"It seems to me I am trying to tell you a dream-making a vain attempt, because no relation of a dream can convey the dream sensation, that commingling of absurdity, surprise,, and bewilderment in a tremor of struggling revolt, that notion of being captured by the incredible which is of the very essence of dreams. No, it is impossible, it is impossible to convey the life-sensation of any given epoch of one's existence-that which makes its truth, its meaning-its subtle and penetrating essence. It is impossible. We live, as we dream-alone".
------------- Joseph Conrad in "Heart of Darkness"


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Dec 10, 2011

सिनेमा की खिड़की: बेतरतीब यादें



सात बरस की उम्र में  पहली फिल्म टेलीविजन पर देखी थी "माया.  बमुश्किल एक दो साल पहले मसूरी में टावर लगने की वजह से ही संभव हुआ था कि कुछ नजदीकी पहाडी शहरों में लोग टीवी देख सकें. टीवी की चलती-फिरती तस्वीरों का कस्बाई और ग्रामीण समाज में कोतुहल था. सिनेमा के परदे पर फिल्में देखने वालों के लिए भी. लेंसडाउन में तब सिर्फ किसी एक घर में टेलीविजन था, और सिर्फ कोतुहल में ही लोग कुछ मिनट से लेकर कुछ घंटों तक टीवी वाले घर में चले जाते. जान पहचान जरूरी नहीं थी. इतवार की फिल्म देखने का निमंत्रण संजोग से उस दिन हमारे परिवार के लिए था. धीरे-धीरे कीड़े मकोडों से स्क्रीन पर दिखते लोगों की कहानी समझ आयी. देवानंद, माला सिन्हा. देवानंद का उसमे नाम शायद श्याम था. मालूम नही था कि फिल्म में और असल जिन्दगी में नाम अलग होते है, कि फिल्म जीवन की सीधी सच्ची कहानी नही होती. बाद के 2 साल तक देवानंद को श्याम की तरह ही पहचानती थी..
क्या बदला सिनेमा ने उस उम्र में, मालूम नहीं, इतना तो हुआ कि एक खिड़की थी फिल्में, अजाने संसार में खुलती, डर, दर्द, जुगुप्सा और खुशी के कुछ कतरे वहां से बालमन में पैठ बनाते.  हकीकत के साथ तालमेल की कोशिश अवचेतन में चलती. बाद के तीन सालों में अनगिनत फिल्में देखी. कुछ फिल्में आवश्यक रूप से दादी के साथ देखीं, सती अनुसूया, अहिल्या, बहुला  टाईप, जिनका सारा खेल औरत की सती, और महासती होने और जीवन भर परीक्षा के नाम पर दुःख झेलने की लम्बी कहानियां थी. दादी से अकसर पूछा कि इन औरतों को क्यों इस तरह परीक्षा देनी पडी? दादी का ज़बाब होता कि पुरुष की मूढमति के कारण जीवन के इतने संकट खड़े होते है. टीवी पर उन दिनों नागिन फिल्म और चित्रहार में "मेरा मन डोले, तन डोले" छाया था, दूसरी भी कई नागिन टाईप की फिल्में. हमउम्र बच्चों के बीच ही नहीं बड़ों की बतकही में भी ये शुमार था कि सांप की आँखे कैमरा  सरीखी होती है, और अगर नाग को मार दिया तो नागिन बदला लेती है. अपने परिवेश में जहां हर बरसात सांप ही सांप नज़र आते थे, स्कूल जाते समय सड़क पर, अचानक से रिक्शे के नीचे पिचकते, कभी लम्बे और अकसर कुण्डली मारे, किचन के पाईप से घुसकर दुमंजिले घर में भी पहुँचते और केले के तने में लिपटे बड़े-बड़े  अजगर. ऊपर से नागिन जैसी फिल्मों के सबक थे कि कभी किसी ने नाग को मार दिया तो नागिन डस लेगी दोहरा भय जगाते थे. बचपन की एक बड़ी उलझन ये भी रहती थी, कि कैसे पहचाना जाय कि कौन वाकई नाग है, और दूसरे रेंगते सांप आखिर कौन से है? फिर ये भी कि नाग और नागिन की ठीक पहचान कैसे हो? क्यूंकि बदला सिर्फ नागिन ही लेती है, नाग बदला नहीं लेता, और क्यूं नहीं लेता?  दादी कहती रही कि सिर्फ नागिन की ही स्मृति तेज़ होती है. नाग को कुछ कहां याद रहता है?  नागिन की कहानी भी सावित्री, सती अनुसूया, बहुला की कहानी का का दूसरा पाठ था. नाग को भी कुछ उसी तरह की सहूलियत रही होगी जैसी अनगिनत सती स्त्रियों के पतियों को थी.

