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Jan 18, 2012

सेन डियागो-02 ( zoo)

चिड़ियाघर मुझे बचपन के बचे रह गये उत्साह से अलग इसीलिए भी आकर्षित करते हैं कि वहां जाकर अहसास गहराता है कि प्रकृति में मनुष्य के अलावा भी कितने कितने विचित्र प्राणी है, और मनुष्य इन सबके बीच का हिस्सा है, वरना  आपाधापी में उम्र बीत जाती है, कुछ पालतू पशुओं के अलावा हमारे परिवेश में  जीवों की कोई उपस्थिति नहीं है. विकास के मौजूदा खांचे में जितनी इमारतें, मॉल, मल्टीप्लेक्स बढ़ते जा रहे है, जिस तरह से दुनिया अर्बनाइजेशन की दौड़ में शामिल है, उसकी एक बड़ी कीमत पशुओं की प्रजातियों का विलुप्त होते जाना भी है.  दुनिया में  रेड लिस्ट हर साल बढी दर से भरी जाती है, अकेले भारत में करीब ५६९ सिर्फ पशुओं की जातियां इस लिस्ट में है। जानवर प्रेमियों के पास अपनी अपनी तरह की संवेदनाएं है. हमारे समय में पश्चिम में शाकाहार के पक्ष में मजबूत राय बनती दिखती है, इतनी कि पहले कभी ऎसी चेतना न थी और लगभग पूर्व की ही तरह अबकी बार इसका आधार अहिंसा के नैतिक मूल्य भी है. कुछ लोग दूध  और उससे बनी चीज़े भी छोड़ चुके है. जानवर प्रेमियों की अपनी अतिरेक कहानियाँ हैं. 

पिछले हफ्ते दोपहर बाद एक दिन कुछ समय मिला तो बच्चों को लेकर का चिड़ियाघर जाना हुआ, चिड़ियाघर के खुले रहने में सिर्फ घंटाभर बचा था, लेकिन टिकट पूरा लेना पड़ता, मेरे अंदाज़ से तीन गुना ज्यादा महंगा. इसीलिए अगले दिन पर छोड़कर समुद्रतट पर जाना तय किया. दो दफे चिड़ियाघर के टिकट खरीदना मेरे लिए संभव नहीं था. बच्चे कुछ रुआंसा हुए, फिर वहीँ  चिड़ियाघर के बाहर एक मोर चलता हुआ दिखा और उसके पीछे भागते उनके कुछ जानवर देखने की मुराद पूरी हुयी. ..

अगली सुबह से दोपहर तक जितना संभव  हुआ सेन डियागो का जू  देखा. एक तरह से अब तक देखे लगभग २० से ज्यादा चिड़ियाघरों में से सेन डियागो का चिड़ियाघर सबसे ज्यादा व्यवस्थित, पैदल घूमने, बस से या ट्राली से भी घूमने की व्यवस्था, सभी तरह की शारीरिक क्षमता के लोग चाहे छोटे बच्चों के साथ उलझे माता-पिता हो, बूढ़े असहाय लोग, किसी तरह से अपाहिज लोग या  पैदल घूमने दौड़ने वाले धावक , सभी एक सामान रूप से इस बड़े चिड़ियाघर का आनद ले सकते है.  इस एक चिड़ियाघर के भीतर बहुत परिश्रम और सूझबूझ से कई तरह के प्राकृतिक जंगलों की नक़ल है, सघन वर्षावन के भीतर बहुत घने बांस के जंगल, अलपाइन फोरेस्ट, रेगिस्तान, आर्कटिक है. इन  सभी परिवेशों में  जानवर स्वस्थ दीखते है, अपने प्राकृतिक वातावरण में उन्हें देखने का भरम होता है. सिर्फ चिड़ियाघर ही नहीं वरन ये वन्य जीव संरक्षण की रिसर्च का भी एक केंद्र है. दुनिया के कई हिस्सों से जानवरों को यंहा लाया गया है, और उनके व्यवहार का अध्ययन  किया जाता है. इस जगह ६५ साल से हाथी है, और उनकी रीसर्च से ही हाथी के बारे में कुछ ख़ास बात पता चली, की हाथी की उम्र ६५-९० साल तक हो सकती है. २४ घंटों में हाथी सिर्फ २०-२५ मिनट की नींद खड़े-खड़े लेता है. ९०% समय से ज्यादा अपने पैरों पर खडा रहता है. इसी चिड़ियाघर के भीतर "लाइन किंग" बनाने से पहले डिज़नी की टीम ६ महीने तक रिसर्च करती रही और अपनी कहानी, उनके चरित्र गढ़ती रही. कुछ समय पहले ही इस चिड़ियाघर में कौन्डोर की प्रजाति को सुरक्षित करने और फिर से जंगल में इन पक्षियों को छोड़ने  में सफलता मिली है. तो इस मायने में चिड़ियाघर वाकई विलुप्त प्रजातियों को फिर से कंजर्व करने में सहायक हो सकते है. चिड़ियाघर को देखकर ख़ुशी होती है कि मनुष्य की सकारात्मक सोच और सृजन के ज़रिये क्या क्या संभव हो सकता है अगर इसके लिए संसाधन हो, आर्थिक आधार हो और इमानदार तरीके से काम करने का, रिसर्च का माहौल हो तभी....

