, August 13, 1813


–The Congress shall have Power> To promote the Progress of Science and useful Arts, by securing for limited Times to Authors and Inventors the exclusive Right to their respective Writings and Discoveries;"
U.S. Constitution, Article 1, Section 8, Clause 8

For forums:If you want to run a forum (not a personal blog) establish an advisoryboard/panel that will direct your membern the agenda। Members

can post a list of agenda items and then a small set of editorial panel (asecond panel) should moderate the postings on its content, includingmatching to the listed agenda, ethics, appropriate acknowledgment. Thismay sound funny and time consuming, but that is how it should be runrather than simply posting. Its not just for your's but for any otherforum based blogs is a must exercise. TO be professional, no postingshould be released for public view unless a majority of your editorpanel has given its consent. IN any case the admin of the blog isaccountable for any content on the blog, therefore he/she should takedue responsibility and be kind enough to say 'sorry'.
A Bloggers' Code of Ethicshttp://www.cyberjournalist.net/news/000215.phpThe Forum Newsroom Code of Ethicshttp://www.in-forum.com/collections/ethics/http://www.in-forum.com/collections/ethics/index.cfm?page=weblogs From Probloggerhttp://www.problogger.net/archives/2004/09/23/blog-ethics/

Feb 19, 2008

क्या जूते मारना छेड़छाड़ रोकने का सही समाधान है ?

पारुल ने गाहे-बगाहे बच्चियों और औरतों को जिस तरह, verbal, physical, emotional, ताडन रोज़-रोज़ झेलना पड़ता है, उसी पर मन की बात लिखी। मुझे नही लगता की कोई भी इस ताडन से बच निकलने का अपवाद है। उत्तर भारत मे ये बहुत ज्यादा है, पर बाकी हिस्सों मे भी है। कही कम कही ज्यादा। औरतों के प्रति इस तरह की हिंसा मे समाज के हर वर्ग के पुरुष शामिल है, इसमे पढाई-लिखाई, जाती-धर्म, कोई बाधा नही।इसी मुद्दे पर मेने पहले भी अपने कोलेज के दिनों के संस्मरण किस्साये-कैंटीन-३ मे ज़िक्र किया है, और इसी असुरक्षा के माहौल मे किस तरह से हमारे सभ्य कहे जाने वाले ज्ञान के मंदिरों, विश्व्विधालयों मे भी लड़किया वहा alien बनी रहती है। कैंटीन जैसी सार्वजनिक जगह से भी निष्कासित रहती है। प्रेमचंद की लिखी पार्क वाली कहानी आज ५०-६० साल बाद भी समसामायिक है.हम मे से हर कोई अपने अपने समाधान निकलता है, जैसे पारुल ने निकाला, एक ऐसे जानवर को पीट कर, इस भरोसे की पीछे पति खडा है, बात बिगडी तो संभाल लेगा। अधिकतर लड़कियों के पीछे कोई खडा नही होता, बात संभालने के लिए। फ़िर आप शहर के हर नुक्कड़ पर अपने साथ किसी bodyguaard को लेकर घूम नही सकते। अब अगर साथ मे दो दो bodyguard भी हो तो बचना मुश्किल है, ये हमे नए साल मे हुयी मुम्बई की घटना ने बता दिया है। अब लड़कियों को छुप के छेडने kaa samay बीत गया है। भारत प्रगति पर है, अब ये एक सामूहिक आयोजन है। आसाम की राजधानी की सड़को पर भी दिन दहाड़े इस तरह की हरकत होती है, सरे आम। बुद्धीजीवी मीडीया कर्मी निर्वस्त्र भागती एक बच्ची की तसवीर खींचते है, आख़िर कैसे बनेगे अच्छे पत्रकार ? यही तो मौका है। मदद करने जायेंगे तो फोटो कैसे खीचेंगे, सुर्खियों मे कैसे आयेंगे, उनके चैनल्स किस तरह सफल होंगे? इसीलिए अपने भीतर के एक जिम्मेदार शहरी को मारकर, एक ऐसे इंसान को मारकर जो दूसरे के लिए मदद का हाथ बढ़ा सकता है, ही तो सफलता मिलाती है। पलएन एंड सिमपल .......हमारे समाज की नैतिकता यही पर उलझी है, की जिन महिलाओं के साथ इस तरह की हरकत होती है, वों अपने पहनावे से, अपने हाव-भाव से, इस हादसे के लिए कितनी जिम्मेदार थी? क़ानून, पुलिस, कोर्ट ये बाद की बातें है.पर आम लोगो मे , और एक बड़े समाज के हिस्से मे , इन हरकतों को अपराध न मानना और उसके लिए तर्क कुतर्क इस हद तक ढूंढ निकालना की पुरुषो के होर्मोनेस उनके वश मे नही, स्त्रिया उदीपन के लिए जिम्मेदार है, हमारे महान भारतीय संस्कृति का काला चेहरा दिखाने के लिए काफी है। जानवरों मे कभी किसी मादा के सामूहिक बलात्कार की कोई घटना, फिलहाल तो मेने न कभी पढी न नेशनलजेओग्रफिक पर आज तक देखी है।क्या जानवरों के नर अपने होर्मोनेस पर आदमी से ज्यादा वश रखते है ? प्रकृति मे हर जाती का नर यहां तक की फूल -पोधे भी बड़ी रचनात्मक तरीके से मादा को लुभाते है। इसीलिए कम से कम होर्मोनेस वाला समीकरण तो बहुत ही हास्यास्पद है। इसीलिए बात को आगे बढाते हुए मैं फ़िर से कहूंगी की ये एक ख़ास तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक समीकरणों से उपजी समस्या है, और इसका अन्तिम समाधान भी एक सजग समाज की भागीदारी और सक्षम क़ानून से ही सम्भव है। जब तक लोग खंड-खंड मे व्यक्तिगत समाधान ढूँढने के लिए अभिशप्त है, और हमारे समाज मे किसी तरह का सपोर्ट सिस्टम नही है, हर तरह के व्यक्तिगत समाधान सही ही है, जिनमे इग्नोर करना , रास्ता बदलना भी है। जिस तरह के परिवेश मे हम लोग बड़े होते है, अक्सर इस तरह की हिंसा की शिकार लड़की, को उनका परिवार, और समाज बार -बार कटघरे मे खडा करता आया है, और एक व्यक्तिगत परेशानी मे तब्दील कर देता है। हालाकि एक बड़े सामाजिक स्तर पर ये घटना रोज़ होती है। ये सब मैं अपनी व्यक्तिगत कायरता, या कम हिम्मत की वजह से नही कह रही हूँ। और सिर्फ़ व्यक्तिगत अनुभव के धरातल से ऊपर उठकर कह रही हूँ।