माँ और उनकी सहेलियों के साथ डकैतों-पुलिस वाली, अमिताभ की दीवार, ज़ंजीर, धर्मेन्द्र की क्रोधी या फिर मनोज कुमार की क्रांति, जितेन्दर की कव्वे उड़ाने वाला डांस से भरी फिल्में, शशि कपूर की चौर मचाये शोर, शोले. जीनत अमान और परवीन बाबी, हेमा मालिनी, रेखा. छोटे कस्बाई पहाडी शहरों में, जहां क़त्ल की कोई वारदात १०-२० सालों में एक बार होती थी, वहाँ की शब्दावली में "डान/ स्मगलर" तरह के शब्द किसी एलियन दुनिया की कहानी थे. आसपास उनके जैसा कभी कोई दिखता न था. क्रांति फिल्म देखकर देशभक्ती के ज्वार के चलते शहर में टहलते गोरी चमड़ी के टूरिस्ट पानी भरे गुब्बारों का टार्गेट बने. तब सारी गोरी चमड़ी वाले "अँगरेज़" थे. उनका और कोई देश, कोई नागरिकता, उनके देश भूगोल का हमारे बचपन के मन और आस-पास के बहुत से वयस्कों के मस्तिष्क में कोई साफ़ तस्वीर बनती नहीं थी. "एफिल टावर",  वियना के ओपेरा हाऊस, लंडन ब्रिज, सब सिर्फ अपराध की लोकेशन थी, जिधर एलियन जीव "संगरीला" टाईप कोई गाना गाते. फिल्मों की दुनिया हमारी अपनी पहचानी दुनिया से इतनी अलग थी. सिनेमा हॉल से बाहर कोई और दुनिया थी, अच्छा था सुकूनभरी थी. उसमे वैसी हिंसा, चकमक और असुरक्षा नहीं थी. बचपन में बहुत सीमित गतिविधियाँ  थी, अल्मोड़ा जैसे पहाडी शहर में कुल जमा दो सिनेमाहॉल, ऋषिकेश में तीन, और शायद नैनीताल में भी तीन ही थे, अब भी शायद इतने ही है. सिल्वर स्क्रीन पर देखी सूरतों के मिलान का कार्यकर्म घर में आये किसी मेहमान से लेकर, सड़क पर भीख माँगते भिखारी की सूरत तक से करने के खेल चलते रहते. सिनेमा हॉल में फिल्म देखना लगातार कम होता गया, उसका कोई आकर्षण नहीं बचा, सिर्फ साल में एक या दो. एक सालाना इम्तिहान के बाद , एक कभी बीच में. सिनेमा हॉल के बजाय टीवी फिल्में देखते रहे, राजकपूर की, गुरुदत्त की, विमल रॉय की, मनोज कुमार की, "मुगले आजम", "यहूदी" और दूसरी ऐतिहासिक फिल्मे भी, वही कुछ मन को अचीन्हे आनंद में भिगोतीं थी, इन फिल्मों के सुरीले गाने याद रहते. 

देवानंद की २-४ फिल्मों की जगह जहन में बनी रहेगी, पर सबसे ज्यादा वो सुरीले गानों के मार्फ़त ही याद रहेंगे.



Dec 4, 2011

Poetry Reading

पौड़ी गढ़वाल : मेरे गाँव की तस्वीर
आपाधापी के बीच कुछ समय बहुत चुपके से पोएट्री रीडिंग का भी इस बीच निकला. शुक्रवार को "Literacy Northwest Series" इस सत्र की ख़त्म हुयी, क्रिस एंडरसन के डेढ़ घंटे की कविता-पाठ के साथ. क्रिस  इंग्लिश डिपार्टमेंट में प्रोफेसर है, और कविता पाठ उनके नए कविता संग्रह "The Next Thing Always Belongs" की कविताओं का था. अंग्रेजी के प्रोफेसर  और कवि-लेखक के अलावा क्रिस कैथलिक मिनिस्टर भी है, और चर्च से जुडी गतिविधियों का  हिस्सा भी. पिछली दफे हालांकि उनकी कविता पाठ के बीच जब वो कहे  "ऐतिहासिक यीशु की उन्हें परवाह नहीं" तो कुछ लोग कमरा छोड़कर चले गए. क्रिस की कवितायें उनके जीवन के बीच से उपजी खट्टी-मीठी कवितायें है, दिल को छू कर जाती है, प्रकृति के साथ गहरे लगाव की उपज है. किसी भी तरह का अतिरेक, कोई प्रतिबद्धता उनमे नहीं है, जीवन का ही बड़ा पाठ है. उनकी कुछ कवितायें सुनते हुए मुझे रिल्के की याद हो आयी.  
कविता लिखने और सुधार के मामले में उनका कहना था की लगभग १०० दफे हर कविता को सुधारा  है उन्होंने, मैंने उनसे मज़ाक में कहा  "फिर तो प्रोफ़ेसर कवि पर हावी हुआ", उनका कहना था की कवि ने पिछले ९९ ड्राफ्ट भी फेंके नही, और कभी प्रोफ़ेसर को उलटे रास्ते फिर कवि ले जाता है. कविता के बारे में उनका कहना है की कविता कर्म  लगभग प्रार्थना करने जैसा है, एक स्प्रिचुअल एक्टिविटी, भले ही किसी धर्म से उसका कुछ लेना देना न हो...
मुझे अभी तक अपनी कवितायें पढने का उस तरह का अभ्यास नहीं है, जैसे अपने लेक्चर का, पिछले महीने, डिपार्टमेंट के "Travel Seminar Series" अपना लेक्चर "In the Heart of Himalayas" ख़त्म किया तो कुछ मित्रों ने आग्रह किया की कुछ कवितायें भी पढी जाय. सो दो कवितायें पहले हिंदी में पढी और फिर उनका कुछ इंस्टेंट अंग्रेजी कचर अनुवाद. बाद में "थैंक्स गिविंग के मौके के पर"  कुछ इसी तरह के कचर अनुवाद. अपने मित्रों से कहा की मुझे अंग्रेजी आती नहीं, तुम लोग हिंदी सीखों और अनुवाद करो. अपने से ज्यादा हमेशा मुझे दूसरों की कवितायें अच्छी लगती है, सो सुनने का रस भरपूर मिला...


