मन के पैर नहीं होते
बस जब-तब पंख उग आतें है, हरे-नीले-लाल,
मन उड़ जाता है अपरिमेय पहाड़ों को फांदता,
समन्दर लांघता, समयकाल से बेपरवाह कंही भी...
लाता है सपेरें सा पोटली बांधे सौगाते,
कभी न देखी गयी, कभी न सुनी गयी,
पकड़ में न आने वाले सुगंधियों सी,
मचलती मछली सी....
झिलमिल करते है सुरज से छिटके सात रंग
उसी में खोजती हूं मन का रंग,
जब तक है रोशनी तब तक है रंग
जब-तब जलती हूं मैं, रोशनी के लिए
जारी रहता है, रंगों का नृत्य,
मन का सपेरा धीमे-धीमे खोलता है बंद पोटली........
महकती है एक पूरी अमराई,
सपने में बहती है कंही एक मटमैली बरसाती नदी,
उठी है फिर से बरसात और अमराई की मिली-जुली सुगंध
अभी रचे बसे है रंग, रोशनी, गंध और स्वाद
अभी बची है आदिम स्मृति
फिर एक बार जीवित हूं मैं......................
"He is an emissary of pity and science and progress, and devil knows what else."- Heart of Darkness, Joseph Conrad
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Mar 14, 2010
Mar 7, 2010
तेहरान की छते (Roofrops of Tehran)

बहुत दिनों बाद जो कोई एक किताब एक झटके में ख़त्म की वों Mahbod Seraji की Rooftops of Tehraan है. किताब पढ़ते हुये मैं भी बहुत देर तक तेहरान की छतों पर बैठी रही। पूरी किताब कुछ १७-१८ साल के कुछ चार बच्चों उनके परिवार और १९७० के आसपास इरान के समय की है, जब इरान के शाह का राज था। उपन्यास का मुख्य पात्र पाशा गर्मी की रातों में अपनी छत पर अपने दोस्त अहमद के साथ बातें करते, तारों को गिनते, किताब पढ़ते गुजारता है, और कई रातें छत पर बैठे अपनी प्रेमिका के साथ जो एक ईंट की दीवार पार बगल की छत पर बैठी रहती है, और कई बार उसे लांघकर आरपार जाना भी होता है।
एक कुछ थोड़ी बड़ी उम्र का इन बच्चों का दोस्त जो वामपंथी है, शाह की खुफ़िया पुलिस (SAVAK) के हत्थे चढ़ता है और क़त्ल होता है। इस अचानक हुयी घटना में इन चार किशोरवय लड़के-लड़कियों का जीवन छिन्न-भिन्न होता है, उसी के इर्द-गिर्द ये उपन्यास बुना गया है। किशोरवय की दोस्ती, प्रेम, इरान के परिवारों का भीतरी मीठा माहौल, बच्चों की गलियों मोहल्लों की दोस्तीयां। एक बूढ़ी नास्तिक दादी, जो अपने पति के मरने के बाद कुछ सिरफिरी होकर रोज अपने प्रेम की कहानिया गढ़ती रहती है, कि कैसे अपने पति से मिली थी। कुछ इन बच्चों के माता-पिता की अपनी प्रेम कहानियां, राजनीतिक गतिविधियों की कहानियां, कुछ किताबे, कुल मिलाकर इरान की क्रांती से पहले के समाज की एक झलक दिखाता है। किताब से अलग पिछले ४० सालों में इरान ने इस्लामिक क्रांति देखी है, और उसके भीतर भी आज तक जनतांत्रिक मूल्यों के लिए तीखा संघर्ष लगातार जारी है. ये किताब कुछ उन्ही लोगो को समझने की एक नयी नज़र देती है। बहुत सीधी सरल-तरल किताब, एक सांस में पढ़कर ख़त्म होने वाली. किताब के कवर पर गुलेसुर्खी (ग़ुलाब) एक तरह से पूरी किताब का प्रतीक है, गहरी दोस्ती प्रेम और बलिदान का। लेखक के लिए स्मृति का भी शायद. हमारी अपनी हिन्दी में इतने जाने पहचाने शब्द फ़ारसी के मिले हुये है कि कुछ जाना पहचाना लोक लगता है. किताब अंत में आकर कुछ फ़िल्मी तरीके से सुखद हो जाती है, जो शायद इस किताब का कमजोर पक्ष है.
