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Feb 12, 2012

डा. विद्या सागर नौटियाल: श्रद्धांजलि



(*लेख में अधिकतर तथ्य नौटियाल जी की आत्मकथा "मोहन गाता जाएगा" और उनसे की गयी मेरी  रेकॉर्डेड बातचीत पर आधारित है, लेख का कुछ भाग "हंस" पत्रिका के मार्च २०१२ के अंक में छपा है).

खबर मिली  आज डा.  विद्या सागर नौटियाल नहीं   रहे. ७९ वर्ष की आयु में बैंगलोर में उनका देहांत हो गया.  डा. विद्या सागर नौटियाल जी का नाम कई सालों अलग अलग सन्दर्भों में सुनती रही.  २०१० में मालूम हुआ डा. विद्या सागर नौटियाल देहरादून में रहते है, अगस्त में जब अपने माता-पिता के घर आयी तो उन्हें एक छोटी सी इमेल उन्हें लिखी कि "आपसे मिलने के लिए मुनासिब समय/दिन  क्या हो सकता है?"  उनका अविलम्ब ज़बाब आया, "प्रिय  सुषमाजी,  मैं  आजकल  एंजियोप्लास्टी के  बाद  घर  पर  आराम  कर  रहा   हूँ. आप  फ़ोन  से  अपनी  सुविधा  का  समय  निश्चित  कर  सकती हैं". अगस्त में जब घर पहुंची तो उनसे मिलना भी हुआ. उन्हें आराम की सख्त हिदायत थी, फिर भी तीन दफे उन्होंने मिलने का समय दिया, बातचीत लगभग ३-४ घंटे की रेकॉर्ड की.   ७७  साल की उम्र में बेहद कमज़ोर शरीर, बहुत क्षीण आवाज़, और बेहद चौकन्ना मस्तिष्क, सरल ह्रदय,  और बेहद सरल जीवन जीते हुए नौटियाल जी, मेरी कल्पना से भी बाहर. इन सब के बीच एक तपा हुया अनुशासन का जीवन, लगातार कंप्यूटर की खटर-पटर, उनके पास बहुत कम समय है, इस बात का इल्म, उन्हें अभी बहुत सी बातें पब्लिक डोमेन में छोड़कर जानी हैं .  
उनसे मिलना ही बेशक इस पूरी यात्रा का  सबसे बड़ा सबब बना. उनसे मिलने से पहले उनकी किताब, "सुरज सबका है" पढी. कई सालों से सुने लोकगीत "बीरू-भड़ू क देश, बावन गढ़ु क देश" का कुछ मतलब इसी किताब से मिला, "गोर्ख्याणी " के पुराने भूले किस्से समय के नक़्शे में फिर कहीं अपनी जगह पाए. फिर तीस साल पहले अपने बचपन के दिनों में भी लौटे, अंगीठी को तापते अपने दादा जी से सुने किस्सों कहानियों की साँझ-और रातों में लौटे.  कुछ किताबें साथ लायी, जिन चार किताबों की प्रति बाज़ार में नहीं थी, उन्हें नौटियाल जी से लेकर इस बीच पढ़ा.  वापस लौटने पर  उनकी इमेल मिली.
"प्रिय  सुषमा  जी, मैं  तो  आपका  अपने  घर  पर  एक  मर्तबा  फिर  से  आने  का  इंतज़ार  कर  रहा  था. इधर  हम  लगातार  बरसते   पानी  से  परेशां  हैं. यह  भी  एक  यादगार  वर्षा  साबित  होगी. आपने  अपनी  पहाड़-यात्राओं  में  जो  नए  अनुभव  हासिल  किये, कृपया  उनको  तत्काल  लिख  डालिए. बाद  में  डीटेल्स याद  नहीं  रहते. उस  दिन  मैंने  गिरदा कि  जीवन-शैली की  बात  शुरू  की  थी. आपने  बताया  था  की  आपने  उनकी  पत्नी  से  बातें  की  हैं . लेकिन  गिरदा  उसके  दो-तीन   ही  दिन  बाद  हमें  छोड़  कर  विदा  हो  गए. मैं  हतप्रभ  हूँ.  पहाड़  क्या, इस  देश  के  अन्दर  अब  कोई  ऐसी  शख्सियत  कभी  जन्म  नहीं  लेगी. वे  जिस  युग  के  अनुभवों  को  साथ  लिए  चलते  थे, वे  दिन  ही  कभी  वापिस  नहीं  आने  वाले  हैं. हम  सबको  आपकी  नई भारत यात्रा  की  प्रतीक्षा  रहेगी".--------विद्या  सागर  
लगभग कुल ज़मा यही तीन स्नेहभरी मुलाकातें हैं. बीच बीच में डेढ़ साल तक उनसे इमेल पर बातचीत होती रही, देहरादून के दुसरे दोस्तों से उनकी खैरियत की पूछताछ भी. आस थी कि अभी कुछ और मुलाकातें उनसे होंगी, क्या पता था २०१० से जिस तरह से हम गिरदा को बिसूरते रहे, दो साल बाद नौटियाल जी भी याद में ही रह जायेंगे.
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डा. विद्या सागर नौटियाल का इस वर्ष १२  फरवरी को ७९ वर्ष की आयु में देहांत हो गया.  बेहद चौकन्ना मस्तिष्क, सरल ह्रदय, दुबले पतले नौटियाल जी  ६५ वर्ष से ज्यादा वामपंथी राजनीती में सक्रिय रहे और पहाड़ की जमीन , जीवन अनुभवों, और लोगों के साथ गहरे जुड़ाव से उपजी उनकी कहानियां पहाड़ के कठिन जीवन की  प्रमाणिक  झलक है. विद्या सागर इस मायने में विलक्षण साहित्यकार थे कि लम्बे राजनीतिक जीवन के बावजूद उनके साहित्य में राजनैतिक  नारेबाजी  नहीं है, लेकिन जन की पीड़ा के गहरे चित्र, बंधी नैतिकता को मानवीय आधार पर चुनौती, और  जीवन अनुभवों  से उनका साहित्य समृद्ध  है.  अपनी जड़- और जमीन से उपजा साहित्य है, किसी अमूर्त दुनिया में इसका सृजन नही हुआ.  उनके ही अनुसार 
"अपने लोगों की यह कथा जिसे अनेक वर्षों तक मैंने अपने भीतर जिया है, अपने को अपने समाज का ऋणी  मानते हुए उससे उऋण होने की छटपटाहट में लिखता हूँ, साहित्य मेरे लिए मौज मस्ती का साधन नहीं , जिन्दगी की ज़रुरत है. लेखन के काम को में एक फ़र्ज़ की तरह अंजाम देता हूँ. किसी प्रकार की हडबडी के बगैर लिखता हूँ, और किसी की फ़रमईश पर नहीं लिखता. जो मन में आये वो लिखता हूँ. सिर्फ वही लिखता हूँ". 