Nov 28, 2011

"जहाँ तेरे नक़्शे-कदम देखते है, खियाबां-खियाबां इरम देखते है"*


भले ही जियोलोजिकल टाइमस्केल में इंसान की उम्र एक ज़र्रे से भी कम हो, तब भी अपनी कामनाओं, दुश्चिंताओं और अचरज के मिश्रण में जीवन सान्द्र है, सघन है, विरोधाभासी भी.  पृथ्वी भी ऎसी ही है , विपरीत चीज़ों के बीच साम्य का भ्रम खड़ा करती. जैसे पहाड़ और दर्रे (canyons/gorges) बिलकुल एक सा वितान, एक सरीखे, जमीन दरकती है, दर्रे बनते है, और बचा रह गया प्लेट्यू पहाड़ का भ्रम.  फिर टूटते-दरकते पहाड़ लगातार नए दर्रे बनने का सबब बनते है. सबसे ऊँचे पहाड़ और सबसे गहरे दर्रे हिमालय में ही है, पर आम लोगों की पहुँच से बाहर, दुर्गम. बहुत छोटे-छोटे दर्रे मध्य हिमालय में सब तरफ बिखरे हुये, भुरभुरे, भूरे-सिलेटी,  हरे पहाड़ों के बीच, जिन्हें मैं ठीक से पहचानती हूँ. जिन्हें बचपन के और बाद के वर्षों में भी कुछ पैदल नापा है, एक पैर रखने की जगह में, दोनों हाथों से जपकाते हुये जाना है,. कई दफ़े भुरभुरी रेत हाथ में आयी है,. बचपन के दिनों में  दर्रों के बीच चमकती चट्टानों की खानों में चट्टानों को पठाल/स्लेट में ढलते देखा है, जिनसे पहाड़ी घरों की  छत और आँगन बनते.  इन्ही स्लेटों पर आँगन के एक कोने बैठे दादाजी को ज्योतिष गणना करते देखा है, और बड़े कारिज़ के मौकों पर  भोज में बैठे मित्र-संबंधी, बारात की पंगत भी. कोयले से इन पर आड़ी-तिरछी रेखाएं खींची हैं, गंदा करने पर डांट खायी है. उन भोले दिनों में मन के लैंडस्केप की बुनियाद भी ऊबड़-खाबाड़ ही पडी, चोटियों और खड्डों से भरी-भरी....


पिछले कुछ दिन कोलंबिया रिवर गोर्ज में बीते, जो अमेरिकी उत्तरपश्चिमी भूभाग का वो हिस्सा है जो आइसऐज़ के ख़त्म होने के बाद महाजलप्रलय के असर में बना है . आईसएज  के अंत में तेज़ी से पिघलते ग्लेशियर्स के कारण नदियों और झरनों में आयी बाढ़,  तीव्र रफ़्तार से बहते पानी ने ज़मीन का वृहद् हिस्सा दर्रों में तब्दील किया.  जो हिस्सा या तो सीधे पानी से बचा रहा या अपनी ख़ास संरचना के कारण पानी के दबाव को झेल सका वों क्लिफ्फ़ बन गया. जो बह/कट  गया, जो परते पानी में घुल गयी, उनकी जगह खड्ड/ दर्रे बनते रहे. ये प्रक्रिया कई बार हुयी  है. इसके अलावा, बदलते मौसम में बार बार चट्टानों के बीच रिसते पानी का बर्फ़ बनना, फिर पिघलना, फिर जमना, एक अनवरत प्रक्रिया भी चट्टानओं को तोडती है, धीरे-धीरे.  पानी, हवा, से हुये भूक्षरण, ज्वालामुखी और भूकंप से हुये  विध्वंस सबने लाखों-करोड़ों वर्षों में इस विहंगम लैंडस्केप को गढ़ा है. इसे देख कुछ देर आँखें फटी रहती है, मन हक बक होता है हर बार. धरती  अजब अनोखी, जाने किस किस रंग को समेटे है, ठीक ठीक कभी मौका बनेगा कि सतह भर को ही पूरा देख सकूंगी?
 
पहाड़ और दर्रे का साम्य, अजीब खेल करता है.  तेज़ हवा और बहुत तेज़ पानी की मिलीजुली आवाज़, हड्डियों को चीरती ठण्ड बीच हिमालय में कहीं होने का अहसास बनता है, कुछ ही देर को सही, मैं घर से बहुत दूर घर जैसी किसी जगह में पहुँच जाती हूँ. कोस-कोस पर झरने और दरों के बीच बहती नदियाँ. नोर्थवेस्ट की हिमालय से समरूपता यहां के पोधों में भी है; लंबे घने बाँज, फर, चीड, हेमलक, बिर्च, चिनार, और देवदार के सुदूर तक फैले जंगल. हालांकि ये सब अब प्लान्ड फोरेस्ट्री का फल है, प्रकृति की सीधी उपज नही है. न यहाँ, न बहुत से हिमालयी हिस्सों में. उन्नसवीं सदी के मध्य से यहाँ और हिमालय दोनों के नेटिव पेड़ों का भारी मात्रा में कटान हुया है. और जैव-विविधता का नुकसान भी. सिर्फ व्यवसायिक नज़रिए से ही यहाँ तेज़ी से बढ़ने वाले वृक्ष लगाए गए है. फिर भी अमरीका के इस छोर की एशिया के कुछ हिस्सों से समानता है. बहुत से चीन में पाए जाने वाले और हिमालयी पोधों के जीवाश्म (fossil), जॉन डे , ओरेगोन में मिलते है,, और अनुमान है कि ये फोसिल एक तरह से २५० मिलियन वर्षपूर्व  पैनेंजिया के अस्तित्व के महत्त्वपूर्ण प्रमाण है.