Feb 19, 2010
निर्मल पांडे और नैनीताल
आज शाम होते-होते कई पुराने दिनों के मित्र परिचित कुछ थोड़ी देर के बाद निर्मल पर लौट आये.
निर्मल को कुछ बार नैनीताल में देखा, कुछ थोड़ी बहुत बातचीत, कुछ ८९-९० के बीच उनके कुछ नाटक (नैनीताल युगमंच द्वारा आयोजित) को देखने का मौक़ा मिला होगा। कभी गाहे बगाहे इन नाटको की टिकट भी बेची होंगी अपने हॉस्टल के दायरे में। फिर भी एक छोटे झीलवाले, रोमानी शहर में निर्मल के मायने, हमेशा कुछ ख़ास रहेंगे, भले ही बोलीवूड में निर्मल के मायने कुछ हाशिये से ज़रा से ऊपर, और एक संघर्षरत एक्टर के हो तब भी।
नैनीताल में पता नहीं अब बीस वर्षों के बाद आम युवाओं के बीच संभावना के मायने क्या है मुझे मालूम नहीं(निश्चित रूप से ग्लोबलाईजेशन ने ये सूरत नैनीताल में भी बदली होगी, बाकी जगह की तरह)। बीस पचीस साल पहले तक सिर्फ एक कोलेज था, रोमान में नहाया हुया, एक लम्बी फैशन परेड। जिससे निकलकर कुछ ९५% जनता बाबू बनने के सपने संजोये जीवन में उतरकर अपने को धन्य समझती थी। कुछ लोग वहीँ अटके पहाड़ पर चढ़-चढ़ कुछ पी. एच. डी. उधम भी करते थे, फिर थककर बी. एड. करके किसी स्कूल की नौकरी पकड़ते थे। सपनों के पीछे दौड़ने का जज्बा बहुत लोगों में था नहीं. मेरी एक मित्र ने जो बेहद अच्छी खिलाड़ी थी, सिर्फ इसलिए खेलना छोड़ दिया कि खेल की प्रेक्टिस के लिए जो कपडे पहने जाते थे, उन्हें देखकर कुछ शोहदों ने उसका जीना हराम कर दिया था. एक बार कुछ हॉस्टल की लडकियां राज बब्बर के साथ फोटो खिंचा आयी थी, कुछ तीन दिन तक होस्टल वार्डन ने उनका जीना हराम किये रखा. हॉस्टल में कुछ रातजगे करके जो कुछ पोस्टर बनाएं होंगे, कुछ ढंग की किताबें पढी होंगी, तो उनके आगे "Mills and Boons" का घटिया अम्बार भी सजाया होगा, कि हमारी एक किशोरवय वाली नोर्मल लड़की वाली पहचान का भ्रम वार्डन को और हॉस्टल के कुछ गुंडा तत्वों को रहे, खासकर अति junior जमाने में. इसी तरह का सीमित सपनो का आकाश था नैनीताल में.
निर्मल कुछ उन ५% लोगो में से थे जिन्होंने इस बेहूदगी के पार संभावनाएं देखी थी। और उसमे भी शायद कतिपय ऐसे होंगे जिन्होंने किसी सपनीली दुनिया में जाने के बारे में सोचा होगा। इसीलिए निर्मल कुछ ज्यादा प्यारे होंगे बहुत से मित्रों को क्यूंकि उनके बाद बहुत से लड़के-लडकिया नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की तरफ रूख किये। सपनों के पीछे दौड़ने का ज़ज्बा कुछ अभिजात्य वर्ग के नैनीताल के स्कूलों में पढ़े छात्रों में रहा होगा, कोई नसीर बना, कोई अमिताभ, पर खांटी नैनीताली, पहाड़ की ऊबड़-खाबड़ भूगोल की धुन्ध से निकला स्टार सिर्फ निर्मल था.
निर्मल लगभग लगातार एक अरसे तक नैनीताल में आकर थियेटर से लेकर नुक्कड़ नाटक करते रहे, और सपनीली दुनिया के द्वार तक पहुँचने वाले पुल की तरह कुछ लोगों को दिखते रहे। एक बार कुछ इन्तखाब में बैठे एक लड़की जो फ़िल्मी दुनिया में जाना चाहती थी, बड़े समय तक कुछ ख्वाब बुनती रही। मैं कुछ एक कोने अनसुना करके सुनती रही. इसीलिए निर्मल हकीक़त से ज्यादा नैनीताल में एक ख्वाब की तरह लोगों को याद रहेंगे .