यहीं एक कोने मुझे  विलियम सरोयन की कहानी "Tracy's Tiger" दिखता  है, ये ब्लेक पैंथर कभी भूले से भी मारा न जाय. सरोवान की अटपटी, पगलेटी भरी कहानियों सा जीवीत रहे. भूले से भी किसी जानवर का वैसा अंजाम न हो जैसा  "टेरी थोमसन"  के प्राइवेट चिड़ियाघर के जानवरों का कुछ महीने पहले जेनेसविल, ओहायो में हुआ. टेरी थोमसन की कहानी, या कि न्यूयॉर्क के किसी फ्लेट में पाये गए  शेर की कहानी इसी बात का सबक है कि व्यक्तिगत प्रयास और सिर्फ व्यक्तियों का अपने स्तर पर जानवर प्रेम नाकाफी है कम से कम जानवरों की खुशहाली और संरक्षण के लिए. ये सामूहिक बड़ी जिम्मेदारी है.

चिड़ियाघर की उत्सुकता और देखने का रोमान कुछ घंटों में ही ध्वस्त हुआ, शाम तक का एक चर्चित वीडियो भारत के एक शहर जोधपुर के  सरकारी अस्पताल की आइ.सी.यु. का देखने को मिला, जिसमे भर्ती एक सत्तर साल के लकवाग्रस्त  मरीज़ को  चूहे नोचकर खा रहे है.   शाम को  एक पुराना मित्र कहता है कि "जो लोग देश से बाहर आ गए है, उन्हें पलटकर भारत के बारे में बुरी बातें नहीं कहनी चाहिए, सवाल खड़े नहीं करने चाहिए. इससे देश की इमेज खराब होती है". देश में रह रहे कितने-कितने दोस्त कहते है, कि "विरोध करने और सवाल उठाने की जगहें भारत के भीतर भी बची नहीं रह पा रही है. यहाँ रहना है तो बहुत चुप होकर रहना है, भले लोगों को, काम करने की चाहत रखने वाले नौजवानों को बहुत ज़िल्लत के साथ जीते रहना है.".

कहने की आजादी सो इन्टरनेट और सोशल नेट-वर्किंग साइट्स पर अभी हालिया सालों में आयी, उसके भी पर कतरने की कवायद दुनिया भर में अलग अलग तरह से शुरू हो गयी है. चीन में जहां इन्टरनेट एक तरह से पूरी निगरानी में है, कपिल सिब्बल भी भारत को उसी रास्ते ले जाना चाहते हैं, अमेरिकी सीनेट में आज इसी आज़ादी पर प्रतिबन्ध के लिए दो बिल बहस के लिए है..


Jan 12, 2012

कोरोनेडो आईलैंड

किसी शहर को जानने के लिए हफ्ता भर काफी नहीं होता कुछ महीने,  कुछ साल वहां रहने  की ज़रुरत बनती है, कि शहर आत्मा के भीतर किसी हिस्से में धडकता रहे, थोड़ी अपनी बैचैनी और ख़ुशी हम शहर के किसी हिस्से में छोड़ आयें. फिर भी किसी जगह होता है, बहुत थोड़ी देर को रहना, जानने की फुर्सत नहीं बनती, सिर्फ  वहां होना  हमारी आत्मा को कुछ शांत करता है. कुछ देर को दिमाग खाली हो जाता है, हर तरह के बोझ से मुक्त , उन्मुक्त, तसल्लीबख्श. डाउनटाउन सेन डियागो से करीब पांच मील की दूरी पर बसा  कोरोनेडो आईलैंड ऎसी ही जगह है. साफ़सुथरा, और खासकर जनवरी के इस महीने में बहुत कम भीड़ भरा, समुद्र तट मीलों तक फैला हुआ, बहुत महीन-मुलायम रेत, बरबस दौड़ाने का मन करता है, दूर तक देर तक. अब तक देखे सभी समुद्रतटों  में सबसे खूबसूरत...

जगह-जगह पर बड़ी चट्टानें इकठ्ठा है और उन्ही के बीच एक लड़की किसी किताब में डूबी है. बीच समंदर में दो घंटे से कोई आदमी एक ही जगह खडा-खडा क्लैम्स इकठ्ठा कर रहा है. मेरे दो बच्चों समेत चार पांच दुसरे बच्चें हैं, रेत और पानी के बीच दौड़ते-भागते-भीगते, पंख फैलाये कई सीगल गीली रेत में अपनी परछाइयों के साथ चलते, और आकाश में रह-रह कर मंडराता पुलिस का हेलिकोप्टर. रवि ने रेत पर अपना नाम लिखा है, "R"    मिरर  इमेज में, और पैर रेत में धंसाये समंदर से खेल करता है, तट पर लौटती लहरों के आगे भागता खुश-खुश. कुछ देर में एक सीपी लेकर आया है, जिसके भीतर जीवित मोलस्क है, सीपी को हाथ में पकड़कर इल्म होता है कि कोई हलचल है इसके भीतर, कोई नन्हा सा जीव सांस ले रहा है. जैसे ही इस जीव का ज़रा सा हिस्सा बाहर आता है, इसकी हरकत से सीपी के दो बंद कपाट बहुत हल्के से बस ज़रा से खुलते है, अच्चके में सीपी रवि के हाथ से गिरती है, फिर बंद हो जाती है, कुछ देर इसे लिए लिए घूमने के बाद समंदर की सौगात उसी को वापस. समंदर से झोला भर सीपीयाँ इकठ्ठा कर वो आदमी, इक्कीसवीं सदी का हंटर-गैदरर, अमेरिका के सबसे अभिजात्य इलाकों में शामिल इस एक इलाके से वापस घर लौट रहा है, उसके झोले में कितनी बड़ी-बड़ी सीपीयाँ, मन में ख़ुशी कितनी, क्या मालूम?