बचपन और विद्यार्थी जीवन
 20 सितंबर 1933 को टिहरी के मालीदेवल गांव में राजगुरु कुल में  विद्या सागर जी का जन्म हुआ. उनके पिता नारायण दत्त नौटियाल वन विभाग में अधिकारी थे व माँ रत्ना सावली गाँव के भट्ट परिवार से थी. उनका बचपन टिहरी रियासत के घनघोर जंगलों के बीच बीता, और ११-१२ साल की उम्र में प्रताप इंटर कोलेज में पढने के लिए टिहरी शहर आ गए.  इसी कच्ची  उम्र में  राजनीती और लिखने -पढने की उनके जीवन में साथ साथ पैठ बननी शुरू हुयी. इन्हीं दिनों वो शंकर दत्त डोभाल के संपर्क में आये और रियासत के भीतर राजशाही के खिलाफ चले प्रजामंडल आन्दोलन में हिस्सा लेने लगे, "श्रीमन जी" के साथ गाँव-गाँव पैदल यात्रा करने का मौका मिला, और नागेन्द्र सकलानी जैसे नेताओं का असर पड़ा. इसी उम्र में एक कविता संग्रह उन्होंने तैयार किया था, जो कभी छपा नहीं, और गुम हो गया था.  जल्द ही भारत आज़ाद हो गया परन्तु टिहरी की जनता को राज शाही से मुक्ति नही मिली. रियासत की जनता प्रजामंडल की अगुआई में सम्पूर्ण भारत की आजादी की तरह टिहरी के भीतर भी आजादी की मांग को लेकर आन्दोलन और धरने पर बैठ गयी. १७ अगस्त १९४७ को राजशाही के खिलाफ धरने में शामिल होने के कारण सिर्फ 13 साल की उम्र में उन्हें राजद्रोह के आरोप में जेल भेजा गया.  हाईस्कूल के बाद  विद्या सागर टिहरी रियासत से बाहर निकल आये और आगे की पढ़ाई क्रमश: देहरादून और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से की, जहां उनकी सक्रियता वामपंथी छात्र आन्दोलन में रही . बनारस में उन्हें पी. सी. जोशी, मोहन उप्रेती, नईमा उप्रेती,  रुस्तम सैटिन, जैसे राजनैतिक साथी मिले, बाबा  नागार्जुन, नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह आदि साहित्य धर्मी मित्र मिले. बीएचयू में अंग्रेजी साहित्य से एम. ए.  के दौरान आंदोलन में सक्रियता के चलते उन्हें विश्वविद्यालय से निष्कासित किया गया. १९५३  व १९५७  में बीएचयू छात्र संसद के "प्रधानमंत्री" (अध्यक्ष के लिए शायद यही शब्द था)  और  १९५८  में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के छात्र संगठन एआईएसएफ के  राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए.  इसी वर्ष उन्होंने वियना में हुए अंतर्राष्ट्रीय युवा सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. 
छात्र जीवन में ही १९५३-५४ में उनकी कहानी ‘भैंस का कट्या’, "मेरा जीवन एक खुली किताब है "  और "मूक बलिदान’" छपीं. कहानी लिखने के शुरुआत दिनों  में वे यशपाल से प्रेरित रहे. 

