"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Sep 23, 2011

भाषा की संगत




 "When we use our native language, a torrent of words flows into and out of brain. The occasional frustration of having a word stuck on the tip of the tongue, the slow ordeal of composing a passage in a foreign language, and the agony of a stroke victim struggling to answer a question reminds us that our ordinary fluency with language is a precious gift."-- in 'Words and Rules' ----Steven Pinker 
 
 घर की दहलीज़ के भीतर बोलना गढ़वाली में सीखा, हिन्दी भी वहीं  थी आँगन में खड़ी, बारादरी की बहसों के बीच, पड़ोस के घर में,  रेडियो पर बजती. फिर लिखना-पढ़ना, ठीक से सोचना इसी हिन्दी भाषा में सीखा, गढ़वाली घर के भीतरी कोनों में खिसकती चली गयी, कहीं याद में बिना शब्दों के मीठी तान बजती, स्वर धीरे से खो गए. इतना याद रहा क़ि इस भाषा को सुनते हुए लगता कि  स्वर और शब्द साथ-साथ रोतें है, हँसतें है, गढ़वाली में बात करना ऐसे, जैसे कोई लगातार गाने का रियाज़ हो, उसकी लय में ही उदासी, उल्लास, बैचैनी सारे भाव इतनी आसानी से घुले रहते की शब्दों को भी पकड़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती.  शब्द और भावों की भिडंत न होती, आर-पार सब पारदर्शी .....
हिंदी की मुख्यधारा का दबाव होगा, या सबके बीच घुलमिल जाने की चाह, भीड़ के बीच अलग से इंगित होने का डर, या सबका मिला जुला असर, गढ़वाली भाषा का संगीत मेरे स्वर से हमेशा के लिए जुदा हो गया, उसकी जगह सपाट, बिना उतार चढ़ाव वाली, खड़ी बोली घर कर गयी. कोई उतार चढ़ाव स्वर में नहीं, निस्संग भाषाई संस्कार, जैसे बात करने वाला जो है, उसकी अपनी कही बात के साथ ही कोई रिश्ता नही. वापस पलटकर गढ़वाली बोलने की कोशिश करती हूँ तो सबसे पहले मेरी माँ को अटपटा लगता है, ये स्वर गढ़वाली नहीं रहे, रूखे है, लय से इनका सामंजस्य नहीं है. वो मुझसे कहती है, तू हिंदी ही बोल... 

पिछले वर्ष देहरादून के आस-पास के गाँवों में गयी तो कुछ गढ़वाली गाँवों में सभी बच्चे हिंदी बोलते दिखे, किसी को गढ़वाली नहीं आती थी. देहरादून की नजदीकी बसावट के ये गाँव शायद कई पीढ़ी पहले अपनी भाषा भूल गए होंगे. इनके लिए कठ्मोली या इसी तरह का कोई शब्द चलन में है. भाषा हिन्दी है, पर इन सबके स्वर न खड़ी बोली वाले है, न ही गढ़वाली की मिठास है कहीं,  बरेली, सहारनपुर के चूड़ी बेचनेवालों, और गरीब मुसलमान कारीगर तबके के स्वर इनकी भाषा में बजते हैं.

अंग्रेजी जीवन में सबसे बाद में दाख़िल हुयी, एक तरह से कॉलेज़ पहुँचने के बाद की भाषा, ज़रूरी भाषा, वो परिवेश की भाषा न थी, बर्ताव की भी नहीं, लगातार रट लेने वाली भाषा थी. सिर्फ स्मृति की भाषा, बाद में परिवेश की, काम-काज की भाषा बनी. खड़ी बोली का सपाटपन अंग्रेजी के पाश्र्व में मौजूद रहता है. और सहमापन, अटपटापन भी किसी कोने छिपा रहता है, जो हाव-भाव के साथ सहजता बनने नहीं देता, अचानक से इस भाषा में कोई चुहल नही सूझती, कोई मुहावरा, कोई कहावत, कोई लोकोक्ति यूं ही नहीं टपकती. इन सबका रियाज़ करना पड़ता है. मेरे स्वर, शब्द और भाव तीनों में कोई भीतरी, आत्मीय संगत नही है. अंग्रेजी पर सचेत और अचेत दोनों तरह से अमेरिकनाइज़्ड  एक्सेन्ट की परत चढ़ गयी है, लेकिन मूल हाव-भाव के साथ उसका सहज मिलाप नहीं ही हुआ है. 

अब इतने बरसों बाद भी, न पढ़ी  और लिखी गयी और न बरती गयी गढ़वाली भाषा की मिठास जबकि अब भी मेरे चेतन अवचेतन में बसती है. पहली भाषा, परिवार की और विरासत की अंतरंग भाषा और मादरीजबां  इतनी आसानी से नहीं छूटती ....

  मेरे यूरोपियन दोस्त हमेशा कहते रहे हैं कि क्यूँ हिन्दुस्तानी इतनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलने के बाद भी भाषा के साथ सहज नहीं, उनके एक्सप्रेशन सपाट होते है? चहरे पर भाव सहजता से आते जाते नहीं? स्वर में कोई उतार-चढाव नहीं होता?  यूरोपीय लोगों में  ये बात नहीं दिखती, वो अंग्रेज़ी बोलते है तो उनका मूलस्वर, हाव-भाव बहुत हद तक अपनी जमीन पर रहते है. हमारी तरह सपाट और सहमें नहीं होते, न ही अमेरिकी, ब्रिटिश स्वर की नक़ल की ऐसी पुरजोर कोशिश...