Dec 14, 2008

भारत यात्रा- तस्वीर पर कुछ पैबंद


पिछले कई महीनो से पैर थमने का नाम नही लेते, और कई तरह की यात्राओं के बीच तकरीबन ढाई हफ्ते की भारत यात्रा भी बस आज ख़त्म होने को है। हर बार की तरह इस बार भी बदलते भारत को समझने की एक सतही जद्दोजहद मेरे मन मे चलती रही, और रेफेरेंस के तौर पर वों भारत मेरे सामने बार-बार आता रहा, जो कुछ सालों पहले पीछे छूट गया, और अब हर बार चंद दिनों मे जो भी मानस को नया लगता है, उसी तस्वीर को बनाने -बिगाड़ने का समान बन जाता है। सब जगह कितने असंगठित कलाकार है, जिनके लिए इस नयी ग्लोबल अर्थ व्यवस्था मे एक नयी ज़मीन तलाशी जा सकती है, अगर उनको थोडा सा प्रशिक्षण दिया जा सकता, एक बड़ी फलक पर कई संभावनाए सामने आ सकती है.

कई किस्म के लोगो से इस बीच मुलाक़ात हुयी, और काफी बातचीत भी हुयी। ख़ास तौर पर अपनी एक ७० साल की बुआ से बात करके बड़ी गहराई से ये बात महसूस हुयी कि एक अनपढ़, बहुत साधारण और बूढी स्त्री का मानस भी लोकोक्तियों मे, कबीर और रहीम के दोहो मे, भगवत पुराण की कहानियों मे कही न कंही अपने अस्तित्व का और उसको समझने , उसे विस्तृत करने का प्रयास करता है। शायद कोई मुझे कभी इस विषय पर निबंध लिखने को कहता तो सूर, कबीर, वेदव्यास जैसे कितने ही नामो के सहारे मैं लिख लेती। पर दिल की गहराई से पहली बार मुझे ये समझ मे आया।
इस यात्रा मे खासतौर पर शहरों और महानगरो मे एक नयी और परोक्ष जाति -व्यवस्था भी उभरती नज़र आयी। खासतौर पर उन दो तबको के बीच जिनमे से एक के पास बहुत कुछ है, और दूसरे के के पास बड़ी मुश्किल से गुजारे का साधन। आर्थिक पहलू से बना ये विभाजन पहले भी था, और भारत के अलावा दूसरे देशो मे भी है। इसे जाति व्यवस्था मैं इसीलिये कह रही हूँ, क्योंकि पहले जो त्रिस्क्रित व्यवहार अछूतों के लिए था, अब गरीब आदमी के लिए है। महानगरो के निवासी अपने घरो मे काम करनेवाली, ड्राईवर, माली आदि को एक आदमी के वजूद से कमतर नज़रिए से देखते है। और कई तरह के कामो को भी उन्होंने अपने वर्ग और अपने अभिमान का विषय केन्द्र मे रखकर इस तरह से बाँट लिया है, की कुछ काम उनकी इज्ज़त को कम और दूसरे उनकी इज्ज़त को बढ़ा देते है। अपने द्वारा जनित कचरे को ठिकाने लगाना अब भी कमतर समझा जाता है। इसीलिये शहर-गाँव मैदान सब कचरे का ढेर है।
तीसरा बड़ा ही हास्यास्पद और दू:खदायी पहलू है लगभग सभी वर्गों का सिर्फ़ मात्र एक उपभोक्ता बन जाना। एक ऐसा उपभोक्ता जिसकी समझ सिर्फ़ नए से नए समान को एकत्र करने मे है, बिना ये समझे कि इसकी ज़रूरत क्या है, और कभी -कभी इन चीजों का सही इस्तेमाल क्या है। इसीलिये घड़ी एक समय को ट्रैक और मैनेज करने का टूल न बनकर जेवर बन जाती है, और कैसरोल रेफ्रीजरेटर मे खाना रखने के डिब्बे मात्र। बड़ी मार्के की बात है कि जिस समाज की सोच से नए आविष्कार जन्म नही लेते, और सिर्फ़ जहा नए उत्पादों को बेचने का एक बड़ा बाज़ार है, वहाँ निजी और सार्वजानिक तौर पर संसाधनों का क्षय होता है।