"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Sep 7, 2009

आयोवा डायरी-०२

पहला भाग यहाँ पढ़े
मार्च १९९८  
आयोवा  की पहली सुबह, ठण्ड मे घुली हुयी और धुप-छाँव की आँख-मिचौली के साथ शुरू हुयी. लैब जाने के लिए एक मित्र ने राईड दी और दो चीजे जो रात के अंधेरे मे नही दिखी वों सुबह के उजाले मे हतप्रभ करनेवाली थी; एक तो १००% समतल लैंडस्केप, और दूसरा, चिनार के, ओक और  तकरीबन १५-२० अलग-अलग जातियों के पेड़, सब के सब अमूमन ३० फिट की ऊँचाई से ज्यादा नही. लगभग वीरानी से भरा शहर, चरों तरफ  सिर्फ़ कार ही कार, लोग नही.  लोगो को देखना तब तक न हुआ , जब तक अपनी बिल्डिंग के अन्दर नही घुस गए. पहला दिन कई तरह की कागज़बाजी मे बीता और इस बहाने लगभग पुरे कैम्पस मे चक्कर लगाना पढ़ गया. बहुत जल्द सभी पेडो का ३० फिट से ऊंचा न होना मेरी समझ मे आ गया. आयोवा मे खासकर ठण्ड मे 50-६० किमी प्रति घंटा की रफ़्तार से बर्फीली हवा चलती है, जो पेडो को इस ऊंचाई से ज्यादा बढ़ने नही देती, पेड़ टूट जाते है। दूसरा, हवा की इतनी तेज़ रफ़्तार तापमान को -२० डिग्री से -४० डिग्री तक आसानी से पहुंचा देती है. मुझे इसका कोई पूर्वानुमान नही था. सिर्फ़ इतना पता था की बर्फ पड़ती है आयोवा मे। और लगा था, की पहाडी लड़की को बर्फ से क्या डरना? और इस लिहाज़ से जिस तरह के जैकेट की दरकार थी, वों मैं लेकर नही गयी थी। थोडा बहुत ढूढा था, लखनऊ , दिल्ली मे, पर कोई ठीकठाक जैकेट मिली नही, और अंत मे लखनऊ से एक कोट लिया. कोट देखने मे तो ठीक था, पर मौसम को झेलने की कुव्वत उसमे नही थी. हड्डी तो दूर, मज्जा को भी मजा चखाने के लिए चाकू सी तेज़ ठंडी हवा काफी थी. अपनी सीमित जानकारी के चलते, डॉन किहोते टाईप के एडवेंचर की ये शुरुआत भर थी....

दूसरे दिन एक लोकल कांफ्रेंस हमारी ही बिल्डिंग मे शुरू हो रही थी. एक एक करके लोगो से बतियाना शुरू किया, काम के बारे मे पूछा और कुछ अंदाज़ लगा की कैसे लोग है? क्या करते है? और "सायंस के मक्का" मे सायंस का क्या हाल-चाल है. पर अभी तक तो सबसे बड़ी दिक्कत थी घर ढूँढने की, कैसे ढूंढा जाय? कुछ लोकल अखबार ढूंढें, फ़िर अगले एक हफ्ते तक कई लोगो को फ़ोन किया, पर दिक्कत ये की शहर का कुछ नक्शा पता हो तो समझ मे आए. लैब के कुछ सहकर्मी मदद देने को तैयार थे (जिसमे सिर्फ़ कार राईड, और ग्रोसरी शोपिंग शामिल थी), कोई भी सीधी जानकारी देने की पहल नही कर रहा था. जिसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, यानी किराए का मकान कैसे और कहाँ मिलेगा ?  कुछ मेरा अंतर्मुखी स्वभाव भी आड़े आया, और जितना कम हो सकता था उतनी ही मदद लेने का मेरा विचार था.  अगले दिन लिफ्ट मे एक हिन्दुस्तानी साहब नज़र आये, सोचा की इनसे पूछा जाय, कि लोकल ट्रांसपोर्ट क्या है? पर वों बोले के "मैं यहाँ बहुत अरसे से हूँ".  मतलब कि "अपना रास्ता नापो! यू आर फ्रेश आउट ऑफ़ बोट"  . इसी बीच जिन प्रोफ़ेसर के घर पर मेरा टेम्पररी रुकना था, वही पर तीन दिन के लिए, संतूरवाले शिवकुमार शर्मा जी, उनके बेटे राहुल और तबलावादक सफत अहमद खान आकर रुके. उठते-बैठते इन तीनो लोगो से काफी बातें हुयी. संगीत, खासकर सेमी-क्लासिकल, और वोकल को सुनने की आदत थी, पर विशुद्ध रूप से "इंस्ट्रुमेंटल" से मेरा परिचय यही से शुरू हुआ. शिवजी से पूछा कि गाने की तो थीम होती है, आप खाली इंस्ट्रुमेंटल परफोर्मेंस की थीम कैसे लिखते है? उनका सुझाव था कि शाम को उनका कंसर्ट सुना जाय, और मैं ख़ुद समझने की कोशिश करू कि क्या कहा जा रहा है? फ़िर अगले दिन इसके बारे मे बात की गयी. इंस्ट्रुमेंटल को समझने की शुरुआत शायद उसी दिन से हुयी.