क्लाइमेट सामान होने से बहुत से हिमालयी पोधे यहां फलफूल रहे है. आज लंबे घने बाँज, फर, चीड, हेमलक, बिर्च, चिनार, भोजपत्र, और  देवदार के पेड़ों के बीच हिमालय की खुशबू तिरती है. पहली दफ़े जब २००८ में ओरेगोन आयी थी तो जगह जगह सड़क के किनारे, नदी के किनारे, और यहाँ तक कि घर के आँगन में भी हिमालयन ब्लेक बेरी के कंटीले झाड, हिसालू और जगह जगह बुरांश के पेड़ दिखे.  लूथर बरबैंक  ने ब्लेक बेरी के बीज भारत से मंगवाए थे और १८८५ में इसे अमेरिका में इंट्रोड्यूज किया था. आज ब्लेक बेरी , की खेती मुख्यत: ओरेगोन और कैलिफोर्निया के कुछ हिस्सों में होती है. ओरेगोन में दुनियाभर में सबसे ज्यादा  ब्लेक बेरी  उगायी जाती है (~ 56.1 million pounds on 7,000 acres in २००९). कई वर्षों की ब्रीडिंग से ब्लेक बेरी  की ढ़ेर सी उन्नत किस्में ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी ने डेवेलप की है. इसी तरह बुरांश के भी बहुत से रंग लगातार ब्रीडिंग का नतीज़ा हैं. हिमालय में सिर्फ २-३ रंग देखे थे, यहां लाल और सफ़ेद और पीले, नीले , बैंगनी हर शेड में बुरांश और अज़ेलिया के फूल दिखते है. 
नोर्थवेस्ट में रहते हुये बचपन के दिनों के घर की बहुत याद आती हैहालांकि अब घर यहीं है, और बचपन का घर अब अस्तित्व में भी नही है, फिर भी मन भागता है उसी की तलाश में. कितनी दूर जाकर भी कितने पीछे लौटा ले जाता है मन.
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*- ग़ालिब 

Nov 11, 2011

बहक

सुनहरी उकाब का एक पंख है
मिट्टी, बारिश, और धूप के रंग है इसमें
खुशबू सुदूर की
पंख है पैना
पंख है टूटा
गीली मिट्टी में बो दूं?
कि लहलहाती  सुनहरी एक झाड़ उग आये 
कि सचमुच ही उस पर बैठ कोई चिड़िया गाये...


Nov 5, 2011

सच और सपने के पार

दुनिया का तसव्वुर उतना ही बनता, जितनी बड़ी देखे की दुनिया होती, देखे-पहचाने लोगों से, चीज़ों से, पेड़-पोधों से,  कीड़े-मकोड़ों से, पंछियों-पशुओं  से... अनुभूती, हमें जाने पहचाने कोनों में, अपनी अपनी आत्म-गुफाओं के सुरक्षा के घेरे में बाँध लेती. मामूली होने से बचाती, उतना ही दुनिया का वितान होता सचमुच की दुनिया का, जिसको हेंडल करने की हमारी सामर्थ्य  होती है.

फिर इस देखे की दुनिया, जाने पहचाने के बीच दुनिया का सपना होता, जो हम सचमुच अपने लिए चाहते होते. जो पढ़ा होता, सुना होता है, तस्वीरों और फिल्मों  के मार्फ़त हमारे संज्ञान में आता. वो अंश-अंश के घालमेल, जागे में,  नींद में भी. सुनी बातें, लिखे शब्द, बुने हुये बिम्ब- सच से बहुत दूर, मायावी, परानुभूति  सपनों  की  ज़मीन बुनती...
बहुत कम लेकिन कभी ऐसा भी होता है कि सच से दूर,  कोई परानुभूती का अंश अपने साथ दृष्टी भी साथ लाता है. रोज आदत की तरह हमारे जीवन में सहजता से शुमार काम,  आस-पास  रोज देखे जाने वाली चीज़ों  के अपह्चाने सत्य कला उद्घाटित करती है.  अनायास ही किसी कैमरे की नज़र, किसी घनीभूत पीड़ा के स्वर , व्यक्त किसी की छटपटाहट हमें मानो फिर से खुद को मिला देती है. अदेखे की दुनिया ही हमारे लिए सपनों की समान्तर दुनिया बुनती, जिसमे हमारी देखी दुनिया से बहुत बड़ी एक दुनिया है, कई तरह के लोग है,  जितना हम जानते है उससे भी बहुत आगे हर तरह के भले बुरे, वीभत्स, डरे हुये भी. ये अजानापन ही हमें हमारे जाने हुये की ऊब से बचाता है, जानी-पहचानी यांत्रिक, अमानवीय, तंगनज़र की सीमा से हमें आज़ाद करता है. आशा की एक खिडकी खुली रखता है, मन कहता है, ये सब पीछे छूटा रह जाएगा, दुनिया बदल जायेगी एक दिन, इस कुएं से बाहर जायेंगे, खुली घास के मैदानों की तरफ, ऊँचे पहाड़ों और समन्दर की तरफ कितनी विशाल है पृथ्वी ....

सच और सपने के पार  फिर सूचना होती,  हमें भयभीत करते अंक होते, कि बड़ी बहुत बड़ी दुनिया के बीच, विराट, बहुमुखी भूगोल के बीच हम टिनहा खड़े है. कि अपने  ताप और सपनों की भाप में जलते, हाथ-पैर पटकते, घुटनों पर सर किये. इस बड़ी दुनिया के बीच क्या मोल उसका ?
 

Oct 8, 2011

"उड़ते हैं अबाबील"

 

कई वर्षों से लिखने पढ़ने के बीच रही हूँ.  यायावरी के बीच बहुत कुछ लिखा (सायंस के इतर) शुरू के वर्षों का गुम हुआ, नष्ट हुया. लिखना बचा रहा. क्यूँ लिखती रही? नहीं मालूम, दिल में लिखने की हूक  उठती रही है. लिखना एक मायने में अपने से बातचीत करना है, एक निजी ज़रूरत,  अपने परिवेश, अपने समय की समझ बुनते जाने की कोशिश. इस लिहाज़ से बेहद अन्तरंग जगह, अपने साथ बैठ लेने की सहूलियत, चुपचाप, कभी झगड़ा  करते हुए, और कभी दुलार के साथ भी...

