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Mar 26, 2008

आकाश, बादल और कुदाल



बचपन के कुछ दिन गाँव मे बीते, पत्थर की स्लेटो की छत , दुमंजिला पत्थर और मिट्टी का घर, आगे जंगला। घर का सबसे बढिया भाग मेरे लिए हमेशा जंगला ही रहा, खुला हुआ , जहाँ बैठकर घाम (धुप) तापा जा सकता है, दिन भर। और सामने दूर-दूर तक के पहाड़ देखे जा सकते है। नीचे की तरफ सीढीनुमा बगीचे, खेत, और फ़िर चीड़ का घनघोर जंगल। सर के ऊपर खुला हुआ आसमान, जो कई आकारों के बादल, रोशनी, और रंगो के तिलिस्म जैसा था। रोज़-ब-रोज़ नए रूप रंग मे, और बहुत दूर ऐसा लगता था की सामने वाले पहाड़ से जाकर मिला हुआ।

बालमन की छवी मे एक छवी ये भी थी की देवी-देवता, मृत और पितर भी आकाश मे ही कही रहते है। अक्सर आकाश मुझे एक झीने परदे जैसा दिखता और बादल मिलकर कई तरह के चहरे बनाते, जो उस परदे मे से झांकते हुए प्रतीत होते। मन मे बड़े होने की हूक कई बार ज़ोर मारती जिसका उद्देश्य होता, सामने वाले पहाड पर एक कुदाल लेकर जाना और आकाश को खोदना, ताकी उसके पीछे से झांकते चेहरों वाले देवी-देवता और पितरो को आजाद किया जा सके। उनसे बात की जा सके।


गरमी की राते भी गए देर तक जंगले मे बीतती थी। खुला आसमान, घुप्प अँधेरा और तारो भरी वैसी राते, चांदनी राते और ढेर सी पुरानी बातें, मेरे मन मे आज भी किसी आदिम स्मृति की तरह है।