 टिहरी वापसी, देशभक्तों की कैद में , विधायक 
 १९५९ में वापस टिहरी आने के बाद नौटियाल जी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए  और अगले कई वर्षों तक उन्होंने कहानियाँ नही लिखीं, एक तरह से साहित्य से वनवास ले लिया और आदमी नामक जीव और अपने आस-पास के जीवन को पढ़ते रहे. टिहरी  में नये  सिरे से संगठन की शुरुआत की और दो वर्षों तक गुणानंद पथिक और दलेब सिंह असवाल के साथ हाथ में लाल झंडा लिए टिहरी, उत्तरकाशी और चमोली के गाँव गाँव में घूमते रहे. टिहरी में इस बीच राजशाही ख़त्म हुयी और भारत चीन युद्ध शुरू हो गया और बहुत से वामपंथी नेताओं के साथ विद्यासागर जी को भी २२ महीने के लिए जेल भेज दिया गया. अपनी गिरिफ्तारी के समय वो चीन-भारत विवाद से उत्पन्न परिस्थिति में सुरक्षा कार्यों में जन सहयोग संगठित करने के लिए टिहरी में  प्रचार कर रहे थे. उन दिनों की याद में उन्होंने लिखा है.
"चीन ने भारत पर हमला किया था, कम्युनिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता होने के कारण हमें चीन समर्थक मान लिया गया था, और जेल में बंद कर दिया गया था. भारत सुरक्षा अधिनियम में  बगैर कारण  बताये, बगैर मुकदमा चलाये, बंद करने का अधिकार सरकार को मिल गया था". 
बरेली की जेल में उनके साथ मोहन उप्रेती और चन्द्र सिंह गढ़वाली भी थे. उन दिनों के संस्मरण उन्होंने "देशभक्तों की कैद" नाम से लिखे है, और कुछ वाकये  उनकी संस्मरण पर आधारित  "मोहन गाता जाएगा" (२००४, राधाकृष्ण प्रकाशन) में हैं.  इस किताब को पढने के बाद उनकी दूसरी रचनाएँ और जीवन के साथ उनके अंतर्संबंध की भी कुछ झलक मिली. बहुत  मीठेपन से  नौटियाल जी ने उन दिनों के जेल वाले  करिश्माई मोहन उप्रेती को याद किया है, जेल के भीतर उनकी गायकी की रंगत, कैदियों के बीच नृत्य नाटिका का आयोजन, और जेल प्रशासन को किस तरह उप्रेती जी ने अपना मुरीद बना डाला.   बाद के वर्षों में उन्होंने वकालत की पढ़ाई की, साहित्य में पी.एच डी.  भी की.  लम्बे समय तक सबसे गरीब लोगों का कानूनी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व करते रहे. वन आंदोलन, चिपको आंदोलन के साथ वे टिहरी बांध विरोधी आंदोलन में भी जनता के पक्ष में लड़ते रहे और  1980 में देवप्रयाग से उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए. शायद भारत के लोकतंत्र के इतिहास में वो अकेले जननेता होंगे जिन्होंने महीनों महीनों दूर दराज़ के क्षेत्रों की लम्बी पैदल यात्राएं की, लोगो की बात सुनीं  और जितना भी संभव हुया उनकी बात आगे रखी, और एक मामूली दो कमरे के घर में अपना पारिवारिक जीवन बिताया.   
टिहरी की जमीन से बेदख़ल और तीस वर्ष बाद साहित्य में  वापसी 
टिहरी बाँध की परियोजना में अपनी घर जमीन से नौटियाल जी भी बेदखल हुए और देहरादून बसे. परन्तु उनका सिर्फ भोगोलिक विस्थापन ही हुआ, ये साहित्य के ज़रिये टिहरी वापस लौटना और उस डूबी जमीन पर शेष जीवन खड़े रहने की शुरुआत थी.  ३० वर्षों बाद १९८४ में  "टिहरी की कहानियां" राजकमल प्रकाशन से छपीं और ६० साल की उम्र में फिर उन्होंने साहित्य की तरफ रुख किया.  जीवन के आखिरी दो दशकों में उनकी दस से अधिक किताबें प्रकाशित हुईं. जिनमें "भीम अकेला", "सूरज सबका है", "सरोज का सन्निपात", "उत्तर बायाँ है",  "स्वर्ग दद्दा पाणि पाणि", "फट जा पंचधार", "यमुना के बाग़ी बेटे",  "मेरी कथा यात्रा " और "मोहन गाता जाएगा"  प्रमुख है.  अपने साहित्य में नौटियाल जी कभी टिहरी के बाहर नही गए, विश्व बंधुत्व की उदारता और राजनीती में अंतर रास्ट्रीयता के हिमायती होने के बावजूद उनके रचना की भूमी यही रही, जिसे वो बहुत गहरे पहचानते थे, जिसे पैदल वर्षों तक उन्होंने नापा था, जिनके भीतर रहने वाले लाखों लोगों के सुख दुःख और सपनों के वे भागीदार थे.
"पहाड़ दरअसल वैसा नहीं है, जैसा वह दो  घड़ियों के अपने जीवन को पहाड़ पर बिताने वाले सैलानियों को दिखाई देता है.  पूर्णमासी का, शरद का चाँद घने जंगल में अपनी रोशनी डालता है तो उसकी झलक मात्र से जीवन धन्य लगता है.  सूरज, नदियां, घाटियां और इन पहाड़ों में बसने वाले लोग, ये सब शक्ति देते हैं.  उच्च शिखरों पर बुग्यालों के रंगीन कालीन के ऊपर बैठकर एक क्षण के लिए सूर्य की किरणों के दर्शन जीवन को सार्थक करने लगते हैं. लेकिन इन पहाड़ों में भीतर जीवन विकट है.  याद रखना चाहिए कि इस हिमालय में पांडव भी गलने आए थे.  मैं इस विकट पहाड़ में रम-बस गया.  इसे छोड़कर कहीं बाहर भाग जाने की बात नहीं सोची.  अपनी रचनाओं में मैं इस पहाड़ की सीमाओं के अंदर घिरा रहा.  टिहरी के बाहर नहीं निकला. निकलूंगा भी नहीं". 
उनकी किताबें पढतें हुए अजब खुशी से मन भरता है, हिम्मत से भी... एक जीवन इतना समृद्ध, इतना सरल और रचनाधर्मिता से लाबाबब. बिना औपचारिकता के, बिना दिखावे के, बिना साज सामान, जैसे किसी फालतू चीज़ की उसमें जगह नहीं. जीवन जिसने बहुत बहुत समाज को दिया, लिया बहुत बहुत कम... 
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नौटियाल जी को याद करते हुए नवीन जी ने  यहाँ और और शिव प्रसाद जोशी जी ने  यहाँ लिखा है, पल्लव कुमार से बातचीत यहाँ है. अब उन्हें कुछ जानना उन्हें जानने वालों के मार्फ़त भी जानना होगा. शिव जोशी की नौटियाल जी से बातचीत हिलवाणी में सुनी जा सकती है.