तकरीबन तीसरे-चौथे दिन कॉफी मशीन के पास एक दूसरे सज्जन फिरोज़ ने बतियाना शुरू किया, पता चला वों उजबेकिस्तान के है, करीब साल भर पहले आए है. उसके बाद करीब १५-२० मिनट बातचीत होती रही. फिरोज़ ये जानकर खुश हुआ की मुझे समरकंद के बारे मे और उलूगबेग के बारे मे पता था. अगले दिन कुछ तस्वीरे उसने मुझे दिखाई, यशब  के प्यालों की, मेहराबदार घरों और गुम्बदों पर फिरोजी ही रंग के पत्थरों की सजावट, एक पुराना ज़रदोज़ी का कोट, अपनी मंगेतर और घर के लोगों की तसवीरें. फ़िरोज़ से ही लोकल ट्रांसपोर्ट और घर किराए पर कैसे ढूंढा जाय ये पूछा. उनकी एक मित्र हाल-फिलहाल मे कैलीफ़ोर्निया चली गयी थी और उसका अपार्टमेन्ट किराए पर उठाना फिरोज़ साहेब की जिम्मेदारी थी. सो फिलहाल तीन महीने के लिए घर का इन्तेजाम हो गया था, जुलाई के महीने में मेरे पास भरपूर चोयास होती क्यूंकि एम्स शहर में मकानों की लीज़ जुलाई से जून के बीच ही मिलती है. मेरे प्रोफेसर ने अपने घर से मेरा समान अपार्टमेन्ट तक पहुंचाया, और कुछ समान खरीदवाने के लिए ग्रोसरी स्टोर लेकर गए. जितना भी हो सकता था, समान लिया, और यही पर मुझे बस का पास, और शहर का नक्शा जो निहायत ज़रूरी था, वों भी मिला.

ऐम्स एक बेहद छोटा शहर है, अप्रेल पहले-दूसरे हफ्ते के बाद मौसम कुछ खुल गया, और अक्सर पैदल चलने की वजह से शहर के बारे मे मेरा एक अनुमान बन गया. करीब एक हफ्ते के बाद लौंड्री रूम मे जो अपार्टमेन्ट मे साझा था, हैदराबाद से आए एक तेलगु परिवार से जान-पहचान हुयी, राव भी सीनीयर पोस्टडोक थे, और उनकी पत्नी और दो साल का बच्चा, ये लोग मेरे ही अपार्टमेन्ट मे रहते थे. उसी वक़्त इसरार करके वों लोग मुझे अपने घर ले गए, खाना खिलाया, और एक बेहद आत्मीयता के माहौल से मैंने कुछ घंटो के बाद विदा ली.

लंच के वक़्त अक्सर फिरोज़ से और कुछ दिन बाद उसके रूसी दोस्तों से बात होती थी और बातें दुनिया जहान की.  मजे की बात ये थी कि रूस के १६ टुकड़े अस्सी दशक के आख़िरी सालो मे हुए थे, उन सभी देशो के लोग एम्स मे एक ही ग्रुप मे रहते थे, सभी अपनी भाषा के अलावा रूसी बोलते थे, आपस में गहरे सूत्र मे बंधे लगते थे. मैं अक्सर सोचती थी, कि भारत और पाकिस्तान के बीच इतनी दुश्मनी क्यो है? कुछ महीनों के बाद कुछ पाकिस्तानी दोस्त बने तब मैंने जाना की हमारे बीच में भी खान-पान, भाषा और संस्कृति के वैसे ही सूत्र है, परन्तु हमारे देशों की राजनीती हामारी संस्कृति और साझेपन पर सवार हो जाती है.

रूसी साहित्य को पढ़कर जो कुछ समझ बनी थी, उसका फायदा ये हुया कि मैं लगभग सभी रूसी नामो को सही उच्चारण करती थी, और अक्सर तो कई शहर जिनके बारे मे सिर्फ़ पढा था, रूसी क्रांती के बारे मे भी सिर्फ़ पढा ही था, पर काफी देर तक बातें होती थी. उस ग्रुप के अधिकतर दोस्तों के परिवार भयंकर आर्थिक संकट के समय से गुजर रहे थे. फ़िर भी जितना हो सकता था, भाई-बहन, दोस्त, नाते रिश्तेदार एक दूसरे की भरपूर मदद करते थे. इसी बीच एक लड़की उक्रेन से आयी, और फ़िर उसकी मकान ढूँढने की फजीहत को देखते हुए, मैंने उसे अपने अपार्टमेन्ट मे रहने के लिए कह दिया.  उसे अंगरेजी बहुत कम आती थी और अक्सर बात करते समय उसके हाथ मे डिक्शनरी होती थी. उसके साथ बड़ी आत्मीयता बनी. लेरेसा जितनी बढिया इंसान थी, उतनी ही आला दर्जे की वैज्ञानिक भी, और वैसी ही मेहनत और रुची के साथ खाना भी बनाती थी. उसका बेहद महीन किस्म के काम को लैब मे देखकर  और उसका धैर्य देख कर मुझे बहुत राहत मिलती थी. लेरेसा के मार्फ़त उन दिनों और उससे पहले के रूस के बारे मे मुझे काफी कुछ समझने का मौका मिला, उस भूभाग के साहित्य और संगीत, खानपान, और लोगो के बारे मे पता चला.
..........जारी

3 comments:

  1. सही है. एक पाठक फिक्‍स हुआ.

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  2. यात्रा वृतांत पढ़ने का शौक है। जेहन में वे दिन उपन्यास अब भी ताजा है। निर्मल वर्मा का। आपका वृतांत भी पढ़कर अच्छा लगा। लेकिन पहला पोस्ट कहां है ?अमित

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  3. Di aap itna accha kaise likh lete ho. I mean aapki hindi bhasha pe pakad bahut acchi hai not like mine chalti firti:)

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