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Oct 23, 2010

२०१० पहाड़ डायरी -03

देहरादून जाकर पहले हफ्ते में विद्यासागर नौटियाल जी से मिलना हुया. उनकी सहृदयता रही कि कुछ दिन पहले ही अस्पताल से घर लौटे थे, आराम की हिदायत के बीच भी सिर्फ एक इमेल के बदले उन्होंने घर आने को कहा, कुछ तीन घंटे तक उनसे बातचीत होती रही, फिर आने से पहले दो और मुलाकाते, तीसरी वाली खासकर उनकी पत्नी से. उनसे मिलना ही बेशक इस पूरी यात्रा का  सबसे बड़ा सबब बना. उनसे मिलने से पहले उनकी किताब, "सुरज सबका है" पढी. कई सालों से सुने लोकगीत "बीरू-भड़ू क देश, बावन गढ़ु क देश" का कुछ मतलब इसी किताब से मिला, "गोर्ख्याणी " के पुराने भूले किस्से समय के नक़्शे में फिर कहीं अपनी जगह पाए. फिर तीस साल पहले अपने बचपन के दिनों में भी लौटे, अंगीठी को तापते सुने किस्सों कहानियों की साँझ-और रातों में लौटे.  उसके बाद फिर "फट जा पंचधार" "मेरी कथा यात्रा", "सरोज का सन्निपात" पढी.  जो अब  भी बची है वों  "उत्तर बायाँ है" और "देशभक्तों की कैद में", "मोहन गाता है".,  बाकी पुस्तकों तक पहुँचने का भी कभी मौक़ा बनेगा ऐसी उम्मीद है.  उनके पास बेहद अच्छी स्मृति है, जिया हुया एक गरिमापूर्ण सामाजिक और बेहद सादा व्यक्तिगत जीवन का खजाना है, बहुत सी नयी किताबे अभी लिखी जानी भी बाकी है......

बहुत सी बातें गढ़वाल के बारे में उनसे पता चली, कुछ मोटी बातें भी मुझे मालूम न थी, जैसे कि टेहरी रियासत १९६० तक बनी ही रही, बाकी देश से अलग यहां रियासत का कानून चलता था, और राजशाही के दमन,मनमाने पने की और बहुत सी बाते भी, मसलन लोगो के लिए रामलीला खेलना एक अपराध हुआ, क्यूंकि राजा की एक रानी इस दरमियान मर गयी थी. फ़िल्मी गाने की सख्त मनाही, हाथ से सिले कपड़ों का लम्बे समय तक चलन.., फिर बहुत कुछ प्रजामंडल आन्दोलन के बारे में, टेहरी बाँध के चलते गाँव, घर डूब जाने की बातें, और अब नए टेहरी तक की भी. उनके चुनाव जीतने की बातें बिना पैसे खर्च किये, दूर दराज़ के देहातों तक की लम्बी पद-यात्राएं.   एक व्यक्ति इतनी आसानी से सुलभ, निष्कपट, एक जीवन इतना सादा पर कितना विराट.
उनसे हर बात सुनने जान लेने का इतना मोह था, कि जिस छोटी सी फिल्म के लिए उनसे मिलना हुआ, बातचीत उसके दायरे के बाहर ही होती रही. फिल्म और जीवन की वैसे भी  क्या तुलना? फिल्मे जीवन से निकलती है, फिल्मों से जीवन निकले ये होता नहीं....

पहले हफ्ते में ही सुदर्शन जुयाल जी से भी मुलाक़ात हुयी, जो फिल्मकार है, और कुछ महीनों पहले १८ साल बंबई में रहने के बाद देहरादून वापस आये थे. उनके बारे में नैनीताल में ज़हूर दा और कुछ दोस्तों से  सुनती रही थी,२० साल पहले, कभी मुलाक़ात नहीं हुयी थी. अवस्थी मास्साब से कई बार बात हुयी थी,  ये कुछ अजब संयोग ही है कि उनकी फ़ाकामस्ती की कुछ झलक सुदर्शन जो दामाद है उनके, उनमे झलकती है. सुदर्शन लगभग हमारे साथ ही रहे जब भी बाहर निकलने के मौके बने, और घर पर भी कई बार लम्बी बात हुयी. सबसे अच्छी तस्वीरे और कुछ वीडीयो उन्होंने ही बनाए अपने मार्क II 5D से,  उनसे मेरी खूब जोर-शोर से बहसे हुयी, बहुत अच्छी बातचीत हुयी, और बच्चे मेरे उनके गेजेट्स को देखकर जब तब कैमरामैन बन जाने और फिल्म बनाने के आईडिया से उत्साहित होते रहे. सुदर्शन कैमरे के प्रयोगों के साथ मोर्छंग की धुनें भी निकालते रहे. गाँव में बच्चों के बीच खिलोने की तरह कैमरे को ले जाते रहे, बहुत आसानी से खासकर बच्चों के साथ बिना किसी प्रयास के सम्बन्ध बना लेना, और बातचीत में हास्य की छटा भी उनकी ख़ास बात है. ...........