कविता लिखना खासकर मन की किमीयागिरी है, विशुद्ध प्रज्ञा को झकझोर देने का सलीका है. तर्क की विपरीत दिशा में आगे बढ़ने की मति, दुस्साहस है. हमारे जीनोम में अमूर्तन का कोड है. भाषा के पहले और भाषा के इतर की स्मृति का आदिमबोध है. जो अजाने संसार में, अनिश्चित यात्राओं में हमारी शरण बनता है. इस लिहाज़ से कविता लिखना समझ न आने वाली बड़ी दुनिया के बीच, खुद को तलाश लेने का उपक्रम है.

 लिखना फिर निजता के माईक्रोस्कोपिक फ्रेम के बाहर एक बड़े स्पेस में बनीबुनी समझ को परखना है, जीवन अनुभव के बेतरतीब ढेर को खंगालना है, भीतर चलती एक अनवरत तोड़फोड़  है सालों साल की. इस प्रक्रिया में जो भी निज है, एक मायने में फिर निज नहीं रहता, सामाजिक हो जाता है, स्व:अनुभूत एक सामूहिक अनुभूती का छोटा सा टुकडा, एक बड़े भवन की कोई खिड़की, कोई शहतीर हो ज़ाता है. 

 २००७ में बहुत पुराने मित्र के कहने पर हिंदी का ये ब्लॉग बिना किसी योजना के बनाया. २००७ से इस ब्लॉग पर बीच बीच में लिखती रही हूँ. इस बहाने ये लिखे का ड्राफ्ट एक जगह बचा रहा. लिखना फिर एक संवाद की जगह भी बनी. कई नए पुराने मित्रों के सुझावों, और हौसलाअफज़ाई  के बीच संवाद जारी रहा है. आप सभी मित्रों का शुक्रिया.

पिछले १३-१४ सालों से हिंदी परिवेश ज़बान नहीं रही.  हिंदी में लिखते रहना स्मृतिलोप के खिलाफ मेरी निजी लड़ाई है, अपनी भाषा, अपने समाज और देश से जुड़े रहने का एक पुल है. पिछले कुछ महीनों में, कुछ नई पुरानी और बहुत सी इस ब्लॉग पर लिखी कविताओं को एक कविता संग्रह की शक्ल दी है. संकलन की तैयारी के दौरान सुझावों के लिए  मेरे भाई अभिषेक, और  कवि मित्रों में  विजय गौड़,  मोहन राणा  और प्रमोद सिंह का शुक्रिया.  आदरणीय मंगलेश  डबराल जी का विशेष शुक्रिया , जिन्होंने धैर्य से  इस संग्रह को पढ़ा  और अपनी उदारता में  उत्साहवर्धक  शब्द इसकी भूमिका में लिखे है.

अंतिका प्रकाशन से  "उड़ते हैं अबाबील" इस महीने के आखिर में आप सब मित्रो को उपलब्ध होगा.. 



 
प्रकाशक
अंतिका प्रकाशन 

उड़ते हैं अबाबील 
(कविता-संग्रह) 
© डा. सुषमा नैथानी
 ISBN 978-93-80044-84-2
संपर्क 
सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
फोन : 0120-2648212 मोबाइल नं.9871856053
ई-मेल: antika.prakashan@antika-prakashan.com, antika56@gmail.com
फ्लिपकार्ट पर भी "उड़तें हैं अबाबील" उपलब्ध है.

 

Sep 23, 2011

भाषा की संगत




 "When we use our native language, a torrent of words flows into and out of brain. The occasional frustration of having a word stuck on the tip of the tongue, the slow ordeal of composing a passage in a foreign language, and the agony of a stroke victim struggling to answer a question reminds us that our ordinary fluency with language is a precious gift."-- in 'Words and Rules' ----Steven Pinker 
 
 घर की दहलीज़ के भीतर बोलना गढ़वाली में सीखा, हिन्दी भी वहीं  थी आँगन में खड़ी, बारादरी की बहसों के बीच, पड़ोस के घर में,  रेडियो पर बजती. फिर लिखना-पढ़ना, ठीक से सोचना इसी हिन्दी भाषा में सीखा, गढ़वाली घर के भीतरी कोनों में खिसकती चली गयी, कहीं याद में बिना शब्दों के मीठी तान बजती, स्वर धीरे से खो गए. इतना याद रहा क़ि इस भाषा को सुनते हुए लगता कि  स्वर और शब्द साथ-साथ रोतें है, हँसतें है, गढ़वाली में बात करना ऐसे, जैसे कोई लगातार गाने का रियाज़ हो, उसकी लय में ही उदासी, उल्लास, बैचैनी सारे भाव इतनी आसानी से घुले रहते की शब्दों को भी पकड़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती.  शब्द और भावों की भिडंत न होती, आर-पार सब पारदर्शी .....
हिंदी की मुख्यधारा का दबाव होगा, या सबके बीच घुलमिल जाने की चाह, भीड़ के बीच अलग से इंगित होने का डर, या सबका मिला जुला असर, गढ़वाली भाषा का संगीत मेरे स्वर से हमेशा के लिए जुदा हो गया, उसकी जगह सपाट, बिना उतार चढ़ाव वाली, खड़ी बोली घर कर गयी. कोई उतार चढ़ाव स्वर में नहीं, निस्संग भाषाई संस्कार, जैसे बात करने वाला जो है, उसकी अपनी कही बात के साथ ही कोई रिश्ता नही. वापस पलटकर गढ़वाली बोलने की कोशिश करती हूँ तो सबसे पहले मेरी माँ को अटपटा लगता है, ये स्वर गढ़वाली नहीं रहे, रूखे है, लय से इनका सामंजस्य नहीं है. वो मुझसे कहती है, तू हिंदी ही बोल... 