Jan 29, 2012

आयोवा-02

इस सर्दी में हिन्दुस्तान छोड़े हुये १५ साल पूरे हो जायेंगे. एम्स, आयोवा में बिताये हुये कुछ पहले महीनों की यादें अचानक फिर से जहन में उठ रही हैं. ये पोस्ट कभी Sep 7, २००९ में लिखी थी. फिर से पोस्ट कर रही हूँ...

आयोवा  की पहली सुबह, ठण्ड मे घुली हुयी और धुप-छाँव की आँख-मिचौली के साथ शुरू हुयी. लैब जाने के लिए एक मित्र ने राईड दी और दो चीजे जो रात के अंधेरे मे नही दिखी वों सुबह के उजाले मे हतप्रभ करनेवाली थी; एक तो १००% समतल लैंडस्केप, और दूसरा, चिनार के, ओक और  तकरीबन १५-२० अलग-अलग जातियों के पेड़, सब के सब अमूमन ३० फिट की ऊँचाई से ज्यादा नही. लगभग वीरानी से भरा शहर,  चारों तरफ  सिर्फ़ कार ही कार, लोग नही.  लोगो को देखना तब तक न हुआ , जब तक अपनी बिल्डिंग के अन्दर नही घुस गए. पहला दिन कई तरह की कागज़बाजी मे बीता और इस बहाने लगभग पुरे कैम्पस मे चक्कर लगाना पढ़ गया. बहुत जल्द सभी पेडो का ३० फिट से ऊंचा न होना मेरी समझ मे आ गया. आयोवा मे खासकर ठण्ड मे 50-६० किमी प्रति घंटा की रफ़्तार से बर्फीली हवा चलती है, जो पेडो को इस ऊंचाई से ज्यादा बढ़ने नही देती, पेड़ टूट जाते है। दूसरा, हवा की इतनी तेज़ रफ़्तार तापमान को -२० डिग्री से -४० डिग्री तक आसानी से पहुंचा देती है. मुझे इसका कोई पूर्वानुमान नही था. सिर्फ़ इतना पता था की बर्फ पड़ती है आयोवा मे। और लगा था, की पहाडी लड़की को बर्फ से क्या डरना? और इस लिहाज़ से जिस तरह के जैकेट की दरकार थी, वों मैं लेकर नही गयी थी। थोडा बहुत ढूढा था, लखनऊ , दिल्ली मे, पर कोई ठीकठाक जैकेट मिली नही, और अंत मे लखनऊ से एक कोट लिया. कोट देखने मे तो ठीक था, पर मौसम को झेलने की कुव्वत उसमे नही थी. हड्डी तो दूर, मज्जा को भी मजा चखाने के लिए चाकू सी तेज़ ठंडी हवा काफी थी. अपनी सीमित जानकारी के चलते, डॉन किहोते टाईप के एडवेंचर की ये शुरुआत भर थी....

दूसरे दिन एक लोकल कांफ्रेंस हमारी ही बिल्डिंग मे शुरू हो रही थी. एक एक करके लोगो से बतियाना शुरू किया, काम के बारे मे पूछा और कुछ अंदाज़ लगा की कैसे लोग है? क्या करते है? और "सायंस के मक्का" मे सायंस का क्या हाल-चाल है. पर अभी तक तो सबसे बड़ी दिक्कत थी घर ढूँढने की, कैसे ढूंढा जाय? कुछ लोकल अखबार ढूंढें, फ़िर अगले एक हफ्ते तक कई लोगो को फ़ोन किया, पर दिक्कत ये की शहर का कुछ नक्शा पता हो तो समझ मे आए. लैब के कुछ सहकर्मी मदद देने को तैयार थे (जिसमे सिर्फ़ कार राईड, और ग्रोसरी शोपिंग शामिल थी), कोई भी सीधी जानकारी देने की पहल नही कर रहा था. जिसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, यानी किराए का मकान कैसे और कहाँ मिलेगा ?  कुछ मेरा अंतर्मुखी स्वभाव भी आड़े आया, और जितना कम हो सकता था उतनी ही मदद लेने का मेरा विचार था.  अगले दिन लिफ्ट मे एक हिन्दुस्तानी साहब नज़र आये, सोचा की इनसे पूछा जाय, कि लोकल ट्रांसपोर्ट क्या है? पर वों बोले के "मैं यहाँ बहुत अरसे से हूँ".  मतलब कि "अपना रास्ता नापो! यू आर फ्रेश आउट ऑफ़ बोट"  . इसी बीच जिन प्रोफ़ेसर के घर पर मेरा टेम्पररी रुकना था, वही पर तीन दिन के लिए, संतूरवाले शिवकुमार शर्मा जी, उनके बेटे राहुल और तबलावादक सफत अहमद खान आकर रुके. उठते-बैठते इन तीनो लोगो से काफी बातें हुयी. संगीत, खासकर सेमी-क्लासिकल, और वोकल को सुनने की आदत थी, पर विशुद्ध रूप से "इंस्ट्रुमेंटल" से मेरा परिचय यही से शुरू हुआ. शिवजी से पूछा कि गाने की तो थीम होती है, आप खाली इंस्ट्रुमेंटल परफोर्मेंस की थीम कैसे लिखते है? उनका सुझाव था कि शाम को उनका कंसर्ट सुना जाय, और मैं ख़ुद समझने की कोशिश करू कि क्या कहा जा रहा है? फ़िर अगले दिन इसके बारे मे बात की गयी. इंस्ट्रुमेंटल को समझने की शुरुआत शायद उसी दिन से हुयी.

