घर की दहलीज़ के भीतर बोलना गढ़वाली में सीखा, हिन्दी भी वहीँ थी आँगन में खड़ी, बारादरी की बहसों के बीच, पड़ोस के घर में, रेडियो पर बजती. फिर लिखना-पढ़ना, ठीक से सोचना इसी हिन्दी भाषा में सीखा, गढ़वाली घर के भीतरी कोनों में खिसकती चली गयी, कुछ बहुत दूर की रिश्तेदार हो गयी जिससे बहुत कम बात होती, कहीं याद में बिना शब्दों के मीठी तान बजती, स्वर धीरे से खो गए. इतना याद रहा क़ि इस भाषा को सुनते हुए लगता क़ि लोग गाकर बात करते है. स्वर और शब्द साथ-साथ रोतें है, हँसतें है, गढ़वाली में बात करना ऐसे, जैसे कोई लगातार गाने का रियाज़ हो, उसकी लय में ही उदासी, उल्लास, बैचैनी सारे भाव इतनी आसानी से घुले रहते की शब्दों को भी पकड़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती. ऐसा ही कुछ कुमांयुनी, और डोगरी सुनते हुए भी लगा, शब्द और भावों की भिडंत न होती, आर-पार सब पारदर्शी .....
हिंदी की मुख्यधारा का दबाव होगा, या सबके बीच घुलमिल जाने की चाह, क़ि भीड़ के बीच अलग से इंगित होने का डर, या सबका मिला जुला असर क़ि गढ़वाली भाषा का संगीत मेरे स्वर से हमेशा के लिए जुदा हो गया, उसकी जगह सपाट, बिना उतार चढ़ाव वाली, खड़ी बोली घर कर गयी. कोई उतार चढ़ाव स्वर में नहीं, निस्संग जैसे बात करने वाला जो है, उसकी अपनी कही बात के साथ ही कोई रिश्ता नही. वापस पलटकर गढ़वाली बोलने की कोशिश करती हूँ तो सबसे पहले मेरी माँ को अटपटा लगता है की ये स्वर गढ़वाली नहीं रहे, रूखे है, लय से इनका सामंजस्य नहीं है. वो मुझसे कहती है, तू हिंदी ही बोल...
पिछले वर्ष देहरादून के आस-पास के गाँवों में गयी तो कुछ गढ़वाली गाँवों में सभी बच्चे हिंदी बोलते दिखे, किसी को गढ़वाली नहीं आती थी. देहरादून की नजदीकी बसावट के ये गाँव शायद कई पीढी पहले अपनी भाषा भूल गए होंगे. इनके लिए कठ्मोली या इसी तरह का कोई शब्द चलन में है. भाषा हिन्दी है, पर इन सबके स्वर न खडी बोली वाले है, न ही गढ़वाली की मिठास है कहीं. अजब तरह से लगता है, बरेली के, सहारनपुर के चूड़ी बेचनेवालों, और गरीब मुसलमान कारीगर तबके के स्वर इनकी भाषा में बजते हैं.
अंग्रेजी जीवन में सबसे बाद में दाखिल हुयी, एक तरह से कॉलेज़ पहुँचने के बाद की भाषा, ज़रूरी भाषा, वो परिवेश की भाषा न थी, बर्ताव की भी नहीं, लगातार रट लेने वाली भाषा थी. सिर्फ स्मृति की भाषा, बाद में परिवेश की, काम-काज की भाषा बनी. खड़ी बोली का सपाटपन अंग्रेजी बोलती हूँ तो उसके पाश्र्व में मौजूद रहता है. और साथ-साथ कुछ सहमापन, अटपटापन भी किसी कोने छिपा रहता है, जो हाव-भाव के साथ सहजता बनने नही देता, अचानक से इस भाषा में कोई चुहल नही सूझती, कोई मुहावरा, कोई लोकोक्ती, कोई स्लैंग यूं ही दोस्त की तरह हाथ बढाते हुए नहीं टपकता. इन सबका रियाज़ करना पड़ता है. अपने बहुत से देशवासीयों पर नज़र डालती हूँ तो अपनी झलक मुझे उन सब में दिखती है, कुछ अलग शक्ल-सूरत में. उनकी अंग्रेजी पर सचेत और अचेत दोनों तरह से अमेरिकनाइज़्ड या ब्रिटिश एक्सेन्ट की परत चढ़ गयी है, लेकिन बसिक हाव-भाव के साथ उसका सहज मिलाप नहीं ही हुआ है. मुझे कई सालों तक इसका अहसास भी नहीं हुआ क़ि मेरे स्वर, शब्द और भाव तीनों में कोई भीतरी, आत्मीय संगत नही है.