पिछले वर्ष देहरादून के आस-पास के गाँवों में गयी तो कुछ गढ़वाली गाँवों में सभी बच्चे हिंदी बोलते दिखे, किसी को गढ़वाली नहीं आती थी. देहरादून की नजदीकी बसावट के ये गाँव शायद कई पीढ़ी पहले अपनी भाषा भूल गए होंगे. इनके लिए कठ्मोली या इसी तरह का कोई शब्द चलन में है. भाषा हिन्दी है, पर इन सबके स्वर न खड़ी बोली वाले है, न ही गढ़वाली की मिठास है कहीं,  बरेली, सहारनपुर के चूड़ी बेचनेवालों, और गरीब मुसलमान कारीगर तबके के स्वर इनकी भाषा में बजते हैं.

अंग्रेजी जीवन में सबसे बाद में दाख़िल हुयी, एक तरह से कॉलेज़ पहुँचने के बाद की भाषा, ज़रूरी भाषा, वो परिवेश की भाषा न थी, बर्ताव की भी नहीं, लगातार रट लेने वाली भाषा थी. सिर्फ स्मृति की भाषा, बाद में परिवेश की, काम-काज की भाषा बनी. खड़ी बोली का सपाटपन अंग्रेजी के पाश्र्व में मौजूद रहता है. और सहमापन, अटपटापन भी किसी कोने छिपा रहता है, जो हाव-भाव के साथ सहजता बनने नहीं देता, अचानक से इस भाषा में कोई चुहल नही सूझती, कोई मुहावरा, कोई कहावत, कोई लोकोक्ति यूं ही नहीं टपकती. इन सबका रियाज़ करना पड़ता है. मेरे स्वर, शब्द और भाव तीनों में कोई भीतरी, आत्मीय संगत नही है. अंग्रेजी पर सचेत और अचेत दोनों तरह से अमेरिकनाइज़्ड  एक्सेन्ट की परत चढ़ गयी है, लेकिन मूल हाव-भाव के साथ उसका सहज मिलाप नहीं ही हुआ है. 

अब इतने बरसों बाद भी, न पढ़ी  और लिखी गयी और न बरती गयी गढ़वाली भाषा की मिठास जबकि अब भी मेरे चेतन अवचेतन में बसती है. पहली भाषा, परिवार की और विरासत की अंतरंग भाषा और मादरीजबां  इतनी आसानी से नहीं छूटती ....

  मेरे यूरोपियन दोस्त हमेशा कहते रहे हैं कि क्यूँ हिन्दुस्तानी इतनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलने के बाद भी भाषा के साथ सहज नहीं, उनके एक्सप्रेशन सपाट होते है? चहरे पर भाव सहजता से आते जाते नहीं? स्वर में कोई उतार-चढाव नहीं होता?  यूरोपीय लोगों में  ये बात नहीं दिखती, वो अंग्रेज़ी बोलते है तो उनका मूलस्वर, हाव-भाव बहुत हद तक अपनी जमीन पर रहते है. हमारी तरह सपाट और सहमें नहीं होते, न ही अमेरिकी, ब्रिटिश स्वर की नक़ल की ऐसी पुरजोर कोशिश...

भाषाओँ की सहज संगत होना सिर्फ भाषा का मामला भर नहीं है, सभ्यता का मामला है, सत्तातंत्र के भीतर भाषाओं की हायरार्की का मसला है, एक समान्तर जाति-व्यवस्था, समाजशास्त्र की बात है. किसी भी भाषा के साथ दोस्ती होने के पहले ही आम लोग सत्ता के समीकरणों से सहम जाते है. क्षेत्रीय भाषा हिंदी के आगे, हिंदी अंग्रेजी के सामने. हमारी शिक्षा प्रणाली सिर्फ इस व्यवस्था को बनाए रखने का, इन मूल्यों की कन्फरमिटी का टूल है. शिक्षा हमें सिर्फ जो भी चालू व्यवस्था है उसीके बीच पैठ बना लेने की समझ देती है, आजादी और जनतांत्रिक तरीके से कुछ नया सीखने-रचने का शऊर, सहज बने रहने का हौसला, नहीं देती.

मेरे लिए हिन्दी ही पढने लिखने की सीखने की, सोचने की पहली भाषा रही, इस लिहाज़ से सारी बाक़ी भाषाओँ से मेरी नजदीकी भाषा है. हिंदी फिर रोज़गार की भाषा न रही, काम की भाषा भी नहीं, और पिछले कई सालों से परिवेश की भाषा भी नहीं. हिंदी में गाहे-बगाहे लिखते रहना, हिंदी पढ़ते रहना भाषा के साथ अपनी आत्मीयता को बचाए रखने की कोशिश है. इस कोशिश इतर भी कोशिश है कि किसी तरह से शब्द, स्वर और लय की संगत भी इसी भाषा में ठीक से ढूंढी जाय. 

खड़ी बोली इतनी सपाट है, हमेशा लय के खो जाने का अहसास बना रहता है, हमेशा लगता है कोई सुरीली संगत काश इस भाषा में संभव हो. सिर्फ गढ़वाली ही नहीं, शायद सभी क्षेत्रीय बोलियाँ हिन्दी में कुछ सुरीलेपन को घोल सकती है. इसे कुछ जीवंत बना सकती है. कुछ सहोदर रिश्ता हिन्दी का बोलियों के साथ हो, दूसरी भारतीय भाषाओँ के साथ हो...


 

Aug 23, 2011

अन्ना और अरुंधती

अरुंधती और बाकि सब लोगो का आन्दोलन पर सवाल उठाना ठीक  है. मुझे लगा कि कुछ दूरबीन से देखने की कसरत उन्होंने की है, उसकी भी ज़रुरत है, शायद माइक्रोस्कोप से देखने की भी. अलग अलग तरह के विचार विमर्श कुछ पूरी समझ बनाने में मदद करेंगे.  ये ही हमारे जनतंत्र को मजबूती देगा.