तकरीबन तीसरे-चौथे दिन कॉफी मशीन के पास एक दूसरे सज्जन फिरोज़ ने बतियाना शुरू किया, पता चला वों उजबेकिस्तान के है, करीब साल भर पहले आए है. उसके बाद करीब १५-२० मिनट बातचीत होती रही. फिरोज़ ये जानकर खुश हुआ की मुझे समरकंद के बारे मे और उलूगबेग के बारे मे पता था. अगले दिन कुछ तस्वीरे उसने मुझे दिखाई, यशब  के प्यालों की, मेहराबदार घरों और गुम्बदों पर फिरोजी ही रंग के पत्थरों की सजावट, एक पुराना ज़रदोज़ी का कोट, अपनी मंगेतर और घर के लोगों की तसवीरें. फ़िरोज़ से ही लोकल ट्रांसपोर्ट और घर किराए पर कैसे ढूंढा जाय ये पूछा. उनकी एक मित्र हाल-फिलहाल मे कैलीफ़ोर्निया चली गयी थी और उसका अपार्टमेन्ट किराए पर उठाना फिरोज़ साहेब की जिम्मेदारी थी. सो फिलहाल तीन महीने के लिए घर का इन्तेजाम हो गया था, जुलाई के महीने में मेरे पास भरपूर चोयास होती क्यूंकि एम्स शहर में मकानों की लीज़ जुलाई से जून के बीच ही मिलती है. मेरे प्रोफेसर ने अपने घर से मेरा समान अपार्टमेन्ट तक पहुंचाया, और कुछ समान खरीदवाने के लिए ग्रोसरी स्टोर लेकर गए. जितना भी हो सकता था, समान लिया, और यही पर मुझे बस का पास, और शहर का नक्शा जो निहायत ज़रूरी था, वों भी मिला.

ऐम्स एक बेहद छोटा शहर है, अप्रेल पहले-दूसरे हफ्ते के बाद मौसम कुछ खुल गया, और अक्सर पैदल चलने की वजह से शहर के बारे मे मेरा एक अनुमान बन गया. करीब एक हफ्ते के बाद लौंड्री रूम मे जो अपार्टमेन्ट मे साझा था, हैदराबाद से आए एक तेलगु परिवार से जान-पहचान हुयी, राव भी सीनीयर पोस्टडोक थे, और उनकी पत्नी और दो साल का बच्चा, ये लोग मेरे ही अपार्टमेन्ट मे रहते थे. उसी वक़्त इसरार करके वों लोग मुझे अपने घर ले गए, खाना खिलाया, और एक बेहद आत्मीयता के माहौल से मैंने कुछ घंटो के बाद विदा ली.

लंच के वक़्त अक्सर फिरोज़ से और कुछ दिन बाद उसके रूसी दोस्तों से बात होती थी और बातें दुनिया जहान की.  मजे की बात ये थी कि रूस के १६ टुकड़े अस्सी दशक के आख़िरी सालो मे हुए थे, उन सभी देशो के लोग एम्स मे एक ही ग्रुप मे रहते थे, सभी अपनी भाषा के अलावा रूसी बोलते थे, आपस में गहरे सूत्र मे बंधे लगते थे. मैं अक्सर सोचती थी, कि भारत और पाकिस्तान के बीच इतनी दुश्मनी क्यो है? कुछ महीनों के बाद कुछ पाकिस्तानी दोस्त बने तब मैंने जाना की हमारे बीच में भी खान-पान, भाषा और संस्कृति के वैसे ही सूत्र है, परन्तु हमारे देशों की राजनीती हमारी संस्कृति और साझेपन पर सवार हो जाती है.

रूसी साहित्य को पढ़कर जो कुछ समझ बनी थी, उसका फायदा ये हुया कि मैं लगभग सभी रूसी नामो को सही उच्चारण करती थी, और अक्सर तो कई शहर जिनके बारे मे सिर्फ़ पढा था, रूसी क्रांती के बारे मे भी सिर्फ़ पढा ही था, पर काफी देर तक बातें होती थी. उस ग्रुप के अधिकतर दोस्तों के परिवार भयंकर आर्थिक संकट के समय से गुजर रहे थे. फ़िर भी जितना हो सकता था, भाई-बहन, दोस्त, नाते रिश्तेदार एक दूसरे की भरपूर मदद करते थे. इसी बीच एक लड़की उक्रेन से आयी, और फ़िर उसकी मकान ढूँढने की फजीहत को देखते हुए, मैंने उसे अपने अपार्टमेन्ट मे रहने के लिए कह दिया.  उसे अंगरेजी बहुत कम आती थी और अक्सर बात करते समय उसके हाथ मे डिक्शनरी होती थी. उसके साथ बड़ी आत्मीयता बनी. लेरेसा जितनी बढिया इंसान थी, उतनी ही आला दर्जे की वैज्ञानिक भी, और वैसी ही मेहनत और रुची के साथ खाना भी बनाती थी. उसका बेहद महीन किस्म के काम को लैब मे देखकर  और उसका धैर्य देख कर मुझे बहुत राहत मिलती थी. लेरेसा के मार्फ़त उन दिनों और उससे पहले के रूस के बारे मे मुझे काफी कुछ समझने का मौका मिला, उस भूभाग के साहित्य और संगीत, खानपान, और लोगो के बारे मे पता चला.