मेरे यूरोपियन दोस्त हमेशा कहते रहे क़ि क्यूँ हिन्दुस्तानी इतनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलने के बाद भी भाषा के साथ सहज नहीं, उनके एक्सप्रेशन सपाट होते है? चहरे पर भाव सहजता से आते जाते नहीं? स्वर में कोई उतार-चढाव नहीं होता? यूरोपीयंस में खासतौर पर ये बात नहीं दिखती, वो अंग्रेज़ी बोलते है तो उनका मूलस्वर, हाव-भाव बहुत हद तक अपनी जमीन पर रहते है. हमारी तरह सपाट और सहमें नहीं होते, न ही अमेरिकी, ब्रिटिश स्वर की नक़ल की ऐसी पुरजोर कोशिश, क्यूँ? मालूम नहीं...हो सकता है की भाषाओँ की सहज संगत होना सिर्फ भाषा का मामला न हो, हमारी सभ्यता का मामला हो, जहां भाषाएँ भी हायरार्की में चलती है, उनका अपना समाजशास्त्र है. एक समान्तर जाति- व्यवस्था है. और भाषा के साथ दोस्ती होने के पहले ही हम सहम जाते है. क्षेत्रीय भाषा हिंदी के आगे, हिंदी अंग्रेजी के सामने. हमारी शिक्षा प्रणाली सिर्फ इस व्यवस्था को बनाए रखने का, इन मूल्यों की कन्फरमिटी का टूल है. शिक्षा हमें सिर्फ जो भी चालू व्यवस्था है उसीके बीच पैठ बना लेने की समझ देती है, आजादी और जनतांत्रिक तरीके से कुछ नया सीखने,-रचने का शऊर, सहज बने रहने का हौसला नहीं देती.
मेरे लिए हिन्दी ही पढने लिखने की सीखने की, सोचने की पहली भाषा रही, इस लिहाज़ से सारी बाक़ी भाषाओँ से मेरी नजदीकी भाषा है. हिंदी फिर रोज़गार की भाषा न रही, काम की भाषा भी नहीं, और पिछले कई सालों से परिवेश की भाषा भी नहीं. हिंदी में गाहे-बगाहे लिखते रहना, हिंदी पढ़ते रहना भाषा के साथ अपनी आत्मीयता को बचाए रखने की कोशिश है. और इस कोशिश इतर भी कोशिश है क़ि किसी तरह से शब्द, स्वर और लय की संगती भी इसी भाषा में ठीक से ढूंढी जाय. खड़ी बोली इतनी सपाट है, क़ि हमेशा लय के खो जाने का अहसास बना रहता है, हमेशा लगता है कोई सुरीली संगत काश इस भाषा में संभव हो. सिर्फ गढ़वाली ही नहीं, शायद सभी क्षेत्रीय बोलियाँ हिन्दी में कुछ सुरीलेपन को घोल सकती है. इसे कुछ जीवंत बना सकती है. कुछ सहोदर रिश्ता हिन्दी का बोलियों के साथ हो, दूसरी भारतीय भाषाओँ के साथ हो...
भाषा की बहस के बीच प्रियदर्शन का ये लेख और अनिल जी की ब्लोग्पोस्ट भी गौरतलब है.
सार्थक आलेख्।
ReplyDeleteसुन्दर सार्थक आलेख. यही कुछ अपने बारे में भी सोचने लग गया. कितनी भाषाओं और बोलियों की संगत रही. अंततः अब हिंदी ही है, जिसमें चैन मिलता है.
ReplyDeleteआपके और मेरे जैसे अनगिनत लोग भरसक प्रयास के रहे हैं ताकि हमारी भाषाओँ का प्रचालन और शुद्धताबनी रहे लेकिन परिवर्तन की बयार इतनी तेज़ है कि अधिकांश भारतीय भाषाओँ को विलुप्त और विस्मृत होने में देर नहीं लगेगी. मेरे घर में ही मेरे छः वर्षीय बेटे के अवलोकन से यह कह सकता हूँ कि अगले कुछ सालों में वह मूलतः अंगरेजी में ही सोचने-समझने लायक बचा रहेगा.
ReplyDeleteयह सही है कि हम भारतीय व्यक्ति विदेशी भाषाएँ बोलने में सहजता का अनुभव नहीं करते. मैं अच्छी अंगरेजी और कुछ फ्रेंच बोल लेता हूँ लेकिन उसमें मेरे भाव बेहतर नहीं उमड़ते. वही सपाटबयानी रहती है जिसका आपने ज़िक्र किया.
जो हो गया, उसे मिटाया तो नहीं जा सकता। लेकिन आजादी के बाद अगर 200-400 साल पहले भारतीय विकास की तोड़ दी गई कड़ियों को पकड़कर नयी जरूरतों के हिसाब से ढाला गया होता तो हर भारतीय भाषा आज बेहद सजीव व समृद्धि होती। शायद भक्तिकाल से उठ रही हिंदी भाषा पूरे देश में एकल संपर्क की भाषा बन चुकी होती। ऐसा नहीं हुआ तो यकीकन हमारी सृजनात्मकता को चोट पहुंची है।
ReplyDeleteवैसे अपनी भाषा का ऐसा बोध पहली बार पढ़ा, "गढ़वाली में बात करना ऐसे, जैसे कोई लगातार गाने का रियाज़ हो, उसकी लय में ही उदासी, उल्लास, बैचैनी सारे भाव इतनी आसानी से घुले रहते की शब्दों को भी पकड़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती. ऐसा ही कुछ कुमांयुनी, और डोगरी सुनते हुए भी लगा, शब्द और भावों की भिडंत न होती, आर-पार सब पारदर्शी..."
हाँ, बात तो है कुछ…सब ऐसा महसूस करते हैं…जिसे आपने सपाटबयानी कहा है…लेकिन मानते नहीं यह…
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