निर्मल को कुछ बार नैनीताल में देखा, कुछ थोड़ी बहुत बातचीत, कुछ ८९-९० के बीच उनके कुछ नाटक (नैनीताल युगमंच द्वारा आयोजित) को देखने का मौक़ा मिला होगा। कभी गाहे बगाहे इन नाटको की टिकट भी बेची होंगी अपने हॉस्टल के दायरे में। फिर भी एक छोटे झीलवाले, रोमानी शहर में निर्मल के मायने, हमेशा कुछ ख़ास रहेंगे, भले ही बोलीवूड में निर्मल के मायने कुछ हाशिये से ज़रा से ऊपर, और एक संघर्षरत एक्टर के हो तब भी।
नैनीताल में पता नहीं अब बीस वर्षों के बाद आम युवाओं के बीच संभावना के मायने क्या है मुझे मालूम नहीं(निश्चित रूप से ग्लोबलाईजेशन ने ये सूरत नैनीताल में भी बदली होगी, बाकी जगह की तरह)। बीस पचीस साल पहले तक सिर्फ एक कोलेज था, रोमान में नहाया हुया, एक लम्बी फैशन परेड। जिससे निकलकर कुछ ९५% जनता बाबू बनने के सपने संजोये जीवन में उतरकर अपने को धन्य समझती थी। कुछ लोग वहीँ अटके पहाड़ पर चढ़-चढ़ कुछ पी. एच. डी. उधम भी करते थे, फिर थककर बी. एड. करके किसी स्कूल की नौकरी पकड़ते थे। सपनों के पीछे दौड़ने का जज्बा बहुत लोगों में था नहीं. मेरी एक मित्र ने जो बेहद अच्छी खिलाड़ी थी, सिर्फ इसलिए खेलना छोड़ दिया कि खेल की प्रेक्टिस के लिए जो कपडे पहने जाते थे, उन्हें देखकर कुछ शोहदों ने उसका जीना हराम कर दिया था. एक बार कुछ हॉस्टल की लडकियां राज बब्बर के साथ फोटो खिंचा आयी थी, कुछ तीन दिन तक होस्टल वार्डन ने उनका जीना हराम किये रखा. हॉस्टल में कुछ रातजगे करके जो कुछ पोस्टर बनाएं होंगे, कुछ ढंग की किताबें पढी होंगी, तो उनके आगे "Mills and Boons" का घटिया अम्बार भी सजाया होगा, कि हमारी एक किशोरवय वाली नोर्मल लड़की वाली पहचान का भ्रम वार्डन को और हॉस्टल के कुछ गुंडा तत्वों को रहे, खासकर अति junior जमाने में. इसी तरह का सीमित सपनो का आकाश था नैनीताल में.
निर्मल कुछ उन ५% लोगो में से थे जिन्होंने इस बेहूदगी के पार संभावनाएं देखी थी। और उसमे भी शायद कतिपय ऐसे होंगे जिन्होंने किसी सपनीली दुनिया में जाने के बारे में सोचा होगा। इसीलिए निर्मल कुछ ज्यादा प्यारे होंगे बहुत से मित्रों को क्यूंकि उनके बाद बहुत से लड़के-लडकिया नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की तरफ रूख किये। सपनों के पीछे दौड़ने का ज़ज्बा कुछ अभिजात्य वर्ग के नैनीताल के स्कूलों में पढ़े छात्रों में रहा होगा, कोई नसीर बना, कोई अमिताभ, पर खांटी नैनीताली, पहाड़ की ऊबड़-खाबड़ भूगोल की धुन्ध से निकला स्टार सिर्फ निर्मल था.
निर्मल लगभग लगातार एक अरसे तक नैनीताल में आकर थियेटर से लेकर नुक्कड़ नाटक करते रहे, और सपनीली दुनिया के द्वार तक पहुँचने वाले पुल की तरह कुछ लोगों को दिखते रहे। एक बार कुछ इन्तखाब में बैठे एक लड़की जो फ़िल्मी दुनिया में जाना चाहती थी, बड़े समय तक कुछ ख्वाब बुनती रही। मैं कुछ एक कोने अनसुना करके सुनती रही. इसीलिए निर्मल हकीक़त से ज्यादा नैनीताल में एक ख्वाब की तरह लोगों को याद रहेंगे .
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