पहला भाग यहाँ पढ़े

Jan 20, 2012

सायंस और सोसायटी

सेन डियागो में प्लांटस  एंड एनिमल जेनोम की सालाना मीटींग है,  अच्छी किस्मत रही की मीटिंग के दिनों पूरी फुर्सत से मीटिंग अटेंड की, होटल में एक अच्छी बेबी-सिटर मिल गयी, एक दादी की उम्र की महिला, जिसके अपने नाती-पोते हैं. एक स्कूल की रिटायर्ड टीचर, जल्दी ही बच्चों के साथ घुल मिल गयी है.  छोटे बच्चों की माँ के लिए १२-१४ घंटे चलने वाली मीटींग में शिरकत करना लगातार ३-५ दिन तक आसन नहीं होता, खासकर जब पति-पत्नी एक ही चरखे पर दौड़ रहे हो. पिछले कई सालों में बहुत सी ऎसी मीटिंग्स हम लोग साथ साथ नहीं अटेंड कर सके. अमेरिकन सोसायटी फॉर प्लांट बायलोजी ने कुछ वर्ष पहले एक नीती बनायी थी कि यदि पति-पत्नी मीटिंग अटेंड कर रहे हैं, उनके बच्चों की देखरेख के लिए वो इंतजाम करेंगे. किन्हीं वजहों से ये अब तक मुमकिन नहीं हो सका, क्यूंकि मीटिंग के कांफेरेंस सेंटर की  बीमा पालिसी इसके आड़े आती रही. फिर भी अगर हमने व्यक्तिगत रूप से किसी को बेबी सीटिंग के लिए रखा तो उसकी कीमत का कुछ हिस्सा उन्होंने वापस किया हैं. इस तरह के सरोकारों का किसी पालिसी में तब्दील होना बहुत से वैज्ञानिकों जिनके छोटे बच्चे है, उन्हें कुछ तसल्ली के साथ काम करने का माहौल देता है. कोर्नेल के पोस्टडोक दिनों में मेरी सेलरी का ८०% भाग दो बच्चों की देखरेख में चला जाता था. हाथ में बहुत कम पैसे आते थे, पर ८ घंटे का समय मिलता था जिसमे कुछ काम किया जा सकता था. आर्थिक फायदे नुकसान  से बहुत ऊपर कुछ रचात्मकता का सुख और नए सीखने की चाह बनी रहती थी. एक दशक पहले  कोर्नेल ने अपने पी. एच. डी. छात्रों और पोस्टडोक माताओं के लिए एक बड़ी मामूली से पहल की थी, चाइल्ड केयर ग्रांट की. उस ग्रांट में से दो दफे कुछ एक एक महीने की चाइल्ड केयर की फीस रिफंड हुयी. इतने सालों के बाद भी मुझे उसे अक्नोलेज करते हुए खुशी होती है. बहुत सी दूसरी जगहों में इस तरह का ख्याल अभी बना नहीं है, और उस ग्रांट के बारे में सुनते हुए भद्र वैज्ञानिकों की तिरछी मुस्कान भी दिखती है, फिर कोई ऐसा स्वर भी जो इस ग्रांट के महत्तव को समझता है. इतने दिनों बाद कल एक पुराने कोर्नेल के डिपार्टमेंट हेड से बात करते हुए मैंने इस ग्रांट को याद किया और एक नयी ग्रांट के बारे में पता चला की अब इस तरह की मीटिंग में जाने के लिए कोर्नेल की फेकल्टी को अपने साथ बेबी सिटर को लेजाने और उसके समय की कीमत को कवर करती नयी फेलोशिप अस्तित्व में आयी है. सायंस और टेक्नोलोजी  में औरतों की कम भागीदारी, और पलायन के रोने-गाने से बहुत बहुत अच्छी ये छोटी छोटी पहल है, जो उन्हें सक्षम बनाती है.