भले ही इस आन्दोलन से कुछ हो या न हो, मैं इससे उत्साहित हूँ, लोग इतनी बड़ी संख्या में बाहर आये, साथ आये, पहली दफा उन्हें दूसरे लोग भीड़ और न्यूसेंस नही लग रहे है. अपने लग रहे है, अपनी शक्ति की तरह दिख रहे है. ये सकारात्मक है. नही तो पिछले २-३ दशकों से वोट डालने भी नही जा रहे थे. लोकपाल के पास होने और उसके प्रभावी होने न होने से भी ज्यादा ये बात अपने मायने रखती है कि जनतंत्र को लोगों ने नेताओं के पास गिरवी नही रखा है, उसमे भागीदारी कर रहे है. हर तरह के लोगों पर इस आन्दोलन ने रोशनी डाली है. जो सबसे ज्यादा क्रांति, सामाजिक बदलाव की बात करते थे, वों लोग कोनों में दुबक गए है. और गाली खाने वाला मध्यवर्ग सड़क पर है. हर तरह के लोग है, हर तबके, हर धर्म और भाषा के. सच तो ये है कि ९०% को नही पता कि लोकपाल क्या है, वों शायद

इसीलिए जुड़े है कि अपने गुस्से और उम्मीदों के लिए उन्हें एक जगह मिल गयी है. मुझे उम्मीद है कि जब इतने विविध तरह के लोग एक जगह खड़े होंगे तो एक दूसरे से बहुत कुछ सीखगें, उनकी चेतना देर सबेर बदलेगी. सरकार और राजनैतिक पार्टियाँ अगर डर  के मारे सिर्फ ५% अपराधियों को भी टिकट आने वाले चुनाव में नही देती, और उनकी जगह २५-३० अच्छे लोग संसद में पहुच जाते है तो ये भी भारी जीत होगी. करोड़ों लोगो के हिस्से कुछ सामाजिक लाभ आएगा.
किसी जनांदोलन को पहले से तय रास्तों पर नही चलाया जा सकता, न ही वों चलता है, समय और समाज के हिसाब से उसकी अपनी स्वतंत्र विकास की दिशा बनती है. मुझे लगता है, अरुंधती इस बात को भूल गयी है. और बहुत सारे दूसरे लोग भी सांस बांधे यही कर रहे है...
 हमारी पीढ़ी ने उत्तराखंड का आन्दोलन देखा, वी पी सिंह के समय का मंडल देखा, उससे पहले आपातकाल के दरमियाँ हुये आंदोलनों के बारे में सिर्फ पढ़ा है. सब के सब बड़े समुदाय की ऊर्जा से चलने वाले, जाहिर तौर पर अराजनैतिक आन्दोलन थे,  कुछ दूध में उबाल की तरह थे, कुछ बहुत थक जाने और सरदर्द के बाद उल्टी कर देने जैसे, इन्ही रास्तों पर उनका अंत हुआ. होना भी था, कोई ग्रासरूट की गोलबंदी नहीं थी, राजनैतिक दूरदृष्टी नही थी, बड़ा सपना नहीं था, लोग कई खेमों में बंटे थे, सो जनाक्रोश का अंत हुआ. पर कुछ हद तक इन सबका गहरा असर हमारे समाज पडा, चेतना पर भी. हो सकता है इस आन्दोलन का भी यही अंत हो..., पर इस बात की मुझे उम्मीद है कि कुछ गुणात्मक परिवर्तन देश की चेतना में ज़रूर आएगा. कम से कम यही बात धंस जाय की जनता की भागीदारी ज़रूरी है, लोकतंत्र में...

Jul 26, 2011

प्रायमरी स्कूल

              

बस ज़रा सी याद है मुझे
प्रायमरी स्कूल की
यही कि पहाड़ की छाँव, खेतों के  बीच धूप नापते
रिक्ख, बाघ के डर के साये
डेढ़ घंटे पैदल चलना चलना होता
रोज़ पेन्सिल का आधा टुकड़ा मिलता    
जो शाम तक शर्तिया खो भी ज़ाता
दो महिला मास्‍टरनियां थीं जिनके पढाएं का
भरोसा नहीं करते थे माँ बाप
और थे दो मास्साब थे, ठोकपीट सीखा देते थे पहाड़े
एक ताई थी खिलाती थी दलिया
वैसे ये सूचना है कि
ताई के श्रीलंका की लड़ाई में २३ साल के शहीद बेटे का मुआवज़ा
इस स्कूल की छत की शक्ल में बचा है अब

तीसरी कक्षा में मुहम्मद साहेब का एक पाठ था 
सिर्फ़ एक वाक्य याद है अब तक
"अरब में लोग बेटियों को ज़मीन मे गाड़ देते थे"
नहीं मालूम था कहाँ अरब देश
पर गाली गढवाल में भी थी “खाडू म धरूल”1
महीनों आतंकित, सहमी नज़रें जब तब खेत में गढी लडकियां ढूंढती
कई बार माँ से पूछा मुझे कब गाड़ेगी?
माँ सुनकर आगबबूला होती
मुझे तब नहीं पता था कि मैं पहली संतान नही

चौथी में सम्राट अशोक के ह्रदय परिवर्तन का एक पाठ था
कलिंग को ध्वनि के मोह में ‘कर्लिंग’ लिखती रही
लिखती रही.. मार खाती रही..   कई कई दिन
तंग आकर मास्साब ने अलमारी के ऊपर बिठा दिया आधा दिन
और शाम को माँ से कहा
“इस लड़की को कुछ समझाना मुश्किल”