भाषाओँ की सहज संगत होना सिर्फ भाषा का मामला भर नहीं है, सभ्यता का मामला है, सत्तातंत्र के भीतर भाषाओं की हायरार्की का मसला है, एक समान्तर जाति-व्यवस्था, समाजशास्त्र की बात है. किसी भी भाषा के साथ दोस्ती होने के पहले ही आम लोग सत्ता के समीकरणों से सहम जाते है. क्षेत्रीय भाषा हिंदी के आगे, हिंदी अंग्रेजी के सामने. हमारी शिक्षा प्रणाली सिर्फ इस व्यवस्था को बनाए रखने का, इन मूल्यों की कन्फरमिटी का टूल है. शिक्षा हमें सिर्फ जो भी चालू व्यवस्था है उसीके बीच पैठ बना लेने की समझ देती है, आजादी और जनतांत्रिक तरीके से कुछ नया सीखने-रचने का शऊर, सहज बने रहने का हौसला, नहीं देती.

मेरे लिए हिन्दी ही पढने लिखने की सीखने की, सोचने की पहली भाषा रही, इस लिहाज़ से सारी बाक़ी भाषाओँ से मेरी नजदीकी भाषा है. हिंदी फिर रोज़गार की भाषा न रही, काम की भाषा भी नहीं, और पिछले कई सालों से परिवेश की भाषा भी नहीं. हिंदी में गाहे-बगाहे लिखते रहना, हिंदी पढ़ते रहना भाषा के साथ अपनी आत्मीयता को बचाए रखने की कोशिश है. इस कोशिश इतर भी कोशिश है कि किसी तरह से शब्द, स्वर और लय की संगत भी इसी भाषा में ठीक से ढूंढी जाय. 

खड़ी बोली इतनी सपाट है, हमेशा लय के खो जाने का अहसास बना रहता है, हमेशा लगता है कोई सुरीली संगत काश इस भाषा में संभव हो. सिर्फ गढ़वाली ही नहीं, शायद सभी क्षेत्रीय बोलियाँ हिन्दी में कुछ सुरीलेपन को घोल सकती है. इसे कुछ जीवंत बना सकती है. कुछ सहोदर रिश्ता हिन्दी का बोलियों के साथ हो, दूसरी भारतीय भाषाओँ के साथ हो...


 

5 comments:

  1. सुन्दर सार्थक आलेख. यही कुछ अपने बारे में भी सोचने लग गया. कितनी भाषाओं और बोलियों की संगत रही. अंततः अब हिंदी ही है, जिसमें चैन मिलता है.

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  2. आपके और मेरे जैसे अनगिनत लोग भरसक प्रयास के रहे हैं ताकि हमारी भाषाओँ का प्रचालन और शुद्धताबनी रहे लेकिन परिवर्तन की बयार इतनी तेज़ है कि अधिकांश भारतीय भाषाओँ को विलुप्त और विस्मृत होने में देर नहीं लगेगी. मेरे घर में ही मेरे छः वर्षीय बेटे के अवलोकन से यह कह सकता हूँ कि अगले कुछ सालों में वह मूलतः अंगरेजी में ही सोचने-समझने लायक बचा रहेगा.
    यह सही है कि हम भारतीय व्यक्ति विदेशी भाषाएँ बोलने में सहजता का अनुभव नहीं करते. मैं अच्छी अंगरेजी और कुछ फ्रेंच बोल लेता हूँ लेकिन उसमें मेरे भाव बेहतर नहीं उमड़ते. वही सपाटबयानी रहती है जिसका आपने ज़िक्र किया.

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  3. जो हो गया, उसे मिटाया तो नहीं जा सकता। लेकिन आजादी के बाद अगर 200-400 साल पहले भारतीय विकास की तोड़ दी गई कड़ियों को पकड़कर नयी जरूरतों के हिसाब से ढाला गया होता तो हर भारतीय भाषा आज बेहद सजीव व समृद्धि होती। शायद भक्तिकाल से उठ रही हिंदी भाषा पूरे देश में एकल संपर्क की भाषा बन चुकी होती। ऐसा नहीं हुआ तो यकीकन हमारी सृजनात्मकता को चोट पहुंची है।
    वैसे अपनी भाषा का ऐसा बोध पहली बार पढ़ा, "गढ़वाली में बात करना ऐसे, जैसे कोई लगातार गाने का रियाज़ हो, उसकी लय में ही उदासी, उल्लास, बैचैनी सारे भाव इतनी आसानी से घुले रहते की शब्दों को भी पकड़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती. ऐसा ही कुछ कुमांयुनी, और डोगरी सुनते हुए भी लगा, शब्द और भावों की भिडंत न होती, आर-पार सब पारदर्शी..."

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  4. हाँ, बात तो है कुछ…सब ऐसा महसूस करते हैं…जिसे आपने सपाटबयानी कहा है…लेकिन मानते नहीं यह…

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