पुराने कई परिचित मिले. पुराने दिनों के  की संगत के बीच फैले स्नेह सूत्र भी फिर से दिखे. उस भोली उम्र के उत्साह की यादें,  कुछ मामूली महीन जानकारियों के बीच टांग खींचने के अवसर और लुत्फ़ बचे रह गए है. कोर्नेल के बहुत से पुराने परिचित फिर से मिले, उनसे फिर अब ३-४ साल बाद मिलना अच्छा लगा, नए लोगों से बात हुयी, बहुत सी नयी जानकारियों के बीच लगता है कितने पीछे छूटती चली जा रही हूँ.
पिछले दशक की सायंस हाईथ्रूपुट टेक्नोलोजी से ड्रिवन रही है, इतना डाटा, कि उसका ठीक ठीक ज्ञान और सूचना में तब्दीली कठिन काम है,  ली हूड अपने प्लेनरी लेक्चर  में आने वाले दस सालों में हेल्थ इंडस्ट्री के बारे में कई अनुमान प्रोजेक्ट करते हुये ये भी कहते है कि हर परिवार का जीनोम सीक्वेंस हो जाएगा, मेडिसिन और ट्रीटमेंट्स बेहद व्यक्ति केन्द्रित हो जायेंगे. बहुत सी नयी डायग्नोसिस की बात करते है. उन्हें सुनते हुये मुझे "Gattaca" की याद आती है. टेक्नोलोजी ड्रिवन समाज की सोच कर कुछ सिहरन होती है.
भारत में अब पिछले २०-२५ साल वाली आर्थिक स्थिति नहीं है कि रिसर्च के लिए सामान और पैसा न हो. आज कई नए इंस्टीटयूट बने है, महल सरीखे, ऐसी सजधज के साथ नए यूरोपीयन और अमेरिकी इंस्टीटयूट भी नही बने है पिछले दशक में, हर नए से नए मॉडल का इंस्ट्रूमेंट वहां है, अगर कोई काम करना चाहे तो किसी तरह की भौतिक सीमा काम करने के आड़े नहीं है. रिसर्च के लिए आज कई गुना बड़ा बजट है. परन्तु, कोई बड़ा विजन सायंस और सायंस की नीती को गवरन करता नही  दिखता. तुगलकशाही और मठ तो हिन्दुस्तानी सायंस में बहुत पहले से थे, अब दुसरे विद्रूप भी पैठ बना चुके है. 
बहुत से भारतीय वैज्ञानिक भी मिले, उनमे से कुछ स्वदेश लौटने की कशमकश के बीच थे, कुछ वहां जाकर फिर वापस लौट आयें है, बहुत बुरे अनुभव और अपमान साथ लेकर लौटें हैं. अयादुरई की कहानी तो पब्लिक डोमेन में है ही. शिवा के किसी फेन का ब्लॉग है "freedom for science"   . जहां इस बहस के कई बिंदु समझ में आते हैं. ये एक वीडियो भी है. शिवा की कहानी और ढेर से दुसरे वैज्ञानिकों की व्यक्तिगत कहानियों की तरह ये चीज़े ख़त्म न हो, हमारे समाज की चेतना का भी ये हिस्सा बने. समाज के खून पसीने की कमाई से भारत में विज्ञान का कारोबार चलता है, इसीलिए सायंस कोई टापू नहीं है, समाज के साथ, समाज की स्वतंत्रा और संस्कृति के साथ उसका गहरा रिश्ता है, और उसकी अकाउंटेबिलिटी पारदर्शी हो, ये प्रक्रिया स्वस्थ दिशा में बढे इस उम्मीद में ये वीडियों  चस्पा कर रही हूँ.