तीन दशक बाद एक पराये देश में
अपने बच्चे के लिए ढूंढ रही हूँ प्रायमरी स्कूल
परिचित, पड़ौसी बताते है कि
अच्छे प्रायमरी स्कूल की सरहद में मकान की कीमत बढ़ जाती है
मंदी की मार के बीच
प्रोपर्टी एजेंट प्रायमरी स्कूल और प्रोपर्टी के सम्बन्ध की तसदीक करता है
उसकी चिन्‍ता शिक्षा नही प्रोपर्टी की रीसेल वेल्यू है
अमरीका में अच्‍छे स्कूल का मतलब
उच्चमध्यवर्गीय बसावट का नजदीकी स्कूल है
मुक्त बाज़ार तय करता है स्कूल में संगत
इस बीच ओबामा रास्ट्रपति हैं
एक दशक के युद्ध और लगातार बढ़ती मंदी के बीच
शिक्षा के लिए बजट कटौती की सूचना है
स्कूल में वॉलेन्टियर करती मांयें हैं
शिक्षा की बदहाली पर “वेटिंग फॉर सुपरमेन”
2
और “एकेडेमिकली अड्रिफट”
3 है
गोकि जीवन में स्कूल से ही बंधी हूँ
प्रायमरी एजुकेशन का कोई प्राइमर नही मेरे पास...

***

1“खाडू म धरूल”; गाड़ दूंगी, एक गाली
2“वेटिंग फॉर सुपरमेन”; डेविड गूगनहाइम द्वारा निर्देशित डोकुमेन्टरी फिल्म(२०१०)
3“एकेडेमिकली अड्रिफट; रिचर्ड अरम और जोसिपा रोक्सा की किताब (२०११)

उड़ते हैं अबाबील, (कविता-संग्रह)-२०११  से

Jul 2, 2011

धूप


           

पतझड़ के बाद
शहर हुआ है सलेटी
सियाह
रंग रोशनी से महरूम
आह, कितना उदास
महीनों महीनों…

इस शहर सरीखे कई शहर
समयकाल से परे
सूरज की आस
धूप के ख्वाब में ऊंघते हैं
महीनों महीनों...

बारिश, बर्फ़,और धुंध के बीच
जो खिली आती है चटक धूप कभी
कनपटियाँ तपती
खिल उठती रूह
धूप का नाम होता
खुशी
हंसी
उम्मीद...
***

May 24, 2011

पहाड़ डायरी ०५- नक़्शे के बाहर का एक गाँव



ये मध्य हिमालय का एक गाँव है
जो ढूढे मिलता नही
डिजिटल अर्थ या  भारत के नक़्शे में कहीं
इस जगह का अनुमान सौ मील दूर क़स्बे से लगता
कच्चे और अधकच्चे रास्ते हैं दूर तक फैले हुये
अठारह मील की सिर्फ़ खड़ी चढ़ाई
बाहरी भूगोल में स्‍थानीय बाशिंदों की बहुत गति नही..

इस प्रदेश के ज़िक्र के बिना अधूरे
रामायण..
महाभारत..
कथा-उपनिषद..
पुराण..
इस प्रदेश का बस इतिहास नही...

आसमान से होड़ करती ऊँचाई पर
बित्तेभर जगह में
जंगली बकरी सी चढ़ती-उतरती हैं औरतें
जुटाती जाती जीवन संसाधन
अब तक हैं  पहुँचतीं दुलहिन
डोले में बैठ एक छोर से दूसरी छोर
और बहुत सी बहुयें झूल जाती रही किसी ठूंठ पर
जीवन की अदम्य चाहना और दुःख के बीच उपजे
हर ठूंठ- पेड़- पणधार के गीत है

दूर तक नही है अब भी स्कूल
पहुँचतें लोग अस्पताल चल मीलों मील
ये सन दो हज़ार दस का अफ़गानिस्तान नही  
यहाँ बम नही गिरा कभी
महाशक्तियों के बीच नही लड़ाई हुयी
बीस साल से तो कोई चोरी भी नही हुयी
वो भी हुयी थी सिर्फ ज़रा सा गुड़-चावल की  
भूखी बहुओं ने किसी कोने बैठ खीर खाई थी

लकड़ी प्रदेश..
नदी प्रदेश..
बिजली प्रदेश ये..  
मूलभूत सुविधाओं से वंचित
नागरिकता से बहिष्कृत
शाईनिंग इंडिया का कोना है
नखलिस्तान नही..  
मेरा अपना ही घर है...

***



(फोटो: उत्तरकाशी के एक गाँव की, पहाड़ के दुसरे बहुत से गाँवों की तरह,  साभार जयप्रकाश पवांर)

May 14, 2011

नराई*

गाढ़े कैनवस पर दूर तक खिंचती जाती
खुशी की रोशन लकीर 
किसी संकरी गली के मुहाने
उम्मीद  झांकती रहती
बहुत देर तक खाईयों के बीच झूलता एक पुल 
जब तब सौंफ की महक उठती
धीमें कहीं गुपचुप  बजता राग- "पीलू"
 

निस्संग  हवा में दूर कहीं चील उड़ती
रह रह कर बारिश की बूंदे झरती
हौले हौले अधूरा इन्द्रधनुष बनता 

जलतरंग के मोह में कंकण फेंकती
बच्ची मचलती चलती
और बस अभी-अभी 
तरणताल में एक मछली दिखती


तय जगह कोई मयस्सर नही
अजाने ही  स्मृतियाँ  हवा- सी सरसराती
रेत में लहर बन बहती हैं
बस  ज़रा-सी देर को कभी भी

कंहीं भी…
***
 
* नराई: मूलत: पहाड़ी शब्द, प्रियजनों को याद करना
कविता-संग्रह "उड़ते हैं अबाबील" से