 देहरादून के पहले हफ्ते के इतवार को डाकपत्थर निकलना हुआ, जहाँ कुछ देर नवीन कुमार नैथानी जी के घर पर, साहित्य भाषा, पहाड़ पर बातचीत हुयी. उनसे कभी ५ साल पहले पत्राचार हुआ था, मिलने का पहला मौक़ा था. नवीन ने मुझे ज्ञानपीठ से हाल में ही आयी "सौरी की कहानिया"  भेट की, और "कथा में पहाड़ " मेरे हाथ अभी तक लगी नहीं. भौतिक विज्ञान के व्याख्याता नवीन की कहानिया, कल्पना की दुनिया सौरी में जिस सहजता से मन को लिए जाती है, वों विलक्षण है और नवीन उतने ही सरल, तरल, अपने.......

नवीन के यहां ही कुछ जौनसार के विधार्थी मिले, जिनसे बातचीत हुयी, एक लड़का जो कोलेज के चुनाव में सक्रीय था, हमारे साथ सहिया तक गया, कुछ लगातार रोचक बातचीत उससे होती रही, कुछ जौनसारी गानों को भी उसने प्रमोद से कुछ प्रोत्साहन के बाद गाया. सहिया तक का खूबसूरत पहाडी रास्ता, पहाड़ों के बीच बहती नदी लागातार साथ ही बनी रहे. एक पुरानी ब्रिटिश आऊटपोस्ट के खंडर पर रुके, जहाँ कुछ औरते बैठी थी, नीचे ढलान पर उनकी बकरियां चर रही थी.   वहीं ज़मीन पर एक बुजुर्ग महिला थी, युं ही बैठी, पता चला कुछ सवा लाख कीमत की अकेली उनकी बकरियां है. मेहनत से तपे खूबसूरत चेहरे. तीन जवान औरते थी, सुदर्शन और प्रमोद काफी देर कुछ बातचीत की कोशिश करते रहे, सबके एवज में ज़बाब उन बुज़ुर्ग महिला से ही मिले, अचानक से दख़ल देते अजनबी मर्दों के बीच वों ढाल सी तनी रही.....


उसको कुछ हल्का करने की कोशिश में और कुछ नदी को पास से देख लेने के मोह में राजीव (जिसने बीच बीच में कचहरी छोड़कर ड्राईवर का रोल निभाया),  को लेकर ढलान पर उतरी. चमकती पारे की नदी खिली धूप में, बरसात की हरियाली, क्यूँ कहीं जाऊ यहाँ से, यही बैठी रहूँ कुछ बकरियां चराते तो भी जीवन में क्या बिगड जाएगा? रोजी-रोटी तो चल ही जायेगी..., राजीव की सोच दूसरी दिशा में है, राजीव कहता है दीदी ऊपर बैठी दोनों लडकियां कितनी खूबसूरत है, कुछ पढाई-लिखाई होती, बड़े शहरों के अवसर होते, तो ये भी मिस-इंडिया, मिस यूनिवर्स क्या नहीं हो सकती थी?  कुछ दिन पहले कश्मीर की किसी फिल्म के शूट के कुछ किल्प्स जो प्रमोद की नज़र चढ़े थे का ज़िक्र करते प्रमोद ने कहा था लडकियां, इतनी खूबसूरत, बिना सोचे यूँ ही मर-कट जाय लोग.  पहाड़ी लडकियां मिस इंडिया/मिस यूनिवर्स की दौड से बेदखल, पूरे के पूरे गाँवभर की खूबसूरत लडकियां औरते, इस खूबसूरत, जटिल और दुरूह भूगोल में अकली मरती-कटती भी, बच्चों और बूढों का संबल, औरतपने के साथ गायब मर्दों के हिस्से का काम  करती, सिर्फ उनके गोरे रंग वाले चेहरे ही नहीं, मेहनत से  दमकती आत्मा भी, पर वहाँ नज़र किसकी जायेगी.....      

4 comments:

  1. बहुत रोचक विवरण है आपकी डायरी मे। हम से साझा करने के लिये धन्यवाद।

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  2. इच्छिला वाले विडियोज़ अच्छे थे .. सिनेमा में तभी अंतरंग सुर की धार बहती है जब जीवन अपनी सरलता में , अपनी संपूर्णता में और अपनी सच्चाई में दिखे .... अपने सब शेड्स में दिखे..

    तो आमेन इस बात के लिये कि जैसा जीवन है वैसी फिल्म आप सब बनायें

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  3. आपकी पोस्‍ट पढ़कर एक बात याद आई। शिमला में कुफरी के एक जंगल में मुझे एक लड़की मिली। बेहद सुंदर, लेकिन उतनी ही साधारण। वो जंगल में गाय चरा रही थी और लकडि़या बीन रही थी। वो कुफरी के उसी जंगल में एक कॉटेज में रहती थी अपने परिवार के साथ। इन सारी बातों में कुछ भी विचित्र नहीं, लेकिन मुझे सुखद आश्‍चर्य तब हुआ जब पता चला कि वह शिमला के उसी कॉन्‍वेंट मैरी स्‍कूल में पढ़ती है, जहां से प्रीती जिंटा पढ़ी है। वो अंग्रेजी पढ़ती है और गाय चराती है और बेहद खूबसूरत है। लेकिन कितनी साधारण भी। सुंदरता के बाजार में वो कहीं नहीं है। कॉन्‍वेंट में पढ़ती और गाय चराती उस लड़की पर किसकी नजर जाएगी?

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