बहुत सी कहानियां, और बहुत बुरी कहानियां मिडिल और एंट्री लेवल के वैज्ञानिकों के अनुभव की हैं, जो शायद ही कभी पब्लिक डोमेन में आयें, हमारी सामाजिक स्मृति और समय का हिस्सा बनें. पोपुलर मीडीया  भारत से ब्रेनड्रेन की उथली कहानी को बेच कर अपना सुख पाता है. जबकि सच्चाई  ये भी है कि सायंस का भी एक प्रभु वर्ग है, जिसके हाथों में सारे संसाधन, और ताकत, अकूत तुगलकी सत्ता है, बहुत बहुत पैसा है, और उसके पैरों के नीचे दबी लाखों गरदनें है. ब्रेन-ड्रेन में वैज्ञानिकों का कुछ डालर कमा लेने की आकांशा से कई अधिक प्रतिशत देश में काम करने के समुचित अवसरों का न मिलना है, और अगर मिल भी गया तो वहां का दमघोटू सामंती कामकाज का माहौल है. बकौल अयादुरई के "Our interaction with CSIR scientists revealed that they work in a medieval, feudal environment," says Ayyadurai. "Our report said the system required a major overhaul because innovation cannot take place in this environment.". 
ये कहानी वैसे भी एक बहुत टॉप लेवल के अमेरिका में शिक्षित और पले-बढे वैज्ञानिक मर्द की है, जिसकी योग्यता और ट्रेनिंग पर कोई प्रश्नचिन्ह नही है. इसे कोई ऐसे ही खारिज नहीं कर सकता. औरतों की समान्तर कहानियाँ अभी हालिया एक सर्वेक्षण में आयी है की भारत में ६०% पी एच डी महिला वैज्ञानिक बेरोजगार है, उन्हें नौकरियां नही मिलीं. सायंस और सोसायटी के बीच का जो आयरन कर्टन है, उसे अब हटना ही है, धीरे-धीरे ही सही, तभी सायंस की उन्मुक्त रचनाशीलता को भी तभी रास्ता मिलेगा...